ज़िंदगी में कभी कभी ऐसे दिन भी देखने पड़ते हैं, जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
जब मैं चंडीगढ़ सबसे पहले अख़बार के दफ्तर में काम करने लगा था, तब सेक्टर 22 में काम करते थे। फिर दफ्तर बदल कर सेक्टर 16 में चला गया। ये वही दफ्तर था, जहां मैंने पहली बार बोलेरो गाडी चलाई थी और एक मारुती कार में डेंट भी डाल दिया था। एक दिन मैं रात को दफ्तर में अकेला था। सभी 6 बजे छुट्टी करके चले गए थे। रात के 8 या 9 बज रहे होंगे। मैं कंप्यूटर पर बैठा कुछ काम कर रहा था। तभी बाहर से किसी ने दरवाजे की घंटी बजायी। मैंने जब दरवाजा खोला तो 5-6 पुलिस वाले अंदर आ गए। एक बार तो मैं उन्हें देखर चौंक गया। वो दफ्तर के बारे में और मेरे बारे में पूछने लगे। फिर उन्होंने दफ्तर की तलाशी लेनी शुरू कर दी।
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। वो जालंधर से आये थे। तभी मैंने दफ्तर के मैनेजर को फ़ोन किया और उनको सारी बात बताई। वो आधे घंटे में दफ्तर आ गए और आते हुए उनके लिए चाय बनवा कर ले आये। पुलिस वाले कंप्यूटर खोल कर उसमें भी कुछ ढूंढने लगे। पहले टीवी में ही देखा था ऐसे रेड डालते हुए। आज मेरे सामने तलाशी अभियान चल रहा था। वहां पर अख़बारों के बण्डल पड़े थे, उनको भी खोल खोल कर देखा। तभी वहां पर इश्तिहार मैनेजर भी आ गया। पुलिस वालों ने कहा कि सारे कंप्यूटर गाडी में रखो। मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ये किस चीज की तलाशी ले रहे हैं।
पुलिस वालों ने सारे कंप्यूटर अपनी गाडी में रख लिए और मुझे कहा कि तुम भी हमारे साथ चलो। पहले तो मैं डर गया की मुझे क्यों ले के जायेंगे। फिर उन्होंने कहा की अपने कम्प्यूटर की रखवाली के लिये तुम हमारे चलोगे। मैंने बोला कि ठीक है, चलता हूँ। तभी वो इश्तिहार मैनेजर कहने लगा कि हम क्यों जायेंगे आपके साथ। वो उनके सामने गुस्सा हो रहा था। तभी पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा कि चलो सभी पहले इसको ही बिठाओ गाडी में। इंस्पेक्टर भी गुस्सा हो गया और जबरदस्ती उसको भी गाडी में बिठा लिया। पहले मैं अकेला जा रहा था, चलो अब हम दो हो गए। मैं अपने साथ एक चादर ले गया था ठण्ड में ओढ़ने के लिए।
रात के 1 बज रहे थे जब पुलिस वाले हमे चंडीगढ़ से जालंधर के लिए लेकर निकले। रस्ते में उन्होंने हमे ढाबे पर चाय भी पिलाई, और खाना भी खिलाया। सवेरे 4-5 बजे हम जालंधर थाने में पहुंचे। काफी नींद आ रही थी। थकावट भी हो गयी थी। हम वहीं मुंशी के कमरे में एक बेंच पर ही लेट गए। सुबह हो गयी तभी मेरे जीजा जी और वो मैनेजर बोलेरो गाडी से वहां पहुंच गए। उन्होंने हमें चाय और कुछ खाने का सामान दिया। पूरा दिन हम थाने में ही बैठे रहे। दिन तो निकल गया, पर जब रात आयी तो हमने सोचा कि अब सोयेंगे कहां। इंस्पेक्टर ने हमारे सोने का प्रबंध पुलिस वालों के क्वाटर में कर दिया था। हम उनके साथ सोने चले गए। एक पुलिस वाले की रजाई में मैं सो गया और दूसरे के साथ इश्तिहार मैनेजर। वो सिगरेट बहुत पीता था। हम सभी उसे मुश्क कहकर बुलाते थे। उसके मुँह से सिगरेट की मुश्क आती रहती थी।
पुलिस वाले ने उसे कहा कि यार तू मेरी रज़ाई में मत आ, तू कहीं और चला जा। उसने मुझे कहा कि तुम आ जाओ, मैं इसे नहीं सोने दूंगा अपनी रजाई में। मुश्क बहुत आती है इससे। मुझे हसी तो बहुत आ रही थी, पर उसके सामने नहीं हस सका, और फिर पुलिस वाले भी थे, इसलिए अपनी हसी रोक के रखा। अगली सुबह फिर जीजा जी और मैनेजर हमारे लिये चाय और खाने का सामान ले कर आ गए। हमें वहां कैद ही महसूस हो रही थी। दिल कर रहा था कि कब यहां से छुटकारा मिले।
अगले दिन शाम को पुलिस वालों ने हमें कहा कि आप अपने कम्प्यूटर ले के जा सकते हो। तब हमारी मानो जान में जान आ गयी हो। अगले दिन हमने कम्प्यूटर गाडी में रखे और चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए। हमने भगवान का शुक्र अदा किया कि चलो यहां से तो निकले। इससे पहले कभी थाने नहीं गया था। पर ज़िंदगी में हर चीज का अपना एक एक्सपीरियंस होता है और होना भी चाहिए।




















