रक्षाबंधन की तैयारियां कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। मन में एक अजीब सी खुशी भी जन्म ले रही होती है। वैसे तो आज के रक्षाबंधन का त्यौहार पहले जैसा नहीं रहा। पहले तो रक्षाबंधन की खुशी ही इतनी होती थी, दूसरा फिर स्कूल से छुट्टी होती थी। आज के दौर में काम में उलझा हुआ इंसान क्या त्योहार मनाएगा। आज के बच्चों के लिए भी अब इस त्योहार की इतनी खुशी महसूस नहीं की जाती। उनको टीवी मोबाइल से ही फुर्सत नहीं है।
पहले तो राखी वाले दिन के पकवान बनने के नाम से ही ख़ुशी छा जाती थी। सेविआं तो इस दिन का मुख्य पकवान है। कोई अलग अलग मिठाईयां लेकर आते थे। जब मेरी बहनों की शादी हुई तो रक्षाबंधन के त्योहार के समय ये ख़ुशी दुगनी हो जाती थी। हमें उनके पास जाने का मौका मिल जाता था या वो आ जाती थी। उस समय की रिश्तेदारी भी बड़ी मजेदार होती थी। परंतु आज के समय में तो सुबह जाकर शाम को वापस आ जाना। रक्षाबंधन के दिन बहनें मायके राखी बांधने जाती हैं।
इस रक्षाबंधन में हमारी बहनों के आने पर असमंजस था कि शायद इस बार वो नहीं आएंगी, काम ही इतने हैं अब। फिर राखी से दो तीन दिन पहले ही मुझे उनके पास जाना पड़ा। तो में उसी समय ही राखी बंधवा कर आ गया। पर मन में एक चीस थी कि राखी भी त्योहार कर दिन ही अच्छी लगती है। तीन चार दिन पहले में अपनी घरवाली के साथ ससुराल जाना पड़ा, वहां वह भी अपने भाई को तभी राखी दे आई। रास्ते में आते समय एक बहन का ससुराल पड़ता है। ताया जी की बेटी के घर। वहां भी पहले ही राखी बंधवा ली। चाचा की बेटी आयी हुई थी अपने ससुराल से। दो दिन पहले वो भी चली गई। जाते जाते मुझे राखी बांध गई। सब त्योहार से पहले ही निबटा लिए। पर आज राखी के दिन कोई राखी बांधने नहीं आ रही।
सुबह से मन में यही उलझन सी उलझ रही थी। मैं दुकान पर बैठा फेसबुक पर पोस्ट पढ़ रहा था। सभी ने राखी के बारे में लिखा हुआ रहा। कोई राखी कि बधाई से रहा था तो कोई राखी को फालतू के खर्चे बताकर उसे गलत करार देने पर तुला हुआ था। मेरे ही एक दोस्त ने पोस्ट डाली की महिलाओं को राखी के नाम पर छोटा दिखाने की कोशिश की जाती है, वगैरा वगैरा। मन में गुस्सा भी आ रहा था कि वो क्या जाने इस त्योहार का महत्व। आज कोई इससे छुटकारा पाना चाहता है इसको गलत बताकर। हमसे पूछो जब हम सुबह राखी बंधवाकर कितनी खुशी महसूस करते थे। हमने तो अपनी बहन को कभी नहीं कहा कि बहन तू कमजोर है, में तेरी रक्षा करूंगा। और ना ही कभी बहन ने ऐसे गुहार लगाई कि भाई में तुम्हे राखी बांध रही हूं, मेरी रक्षा करो। जिस साल बहन राखी बांधने नहीं आ सकती तो क्या उस साल हम अपनी बहन की मदद करने से मना कर देंगे। ये कोन लोग हैं जो धर्म का हवाला दे कर इस त्योहार से छुटकारा पाना चाहते हैं। ये तो एक ख़ुशी होती है आपस में मिलकर खुशियां सांझी करने की। खर्च का हवाला दिन वाले चाहे दुगने पैसे की शराब पी जाएं, और राखी वाले दिन बहन को शगुन देने को खरचा बता दें।
अभी मैं अपने दिमाग में ऐसे सोच ही रहा था कि तभी छोटा भाई दुकान पर आ गया और उसने कहा कि सभी तक बहन और जीजा जी आए नहीं। मैंने कहा कि इस बार वो नहीं आएंगे। तो उसने कहा कि नहीं मेरी बात हुई है। वो दोनों आ रहे हैं। मुझे लगा कि जो राखी वाले दिन की खुशी होती है, शायद अब पूरी हो जाए। दोपहर को में दुकान बंद करके खाना खाने घर चला गया। खाना खा कर में सो गया। 3 बजे बेटे अक्षित ने आकर बताया कि बुआ और फूफा जी आ गए। फिर मैं भी उठकर बैठ गया। चाय पानी पी कर बहन से राखी बंधवाई और फिर तैयार हो कर दुकान पर आ गया। कुछ दिन से मन में जो गुबार भरा हुआ था, आज सोचा कि ब्लॉग में लिख डालता हूं। आज में हल्का हो गया और जो राखी वाली असमंजस थी वो भी खत्म हो गई।
सो, दोस्तो ये त्यौहार हमारी धरोहर हैं, संस्कृति है जो लुप्त होती जा रही है। कहीं ऐसा ना हो कि आने वाले समय में बच्चे पूछें कि ये रक्षाबंधन क्या होता है। इसलिए अपनी श्रद्धा, भावना से इसको बचा लो। और फेसबुक पर डाली अनाप शनाप पोस्टों के बहकावे में ना आएं। धन्यवाद।
रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई।