Friday, March 30, 2018

थाने के वो 2 दिन.....

ज़िंदगी में कभी कभी ऐसे दिन भी देखने पड़ते हैं, जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की होगी। 

जब मैं चंडीगढ़ सबसे पहले अख़बार के दफ्तर में काम करने लगा था, तब सेक्टर 22 में काम करते थे।  फिर दफ्तर बदल कर सेक्टर 16  में  चला गया। ये वही दफ्तर था, जहां मैंने पहली बार बोलेरो गाडी चलाई थी और एक मारुती कार में डेंट भी डाल दिया था। एक दिन मैं रात को दफ्तर में अकेला था। सभी 6 बजे छुट्टी करके चले गए थे। रात के 8 या 9 बज रहे होंगे। मैं कंप्यूटर पर बैठा कुछ काम कर रहा था। तभी बाहर से किसी ने दरवाजे की घंटी बजायी। मैंने जब दरवाजा खोला तो 5-6  पुलिस वाले अंदर आ गए। एक बार तो मैं उन्हें देखर चौंक गया। वो दफ्तर के बारे में और मेरे बारे में पूछने लगे। फिर उन्होंने दफ्तर की तलाशी लेनी शुरू कर दी। 

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। वो जालंधर से आये थे। तभी मैंने दफ्तर के मैनेजर को फ़ोन किया और उनको सारी बात बताई। वो आधे घंटे में दफ्तर आ गए और आते हुए उनके लिए चाय बनवा कर ले आये। पुलिस वाले कंप्यूटर खोल कर उसमें भी कुछ ढूंढने लगे। पहले टीवी में ही देखा था ऐसे रेड डालते हुए। आज मेरे सामने तलाशी अभियान चल रहा था। वहां पर अख़बारों के बण्डल पड़े थे, उनको भी खोल खोल कर देखा। तभी वहां पर इश्तिहार मैनेजर भी आ गया। पुलिस वालों ने कहा कि सारे कंप्यूटर गाडी में रखो। मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ये किस चीज की तलाशी ले रहे हैं। 

पुलिस वालों ने सारे कंप्यूटर अपनी गाडी में रख लिए और मुझे कहा कि तुम भी हमारे साथ चलो। पहले तो मैं डर गया की मुझे क्यों ले के जायेंगे। फिर उन्होंने कहा की अपने कम्प्यूटर की रखवाली के लिये तुम हमारे चलोगे। मैंने बोला कि ठीक है, चलता हूँ। तभी वो इश्तिहार मैनेजर कहने लगा कि हम क्यों जायेंगे आपके साथ। वो उनके सामने गुस्सा हो रहा था। तभी पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा कि चलो सभी पहले इसको ही बिठाओ गाडी में। इंस्पेक्टर भी गुस्सा हो गया और जबरदस्ती उसको भी गाडी में बिठा लिया। पहले मैं अकेला जा रहा था, चलो अब हम दो हो गए। मैं अपने साथ एक चादर ले गया था ठण्ड में ओढ़ने के लिए।  

रात के 1 बज रहे थे जब  पुलिस वाले हमे चंडीगढ़ से जालंधर के लिए लेकर निकले। रस्ते में उन्होंने हमे ढाबे पर चाय भी पिलाई, और खाना भी खिलाया। सवेरे 4-5  बजे हम जालंधर थाने में पहुंचे। काफी नींद आ रही थी। थकावट भी हो गयी थी।  हम वहीं मुंशी के कमरे में एक बेंच पर ही लेट गए। सुबह हो गयी तभी मेरे जीजा जी और वो मैनेजर बोलेरो गाडी से वहां पहुंच गए। उन्होंने हमें चाय और कुछ खाने का सामान दिया। पूरा दिन हम थाने में ही बैठे रहे। दिन तो निकल गया, पर जब रात आयी तो हमने सोचा कि अब सोयेंगे कहां। इंस्पेक्टर ने हमारे सोने का प्रबंध पुलिस वालों के क्वाटर में कर दिया था। हम उनके साथ सोने चले गए। एक पुलिस वाले की रजाई में मैं सो गया और दूसरे के साथ इश्तिहार मैनेजर। वो सिगरेट बहुत पीता था। हम सभी उसे मुश्क कहकर बुलाते थे। उसके मुँह से सिगरेट की मुश्क आती रहती थी। 

पुलिस वाले ने उसे कहा कि यार तू  मेरी रज़ाई में मत आ, तू कहीं और चला जा। उसने मुझे कहा कि तुम आ जाओ, मैं इसे नहीं सोने दूंगा अपनी रजाई में। मुश्क बहुत आती है इससे। मुझे हसी तो बहुत आ रही थी, पर उसके सामने नहीं हस सका, और फिर पुलिस वाले भी थे, इसलिए अपनी हसी रोक के रखा। अगली सुबह फिर जीजा जी और मैनेजर हमारे लिये चाय और खाने का सामान ले कर आ गए। हमें वहां कैद ही महसूस हो रही थी। दिल कर रहा था कि कब यहां से छुटकारा मिले। 

अगले दिन शाम को पुलिस वालों ने हमें कहा कि आप अपने कम्प्यूटर ले के जा सकते हो। तब हमारी मानो जान में जान आ गयी हो।  अगले दिन हमने कम्प्यूटर गाडी में रखे और चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए। हमने भगवान का शुक्र अदा किया कि चलो यहां से तो निकले। इससे पहले कभी थाने नहीं गया था। पर ज़िंदगी में हर चीज का अपना एक एक्सपीरियंस होता है और होना भी चाहिए।

Thursday, March 29, 2018

वीसीआर भी एक बहाना था इकठे बैठने का.....


जब सबसे पहले टीवी आये, तो B/W टीवी भी बहुत अच्छे लगते थे। टीवी होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। किसी के घर में टीवी का होना उसका अमीर होना दर्शाता था। जिसके घर में रंगीन टीवी होता था, वो रईस की श्रेणी में आता था। पहले किसी को ये भी अंदाज़ा नहीं था कि टीवी रिमोट के साथ भी चल सकता है। 
जब रिमोट का ज़माना शुरू हुआ तो देख कर अचंभा लगता था कि इतनी दूर से बिना छुए टीवी शुरू और बंद कैसे हो जाता है। जैसे कोई जादू काम कर रहा हो।वायरलेस का तो नाम भी नहीं सुना था। जब किसी की शादी होती थी, तो उसकी शादी की कैसेट ज़रूर बनती थी। शादी के महीने बाद कैसेट तैयार हो कर मिलती थी। पहले वीसीआर वाली कैसेट होती थी, जो सिर्फ वीसीआर में ही दिखती थी। और हर किसी के घर वीसीआर नहीं होता था। किराये पर ले कर आते थे। फि जमाना बदला, कैसेट की जगह सीडी ने ले ली। फिर सीडी भी सीडी प्लेयर में ही चलती थी। वो भी किराये पर ले कर आते थे।

 धीरे धीरे सभी अपने घर में सीडी प्लेयर रखने लगे। फिर डीवीडी प्लेयर आये, सबकी क्वालटी बढ़िया होती जाती थी। आज तो एक छोटी सी नाख़ून जितनी चीज़ में ये सब चीजें आने लगी। जेब में पड़ी हुई भी किसी को पता नहीं चलता, पेन ड्राइव। जितनी छोटी है, अंदर से उतनी ही बड़ी।  पर आज उस ज़माने वाली बात नहीं, जो वीसीआर किराये पर लेकर कैसेट देखते थे। हमारे गांव में एक तो चिड़ीमार के पास होता था वीसीआर और दूसरा नाथ झूर के लड़के के पास होता था। वो टीवी ठीक करने का काम करता था। जिस दिन कैसेट देखनी होती थी वीसीआर में, उस दिन सभी अपने घर के काम जल्दी निपटा लेते थे। 

पड़ोस में भी बोल देते थे कि आज कैसेट लगेगी, सब आ जाना। एक दिन पहले वीसीआर बुक करना पड़ता था, कि कहीं कोई  और न बुक करके ले जाये। हम दो तीन बन्दे जा के वीसीआर लेकर आते थे।  हमारे घरों में B/W टीवी होता था। कैसेट देखना का मज़ा रंगीन टीवी में ही आता था। टीवी भी उसका ही लाते थे। टीवी बहुत बड़ा होता था, आजकल तो दिवार पर लगे हुए भी पता नहीं चलता। पतली पतली LEd आ गयी हैं। रस्ते में जो भी मिलता, वो पूछता कि आज किसके घर लगेगा। फिर वो भी पहुंच जाता। गांव के लड़कों को दूसरे की शादी की कैसेट देखने का मन नहीं होता था, क्यूंकि उसकी फोटो नहीं होती थी उसमें। 


उनको पता होता था कि एक कैसेट लगाने के बाद फिल्में लगेंगी। उस समय तबाही, बदला जट्टी दा, धर्मवीर, मैदान ए जंग, बहुत सारी फिल्में चलती थी। घर पर आ कर टीवी और वीसीआर लगा देना। मंजे बिछा देने, छोटे बच्चों के लिए पल्ली बिछा दी जाती थी। वीसीआर वाला ऐसा लगता था, जैसे कोई मेहमान आया हो, उसको एक मंजा बिछा के दे देते थे। वो सो जाता था। वीसीआर का रिमोट वो किसी को नहीं देता था। जब कैसेट आगे या पीछे करनी हो तो उसको ही उठाते थे। चिड़ीमार हमारे पड़ोस में ही रहता था, इसलिए वो रिमोट हमें दे देता था। और हम रिमोट लेकर अपने आप को सबसे खास महसूस करते थे। रिमोट की ज़रूरत भले ही काम पड़ती हो, पर पूरी रात रिमोट हाथ में ही रखते थे,  कि कहीं निचे उसको मिटटी न लग जाये। पूरी तरह संभाल कर रखते थे।  


पूरी रात में 3  कैसेट दिखती थी। पड़ोस में पता चले कि फलाने के घर वीसीआर लगेगा, सभी पहुंच जाते थे वहां। सवेरे उठकर आते थे घरों से। पड़े रहते थे पल्ली पर सारी रात। कई बार तो एक भी फिल्म पूरी नहीं देख पाते थे, नींद आ कर घेर लेती थी। आज तो वीसीआर किसी के पास भी नहीं रहे। सब के घरों में LEd  लगी हुई हैं। शादी की कैसेट या कोई फिल्म देखनी हो तो पेन ड्राइव लगा कर अपने अपने घर में देख लेते हैं। पहले वीसीआर के बहाने सभी एक जगह इकठे हो कर बैठ जाते थे। पर आज वो बहाना भी ख़त्म हो गया है। आज के ज़माने में हो रहे विकास ने रिश्ते भी ख़त्म से कर दिए हैं।


Tuesday, March 27, 2018

कैसा लगा? आया स्वाद : मच्छर


गांवों में लोग गर्मियों में घरों के बाहर ही सोते हैं। क्यूंकि गांव में बिजली की बहुत समस्या रहती है। और मच्छरों की तो पूछो मत। उनके लिए तो गर्मियां जैसे दावत बन कर आती हैं। लोगों का खून चूस चूस कर इतने मोटे हो जाते हैं कि लोगों का ये कहना भी गलत नहीं होता कि मच्छर हैं या मैस (भैंस)। कई रिश्तेदार तो गर्मियों में रिश्तेदारी में जाना भी पसंद नहीं करते। वो अपने घर में भैंस जितने मोटे मोटे मच्छर तो मार लेंगे पर रिश्तेदारी में जा के मच्छरों को मारना या मच्छरों से कटवाना कतई पसंद नहीं करेंगे। 

धीरे धीरे मच्छरदानियां आ गयी। उनको लगा के सोने लगे। अगर किसी कोने में से कोई एक मच्छर भी मच्छरदानी में घुस गया, बस सारी रात वो मच्छर ही तंग करता रहेगा। उसका पता भी तब चलता है, जब कान में आ के जैसे कोई गाना सुना गया हो। भीं भीं  करता फिरता रहता है। उस मच्छर को मारने के चक्कर में अपने गाल पर थप्पड़ मरते रहेंगे। फिर थोड़ी देर में कान में आ के भीं भीं करने लगेगा। जैसे आकर कहता हो, कि कैसा लगा, आया स्वाद, अपने गाल पर थप्पड़ मार कर। घर की छत पर चारपाई चढ़ा के सो जाते थे। छत पर थोड़ी बहुत हवा भी लगती थी। बिजली न हो तो एक तो मच्छर, दूसरे गर्मी, दोनों बहुत सताते हैं। 

कई बार तो ऐसा भी होता था, बरसात का मौसम है, और बिजली भीं नहीं होती, न ही हवा चलती ही। चारपाई छत पर ले गए, थोड़ी देर में बरसात की किनमण होने लग जाती थी। फिर नीचे उतारो चारपाई को। जैसे ही नीचे उतरे फिर बरसात हट जाती, फिर ऊपर ले के जाते, फिर बरसात आ जाती, फिर नीचे। कई बार तो सारी रात इस तरह ही निकल जाती थी। एक बार मेरे नाना जी आये हुए थे। बिजली नहीं थी, तो सभी अपने अपने मंजे ले कर छत पर चले गए। नाना जी, अपने मंजे पर लेट गए। तभी मेरे ताया जी ने पानी का गिलास ले कर उसमे से पानी की बूंदें नाना जी के ऊपर फेंक दी। और ताया जी खुद छिप गए। नाना जी को लगा की बरसात आ गयी है। नाना जी अपने मंजे से उठे और बिस्तर इकठा करके चलने लगे। हमने पूछा कि नाना जी क्या हुआ? नाना जी कहने लगे कि बरसात आ गयी है, तुम भी निचे चलो। भीग जाओगे। फिर हमने ताया जी को देख लिया। हम समझ गए।  तभी ताया जी सामने आ गए और कहने लगे कि क्यों मौसा जी, बरसात आ गयी। फिर वो भी हसने लगे। कि मुझे तो लगा था कि सचमुच ही बरसात आ गयी। 

मुझे बार बार मंजे को ऊपर नीचे ले जाना बिलकुल पसंद नहीं था। एक बार मैं बाहर आंगन में ही सो रहा था। बसात का मौसम था, मैंने पहले ही अपने मंडे के ऊपर डंडे खड़ेकर के पल्ली लगा ली थी। कि जब बरसात आये, तो मुझे उठना न पड़े। ऐसा ही हुआ। बरसात आ गयी, पर मैं नहीं उठा। सवेरे उठा तो मेरा सारा बिस्तर भीग चुका था। आजकल तो इन्वर्टर हर घर में लगे हुए हैं। बिजली की आधी समस्या ख़त्म हो चुकी है। पर पहले की तरह आँगन में सोने का आज भी बहुत मन करता है। पर आजकल घर में आँगन बचे ही कहां है। छत पर ठंडी ठंडी हवा में सोने का मज़ा ही अलग था।

Monday, March 26, 2018

शादी एक काम


पिछली कड़ी में हम शादी पर बात कर रहे थे। आज कल की शादियों में लगभग सभी रिश्तेदार शादी के दिन ही पहुंचते हैं, और शादी होते ही वापस मुड़ जाते हैं। ये भी कोई बात हुई। पहले जो शादियां होती थी, उनमे और आज की शादियों में ज़मीन आसमान का फर्क होता है। शादी में मासी, बुआ ही पहले आती हैं। बाकी रिश्तेदार शादी में शामिल हो कर अपनी हाज़री लगवा कर जाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। घर में बड़े बज़ुर्गों की छतर छाया में ही सब काम होते हैं। अगर घर में कोई बज़ुर्ग नहीं है तो ये देखा जाता है कि किस रिश्तेदार में कोई बज़ुर्ग है, उसको बुला लेते हैं। क्यूंकि उनको सब बातों का पता होता है, कि कब क्या करना है। उन्हें सब रस्मों का पता होता है। इसलिए कोई भी काम होता है, पहले उनकी सलाह ली जाती है।  

जिस दिन भठ्ठी चढ़ जाती है, पहले नैंण को लेकर गली में गुलगुले बाँटने के लिए भेज दिए जाते हैं। गुलगुल शादी की शुरूआती मिठाई है। कोई भी मिठाई बनाने से पहले गुलगुले ज़रूर बनाये जाते हैं। गांव में हर जगह खुली होती थी, टेंट खुली जगह में लगाया जाता था। आज जगह भी कम हो गयी है। शादी में एक नया नाम भी जुड़ गया, पैलेस।ज्यादातर लोक पैलेस बुक करने लगे हैं। सारी ज़िम्मेवारी पैलेस वालों की ही होती है। पर जिस घर में शादी होती है, वहां किसी बज़ुर्ग आदमी या औरत को छोड़ कर सब पैलेस में चले जाते हैं। आज शादी करना सिर्फ एक काम रह गया है। 

लोक सोचते हैं कि जितनी जल्दी हो शादी करके काम निपटा लो बस!! लड़की अपने ससुराल चली जाती है। लड़की वाले पैलेस से उसे विदा करके घर आ जाते हैं। लो हो गयी शादी। अब शादी में वो मज़ा नहीं आता, जो पहले शादी का नाम सुनकर ही आ जाता था। किसी की भी शादी होती है, मुझको तो एक ड्यूटी सौंपी जाती है। जब गांव के लोक टेंट में खाना खाने आते हैं, वो जब शगुन दे के जाते हैं, उनको कॉपी में लिखना होता था। मुझे वो कॉपी ले कर टेंट के गेट पर बिठा दिया जाता है। लगभग हर शादी में मेरा यही काम होता है। गेट पर कुर्सी ले के बैठ जाना ताकि आते जाते लुक मुझे देख सकें, और शगुन लिखवा सकें।  

कई रिश्तेदार तो अब बारात पहुंचने पर ही शादी में पहुंचते हैं, और लड़की कि विदाई होने से पहले ही अपने घर को चले जाते हैं। लड़की वाले भी भाजी और जो लेना देना होता है, पहले ही तैयार कर के रख लेते हैं। कोई भी मेहमान जाने लगे, बस उसे भाजी का लिफाफा और कपडे पकड़ा दें। वो भी लेट न हो जाये। लड़की की विदाई होते होते सब मेहमान भी चले जाते हैं। लड़के की शादी हो तो, लड़का शादी में फेरों पर बैठा होता है, और बारात की सारी गाड़ियां बारातियों को ले के मुड़ जाती हैं। एक गाडी छोड़ दी जाती है, दूल्हा और दुल्हन के लिए। आज किसी के पास समय ही नहीं रहा। समझ नहीं आता कि इतनी भागदौड़ करके कहां जाना है। दूल्हा दुल्हन को ले के वापस घर आता है, तो पता चलता है, मां का टब्बर, बुआ का टब्बर, मासी का टब्बर, सब चले गए अपने अपने घर को। घर में रह जाते हैं, बस घर वाले। ऐसी शादियों में मज़ा ही नहीं आता। सुबह शादी में गए, शाम को फिर अपने घर। अब वो माहौल ही नहीं बन पता। चलो खैर, चलने दो दुनिया को इस भागदौड़ में, हमें भी ऐसे ही दौड़ना पड़ेगा, नहीं तो पीछे ही रह जायेंगे।

Sunday, March 25, 2018

कहां गए वो हलवाई के कड़ाहे....


आज शादी की कोई बात चलती है तो एकदम से लड्डू का कड़ाहा आँखों के सामने घूम जाता है। क्यूंकि शादी की शुरुआत यहीं से होती थी। लड्डू बनाने के लिए बड़े बड़े कड़ाहे ले के आते थे। जिस घर में कोई कड़ाहा पड़ा हुआ मिल जाता था, उसे देखकर यही दिमाग में आता था कि इनके घर में कोई शादी है। जिस दिन हलवाई आ के अपना काम शुरू कर देता था तो शादी शुरू हो जाती थी। जब घर या पड़ोस में कोई शादी होने वाली होती थी तो ऐसे लगता था कि हमारी तो मौजें हो जाएँगी। स्कूल से छुट्टी लेने की भी ख़ुशी होती थी। शादी से 4 -5  दिन पहले हलवाई आ जाता था। 

आस पड़ोस में एक एक बन्दे को भठ्ठी पर आ जाने  के लिए बोला जाता था। आस पड़ोस से बजुर्ग आ कर इकठे हो जाते थे। भठ्ठी पर काम करने वालों को चाय और नाश्ता दे के काम शुरू कर दिया जाता था। सभी दिल से काम करते थे। किसी के मन में कोई भेदभाव नहीं होता था। सब इकठ्ठे बैठ कर गप्पें लड़ाते रहते थे।  हसी मज़ाक चलता रहता था। कोई गुस्सा भी नहीं करता था। मुझे याद है, मेरी शादी में 1  महीने पहले ही चाचे, ताये, भाई, सब इकठे हो गए थे। हमारे चौबारे वाले कमरे में ताश खेलना शुरू कर दिया था। 

ये कार्यक्रम शादी के बाद भी 15 दिन तक चलता रहा था। सुखदेव चाचा, रामजी लाल ताया, गुड्डा चाचा, नछतर पाल चाचा, गोरा चाचा,  सलिंदर चाचा, गुरमेल चाचा, नरमेल, धर्मबीर चाचा, बड़ा कला सभी ताश खेलते थे। आज कल तो ये सब ख़त्म होता जा रहा है। सबसे पहले तो हलवाई का काम ख़त्म होता जा रहा है। सभी रेडीमेड मिठाई मंगवा लेते हैं। आज ना कोई किसी को भठ्ठी के लिए बुलाता है, और ना ही कोई आता है। आज किसी के पास टाइम भी नहीं होता। एक समय होता था जब आस पास के लोग अपने घरों से दूध इकठा करके शादी वाले घर में दे के जाते थे। सबको पता होता था कि मेहमानों को आना है, दूध की ज़रूरत भी पड़ेगी। वो अपने आप ही आ के पूछते थे, कि अगर कोई ज़रूरत पड़े तो बेझिझक बोल देना। 

गांवों में सब का काम साँझा माना जाता था।  आज तो शादी वाले दिन ही पता चलता है कि फलाने के घर में शादी है। पड़ोस वालों को भी पता नहीं चलता कि पड़ोस में किस बात का फंक्शन है। आज तो हालत ऐसे होते जा रहे हैं, कि टब्बर में क्या हो रहा है, दूसरों से पता लगता है। आज कल की शादियों की बात सुनकर वैसा महसूस ही नहीं होता, जैसा पहले होता था। जैसे हमारे लिए तो उसी दिन से शादी शुरू हो जाती थी।

Friday, March 23, 2018

अलिफ़ लैला की तयब्बा जब हमारे घर आयी ....





हमारी ज़िंदगी में इंसानों के साथ-साथ जानवर भी बहुत महत्व रखते हैं। जैसे हमारा उनके प्रति लगाव गहरा होता है, उनका लगाव भी हमारे प्रति गहरा हो जाता है। वो भी हमारी तरह ही सहानुभूति की आशा रखते हैं। वो भी हमसे प्यार पाना चाहते हैं। जैसे कुत्ता जब छोटा होता है, तब वो साथ रहता है, फिर वो छोड़कर नहीं जाता। हमारे घर में भैंस, गाय, बिल्ली, कुत्ते पाले होते थे। मेरी छोटी बहन सीमा को जानवरों से खास लगाव था। 

घर में बिल्ली के बच्चे रहते थे। वो मम्मी से छुपकर उनको दूध पिलाती थी, खाना खिलाती थी।  सीमा उनके नाम रखती थी। जैसे टीवी में धारावाहिक आते हैं, उनमे जो नाम होते हैं, वो उनके नाम उन पर रख देती थी। जैसे तनु, तयब्बा, तैयब, और भी बहुत सारे। हमारी भैंस की कटड़ी का नाम तय्यबा रखा हुआ था। जो अलिफ़ लैला में सिंदबाद की कड़ी से लिया था। जब कभी बिल्ली के बच्चे तंग करते थे, जैसे दूध पी जाना, खाना झूठा कर देना। तो उनके पीछे हम डंडा लेकर भागते थे उनको वहां से खदेड़ने के लिए। पर वो जाकर सीमा के पास छिप जाते थे। जैसे उसको जा के बोलते होंगे कि हमें बचा लो, वो हमें मारेंगे। जैसे वो आपस में एक दूसरे की भाषा समझते हों। जब हम रात को सो रहे होते थे तो बिल्लियां हमारी रज़ाई के ऊपर आ के सो जाती थी। कई बार उनको निचे भी गिराया, डराया भी, पर वो थी की मानती ही नहीं थी। 

सवेरे हमारी रज़ाई के ऊपर ही सोई हुई मिलती थी। पर सीमा उनको अपने साथ अपनी रज़ाई में सुलाती थी। वो बोलती थी की इनको भी तो ठण्ड लगती है। सोने दो बेचारियों को। कई बार तो उनसे इतनी खीझ चढ़ती थी कि उनको भगा दें वहां से। सीमा उन्हें बहुत प्यार करती थी। तैयब्बा (कटड़ी) के लाड लड़ाती थी। जब वो उनके पास से गुजरती थी, उसको देख के तैयब्बा रिंगने लग जाती थी। दो कुत्ते काले रंग का और भूरे रंग के पाले हुए थे। काले वाला धर्मेंदर और भूरे रंग वाला जितेंदर। 

हमने धर्मवीर फिल्म देखी थी, जिसमे धर्मेंदर और जितेंदर होते थे। उनके नाम पर हमने उनके नाम रखे थे। वो बहुत लाड लड़ाते थे। उनको हम झिड़कते भी थे, तो जैसे उनको पता होता था कि ये गुस्से में है या प्यार में झिड़क रहा था। वो उल्टा लेटनियाँ खा के मनाने की कोशिश करते थे। और उनकी ये चालाकियां देख कर मन से गुस्सा भाग जाता था। 

काले रंग का कुत्ता गायब हो गया था। कई दिन बाद पता चला कि किसी ने उसे लाठी से मार दिया है। वो तो किसी को भौंकता भी नहीं था। जैसे भगवान ने उसे सिर्फ प्यार के लिए ही बनाया हो। क्या बिगाड़ा था उसका धर्मेंदर ने। फिर कुछ दिन बाद जितेंदर भी कहीं चला गया। शायद उनकी जोड़ी ही ऐसे थी, एक दूसरे से बिछड़ कर नहीं रह पायी। जब सीमा की शादी हो गयी तो बिल्लियां जैसे हमारे घर का रास्ता भी भूल गयी। जानवर भी इंसान की तरह प्यार के भूखे होते हैं। वो भी हमसे वैसी ही अपेक्षा करते हैं, जैसी हम दूसरों से करते हैं।

Thursday, March 22, 2018

साइकिल की क्रेंची, फिर डंडा, फिर उलटी क्रेंची, फिर पिछली सीट


आज हर कोई इतना व्यस्त हो गया है कि उनको अपने बचपन के दिन याद करने की भी फुर्सत नहीं है। अब कभी कोई बात याद आ जाये तो अकेले एंजोये भी नहीं कर कर सकते। जब सबसे पहले साइकिल चलाना सीखते हैं। साइकिल चलाते समय भी पहले कल्पना में साइकिल चलाता था। पहले क्रेंची चलाई, फिर डंडे पर चलाने लगा. एक बार कुल्हा इस साइड करना है, फिर दूसरी साइड। चलानी न भी आती हो, तो पैदल ही खींचते फिरते थे।  ऐसे ही चलाने लगा। 

उसके बाद तो साइकिल खेल ही हो गया था। कभी उलटी क्रेंची चलाना, कभी हैंडल से हाथ छोड़ कर, कभी हाथ बदल कर साइकिल चलाने लगा। कभी पिछली सीट पर बैठ कर, कभी हैंडल पर बैठ कर। हमारे गांव में एक लड़का है, उसको हम चिड़ीमार कहते थे, वो साइकिल से बहुत से करतब करता रहता था। उसको देखकर हमें भी लगता था कि हम भी ऐसा ही करेंगे। जैसे सर्कस में साइकिल को अलग अलग तरीके से चलाना होता है। कभी साइकिल की छलांग लगवाना।उसके बाद मैं जब सेक्टर 16  चंडीगढ़ में नौकरी करता था, ये 2004  की बात है। पहले दफ्तर सेक्टर 22 में होता था।  

जब मैंने नौकरी शुरू की। कंप्यूटर मेरे लिए नया था। तब मैं कंप्यूटर पर कोई भी काम करता था, बड़े शौक से करता था।  उस समय मुझे सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम, फिर शाम से रात होने का पता भी नहीं चलता था।  पहले मैं 15 दिन बााद घर जाता था। इतवार की छुट्टी वाले दिन जब मैं घर नहीं जाता था, तब शनिवार को रात को मैं सारी रात कंप्यूटर पर काम करता रहता था। नए नए काम सीखता रहता था कंप्यूटर पर। कई बार तो ऐसा भी हुआ था कि रात से सुबह कंप्यूटर पर काम करते करते ही हो गयी थी। दफ्तर की गाड़ी थी बोलेरो। मेरे जीजा जी चलाते थे। इतवार कि छुट्टी को वो अपने घर पटियाला चले जाते थे। और गाड़ी दफ्तर में ही रहती थी। जब कोई नहीं होता था तो मैं गाड़ी को लेकर सेक्टर 16 कि छोटी छोटी छोटी सड़कों पर निकल जाता था। उससे पहले मैंने कभी गाड़ी नहीं चलाई थी। 

एक दिन मैं गाड़ी ले के निकल गया और पुरे सेक्टर 16  में घूमने के बाद गाड़ी को वापस दफ्तर में खड़ी करने लगा। मैं गाड़ी को बैक कर रहा था। पीछे किसी की गाड़ी खड़ी थी मारुती कार। मैंने देखा नहीं, पीछे जाकर उस कार में लग गयी। खिड़की में छोटा सा डेंट पद गया। पर मैंने वो डेंट गाड़ी को खड़ी करने के बाद देखा। मैंने आसपास देखा, कोई नहीं था। मैंने शुक्र मनाया कि किसी ने नहीं देखा। और चुपके से दफ्तर के अंदर चला गया। उसके बाद जब कभी मौका मिलता, मैं गाड़ी चलाने लगा। फिर जीजा जी को भी बताया कि मैं गाड़ी चला लेता हूँ। इस तरह से मेरा हौसला बढ़ गया था। 

कई बार दोस्त पूछने लग जाते हैं कि कहां से सीखी गाड़ी चलानी। तो बोल देता हूँ कि अपने आप ही चलाने लग गया। वैसे कई बार दुर्घटना भी हुई। पर सब ठीक ठाक रहा। पर अब वो बातें ही नहीं रही। अब भी दिल करता है कि इस व्यस्त ज़िंदगी से कुछ समय निकाल कर बचपन के दिनों में खो जाएँ।

Wednesday, March 21, 2018

गुड मॉर्निंग, व्हाट्सप्प


सुबह उठते ही हाथ सीधे फ़ोन पर जाता है। फ़ोन उठाने के बाद व्हाट्सप्प पर जाती है हमारी ऊँगली। क्यूंकि सुबह सुबह सभी गुड मॉर्निंग के मैसेज भेजते हैं। बदले में सभी उनको रिप्लाई भी करते हैं। क्यूंकि फ्री है। सबसे पहले गुड मॉर्निंग का ही मैसेज होता है, जो सबको भेजा जाता है। पर अब गुड मॉर्निंग पर टैक्स लगाया जा रहा है। जो मैसेज भेजेगा उसे टैक्स भरना पड़ेगा। क्यूंकि हमारे भारत में सुबह सुबह लोगों को कोई काम तो होता नहीं और उनको फ़ोन सुबह की डिश की तरह लगता है। शायद उनको लगता है कि अगर सवेरे गुड मॉर्निंग का मैसेज नहीं भेजेंगे तो हमारी दिनचर्या शुरू नहीं होगी। और हो सकता है कि हमारे भाई, दोस्त, मित्र, रिश्तेदार नाराज़ भी न हो जाये, कि आज गुड मॉर्निंग का मैसेज क्यों नहीं भेजा। बात में भी सचाई है, गुड मॉर्निंग का मैसेज भेजने से ही पता चलता है कि कोई उन्हें भी याद कर रहा है। पर अब अगर गुड मॉर्निंग के मैसेज पर टैक्स लग जाये तो क्या होगा। सुना है कि सुबह लाखों करोड़ों लोग गुड मॉर्निंग का मैसेज भेजते हैं, जिससे इंटरनेट स्लो हो जाता है। और तो और जो पिक्चर भेजते हैं, उनकी तो डाउनलोडिंग और भी ज्यादा है। उनका तो पुरे महीने का बिल ही कमर तोड़ देगा। सर्कार का कहना है कि जब टैक्स लग जायेगा तो लोग मैसेज भेजना बंद कर देंगे और इंटरनेट की स्पीड ठीक हो जाएगी। पर शायद ये उनको भरम है। जो शायद उनको भी पता है। अगर फिर भी मैसेज भेजने बंद नहीं किये तो उस पर भी टैक्स लगाया जायेगा जिसको मैसेज भेजा गया है। अब वो मैसेज भेजे न भेजे पर पढ़ने वाला ज़रूर मना करेगा कि भाई मुझे मैसेज मत भेजना। मैं ऐसे ही ठीक हूँ। तो अब क्या किया जाये। पर आप घबराईये नहीं। ऐसा कुछ नहीं होगा। आपको याद होगा कि ये खबर किस समय पर आयी थी। जी हाँ! ये होली पर आयी थी खबर। होली के दिन अख़बार में ये खबर लगी। इस तरिके से होली मनाई गयी। होली मनाने का न्य तरीका ईजाद किया गया। जिसने भी ये पढ़ी उसको यही लगा कि भाई अभी से बंद कर देता हूँ मैसेज करना। वैसे भी व्हाट्सप्प पर गुड मॉर्निंग का मैसेज क्यों करते हैं, क्यूंकि वो फ्री है। पैसे वाला कोई मैसेज नहीं करेगा। किसी को याद करने के चक्कर में कोई अपनी जेब ढीली नहीं करेगा। और दूसरी बात भी है, जिसको याद करना हो, मैसेज करना हो वो पैसे कि परवाह भी नहीं करेगा। चाहे कोई कितना भी टैक्स लगा ले।   

Tuesday, March 20, 2018

गज़ब का मैच था वो .....


मुझे क्रिकेट मैच देखने का बहुत शौक है। जब भी भारत का मैच चलता हो, फिर चाहे कोई भी काम हो, बस दिल करता है कि काम छोड़कर मैच ही देखते रहें। जब मैच हमारे मुताबिक नहीं होता तो निराशा भी होती है। और जब हमारे मुताबक होता है, जैसा हम चाहते हैं, तो ख़ुशी इतनी होती है कि बस पूछो ही मत। हाल ही में भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश का टी 20  ट्राई सीरीज ख़त्म हुई। जिस दिन भारत का बांग्लादेश के साथ फाइनल मैच था उस दिन मैं घर गया हुआ था। मैच शाम को 6  बजे के आसपस शुरू हुआ था। मुझे पता भी नहीं था कि आज मैच है। मैं ताया जी के घर बैठा था। मुझे उनके घर से टीवी में मैच की आवाज आ रही थी। मैंने अंदर जा के देखा तो मैच की हाइलाइट्स दिखा रहे थे। मुझे लगा कि शायद मैच ख़त्म हो गया है, अब तो कोई फायदा नहीं। पर जब पता चला कि अभी तो बांग्लादेश की पारी ख़त्म हुई है, अब भारत की बैटिंग आएगी। मैं जल्दी से अपने घर भागा और जा के टीवी चलाया। काफी देर सर्च करने के बाद मुझे चैनल ही नहीं मिला। मुझे लगा कि शायद हमारे टीवी में वो चैनल ही नहीं आएगा। तभी मेरे भाई ने बताया कि मैच तो 238  नंबर पर आता है। मैंने जल्दी से वो चैनल लगाया तो वहां मैच शुरू होने ही वाला था। वैसे तो मैच नार्मल ही चल रहा था। रोहित शर्मा अच्छा खेल रहा था। शिखर धवन जल्दी ही आउट हो कर पेवेलियन लौट गया था। भारत की 2 विकेट 32  रन पर सिमट गयी थी। रोहित शर्मा ने 56  रन बनाये। सुरेश रैना ने कोई खाता भी नहीं खोला था। टी 20  मैच में अच्छा ये होता है कि उसमे शॉट देखने को मिलते हैं। चौके और छक्कों की तो मानो बरसात होती है। भारत मैच जीतने के नज़दीक जा रहा था कि फिर कोई न कोई विकेट उड़ जाती, और फिर से पीछे रह जाता। कई बार तो दिल करता था कि बस अब नहीं जीतेंगे, टीवी बंद ही कर देना चाहिए। मनीष पांडे अच्छा खेल रहे थे, कि वो भी आउट हो गया। अब क्रीज़ पर शंकर और दिनेश कार्तिक थे। मैच जीतने के लिए 2 ओवर में 35 रन बनाने थे। दिनेश कार्तिक ने आते ही पहली गेंद पर छक्का जड़ दिया। सब देखते ही रह गए, कि ये क्या हो गया। अब भारत के प्रशंसकों को आशा की एक किरण  दिखाई दे रही थी दिनेश कार्तिक के रूप में। दिनेश कार्तिक ने भी दर्शकों को निराश नहीं किया। अगली गेंद में चौका जड़ दिया। उससे अगली गेंद में फिर से छक्का मार कर गेंद को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। अब बांग्लादेश के खिलाडियों में कानाफूसी होने लगी। अब क्या किया जाये। उसके बाद एक और चौका मार कर और 2 रन लेकर दिनेश कार्तिक ने स्कोर को 35 से 18 कर दिया था। उसने 1  ओवर में 22  रन जड़ दिए थे जो इस मैच का 1 ओवर का सबसे बड़ा स्कोर था। अब ओवर खत्म हो गया था।  शंकर स्ट्राइक पर आ चुके थे। सभी बोल रहे थे कि दिनेश को स्ट्राइक दो। अगले ओवर की गेंद डाली गयी तो डॉट बॉल हो गयी। अब चिंता बढ़ती जा रही थी। शंकर ने 1 रन लेकर दिनेश को स्ट्राइक दी तो दिनेश कार्तिक ने फिर से चौका जड़ दिया। फिर 1  रन लिया और स्ट्राइक फिर से शंकर के पास आ गयी। शंकर ने भी चौका मार कर स्कोर को थोड़ा सा सरकाया। अगली गेंद पर भी शंकर ने चौका लगाना चाहा पर गेंद को फील्डर ने कैच कर लिया और शंकर के प्रयास को मिट्टी में मिला दिया। शंकर आउट हो कर चला गया। अब गेंद 1  बची थी और रन 5  बनाने थे। कुमेंट्री करने वालों को भी नहीं पता चल रहा था कि दिनेश किस तरफ खड़ा है। स्ट्राइक किसके पास है। सभी सोच रहे थे कि अब क्रीज़ पर नया खिलाडी वाशिंगटन है।  और ये मैच तो गया हाथ से। मैंने भी अपना हाथ रिमोट की तरफ बढ़ा दिया था, कि अब तो टीवी बंद कर देता हूँ। पर जैसे ही स्ट्राइक के लिए तीर का निशान वाशिंगटन से हट कर दिनेश कार्तिक के पास चला गया तो मैंने रिमोट को छोड़ दिया। जैसे सबके मन कि बात भगवन ने सुन ली हो और स्ट्राइक बदल कर दिनेश को दे दी। और अब मैच की आखरी गेंद घूमती हुई आ रही थी दिनेश कार्तिक की तरफ। सभी दर्शक साँसे थाम कर बैठे थे। मैच किसी भी समय पलट सकता था। अगर चौका भी लगता तो मैच ड्रा होता, जीतने के लिए छक्के की ज़रूरत थी। जैसे ही गेंद आयी दिनेश कार्तिक ने घुमा दिया अपना बल्ला और गेंद को पहुंचा दिया बाउंड्री लाइन के बाहर 6 रनों के लिए। सारे दर्शक झूमने लगे। ड्रेसिंग रूम से सारे खिलाडी बाहर मैदान में दौड़ कर आ गए। सबने आ कर दिनेश कार्तिक को बाँहों में उठा लिया। दिनेश कार्तिक ने 8  गेंद पर 29  रन बना बनाये।  उसने 2  चौके और 3  छक्के लगाए। यह एक गज़ब का मैच था। ऐसा मैच कभी कभी ही देखने को मिलता है। घर में सब सो गए थे। मैं अकेला ही ये मैच देख रहा था। ख़ुशी जाहिर करने के लिए भी कोई चाहिए होता है। अकेला बंदा ख़ुशी भी कैसे मनाये। मैं बाहर गली में आ गया कि शायद कोई मिल जाये जिसके साथ ख़ुशी सांझी की जा सके। बाहर गली में ताया जी का लड़का मिल गया। उससे साथ ख़ुशी सांझी की, दो चार बातें की मैच के बारे में और जा के बिस्तरे में सो गए।

Monday, March 19, 2018

क्या धर्म की जगह पर भी ऐसा हो सकता हैं, विश्वास नहीं होता


कई बार हमारे सामने ऐसे किस्से आ जाते हैं कि हमें उन पर विश्वास करना मुश्किल लगता है। हम समझ ही नहीं पाते कि जो हमारी आँखों के सामने हो रहा है क्या ये सच में हो रहा है। ना चाहते हुए भी उन पर विश्वास करना पड़ता हैं। ऐसा ही एक किस्सा मेरे सामने भी आया। मैं मोहाली एक अख़बार के दफ्तर में काम करता था। एक दिन मैं दोपहर को 3  बजे दफ्तर जाने के लिए कमरे से निकला। थोड़ी दूर जा के एक गन्ने के रस की रेहड़ी देख कर मैं रुक गया। गर्मी होने के कारन प्यास भी लग रही थी।  मैंने गन्ने का रस पिया और जैसे ही दफ्तर के लिए चलने लगा तो एक लड़के ने मुझसे कहा कि भैईया मुझे 20  रूपये दे दो, खाना खाना है, भूख लगी हैं।  मैंने सोचा कि इनका तो काम यही है, हर किसी से खाने के नाम पर पैसे मांगते रहते है। मैं मना करके चलने लगा। पर मुझे लगा कि ये लड़का लग तो पंजाबी रहा हैं, पर हिंदी बोल रहा हैं। पंजाब के लड़के तो भीख नहीं मांगते। या तो इसकी कोई मज़बूरी होगी या फिर ये नशे का आदी होगा जो अपनी नशे कि ज़रूरत पूरी करने के लिए पैसे मांग रहा हैं। फिर मैंने उसे टालने के लिए कहा कि ये पास में गुरद्वारा है, वहां से खा लो लंगर, कोई मना नहीं करेगा। मैं उसके साथ पंजाबी बोल रहा था। फिर वो भी पंजाबी में बात करने लगा। उसने कहा कि मैं गया था गुरद्वारे में, पर उन्होने मुझे मार के भगा दिया। मुझे उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता तू झूठ बोल रहा है। तुझे पैसे नहीं दूंगा मैं। उसने फिर कहा कि गेट पैर बन्दे ने मुझे डंडे से मारा और भगा दिया। मैंने कहा कि मेरे साथ चल, तू झूठ बोलता है। मैं उसे ले के जैसे ही गुरद्वारे के गेट के सामने पहुंचा, तो गेट पर बैठा सिक्ख बंदा एक मोटा डंडा लेकर आया और उसे मेरे सामने ही मारने लगा। मैंने उसे रोका और पूछा कि क्यों मार रहे हो इसे, ये तो खाना मांग रहा था। उसने कहा कि ये चोर है, जूते चुराता है। सिक्ख बन्दे ने उससे कहा कि मैंने तुझे मना किया था कि यहां मत आना, तेरी टांगें तोड़ दूंगा। फिर उसने उसको मारने कि कोशिश की। मैंने रोका तो डंडा मेरे कंधे पर लगा। वो डंडा भी कोई छोटा मोटा डंडा नहीं था, चारपाई का सेरवा था। मुझे भी बहुत ज़ोर से लगा। मैंने उससे कहा कि अगर ये चोर होता तो आपसे डंडा खाने दोबारा क्यों आता यहाँ। इसने खाना खाना है, खिला दो। सिक्ख बन्दे ने जो जवाब दिया उसे सुनकर मुझे भी विश्वास नहीं हुआ कि इस तरह के इंसान भी हैं, वो गुरु घर के अंदर। उसने कहा कि यहां कोई होटल है, जो इसे खाना खिला दू, यहां तो किसी का भोग है। उसके शब्द सुनकर मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई सिक्ख बंदा ये शब्द बोल रहा है। मैंने सोचा कि अगर इके साथ यहां बहस करेंगे तो बात बढ़ जाएगी और मैं धर्म के नाम पर कोई बात भी नहीं करना चाहता। क्यूंकि धरम पर होने वाली बहस कभी खत्म नहीं हो सकती। तभी मैंने उस लड़के को 20  रूपये निकाल कर दिए, और कहा कि ये लो पैसे कुछ खा लेना, और दोबारा इनके पास मत आना मार खाने। ये घटना मैंने अपने दोस्तों को सुनाई तो उन्होंने विश्वास नहीं किया की कोई सिक्ख बंदा ऐसा नहीं कर सकता। पर ये मेरे सामने की घटना हैं, जो मैं चाहते हुए भी नहीं भूल सकता।

Sunday, March 18, 2018

मार खाने के बाद तो नहीं रोया, पर ....


प्राइवेट स्कूल से आठवीं पास करके मैंने नौवीं क्लास में दाखला ले लिया था। सरकारी स्कूल 10 वीं तक था। नौवीं क्लास में सब नए नए चेहरे थे। हमारे स्कूल से आठवीं क्लास में मैं या एक दो और पास हुए थे। इसलिए सभी मेरे लिए नए थे। जब क्लास शुरू हुई तो मास्टर ने पूछा की आुपकी क्लास से कौन कौन पास हुए हैं। मैंने कह दिया की सब पास हुए हैं, एक दो फेल हुए हैं। तब तो कुछ नहीं हुआ, मास्टर जब चला गया तभी सौंटी के एक लड़के ने आकर मेरी बाजु मरोड़ कर खा की झूठ क्यों बोला की सभी पास हुए हैं। मैं कुछ नहीं बोला। मैं वैसे भी बहुत कम ही बोलता था, शर्माता ज्यादा था। तभी एक लड़की ने मुझे छुड़वाया कि फिर क्या हुआ, तू मारेगा उसे।  मुझे बहुत बुरा लग रहा था। स्कूल में मैं सबसे दूर ही रहना चाहता था। मुझे दर लगता था कि कहीं मुझसे कोई गलती न हो जाये। एक दिन हम सब स्कूल के आँगन में बैठे पढ़ रहे थे। सब थोड़ी थोड़ी दूर बैठे थे। पी टी मास्टर कुर्सी ले के बीच में बैठा था। तभी कुछ लड़के है रहे थे। मास्टर ने कहा कि कौन है जो है रहा है। कोई नहीं बोला, सब चुप हो गए। लेकिन वो कहां मैंने वाला था। उसने मुझे उठा लिया, बोला कि तू झूठ नहीं बोलेगा, है।तू बता कि कौन था जो शोर कर रहा था। मुझे पता था, पर मैं नहीं चाहता था कि किसी कि पिटाई कि वजह मैं ना बनूँ। पी टी मास्टर बहुत सख्त था, बहुत लम्बा चौड़ा कद था उसका, देखते ही मन में डर सा बैठ जाता था। मैंने कुछ नहीं कहा। फिर उसने मुझसे छड़ी मंगवाई और मेरे हाथों पर मारने लगा। मैं चुप रहा, फिर कहता कि एक तो बता नहीं रहा, और ऊपर से हस रहा है। उसने मुझे और जोर से मारना शुरू कर दिया। सभी मास्टर हमारी तरफ देखने लगे। काफी देर मारने के बाद हमें क्लास में भेज दिया। अब अगली घंटी अंग्रेजी कि थी। अंग्रेजी वाला मास्टर क्लास में आया। सबसे पहले उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा कि क्या हुआ था वो मास्टर क्यों मार रहा था। मैंने सारी बात बता दी। तब उसने मुझसे कहा कि तू बता देता कि कौन शोर रहा था। उनकी वजह से खुद मार खा ली। तभी मेरी आँखों में आंसू आ गए। इतनी मार खाने के बाद भी मेरी आँखों  में आंसू नहीं आये थे। पर अंग्रेजी वाले मास्टर के पूछने से ही मेरी आखें भर आयी थी। क्यूंकि वो पर से पूछ रहे थे। मुझे ये घटना आज भी याद आती है। कि पल होते हैं जिनको कभी भुलाया नहीं जा सकता।

नवरात्र स्पेशल यात्रा


आज 18  मार्च 2018 को नवरात्रे शुरू हो गए  हैं। देवी माँ के दर्शन करने के अभिलाषी इन दिनों माता के मंदिर में जा के पूजा करते हैं। माता के दर्शनों के लिए भक्त दूर दूर से आते हैं। इन दिनों भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार दान पुण्य करते हैं। माता वैष्णो देवी जाते हैं। आज हम आपको माता वैष्णो देवी जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए स्पेशल लेख लेकर आये हैं। माता वैष्णो देवी दर्शनों के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह पवित्र स्थान जम्मू कश्मीर में त्रिकुटा की पहाड़ियों में है। वहां पर एक गुफा है। इस गुफा में माता रानी अपने भक्तों को दर्शन देती है। माता वैष्णों देवी के दर्शनों के लिए जिस रास्ते का प्रयोग किया जाता था वह संकीर्ण होने की वजह से नए रास्ते का निर्माण किया गया था। जब कभी श्रद्धालु कम संख्या में आते हैं तो पुरानी गुफा के रास्ते से माता के दर्शनों के लिए जाते हैं। इस गुफा में माता ने भैरव को मारा था। भैरव का सर धड़ से अलग हो कर भैरव घाटी में गिरा और शरीर इसी गुफा में रह गया। पुरानी मान्यता के अनुसार आज भी भैरव का शरीर गुफा में मौजूद है। जितना महत्व माता वैष्णो देवी मंदिर का माना जाता है, उतना ही महत्व इस गुफा का भी है। इस गुफा में गंगा का पवित्र जल बहता रहता है। वैष्णो मंदिर तक पहुंचने के लिए गर्भजून गुफा में से भी गुजरना पड़ता है। इस गुफा में माता 9  महीने रही थी। जैसे कोई बच्चा अपनी माता के गर्भ में 9  महीने रहता है। इसलिए इस गुफा को गर्भजून गुफा कहा जाता है। अगर आप हवाई जहाज से वैष्णो देवी जाना चाहते हैं तो आपको जम्मू जाना होगा। जम्मू यहां से 48  किलोमीटर दूर है। भारत के बड़े शहरों से जम्मू के लिए हवाई जहाज की सुविधा उपलब्ध है।  जम्मू पहुंचने के लिए ट्रेन की सुविधा भी उपलब्ध है। कटरा तक ट्रेन जाती है। कटरा से वैष्णो देवी की यात्रा शुरू हो जाती है। बस में सफर के चाहवान भक्तों के लिए बस की सुविधा भी उपलब्ध है। वैष्णो देवी का मंदिर पुरे साल खुला रहता है। सर्दियों में भक्तों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए सर्दियों में भक्त कम ही जाते हैं।

Friday, March 16, 2018

हम बिटवा को ले जायेगा, हम बिटवा को ले जायेगा


कई बातें होती हैं, जिनको हम कभी मानना नहीं चाहते, पर वो हमारी ज़िंदगी के साथ जुडी होती हैं। जब कोई हमें इन बातों के बारे में बताता है, तो हम उसकी बातों को ऐसे ही टाल देते हैं, लेकिन जब खुद हमारे साथ ये घटना होती है, तो हमें ना चाहते हुए भी मानना पड़ता है। ऐसे ही एक घटना मेरे साथ हुई थी। मैं उस समय 8वीं में पड़ता था। नैबे के स्कूल में। हमारे हेड मास्टर का नाम नायब सिंह था, पर हम उन्हें नैबा ही बुलाते थे। हमारे स्कूल में कहीं से मधुमखियाँ आ गयी। वो कमरों में भी घुस गयी। थोड़ी देर आग भी जलाई, पर वो नहीं गयी। अब टीचर्स को भी चिंता हुई, कि कहीं किसी बच्चे को ना काट ले। जब मधुमखियां वहां से नहीं गयी तो सब बच्चों को सरकारी स्कूल में ले गए। उस दिन सरकारी स्कूल की छुट्टी थी। वो हमारे स्कूल के पास ही पड़ता था। सब बच्चे सरकारी स्कूल में चले गए। हम साइंस वाले कमरे के सामने बरामदे में बैठ गए। साइंस वाले कमरे में कंकाल टंगे होते थे प्लास्टिक के। पर उस समय हमें नहीं पता था कि ये नकली होते हैं। हम उन्हें भूत कहते थे। उस दिन स्कूल में मुझे बुखार हो गया। हम क्लास ख़त्म करके घर आ गए। घर आ के मुझे और तेज बुखार हो गया। मैं सो रहा था। जब मैं उठा तो माँ ने मुझे कहा कि तू किसकी भाषा बोल रहा था। मुझे समझ नहीं आया कि क्या पुछ रही थी। उन्होंने बताया कि मैं बिहारी भाषा बोल रहा था कि हम बिटवा को ले जायेगा, हम बिटवा को ले जायेगा। किसी ने कहा कि उस स्कूल में भूत रहता है। पहले समय में कभी कोई बिहार का भईया था, जो वहां मर गया था। तब से ही उसका भूत यहां रहता है। लेकिन हम इस बात को अफवाह ही मानते थे। पर जैसे ये बातें किसी और ने भी कही तो हमें भी लगने लगा कि शायद ये सच हो। उस दिन मुझे लगा कि शायद सच में ही वो भईया ही होगा, जो मेरे अंदर घुस गया। और मुझ से  कुछ से कुछ बुलवा रहा है। उस दिन मुझे सामने टंगे झोले में से भी जैसे कोई सांप निकलता हुआ दिख रहा था। मैं तखत पर लेटा हुआ था, उस पर भी ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई नीचे से मुझे चूंटी काट रहा हो। मुझे सब सच लगने लगा था कि ये वो ही भईया है, जो मेरे अंदर घुस गया था। माँ ने मुझे दवाई दिलवाई, फिर ठीक हुआ, तो मैंने सब को बताया कि मेरे अंदर भईया घुस गया था। आज उन बातों को सोचता हूँ कि कैसे हम इन बातों पर विश्वास कर लेते थे।

Thursday, March 15, 2018

बाइक की छलांग लगवा कर बना शक्तिमान


कई बार हमसे गलती हो जाती है, पर हमें उसका अहसास बाद में होता है। मैं जब भी बाइक पर चलता हूँ, तो हमेशा ख्याल रखता हूँ कि कोई गलती न हो। ऐसे ही एक घटना हुई थी मेरे साथ। मेरी ही गलती थी, किसी को कोई दोष भी नहीं दे सकते। रात को 10 :30  बजे अपनी ड्यूटी ख़त्म करके मैं गांव जाने के लिए तैयार हो गया। शनिवार रात को 10  बजे निकलता हूँ दफ्तर से, और साढ़े 11 बजे घर पहुंच जाता हूँ। इतवार की छुट्टी होती थी, तो सोमवार को सवेरे वापस चंडीगढ़ आ जाता था। उस दिन आंधी चल रही थी। आंधी बहुत तेज थी, इस बात का डर भी था कि रास्ते में पेड़ भी गिरे हो सकते हैं। बरसात होने का डर भी लग रहा था। मैं दफ्तर से निकल गया था। अम्बाला पार करके नग्गल के पास पहुंचा था। मुझे सामने एक सफेदे का पेड़ गिरा हुआ नज़र आया जो आंधी में गिर गया था। सड़क के बीच में पड़ा था। मुझे लगा की शायद छोटी छोटी टहनियां ही हैं, इनके बीच में से निकल जाऊंगा। मैंने अपने पैर लेग गॉर्ड  पर रख लिए और बाइक की रेस बढ़ा दी। जैसे कि बाइक की छलांग लगवानी हो। उसके बाद मुझे तभी पता चला जब मैं सड़क पर घिसटता जा रहा था। टहनियों के बीच में एक मोटा तना भी था, जो मुझे नज़र नहीं आया और उससे टकरा कर बाइक दूर जा गिरी। मैं भी साथ में सड़क पर घिसटता जा रहा था। मैंने सड़क पर अपने हाथ लगाए हुए थे अपने आप को रोकने के लिए। जब मुझे लगा कि अब नहीं रुक सकता तो मैंने हाथ हटा दिए। फिर मैंने दो तीन पलटियां खायी और सड़क पर रुक गया। मैंने उठ कर देखा तो बाइक मुझसे भी आगे जा के रुकी थी। बड़ी मुश्किल से मैं उठा अपना बैग संभाला और बाइक को उठाया। बाइक की लाइट टूट गयी थी। एक इंडिकेटर जल रहा था। वहां से घर अभी 10  किलोमीटर दूर था। उसके सहारे मैं वहां से घर तक पहुंचा। घर में किसी को पता न चले इसलिए धीरे से बाइक को साइड में खड़ी कर के चारपाई पर कम्बल ले के बैठ गया। मेरे ताया जी की लड़की कमलेश आयी हुई थी। वो अभी सोये नहीं थे। उनको मेरे आने का पता था, इसलिए मुझसे मिलने के लिए आ गयी। वो मुझे समझाने लगी कि रात को नहीं चला करते, सो बात हो सकती है और तू तो किसी को बताता भी नहीं कि मेरे साथ ऐसा हुआ है। मैं सोच रहा था कि वैसे तो अब भी मेरे साथ वैसा ही हुआ है। थोड़ी देर में परवीन (मेरी घरवाली) को मेरी बाजु नज़र आ गयी। उस पर खून लगा हुआ था। उसने कंबल को हटा दिया। मुझे भी तभी पता चला कि मेरी बाजु पर बहुत चोट लगी थी। बस फिर क्या था, सब इकठा  हो गए। तभी मेरी आँखें छलछला गयी। आँखों में पानी भर आया। फिर ताया जी का लड़का छज्जू आया और उसने बाजु पर पट्टी बंधी और दवाई दी। मैं सोच रहा था कि मेरी ही गलती थी, जिस वजह से ये एक्सीडेंट हुआ। उस समय तो मैं मानो शक्तिमान ही बन गया था, बाइक को सफेदे के ऊपर से छलांग लगवाने लगा था। उस दिन मैंने अपने आप को समझाया कि आगे से कभी भी ऐसी गलती नहीं करनी। कभी शक्तिमान नहीं बनना। हमें तो दुःख होता ही है, हमारे घरवालों को भी बहुत दुःख होता है हमें इस हालत में देख कर।

Wednesday, March 14, 2018

छुट्टियों में निक्कर में हुए दो सुराख़


स्कूल की छुट्टियों का इंतज़ार तो हर किसी को रहता है। चाहे वो स्कूल में पढता हो, या नहीं। कभी किसी को अपने मायके जाना हो तो उनका भी एक ही बहाना होता था कि जब बच्चों की छुट्टियां होंगी, तभी आएंगे। एक बार मुझे छुट्टियों में अपनी चाची जी के साथ उनके मायके जाने का मौका मिला। नाना जी और नानी जी सरसावा में रहते थे। नाना जी गन्ना मिल में काम करते थे। मिल की तरफ से उनको फ्लैट मिला हुआ था। सरसावा में गन्ना मिल के पास ही रहते थे। मैं , चाची, उनका बेटा दर्शन, पवन, और ताई जी का बेटा छज्जू एक साथ सरसावा गए। मेरी चाची और ताई दोनों सगी बहनें हैं। सरसावा ट्रेन से जाते थे। इससे पहले मैं कभी ट्रेन में नहीं बैठा था। अम्बाला कैंट से सरसावा की ट्रेन मिल जाती थी। गर्मियों के दिन थे, घर में तो टिकते ही नहीं थे। हर समय बाहर खेलते रहते थे। चाची जी ने हमें 10  - 10  पैसे दे के कहा कि जाओ दुकान से कुछ ले के खा लेना। हम बहुत खुश हुए। क्यूंकि उस समय 10  पैसे भी बहुत होते थे। हम दौड़ कर दुकान पर गए और हमने 10  पैसे की छोटी छोटी खाने की गोलियां ली। वो बहुत सारी आ गयी थी। जहाँ रहते थे, वो बिल्डिंग 3 -4  मंजिल थी। लिफ्ट तो होती नहीं थी। सीढ़ियों से ही चढ़ते थे। सीढ़ियों के साथ दीवार बनाई हुई थी। वो बहुत फिसलन वाली थी। हम सब ऊपर चढ़ के जाते थे और उस दीवार के ऊपर बैठ कर निचे आते थे। बहुत मज़ा आता था। ऐसे हम सुबह से शुरू करते थे, दोपहर तक, शाम तक घूमते रहते थे। मुझे याद है , माता जी ने नई निक्कर और कमीज सिल्वा के  दी थी। उस समय रेडिमेड का जमाना नहीं था। दरजी से कपडे सिल्वा के डालते थे। उन सीढ़ियों के ऊपर से घिसटते हुए आते थे, जिस कर के मेरी निक्कर के पीछे दोनों साइड दो सुराख़ हो गए। नई निक्कर का क्या हाल हो गया था। मैंने चुपके से वो कपड़ों के बीच में छुपा के रख दी। छुट्टियों में जितना मज़ा ले रहे थे, छुट्टियों का सारा नशा उतर गया। अब घर में पता चलेगा तो बहुत डांट और मार दोनों पड़ने वाली थी।

कुवें में चवन्नी का दान


बचपन भी कैसा होता है, न कोई फ़िक्र, न कोई दुःख। हमेशा अपने मन की सुननी, और वही करना जो मन बोलता। ये भी नहीं सोचते थे की हमारे ऐसा करने से किसी को दुःख भी हो सकता है। किसी से हमें मार भी पड़ सकती है। सोचने समझने की शक्ति तो बहुत कम होती थी, तभी शायद ज़िंदगी आसान थी। आज के जमाने में दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है, ज़िंदगी भी उतनी ही कठिन हो गयी है। एक बार गांव के कुंवे के पास हम खेल रहे थे। अब उस कुवें को जाल से ढक दिया गया है, पहले उसमें से पीने के लिए पानी इस्तेमाल करते थे। आज तो कुवें ख़त्म ही हो गए हैं। हम हम आस पास के लड़के दर्शन, पवन, छज्जू, और पड़ोस के लड़के भी थे। कुंवे को पूजा जाता था। वहीं खड़े किसी लड़के ने कहा कि कुवें में दान करना चाहिए। दर्शन के छोटे भाई पवन के पास अठ्ठनी थी। शायद उसे देखकर ही उस लड़के ने दान करने को बोला होगा। सबने कहा कि हां, अठ्ठनी में से कुछ पैसे कुवें में दान कर दे, तुझे आशीर्वाद मिलेगा। इतने में मैंने उसके हाथ से अठ्ठनी छीन ली और रामदिये कि दुकान पर चला गया। उससे कहा कि इस अठ्ठनी के खुले पैसे दे दो। उसने दो चवन्नियां दे दी। मैं वापस आया और उसे दो चवन्नियां देते हुए बोला कि देख मैं पैसे खुलवा लाया, अब दान कर दे। वो करना नहीं चाह रहा था। मैंने एक चवन्नी उसके हाथ में रख दी, और दूसरी उसे देने की बजाए कुवें में फेंक दी और माथा टेक लिया। इससे पहले की वो मुझे कुछ कहते मैं वहां से भाग गया। मेरे मन में ख़ुशी थी कि चवन्नी दान कर दी। चाहे वो पवन की ही क्यों ना हो।  आशीर्वाद का कुछ हिस्सा तो मिलेगा मुझे भी। आज भी अगर ज़िंदगी उस तरह ही चलने लगे तो शायद आसान हो जाएगी ज़िंदगी।  मेरी ज़िंदगी ।।।। 

Tuesday, March 13, 2018

घर से स्कूल तक नाली यात्रा


हाहाहहाहा, .....
आप सोच रहे होंगे कि क्या हो गया, अभी बात शुरू भी नहीं की और हसने पहले ही लगा।
चलो आपको बताता हूँ कि मैं पहले क्यों हंसने लगा। बात उन दिनों की है, जब मैं गांव के प्राइवेट स्कूल में पांचवीं क्लास में पढता था। हमारे हैड मास्टर गांव भूंनी से स. नैब सिंह थे। हम उन्हें नैबा ही बुलाते थे। उनका स्कूल नैबे का स्कूल मशहूर था। उनसे सभी बच्चे बहुत डरते थे। जब वो सरकारी बस से उतरते थे, तो बस के निचे से उनके पैर देखकर पहचान लेते थे कि आ गया। बस का नाम भी काले मुंह वाली रख दिया था। पहले स्कूल गांव में खेड़े की थाई में बना हुआ था। मैं जब से स्कूल जाने लगा था, तभी से आनाकानी करता था। हमेशा लेट उठना, लेट तैयार होना, लेट स्कूल जाना। यही मेरी आदत बनी हुई थी। और यही आदत 12वीं क्लास तक रही। वैसे तो मैं कोई न कोई बहाना ढूंढता रहता था स्कूल से छुट्टी करने का। एक दिन मेरा मन नहीं था स्कूल जाने का। उस दिन मैं खेत में चला गया और काफी देर तक नहीं आया। स्कूल का टाइम हो गया था। जब काफी समय हो गया तो सोचा कि चलो आज की छुट्टी पक्की। पर मुझे क्या पता था कि होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। मैं जैसे ही घर पहुंचा, मेरी माता जी ने मुझे देखा तो गुस्से से आग बबूला हो उठी। बोली कि चलो स्कूल। मैंने कहा कि अब तो लेट हो गया, पर वो कहाँ मानने वाली थी। उसने मुझे जैसे तैसे कपडे डाले, मुँह भी पता नहीं मैंने धोया था या नहीं, अब तो याद नहीं। स्कूल बैग के नाम पर थैले से सिला एक झोला होता था। झोला उठाया और स्कूल ले के जाने लगी। मैं अपना एक पैर पीछे खींचता था तो माता जी मुझे दो कदम आगे पटक देती थी। रास्ते में माता जी ने मुझे थपड मारा, जिससे मैं नाली में जा गिरा। गांव की नाली किसी नाले से कम नहीं होती थी। मैं कीचड़ में पूरी तरह से लीबढ़ गया था। लीबढ़ शब्द शायद आपको समझ न आये, लीबढ़ का मतलब कीचड़ में धंस गया था, कीचड़ मेरे ऊपर लग गया था। सिर से लेकर पैरों तक कीचड़ से सना हुआ था। पड़ोस की एक औरत जिसका नाम लीला था, (सोना की माता जी ) ने मेरी माता जी से कहा की "ए  तेजो, मैंने तो आज देखा तेरा गुस्सा" । ऐसी ही हालत में मुझे स्कूल में मास्टर के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। सब मुझे देख रहे थे। मास्टर गुलजार सिंह  ने पूछा कि ये क्या हुआ। तब माता जी ने बताया की ये स्कूल नहीं आ रहा था। इसलिए इसको नालियों में से घसीटते हुए ले कर आयी हु। इसकी आधी छुट्टी भी बंद कर दो। तब मास्टर जी ने कहा की आज इसको ले जाओ, नेहलाओ, धुलाओ, कल से इसकी खबर लेते हैं। इसकी छुट्टी भी बंद कर देंगे। आज भी जब पड़ोस में कोई बचा स्कूल न जाने की जिद्द करता है, तो सब उसको यही बोलते हैं, कि तुमको भी नाले में से घसीटते हुए ले के जाना पड़ेगा, ऐसे नी तू पढ़ेगा। आज भी जब इस तरह की कोई बात करता है, तो आँखों के सामने वही नाला याद आ जाता है, जिसमे से मुझे स्कूल जाने की नाली यात्रा करवाई थी मेरी माता जी ने। उस दिन के बाद मेरा स्कूल से छुट्टी करना कम हो गया था। 

चप्पल निकालने के लिए गहरे जोहड़ में उतर गया


एक बार हमारे घर मेहमान आये। माता जी ने मुझे और मेरी बड़ी बहन ममता को दुकान से कुछ सामन लेन के लिए भेज दिया। ये नसीहत ज़रूर दी जाती थी कि जल्दी आना और सामान छुपा के लाना। हम दोनों गांव में रामदिये की दुकान से सामान लाने चले गए। उस समय गांव में एक बहुत बड़ा जोहड़ होता था। जब हम उस जोहड़ के पास पहुंचे तो मेरे दिमाग में पता नहीं क्या आया कि बहन ममता से कहा कि देखो तुमको एक जादू दिखाता हूँ। मैं जोहड़ के किनारे पर पैर हिलाऊँगा तो देखना क्या निकलता है। जोहड़ के किनारों पर मेंढक बैठे होते थे। मैंने जैसे ही पैर हिलाया, बहुत सारी छोटी छोटी मेंढकियों ने पानी में छलांग लगा दी। मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि मेरे पैर से चप्पल ने भी निकल के पानी में छलांग लगा दी थी। वो जोहड़ बहुत गहरा था। आज से पहले मैं उसमे कभी नहीं उतरा था। चप्पल नहीं लाया तो माँ से मार पड़ेगी। फिर मैं चप्पल लाने के लिए पानी में उतर गया। थोड़ी दूर जाने के बाद मेरे पैर जमीन पर लगने बंद हो गए और मैं पानी में ऊपर उठने लगा। मेरी ठोड़ी तक पानी आ गया था। ममता बाहर खड़ी रोने लगी। मैंने कोशिश करके चप्पल को पकड़ किया और बाहर आने लगा। किनारे पर पहुंचते पहुंचते मेरे दूसरे पैर की चप्पल भी निकल गयी और वो भी पानी में तैरने लगी। मैंने पहले नहीं सोचा कि कम से कम दूसरी चप्पल तो बाहर ही निकल दूँ। अब मैं बाहर निकल आया पर दूसरी चप्पल फिर पानी में ही रह गयी। मुझे अब दोबारा फिर पानी में उतरना था। पर ममता मुझे डांट रही थी कि क्यों गया पानी  में। मैंने कहा कि अभी ले आता हूँ, तू डर मत। मैं फिर से पानी में उतर गया। निचे मेरे पैर भी नहीं लग रहे थे। और सांप होने का डर भी लग रहा था। क्यूंकि उसमे समुंद्रशोक बहुत भरा हुआ था। सांप होने लाजमी थे। पर चप्पल तो ले के आनी थी। नहीं तो घर में आज बहुत पिटाई होने वाली थी। खैर मैं चप्पल ले आया। मेरे सारे कपडे पानी में गीले हो गए थे। मैंने ममता से कहा कि तुम दुकान से सामान ले आयो, तब तक मैं अपने गीले कपडे धुप में खड़ा हो के सूखा लेता हूँ। वो सामान लेने चली गयी। मैं वहीं धुप में खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद वो सामान ले के आ गयी। फिर हम घर को चल दिए। माँ कि पिटाई का डर अब भी सता रहा था। घर जा के जब इस बात का पता माँ को चला तो जो पिटाई हुई मेरी, इतनी शायद चपल खो जाने पर भी ना होती। आज उस जोहड़ को भर के उस की जगह वृद्धाश्रम और आंगनवाड़ी बना दिए गए हैं।

Sunday, March 11, 2018

मेहमाननवाजी

एक फंक्शन के दौरान मेहमान और हमारे ताया जी 

एक फंक्शन के दौरान पिताजी और मेहमान 
एक समय होता था जब किसी के घर मेहमान आता था तो कई कई दिन रह के जाता था। जिंदगी की भागदौड़ में आज किसी के पास समय ही नहीं है। जब घर में मेहमान आ जाता था उस दिन कुछ खास ही माहौल होता था। आज जब कोई मेहमान आ भी जाये तो एक दिन में ही वापस मुड़ जाता है। घर में खाने पिने का सब सामान भी मौजूद होता है। पहले मेहमान के आने का पता भी नहीं चलता था। बस आने पर ही पता चलता था कि आज मेहमान आया है। माँ चुपके से कुछ पैसे दे के दुकान से नमकीन और बिस्कुट लाने को भेज देती थी। हम भी बड़े जोश में दुकान पर भागे जाते थे, और नमकीन बिस्कुट लाते थे। हमारा भी इम्तिहान ही होता था की हमने मेहमान को पता ही नहीं लगने दिया कि अभी दुकान से लाये हैं। 
मन में ये भी रहता था कि जब कुछ बच जायेगा तो हमें भी मिलेगा।मेहमान के आने पर सभी घर वाले इकठे हो कर बैठ जाते थे। रात को खूब सारी बातें होती थी। खूब सारी कहानियां सुनने को मिलती थी खासकर जब मेरे नाना जी आते थे। आंगन में चारपाई डाल कर सभी बैठ जाते थे। हमारे ताया जी, चाचा जी, पिता जी सभी नाना जी के पास बैठ जाते थे। वो हमें अपनी पुरानी बातें सुनाते थे। मुझे पुरानी बातें सुनना बहुत अच्छा लगता था। वो बताते थे कि बैल के साथ खेती करते थे। कच्चे रास्तों से पैदल ही रिश्तेदारी में चले जाते थे।

मुझे आज भी याद है, जब हमारे नाना जी आये हुए थे। वो हमें कहानी सुना रहे थे, तभी हमारे घर में टेलीविजन आया था। हमारे आस पास के घरों में सबसे पहले हमारे घर में ही टीवी आया था। टेक्सला का B/W टीवी था। उस दिन महाराणा प्रताप का धारावाहिक चल रहा था। नाना जी कई कई दिन रह के जाते थे। कई बार हमें लगता था कि काफी दिन हो गए, कोई मेहमान ही नहीं आया। उस समय फ़ोन तो होते नहीं थे। बस मेहमान के आने पर ही राजी ख़ुशी का पता चलता था। जब हम किसी के घर मेहमान बन के जाते थे तो हमें भी महसूस होता था कि हम बहुत ख़ास हैं, हम मेहमान बन के आये हैं। खूब सेवा होती थी, हर कोई हर बात का ख्याल रखते थे। आज किसी के पास समय भी नहीं है और ना ही आज कोई बुला के राजी है। काश वो मेहमान आने का सिलसिला आज भी वैसे ही चलता तो कितना अच्छा लगता।

Friday, March 9, 2018

बचपन के दिन


स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां हो गयी थी। मुझे अब ये भी याद नहीं की उस समय मैं कौनसी क्लास में पढता था। जब छुट्टियां होती थी, सबका मन एक ही बात बोलता है, कि मामा जी के घर जाना है। पता नहीं ऐसा क्या होता था मामा जी के घर कि सभी मामा के घर ही जाना पसंद करते थे। जबकि मासी भी होती है, बुआ भी होती है, और भी रिश्तेदार होते हैं, सब बुलाते हैं छुट्टियों में, पर सभी मामा जी के घर ही जाना चाहते हैं। हमारे मामा जी के गांव में जा कर हम सभी मिल कर कच्चे आम तोड़ कर लाते थे। फिर उनको भूस वाले कमरे में भूस में दबा देते थे। थोड़े दिन में वो पक जाते थे। पेड़ के ऊपर कभी आम पकते नहीं थे, क्यूंकि पकने लायक आम बचते ही नहीं थे। पहले ही तोड़ दिए जाते थे। रात को गर्मियों में सभी बाहर आंगन में सोते थे। रात को हम सब मिलकर जुगनू पकड़ पकड़ कर इकठे करते थे। इतने सारे जुगनू एकसाथ कितने अच्छे लगते थे। हम ये भीं नहीं सोचते थे की उनको पकड़ कर रखेंगे, वो मर भी सकते थे। पर हम तो बस अपना मन खुश करना चाहते थे। एक बार हमने जिद की कि हमें मामा जी के घर छोड़ कर आओ। बड़ी मुश्किल से माँ ने पिताजी को जाने के लिए तैयार किया। हमारे पिताजी  मुझे और मेरी बड़ी बहिन को लेकर चल दिए। मैंने खाकी रंग की पेंट को खाकी रंग कि ही कमीज डाली हुई थी। उस समय वो शराब पिया करते थे। जब मामा जी के गांव का बस अड्डा तीन किलोमीटर दूर पड़ता था। बस अड्डे से पैदल ही गांव जाना पड़ता था। तब आगे के लिए कोई साधन नहीं होता था। पिता जी ने हमें अड्डे पर छोड़ कर आगे 5  किलोमीटर दूर शहर से कुछ सामान लेने जाना था। वैसे हमे तब इतना पता नहीं था कि सामान तो बस एक बहाना था, वो शराब लेने गए थे। वो हमें छोड़कर, बस में शहर चले गए। मैं धीरे धीरे वहां से खिसकने लगा। बहन को वहीं छोड़कर पैदल ही गांव कि तरफ चला गया। कोई आधा 15  मिनट पैदल चलने के बाद मैं घर पहुँच  गया। मेरे नाना जी चारपाई पर बैठे थे। मैंने नाना जी को नमस्ते की और पास बैठ गया। पर नाना जी ने मुझे नहीं पहचाना, उनको लगा कि उनके पड़ोस का ही कोई लड़का होगा। तभी मामी जी आ गयी। वो भी सोचने लगे कि ये अकेला कैसे आ गया। थोड़ी देर बाद मेरे पिताजी और बहन भी पहुंच गए। वो मुझे ढूंढ़ते हुए आ रहे थे, कि पता नहीं रास्ता पता होगा या नहीं, कहाँ गया होगा। बहिन तो रोने लग  जाती थी। जब मुझे हाँ देखा तो उनकी जान में जान आयी। उन्होंने मुझे डांटा कि ऐसे छोड़कर नहीं आते, कोई उठा ले जाता तुमको। काफी डराया मुझे। अगले दिन बापू जी ने हमें वहां छोड़कर वापस घर जाना था। तब तो हम खेल में लगे रहे। फिर अगले दिन जब पिताजी  जाने लगे तो मैं भी भाग कर उनके पास आ गया, कि मेरा दिल नहीं लगेगा, मैं भी साथ जाऊंगा। उन्होंने बहुत समझाया पर मेरा दिल नहीं माना। मैं भी उनके साथ वापस अपने घर आ गया। जब वापस घर पहुंचे तो माँ से फिर डांट पड़ी, कि  परेशान करने में लगे रहते हो।, आज के बाद कभी भी छुट्टियों में नहीं जाना। बचपन के दिन याद कर कर के ऐसा लगता है जैसे अभी भी हम वही बचपन के दिन जी रहे हों। काश वो बचपन के दिन वापस लौट सकते, कितना मज़ा आता था। छोटी छोटी खुशियां थी।


तीन महीने का कंप्यूटर कोर्स किया छे महीने में


12th की पढाई पूरी करके आगे कुछ करने की सोचने की तैयारी कर रहा था। क्यूंकि आजकल तो पहली क्लास में जाने वाले बच्चों को भी पता होता है कि वो बड़े होकर क्या बनेंगे, क्या करेंगे। पर हमें तो 12th के बाद भी नहीं पता था की अब आगे क्या करना है। कोई कहता कि कोई काम सीख लो। कोई कहता है कि किसी फैक्ट्री में कोई छोटा मोटा काम देख लो। पर कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाये। मेरे चचेरे भाई ने अम्बाला से डेंटल का काम सीखा था। उसने बताया कि नाबार्ड की तरफ से सरकार कंप्यूटर कोर्स करवाती है। सस्ता भी है, कर लो। मैंने भी सोचा की चलो यही सीख लेते हैं। कहीं काम आया तो कर लेंगे। 3500 /- 3 महीने की फीस थी। कोर्स भी तीन महीने का ही था।ये भी पता नहीं होता था कि कंप्यूटर सॉफ्टवेयर सीखना है या हार्डवेयर। वैसे फॉर्म में हार्डवेयर लिखवाया था। अम्बाला शहर में प्रेम नगर में स्थित नाबार्ड दफ्तर में दाखला ले लिया। हर रोज घर से सुबह बस से चेले जाना और शाम को 5-6  वापस आना।  उस समय अगर कहीं बैंक में कंप्यूटर देख लेते थे तो बड़ी ख़ुशी होती थी आज मैंने कंप्यूटर देखा है।  शुरू शुरू में कंप्यूटर सीखने वाला कॉपी में लिखवाता था। बाद में उसने कहा की जो कम्प्यूटर सिखाएगा वो अभी आया नहीं है। ऐसे ही तीन महीने का समय पूरा हो गया, पर सीखने वाला आया ही नहीं।  तीन महीने गेम खेल कर वापस आ जाता था। मैं अकेला ही जाता था और अकेला ही वापस आता था। क्यूंकि मेरा कोई ऐसा दोस्त नहीं था जो मेरे साथ कम्प्यूटर सीख रहा हो, या मेरे साथ खिन आता जाता हो। उसी दफ्तर में एक इलेक्ट्रिकल का कोर्स आया हुआ था। कई मकैनिक ये कोर्स कर रहे था। वो बिलकुल फ्री था। मुझे भी कहने लगे की तुम यहां आते तो हो ही, ये कोर्स भी कर लो। मैंने तीन महीने का इलेक्ट्रिक्ल का कोर्स भी कर लिया। सर्टिफिकेट भी मिल गया, कंप्यूटर हार्डवेयर का भी और इलेक्ट्रिकल का भी। पर आता जाता कुछ नहीं था, कि कम्यूटर हार्डवेयर क्या होता है। इलेक्ट्रिकल का कोर्स करने का ये फायदा तो हो गया कि घर में कुछ थोड़ा बहुत बिजली का काम होता है, तो अपने आप ही कर लेता हूँ। कई बार तो टीवी भी खोल के रख देता था। मुझसे ठीक हो गया तो अच्छी बात हैं, नहीं तो खुले को ही मकैनिक के पास ले जाना पड़ता था। जीजा जी मुझे बुलाते रहते थे कि जल्दी चंडीगढ़ आ जाओ। मैं बहाना लगता था कि अभी सर्टीफिकेट नहीं मिला। तीन महीने का कोर्स था, पर मैंने छे महीने लगा दिए। पर कंप्यूटर सीखने वाला ही नहीं आया छे महीने में। फिर मैं चंडीगढ़ चला गया। और आज तक जहां भी मैंने काम किया, कहीं भी कम्प्यूटर सर्टीफिकेट दिखने कि ज़रूरत भी नहीं पड़ी। आज भी कई बार जब अम्बाला में उस सड़क से गुजरते हैं तो वहीं समय सामने आ जाता है, कि ये था हमारा इंस्टिट्यूट। कम्प्यूटर का सारा काम मैंने चंडीगढ़ जा काम करते करते ही सीखा। उस समय कंप्यूटर डोस होता था। उसमे जो गेम खेलता था, मुझे वो बहुत पसंद थी। आज भी कई बार उसे ढूंढ़ने कि कोशिश करता हूँ, काश वो गेम मिल जाये तो डाउनलोड करके रख लूँ।

Thursday, March 8, 2018

जब मैं भूत भाई बना

सुराग धारावाहिक में सुदेश बेरी  
असरानी

सोमवार का दिन था। सोमवार को दिल्ली दूरदर्शन पर रात को 9  वजे सुराग सीरियल आता था। 1990 के समय के दूरदर्शन पर बहुत सरे धारावाहिक आते थे, जैसे एक से बढ़कर एक, सुराग, संसार, तहकीकात, शांति, मुंगेरी के हसीं सपने  ,रामायण, महाभारत, चंद्रकांता, अलिफ़ लैला,शक्तिमान, और असरानी का धारावाहिक आता था, जिसमे वह भूत बना होता है। सुराग में सुदेश बेरी मेन किरदार निभाते थे। सभी उसको बहुत पसंद करते थे। उस समय हमारे घर में बिजली चली गयी। 

एक तरफ बिजली का जाना और दूसरी तरफ सुराग का शुरू हो जाना। मैं घर में किसी को बताये बिना ही पड़ोस के चाचा सुरजीत के घर सुराग देखने चला गया।  उन्होंने अपने घर कि लाइट्स बंद की हुई थी। सिर्फ टीवी चल रहा था। गर्मियों के दिन थे, सभी अपने घर के आँगन में ही सोते थे। सुरजीत सो रहा था, उसकी घरवाली धारावाहिक देख रही थी पर उसका मुँह टीवी की तरफ था। उनको पता ही नहीं चला और मैं जा के चारपाई के एक कोने पर बैठ गया। अँधेरा होने की वजह से उनको मेरे आने का पता नहीं चला। थोड़ी देर  बाद उसकी घरवाली ने पीछे की तरफ देख लिया। 

जैसे ही उसने पीछे देखा, उसके तो होश ही उड़ गए। वो चिल्लाने की कोशिश कर रही थी, पर उसके मुँह से कोई शब्द निकल ही नहीं रहा था। तभी उसने चिल्लाना शुरू किया, भूत भूत, हमें माफ़ कर दो। हमें छोड़ दो, हमें छोड़ दो। उनके दिमाग में वही भूतभाई वाला धारावाहिक घूम रहा था, जिसमे जगदीप भूत बना होता है। मैंने बहुत कहा कि मैं हूँ, सुरेश, भूत नहीं हूँ। तभी शोर सुनकर उसका घरवाला भी उठ गया। उसने भी चिल्लाना शुरू कर दिया। भूत भूत , हमें छोड़ दो, हमें माफ़ कर दो। और वो दोनों हाथ जोड़कर चारपाई के सिरहाने के पास जा पहुंचा। मुझे लगा कि ये बहुत डर गए हैं। मैंने भी कई बार कहा कि मैं भूत नहीं हूँ, पर वो सुनने को तैयार ही नहीं थे। 

काफी देर बाद वो चुप हुए और उनको समझ आया कि ये कोई भूत नहीं है, पड़ोस से आया है। थोड़ी देर बाद आराम से बैठ गए। फिर सुरजीत मुझे कहने लगा कि तुम बता देते कि मैं हूँ। ऐसे ही मैंने कोई लाठी उठा के मार देनी थी। मैंने उनसे कहा कि कब से तो बोल रहा था कि मैं हूँ। और दूसरी तरफ मुझे हंसी भी आ रही थी, कि अभी तो सिरहाने जा चढ़े थे हाथ जोड़कर। लाठी मारने की बात कर रहा है। मैंने उनसे फिर कुछ नहीं कहा और अपने घर आ गया। अगले दिन उसने गली में सब को बताया कि रात इसने हमें डरा दिया था। तब से मुझे भूतभाई कह कर बुलाने लगी थी। अब भी कई बार वो बात याद आ जाती है तो पुराने दिनों कि यादें ताजा होने लगती हैं। वो भी क्या दिन थे।

Wednesday, March 7, 2018

पुराना टीवी हुआ चकनाचूर

एक बार मैं चंडीगढ़ से घर गया हुआ  था छुट्टी में । घर में B/W  टीवी था। वो भी उस दिन खराब हो गया। मैंने टीवी को एक कपडे में बाँधा और साइकिल पर उसे ठीक करवाने के लिए पास के गांव ठोल में ले के जाने लगा। हमारे गांव में तब मकैनिक नहीं था। ठोल गांव 5  किलोमीटर पड़ता था। गर्मियों के दिन थे। मैंने कुरता पजामा डाला हुआ था। मैंने साइकिल उठाई और कंधे पर उस कपडे को लटका लिया जिसमे टीवी को बाँधा हुआ था। अभी थोड़ी दूर ही गया था कि मेरा पजामा साइकिल कि चेन में फंस गया। साइकिल के कुत्ते फेल थे, जिस कारन उसकी चेन रुकी नहीं और पजामे को और ज्यादा लपेट लिया। जिस करके मैं टीवी समेत सड़क पर गिर गया। मुझे तो कोई चोट नहीं आयी, पर मेरे कंधे पर लटका टीवी टूट कर चकनाचूर हो गया। 

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं।वापस घर जाऊंगा तो घर में माँ से मार पड़ेगी। और मकैनिक के पास जाकर ठीक करवाऊं तो किसे, टीवी तो टूट गया। काफी देर सोचने के बाद मैंने टीवी को कपडे में इकठा किया और मकैनिक के पास जाना ही ठीक समझा। सोचा कि घर जाऊंगा तो मार पड़ेगी, मकैनिक के पास जाता हु, जाते हुए कुछ न कुछ सोच लूंगा। जाते हुए मेरे मन में ख्याल आ रहे थे कि अगर ये ठीक न हुआ तो घर आ के क्या कहूंगा। मन में पहले से ही माँ से मार खाने पूरी कहानी त्यार हो चुकी थी। 

सोच रहा था कि घर जा के टीवी वाला कपडा घर में रख कर बाहर चला जाऊंगा। जब पता चलेगा कि माँ का गुस्सा ठंडा हो गया है तो घर आ जाऊंगा। इतने में ठोल भी आ गया. और मकैनिक छतर के पास ले गया। उसको बोला कि टीवी टूट गया है और मुझे कोई दूसरा टीवी दे दो। उसने कपड़े में से टीवी निकल के देखा तो सब चूर चूर हो गया था। उसमे ठीक करने को तो कुछ बचा ही नहीं था। फिर उसने एक पुराना टीवी दिखाया। उसका रंग सफेद था। उसने मेरे टीवी में से जो कोई काम का पुर्जा था वो निकल के रख लिया और मुझसे 500 रूपये होर मांगे। 

फिर मैंने उसको अगले इतवार को जब छुट्टी पर आऊंगा तो पैसे दे जाऊंगा बोल के टीवी ले लिया। घर जा के मैंने किसी को इस घटना के बारे में कुछ नहीं बताया। काफी दिनों के बाद ये बात घर में पता चली। पर तब तो गुस्सा करने का कोई फायदा ही नहीं था। वैसे भी मैं टीवी के बदले में टीवी ले ही आया था। आज भी कईं बार ये बात याद आती है तो अपने आप ही मेरे चेहरे पर मुस्कान सी बिखर जाती है। सोचता हूँ की वो दिन भी क्या दिन थे, गलतियां करके अपने आप को बचने कि तरकीबें सोचते थे। उस समय कि नादानियों पर हंसी आती है।

ये उन दिनों कि बात है

चंडीगढ़ के एक पार्क में बेंच पर खींची हुई तस्वीर 


                 आज पहली बार ब्लॉग लिखने की कोशिश कर रहा हूँ पता नहीं क्या होगा. मन में बहुत से सवाल उठ रहे हैं. लिखने के लिए विचार कहाँ से लाऊंगा. आज लिख दिया. कल कहाँ से लिखूंगा. ऐसे ऐसे सवालों ने मन में एक डर सा पैदा कर दिया है. पर चलो कल की कल देखेंगे. आज तो लिखूं.
दोस्तों मेरा नाम सुरेश कुमार है. पर ज़्यदातर दोस्त मुझे सिर्फ शर्मा कहकर ही बुलाते हैं. और तो और उनमे से कुछ को तो पता भी नहीं होगा की मेर नाम सुरेश है. मैं अब जीवन बिमा का एजेंट हूँ. मैंने 2011 में जीवन बिमा की एजेंसी ली थी. मैं चंडीगढ़ शहर में रहता हु. वैसे तो मेरा जन्म हरियाणा राज्य के अम्बाला जिले में पड़ने वाले एक गांव सोँटा में हुआ था. मेरे परिवार में मेरे पिता जी, मेरी माता जी, मेरी दो बहनें और एक छोटा भाई हैं. 8th की पढ़ाई मैंने गांव के ही प्राइवेट स्कूल से की है. उसके बाद मने 9th और 10th  की पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल से की है. गांव में 10th तक ही स्कूल होने की वजह से पास के गांव ठोल में 11th और 12th की पढ़ाई पूरी की. घर के हालत ज्यादा अच्छे न होने की वजह से आगे की पढ़ाई नहीं कर सका. घर वालों को भी जल्दी थी की अपनी पढ़ाई पूरी करके घर के गुजारे के लिए कमाना शुरू कर दे. उसके बाद मेरे जीजा जी ने मुझे चंडीगढ़ बुला लिया. मेरे जीजा जी चंडीगढ़ में एक अख़बार के दफ्तर में गाडी चलाते थे. उन्होंने मुझे भी अपने दफ्तर में लगवा दिया. मैंने कंप्यूटर बेसिक ही सीखा था. वैसे कम्प्पूटर सिखने के लिए मैं अम्बाला शहर में जाता था, वो भी बहुत मजेदार है किस्सा. आज भी याद करता हु तो अपने आप ही हसने लगता हूँ. पुराणी बातें याद करके मन में फिर से वही जिंदगी जीने की इच्छा जागृत हो जाती है. चलो कंप्यूटर सिखने वाला किस्सा फिर कभी सुनाऊंगा. मैं 2013 में चंडीगढ़ में आया था. तब मुझे 1000 रूपये तनखाह मिलती थी. रहना भी वहीँ पर पड़ता था. उनके दफ्तर की देखभाल भी हो जाती थी. पहले 2 महीने 1000  रूपये तनखाह के बाद २००० रूपये कर दी. मुझे बहुत ख़ुशी हुई की मेरी तनखाह बढ़ा दी है. इतवार की छुट्टी के दिन मैं घर आ जाया करता था.  मुझे ऐसा लगता था जैसे कोई फौजी अपनी ड्यूटी से घर वापस आता है. और सोमवार को जब वापस जाना होता था तो ऑंखें भर आती थी. बस में बैठे हुए रोने लगता था. मुझे चंडीगढ़ जाना विदेश जाने जैसा लगता था. कभी घर से दूर रहे ही नहीं. ऐसे ही मैंने उस दफ्तर में 4  साल लगाए . उसके बाद मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा था कि कुछ कमाने के लिए घर तो छोड़ना पड़ेगा.  वैसे चंडीगढ़ मेरे गांव से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर ही पड़ता है. बस में जाने में 2 घंटे का सफर है. गांव में से अगर कोई चंडीगढ़ काम करता है तो उसको बहुत बड़ी बात मानते थे. मुझे भी बहुत ख़ुशी होती थी कि अभी मेरी शादी नहीं हुई और मैं कमाने भी लग गया हु. 3000 तनखाह बहुत मानी जाती थी. घर में सब खुश थे कि चलो कमाने लग गया है. आज इस बात को 15 साल हो गए हैं.

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...