Sunday, May 31, 2020

जहां जिसका जितना दाना पानी होता है, उसी को मिलता ज़रूर है।

मैं कुराली जाने का मन बना चुका था। मैंने रंजीत काका को फोन किया। रंजीत ने कहा कि तुम मोरिंडा आ जाओ, वहीं पर मिलते हैं। उनके किसी दोस्त का जन्मदिन था जिसके लिए होटल में पार्टी रखी थी। मैं दोपहर को 2 बजे मोरिंडा होटल में पहुंच गया। आधे घंटे बाद वो भी वहीं आ गए। शाम को पार्टी का इंतजाम किया हुआ था। शाम तक हम वहीं होटल में ही रहे। शाम को 6 बजे उनके बाकी दोस्त भी आने शुरू हो गए। 8 बजे सभी पहुंच चुके थे। केक काटने के बाद सभी के लिए मेज और कुर्सियों का प्रबंध किया गया। सभी कुर्सियों पर सज गए। सामने मेज पर सबके खाने के लिए समान आने लगा। शराब की बोतलें, कोलड्रिंक, चिकन, वेग रोल, पनीर टिक्का। कुल 35-40 मेहमानों में से मेरे साथ एक दो ऐसे थे जो शराब, चिकन वगैरा नहीं खाते थे। सभी अपनी अपनी मौज मस्ती कर रहे थे। 

मेरा एक जानकार तो सिर्फ रंजीत ही था, वो भी अपने उन्हीं दोस्तों में मशगूल था। कभी कभी मुझे आवाज़ देकर मुझे अपने साथ होने का अहसास करवा देता था। में सोच था था कि अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने में।मज़ा आता है, परंतु जब पार्टी दोस्त के दोस्त की हो तो सोच समझ कर हो जाना चाहिए। परंतु में बिन बुलाया मेहमान भी नहीं था और बुलाया हुआ भी नहीं था। मैं तो वैसे ही अनजाने में पहुंचा हुआ था। कहते हैं कि जिसका झन दाना पानी होता है, वहीं उसको मिलता है। ये सोच कर मैं अपने आप को इस पार्टी का हिस्सा समझ रहा था।


हमने कोलड्रिंक लिया और बाकी सभी ने शराब, बीयर ली। मेरे पास बैठे सभी चिकन डाल डाल कर खाने लगे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इनके बीच मैं कैसे बैठूं। चिकन की गंध भी आ रही थी। पर में बैठा रहा। फिर कुछ वैष्णो सामान आया खाने के लिए, जैसे पनीर टिक्का, वैग रोल। पर मुझे पनीर टिक्का ही मिला। मैंने टिक्का खाने के बाद केक खाया। थोड़ी थोड़ी देर में कुछ कुछ मेहमान जाने लगे थे। साढ़े 9 बजे 12-13 लोग ही रह गए थे। फिर वेटर खाना ले कर आ गया। सभी खाना खाया। 10 बज चुके थे। फिर सभी जाने के लिए होटल के बाहर आ गए। शाम को थोड़ी बारिश हुई थी जिससे मौसम ठंडा हो गया था। 

मैं  बाइक पर बैठ कर कुराली के लिए निकल पड़ा। 15 मिनट के बाद बाद में कुराली पहुंच गया। रंजीत के घर के बाहर रुका तो तीन चार कुत्तों ने मुझे घेर लिया और भौंकने की बरसात कर दी। एक चुप होता तो दूसरा भौंकने लगता। मैंने सोचा कि रात के समय लोग सोचेंगे कि कुत्ते भोंक रहे हैं, कहीं कोई चोर ना आ गया हो। इसलिए मैं बाइक स्टार्ट करके बाहर सड़क पर आ गया और रणजी का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद रंजीत भी कार में कुराली आ गया। हम उसके घर चले गए। घरवाले सभी सो चुके थे। 

हम भी सोने की तैयारी करने लगे। लेकिन अभी नींद नहीं आ रही थी। बातें करते हुए हमें ढाई बज गए थे। फिर हमने अपनी बातों को विराम दिया और नींद की आगोश में चले गए। सुबह उठकर नहा कर तैयार हो गए। तभी रंजीत का भांजा शिवी आलू के परांठे ले आया। दहिं, मखन और अचार के साथ परांठे खाए। पेट भर चुका था, फिर चाय पी और रंजीत को अलविदा कहा।

Saturday, May 30, 2020

लॉक डाउन में चंडीगढ़ की गेढ़ी, खट्टी मीठी

आज लॉक डाउन में थोड़ी छूट मिलने से चंडीगढ़ जाने का सबब बना। मुझे घर आए हुए 2 महीने से ज्यादा समय हो गया है। सोचा था कि सुबह जलदी जाऊंगा जिससे गर्मी में चल रही लू से बचा जा सके। लेकिन सुबह जल्दी जाने के सारे प्रयास फेल हो गए। घर के कामों को निपटाने के बाद आखिर जाने का समय आ ही गया। गर्मी भी बढ़ गई थी। धूप भी बढ़ती जा रही थी। दोपहर को 12 बज चुके थे। अंबाला पार करके प्यास सताने लगी। शंभू बॉर्डर पार करके पंजाब में दाखल हो गया। मेरा दिल दुआ कर रहा था कि कहीं ठंडे पानी की छबील मिल जाए। पर अभी शायद छबील लगने का समय भी नहीं आया था। थोड़ा आगे जाने पर रामनगर गांव में सड़क पर ही लोगों ने ठंडे पानी कि छबील लगाई हुई थी। मानो भगवान ने वहां मेरी दुआ सुनकर तुरन्त वहां छबील लगवा दी हो। मैंने पानी पिया और भगवान का शुक्रिया करके आगे बढ़ चला। उससे आगे कहीं भी पानी की छबील नहीं मिली।  


मोहाली पहुंच कर सबसे पहले एलआईसी के दफ्तर में जाकर फॉर्म को चैक करवाया और फिर खरड़ में दोस्त के पास चला गया। परंतु शायद वो अपने काम में बहुत मशरूफ था। इसलिए थोड़ी देर बैठने के बाद में वापस आ गया और अपने कमरे पर चला गया। शाम को दोस्त रंजीत सिंह काका जी को फोन मिलाया। सामने से आवाज आईं, "हैलो सुश"। वो मुझे फोन पर जब बात करते हैं तो इसी लहजे में बुलाते हैं। 

फिर उसने कहा कि आज तो में बाहर आया हूं, (शायद वो रोपड़ गए हुए थे) कल सुबह मिलते हैं। फोन काटने के बाद कमरे पर जाने रास्ते में ढाबे से पैक करवा के लाया हुए खाना खाया। ढाबे वाले ने मुझसे कहा था कि लॉक डाउन की वजह से यहां बैठकर खाना नहीं खिला सकते। इसलिए आपको पैक करके ले जाना होगा। खैर मैंने खाना खाया और थोड़ी देर आराम किया। शाम को 6 बजे मैं कमरे से बाहर निकला। चाय पीने का में कर रहा था। मार्केट में गया तो कहीं भी चाय वाला नहीं मिला। सभी दुकानें बन्द हो चुकी थी। फिर किसी से पूछने पर पता चला कि शाम को साढ़े पांच बजे सभी दुकानें बंद हो जाती हैं। सिर्फ सब्जी वाली रेहड़ी फड़ी ही मिलती है, वो भी थोड़ी देर के लिए। फिर मैंने आधा दर्जन केले लिए रात के लिए। क्यूंकि अब खाने को तो कहीं कुछ नहीं मिलेगा। 


रात को सोने का समय आ चुका था। मैंने कूलर में पानी डाला परंतु उस समय टेंशन बढ़ गई जब पानी वाला पंप नहीं चला। कूलर चल रहा था, इतना ही शुक्र मनाने के बाद मैं सी गया। गरमी ने बुरा हाल किया हुआ था। 
रात को सोते हुए एक तरफ तो कूलर की हवा लग रही थी, परंतु दूसरी तरफ पसीने से तर बतर था। फिर करवट बदल कर दूसरी तरफ हवा लगवा कर पसीना सुखाता तो दूसरी तरफ पसीना आ जाता। यही प्रक्रिया सारी रात चलती रही। 

जैसे तैसे सुबह हो चुकी थी। मैं नहा कर तैयार हो गया। बाहर मार्केट में जाकर चाय पी। फिर एलआईसी के दफ्तर में चला गया। दफ्तर में दाखिल होने से पहले सिक्योरिटी गार्ड ने मुझे सेनेटाइजर से हाथ साफ करने को कहा और मशीन से मेरा टेंप्रेचर चैक करने के बाद मुझे अंदर जाने दिया। दफ्तर में अपना काम खत्म करने के बाद में वापस आ गया। थोड़ी देर कमरे पर आराम करने चला गया। बहुत तेज गर्मी ने आज भी मुझे पसीने से तरबतर कर दिया। मुझे अभी से सोच होने लगी थी कि रात को फिर से वही हाल होगा, जो पिछली रात को हुए था। मैंने सोचा कि आज रंजीत के पास जाकर सो जाऊंगा। मैंने सोचा कि शायद वहां एसी लगा हो तो अच्छी नींद आ जाएगी।



Sunday, May 10, 2020

मां दिवस पर विशेष... एक मां ही है जो हमें दुख में नहीं देख सकती

आज सुबह से ही में फेसबुक पर मां दिवस से सबंधित पोस्ट देख रहा था। सभी अपने अपने तरीके से मां को सलाम कर रहे थे। मां को याद कर रहे थे। उन सबके साथ मैंने भी अपनी मां की पोस्ट को फेसबुक पर शेयर किया। आज मां दिवस के रूप में मनाया जाने वाला ये दिन सोशल मीडिया पर मां के नाम होता है। सुबह से ही फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर सभी सोशल साइट्स पर लोगों ने अपनी मंटके साथ फोटोज, यादें ताजा की हैं। टिक टोक पर तो मां के गाने चल रहे हैं। 


एक मां ही है को अपने बच्चों को दर्द में नहीं देख सकती। जब हम छोटे थे तो मां से हुई पिटाई से लगता था कि उनसे बड़ी दुश्मन कोई नहीं है। वो क्यों हमें स्कूल भेजती हैं। पर अब जब हम बड़े हो चुके हैं तो पर लगा कि मां की को पिटाई हमारे भविष्य को उज्जवल करने वाली थी। मां की डांट हमें गलत रास्ते पर चलने से रोकने वाली थी। ये वो ही मां थी जो मुझे जख्मी हालात में शिखर दोपहर की कड़कती धूप में अपनी गोद में उठाकर चार किलोमीटर पैदल डॉक्टर के पास लेकर गई थी। इतना दर्द कौन सहन कर सकता है। स्कूल में के जाने के लिए मुझे नाली में से भी घसीटती हुई ले गई। वह घटना मुझे आभास कराती है कि अगर स्कूल नहीं जाएंगे, तो दुनिया के आगे मजबूर हो जाएंगे। स्कूल में जाना चाहिए चाहे नाली में से होकर है क्यों ना जाना पड़े। 

एक बार मैं अपनी चप्पल निकालने के लिए गहरे जोहड़ में उतर गया। उसके बाद को पिटाई हुई थी वो उस मां की अपने बेटे के लिए एक चिंता थी। इन सब बातों का अहसास हमें तब हुआ जब हम खुद माता पिता बने। 
अपने हिस्से का बचाकर अपने बच्चों को खिलाने से खुद की भूख भी मिट सकती है, ये हमने अब जाना। 
मेरी मां हमें अपने साथ खेत में काम करने को बोलती थी, जो हमें अच्छा नहीं लगता था। पर अब अहसास हुए कि उनका ये कदम हमें आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाना था।  उनका अपने बच्चों को डांटने का अधिकार हमेशा रहता है। 
आज मेरे एक दोस्त ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली, जिसमे लिखा था कि आज उस व्यक्ति ने भी अपनी मां को नमन किया है, फेसबुक पर मां की फोटो डाल कर मां दिवस की शुभकानाएं दे रहे हैं। चलो किसी ना किसी बहाने ही सही, अपनी मां को याद तो किया। हमें शुक्र मनाना चाहिए कि हमें डांटने के लिए हमारे मां बाप हमारे साथ हैं

 भगवान उनकी उम्र लंबी करे और उनका अपने बच्चों को डांटने का अधिकार हमेशा बना रहे। आमीन!!

Saturday, May 9, 2020

आज सुबह से ही उसका मिजाज बदला हुआ था....

आज सुबह सोकर उठा तो मौसम का मिजाज कुछ ठीक नहीं लग रहा था। रात को जब सोए तो मच्छरों ने ठीक से नींद नहीं आने दी। मच्छरों ने जगह जगह काट कर बुरा हाल कर दिया। रात में गर्मी भी बहुत लग रही थी। एक छत वाला पंखा और एक कूलर भी गर्मी को भागने नाकाम हो रहे थे। सुबह उठते ही मौसम का मिजाज देखा तो कुछ राहत सी मिली। धूप कम थी, और बादल से छाए हुए थे। फिर मैंने हर रोज की तरह फोन उठाया और फेसबुक खोल की। 

फेसबुक पर मेरे एक दो दोस्तों ने लाइव वीडियो डाल रखी थी, जिससे देखकर कुछ सुकून मिला और आस जगी कि यहां भी शायद यही वाला मौसम बन जाएगा। फेसबुक पर डाली वीडियो में कुराली और चंडीगढ़ के आसपास के इलाके में बहुत तेज हवा चल रही थी। एक दो जगह बरसात हो रही थी। एक दोस्त ने वीडियो डाली थी, दिन में ही अंधेरा हो रहा था। वीडियो देख देख कर मेरा मा हिंडोले ले रहा था। फिर एक वीडियो में देखा तो छोटे छोटे ओले पड़ रहे थे। फिर में अपने बिस्तर से उठा और मुंह हाथ धोए। सुबह का नाश्ता किया। अब 8 बज चुके थे। मैं बार बार आसमान की तरफ देखे जा रहा था कि कहीं कोई बदली आए और बरस पड़े। मैंने गली में बताया कि वहां पर बारिश हो रही है, कहीं पर तेज हवा चल रही है। थोड़ी देर में ही मौसम का मिजाज बिगड़ने लगा। हवा भी तेज होने लगी थी। 

धीरे धीरे घरों से निकाल कर लोग गली में हवा का आनंद लेने आ निकले थे। मैं और चाचा का लड़का संजय सड़क पर चले गए। थोड़ी ही देर में।धूल भरी आंधी चलने लगी। लोगों ने भूस बांधने के लिए रखा हुआ था। वो आंधी में उड़ने लगा। तभी चाचा के घर से एक थैला उड़ कर गली में आ गया। मैंने दौड़ कर उस थैले को उठाया और घर में रखने के लिए दरवाज़ा खोलने लगा। एक बार तो मुझे लगा कि अंदर से दरवाजे कि कुण्डी लगी हुई है। पर जैसे ही मैंने थोड़ा सा और जोर लगाया तो दरवाज़ा खिलने लगा। हवा का प्रवाह इतना तेज था कि दरवाज़ा खुल ही नहीं रहा था। जैसे तैसे करके मैंने थोड़ा सा दरवाज़ा खोला और थैला अंदर रख दिया। 

सड़क पर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे हवा हम भी अपने साथ उड़ा ले जाएगी। धीरे धीरे आंधी कम होने लगी और मोटी मोटी बूंदें गिरने लगी। ठंडी ठंडी बूंदे शरीर को ठंडक दे रही थी। थोड़ी देर में बारिश शुरू हो गई। हमारी गाएं बाहर ही बंधी हुई थी। ओले पड़ने के डर से मैं गायों को अंदर बरामदे में बांध आया। मन जैसे एकदम खिला हुआ था। घर में एक जगह टिकने का मन ही नहीं कर रहा था। कभी गली में आ जाता, कभी सड़क पर चला जाता। बिजली भी चली गई थी। घर में पूरा अंधेरा पसर गया था। बादलों की गड़गड़ाहट मन को भाव विभोर कर रही थी। अब बूंदें बारीक हो गई थी परन्तु पहले से तेज होने लगी थी। अब दिल कर रहा था कि गरमा गर्म चाय पी जाए। थोड़ी देर में में रसोई में चाय बनाने चला गया। अब बाहर बूंदाबांदी हो रही है और रसोई में चाय बन रही है। ......


 

Thursday, May 7, 2020

तीन दिन गढ्डा खोदने के बाद भी मिली नाकामी

आज तीन दिन हो चुके हैं। लेकिन अभी भी उम्मीद की कोई किरन नजर नहीं आ रही। समझ में नहीं आ रहा कि क्या किया जाए। अभी कुछ ही महीने पहले बनी गली धंस चुकी है। गली में पानी के पाइपलाइन में नलों की कनेक्शन किए हुए हैं। सारी गली नाली का पानी रसने की वजह से धंस चुकी है। गली धंस से टूंटियों के पाइप लीक होने लगे हैं जिससे पानी गली के उपर आ गया है। गली में आने जाने वाले टूंटियो को दोष दे रहे हैं। में फैसला किया कि कल सुबह गली में गढ्डा खोद कर पाइप को ठीक किया जाए। अगले दिन सुबह ही मैंने गढ्डा खोदना शुरू कर दिया। चाचा जी की टूंटी भी वहीं पास में थी, इसलिए वो भी अपनी टूंटी वाला गढ्डा खोदने लगे। 

मैं खोदता जा रहा था, अभी एक फुट ही खोदा होगा, कि मेरी कस्सी एक पाइप से जाकर टकराई और पाइप पर लगा बैंड टूट कर उपर आ गया। मुझे लगा कि में पाइप लाइन आ गई है। चाचा ने बताया कि ये में पाइप नहीं है, ये उपर डाली हुई टूंटी का पाइप है। में पाइप लाइन तो अभी पांच फुट गहरा है। मैंने भाई को कहा कि तुम उस प्लम्बर को फोन कर दो जिसने ये टूंटी लगाई थी। वो ही आकर इसे ठीक करेगा। तब तक मैं गढ्डा खोद देता हूं। कोई एक घंटे बाद ही प्लम्बर आ गया। तब तक मैं गली में गढ्डा सिर्फ दो फुट ही खोद पाया था। 

गली में पत्थर और गटका निकल रहा था जिससे खोदने में परेशानी आ रही थी। प्लम्बर ने बताया कि पानी तो साइड में नाली से रिस रहा है। उसने बताया कि में पाइप लीक नहीं है। इसे और मत खोदो। उसके कहने पर मैंने गढ्डा खोदना बन्द कर दिया। जो बैंड टूट गया था, दुकान से मंगवा कर उसे लगवा दिया। फिर हमने गढ्डा ऐसे ही छोड़ दिया। उसने कहा था कि इसे एक दिन ऐसे ही छोड़ दो, अगर पानी लीक हुआ तो कल तक पता लग जाएगा।

लोगों को आने जाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। गढ्डा खुदने से उनके निकलने पर रोक जो लग गई थी। लेकिन हमने बाइक, साइकिल निकलने के लिए थोड़ी जगह बना दी। शाम तक मैं कई बार उस गड्ढे को देख चुका था। शाम तक गड्ढे में पानी नहीं भरा था। तभी घर पर चाची जी आई और बताया कि गढ्डा भर रहा है। मैंने जाकर देखा तो पानी सिर्फ इतना ही था। पहले तो में डर गया कि अगर पानी लीक हुआ तो पांच फुट खोदना पड़ेगा। दो फुट खोदने में तो जान निकल गई। पांच फुट खोदना है तो कैसे जुड़ेगा। गटके ओर पथरों की वजह से खोदने में परेशानी आती है। अगले दिन सुबह मैंने जाकर देखा तो गढ्डा पानी से भर चुका था। आसपास वाले कहने लगे कि गढ्डा तो खोदना पड़ेगा। पाइप ही लीक है। 

चलो मैंने मन बना लिया कि खोद ही लेते हैं। शक निकाल जाएगा। मैंने जैसे तैसे करके दोपहर तक गढ्डा पांच फुट तक खोद दिया। पाइपलाइन दिखाई दिन लगी थी। गड्ढे में पानी भर जाता तो डिब्बे की मदद से बाहर निकलता और फिर आगे खोदना शुरू करता। फिर मैंने पानी पूरा खाली कर दिया। फिर हमने प्लम्बर को फोन किया कि आपको आकर पाइप देखना होगा। वो कलंप के पास से लीक हो रहा है। दोपहर बाद 4 बजे वह गढ्डा देखने आया। उसने गड्ढे में देखा और पानी कि लीकेज बन्द करने की कोशिश की। थोड़ी देर में ही उसने हार मान ली। वो बाहर आ गया और कहा कि ये पानी बन्द नहीं होगा। मेन पाइपलाइन ही खराब है। उसको ही बदलवा लो। हमारे गांव के सरपंच के पिताजी भी वहीं खड़े थे। उन्होंने कहा कि चलो हम लिख कर शिकायत भेज देंगे, फिर पाइपलाइन बदलवा देंगे।

उसके बाद तीसरा दिन हो चुका था गढ्डा खुदे हुए। लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। फिर हमने सोचा कि खुद ही कोशिश कर के देख लेते हैं। मैं गड्ढे में उतर गया। पहले सारा पानी बाहर निकाला। मेरे साथ मेरे चाचा का लड़का संजय, ताया जी का लड़का छज्जू भी वहीं खड़े थे। वो सभी मुझे बता रहे थे कि अब क्या करना होगा। फिर छज्जू चाबियां ले आया। मैंने क्लंप खोल दिया। तभी पाइप में से पानी का प्रेशर आने लगा। एक ट्यूब।काटकर मैंने क्लंप के नीचे लगाई और क़लंप को टाइट कर दिया। कई बार कोशिश करने के बाद भी पानी कि लीकेज बन्द नहीं हो रही थी। देर हो चुकी थी। कभी क़लंप खोलता, कभी टाइट करते। पानी भी भर रहा था। 

एक बार तो नट लगते हुए नट मेरे हाथ से ही छूट कर पानी में गिर गया। मुझे लगा कि अगर अब पानी में से नट नहीं मिला तो और मुश्किल हो जाएगी। क्यूंकि पानी में गारा, पत्थर कंकड़ भी पड़े थे। काफी मुशकत के बाद खैर मुझे नट मिल गया। फिर मैंने क़लंप के नीचे ट्यूब का टुकड़ा लगाकर टाइट कर दिया। अब लग रहा था कि पानी की लीकेज काफी हद तक कम हो गई है। तभी वाटर सप्लाई वाले ने बताया कि मेन पाइप डलवा देंगे। तुम गढ्डा खुला रहने दो। फिर शाम को फोन किया की अभी एक हफ्ता लग जाएगा। अब आप देख लो कैसे करना है। 

फिर हमने सोचा कि ऐसे तो बन्द नहीं होगा। पानी तो कम हो ही गया है, गढ्डा बन्द कर देते हैं जिससे रास्ता तो खुल जाएगा। एक हफ्ता और ऐसे ही निकाल लेते हैं। मिट्टी डाल कर गढ्डा बंद कर दिया गया। अगले दिन सुबह एक ट्रैक्टर वहां से निकलने की डर थी, कि पानी फिर से मिट्टी को लांघता हुए ऊपर आ गया। जैसे हमें चिढ़ा रहा हो कि तीन दिन मशकत के बाद भी यही कुछ होना था। गली के पास बैठा पानी को देखता रहा और सोचता रहा कि तीन दिन ऐसे ही मेहनत की। जब परिणाम यही आना था तो ऐसे ही गारे में गारा हुआ मैं। वो भी एक दो नहीं, तीन दिन। अब तो सरकार की तरफ ही नज़रें लगी हैं कि कितने दिनों में पाइपलाइन डालते हैं। कहीं इस बार भी सिर्फ लारा है तो नहीं है।

Wednesday, May 6, 2020

कुछ रिश्ते ही अजीब होते हैं...

ज़िन्दगी में कुछ रिश्ते कितने अजीब होते हैं। हमारी समझ से परे। ज़िन्दगी इन रिश्तों के सहारे चलती हैं, जैसे रिश्तों के बिना ज़िन्दगी उलझ सी जाती है। कुछ रिश्ते जाने पहचाने तो कुछ अनजान होते हैं। पर अनजान रिश्तों कि महक भी जाने पहचाने रिश्तों जैसी ही होती है। कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में आए बिना भी हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। हम बचपन से रिश्तों में बंधे चले आते हैं। अभी कुछ दिन पहले बॉलीवुड एक्टर ऋषी कपूर और इरफान खान इस दुनिया को अलविदा कह कर चले गए। 

जिस दिन मुझे इरफान खान के कैंसर से निधन होने की बात चली तो मुझे लगा जैसे मेरी ज़िन्दगी का एक रिश्ता दा टूट गया। इरफान खान एक बहुत अच्छे एक्टर थे। मैंने उनकी कई फिल्में देखी। इरफान खान की अदाकारी का में कायल था। सबसे पहले मैंने उनको डीडी नेशनल पर आने वाले धारावाहिक चंद्रकांता में देखा था। उसमे इरफान खान ने बद्रीनाथ का रोल निभाया था। तब मुझे एक्टिंग के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता था। मुझे उसकी शक्ल भी अच्छी सी नहीं लगती थी, जैसे आंखें बाहर की तरफ सी रहती थी। पर जैसे जैसे हम बड़े हुए तो एक्टिंग के बारे में थोड़ी बहुत समझ आनी शुरू हुई। कई फिल्मों में उनकी एक्टिंग  देखी। फिल्म पन सिंह तोमर में उनको देखकर मुझे लगता था कि शायद ये असली व्यक्ति है जिसके बारे में ये फिल्म बनी है। मुझे लगा कि डायरेक्टर ने असली पन सिंह तोमर को ही फिल्म में शूटिंग करने के लिए शामिल किया था। हिंदी मीडियम फिल्म में उनकी हिंदी और अंग्रेजी के बारे में लड़ाई का जवाब नहीं। 

इरफान खान की फिल्म मदारी की तो बात ही अलग है। उनकी ये फिल्म देखकर मेरी आंखों में आंसु गए थे। सरकार की नीतियों और भ्रष्टाचार के उपर बनाई फिल्म मदारी में सचमुच ही गजब की एक्टिंग की थी। उनके हर डायलॉग पर मुझे भावुकता महसूस होती थी। 

इरफान खान के निधन से अगले ही दिन ऋषी कपूर का निधन हुए तो लगा कि बॉलीवुड को किसी की नजर लग गई है। ऋषी कपूर की फ़िल्मे हम बचपन से देखते आ रहे हैं। मेरे चाचा का लड़का संजय बिल्कुल ऋषी कपूर जैसा ही लगता था। ऋषी कपूर की मैंने बहुत सारी फिल्में देखी। अजूबा, अमर अकबर एंथनी, प्रेम ग्रंथ मुझे बहुत अच्छी लगती थी। मुझे उनके बोलने का ढंग, स्टाइल सब बहुत पसंद आते थे। उनकी फिल्म दीवाना में उनका मर जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। जब फिल्म शाहरुख खान की एंट्री होती है तो मुझे लगा कि ऋषी कपूर के अब फिल्म अच्छी नहीं रहेगी। पर जब बाद में ऋषी कपूर वापस आ जाते हैं तो मुझे लगा जैसे फिल्म में जान आ गई है। फिर बाद में जब वो दोबारा फिर दिव्य भारती की ज़िन्दगी से चले जाते हैं तब फिर मुझे लगा कि फिल्म का अंत बेकार बनाया है।

पर असल में मुझे ये सिर्फ भावुकता की वजह से लग था था। ऋषी कपूर के लिए मेरा इस तरह से भावुक होना उस अनजाने रिश्ते के कारण था जो एक एक्टर और प्रशंसक का होता है। उनके जाने से लगा जैसे एक रिश्ता टूट गया है। उनके निधन के बाद मैंने इंटरनेट पर पड़ेगा की नसीरुद्दीन शाह का भी निधन हो गया है। परंतु वो सिर्फ एक अफवाह थी। राजेश खन्ना, देव आनंद, अमरीश पुरी, कादर खान, शशि कपूर जैसे बड़े बड़े रिश्ते हमसे टूट गए। एक बार मैंने अमिताभ बच्चन जी के बारे में ऐसी ही अफवाह देखी परंतु सच्चाई जान कर मुझे सुकून मिला की शुक्र वो ठीक है। भगवान इन रिश्तों को हमेशा बनाए रखे। आमीन!!

Tuesday, May 5, 2020

बादलों की गड़गड़ाहट ने किसी को खुश किया, किसी को निराश

दोपहर का खाना खा कर हम सभी तैयार हो गए लेकिन विक्की अभी भी सो रहा था। उससे पहले तो संजय ने जगाया लेकिन वो मना करता रहा। कहने लगा कि मेरी तो कमर में दर्द हो रहा है। मैं नहीं जाऊंगा। फिर मैंने उसे कई बार जगाया लेकिन को उठने को तैयार ही नहीं हुआ। आखिर हम तीनों ही विक्की हो छोड़कर खेत में चले गए। पहले ही दिन दो बंदे कहते से वापस चले गए। दिल तो हमारा भी नहीं कर रहा था। परंतु जाना तो पड़ेगा ही। फिर खेत का मालिक वहां गेड़ा मारने आया तो उसने कहा कि तुम तीनों काट दोगे इसे। कुछ औरतों को पूछ के शामिल कर को। 

शाम को घर जाकर संजय कुछ औरतों से जाने के लिए पूछने लगाम आखिर तीन औरतें तैयार हो गई। परंतु उन्होंने एक शर्त रखी कि हम दिहाड़ी के बदले में गेहूं का अनाज लेंगे। अगले दिन सुबह हम छे बंदे हो गए मेथी काटने के लिए।  बीच में एक दिन बरसात ने भी हमें आराम करने पर मजबूर कर दिया। हम सभी बैठे मेथी काट रहे थे तभी बादलों के आने का संदेश मिला। बादल ब्दी जोर जोर से गरजने लगे

 एक तरफ तो दिल खुश हो गया कि चलो अब ठंड हो जाएगी। बूंदाबांदी सी होनी शुरू हो गई। लेकिन हम सभी अपने काम में लगे रहे। चाय का समय भी हो चला था। चाय और पानी पिलाने का काम मेरे ही जिम्मे था। सुबह के साढ़े दस बज रहे थे। मैं चाय बनाकर ले आया। 

हमने चाय पी। फिर काम पर लग गए। बूंदाबांदी काम हो गई थी। एक औरत ने तो घास की पल्ली को अपनी पीठ पर बांध लिया बरसात से बचने के लिए। एक दिन का काम बाकी रह गया था। सभी अरदास करने लगे कि आज बारिश ना पड़े तो आज शाम तक काम निपट जाएगा। लेकिन बादलों कि गड़गड़ाहट का शोर बढ़ता ही जा रहा था। सभी अपनी अपनी तरफ से कुछ ना कुछ बोले ही जा रहे थे। एक औरत कहती की है परमात्मा क्यों घड़े से फोड़ रहे हो, कर लेने दो हमें काम। संजय ने कहा कि बादल जल्दी से आजा, हम सभी घर चले जाएंगे। मैंने भी बीच में अपना स्टल्ला छोड़ दिया। मैंने कहा कि बादल तुम्हारी ये बैंड बाजे बजाने की आवाज ही अच्छी लग रही है। ऐसे ही बजते रहो, पर बरसो मत। 

मुझे डर था कि अगर आज काम रह गया तो कल फिर आना पड़ेगा। इसलिए आज ही काम खत्म करके जाएंगे। पर शायद बदल ज्यादा घने होने कि वजह से हमारी आवाज़ वरुण देवता तक नहीं पहुंच सकी। बरसात तेज हो चुकी थी। हमने अपनी अपनी दरांती वहीं रखी और बाइक पर घर आ गए। घर आने  के बाद थोड़ी देर में धूप भी निकल आई। तब तक दोपहर हो चुकी थी। हमने खाना खाया और आराम किया। शाम के चार बजे हम फिर खेत के लिए निकल पड़े। खैर वो दिन भी आ गया जब हम मेथी काट कर फ्री हो गए। मेथी काटे हुए तीन चार दिन हो चुके थे। अब उसको कंबाइन से निकालना था। हम खेत में ही थे जब शाम को कंबाइन खेत में पहुंच गई। उन्होंने कहा कि कल सुबह 8 बजे आ कर कंबाइन में डलवा देना। 

अगले दिन सुबह हम तीनों खेत में पहुंच गए। लेकिन वहां कोई भी नहीं था। तभी संजय ने जाकर पूछा कि कब चलेगी मशीन। उसने कहा कि दोपहर 12 बजे चलेगी। फिर हम 12 बजे खेत में पहुंचे। तीन हम थे और 6-7 बिहारी मजदूर भी वहां पहुंच गए, वो भी पास में ही गन्ना छील रहे थे। हमने एक घंटे में पूरी मेथी निकलवा दी। एक घंटे में ही हमारी शक्ल बिल्कुल खराब हो चुकी था। मशीन से धूल ही धूल निकल रही थी। वहां से फ़्री होकर हम घर आ गए। नहा धोकर खाना खाया और सो गए। शाम को खेत में जाकर भूस का कूप बांधने की तैयारी भी करनी थी। 

Monday, May 4, 2020

खेत में गए मेथी काटने, पहले दिन कितने पहुंचे, कितने वापस आए।

इस बार गेहूं के सीजन में पूरा दिन घर पर ही बीतता है। लॉक डाउन ने हमें घर पर रहने पर मजबूर कर दिया है। फिर सोचा घर पर फ़्री रह कर करेंगे भी क्या। हमने सोचा गेहूं ही काट लेते है। खाने लायक अनाज तो हो जाएगा। परंतु लॉक डाउन की वजह से शायद किसान भी जल्दी जल्दी अपनी फसल को कटवा देना चाहते थे इसलिए इक्कादुक्का किसानों को छोड़कर सभी ने कंबाइन मशीन से कटवानी शुरू कर दी। 
गर्मी भी जोर पकड़ रही थी। हमारे गांव के साथ वाले गांव ठोल के खेतों में एक किसान ने अपने खेतों में मेथी की फसल बोई हुई थी। 
उसने कहा कि तुम सभी मिलकर मेथी की फसल काट दो। हमने कहा कि जैसे गेहूं काटने के बदले अनाज लेते हैं, वैसे ही हम मेथी की कटाई के बदले कनक का अनाज लेंगे। पहले तो उसने आनाकानी सी की फिर उसने कहा कि ठीक है आप काटो, मैं अनाज देने के लिए तैयार हूं। 
अगले दिन सुबह 8 बज रहे थे, पिताजी, चाचा का लड़का संजय और चाचा महिंदर सिंह खेत में चले गए। मुझे कुछ काम से जाना था, सो मैंने बाद में आने को बोला। तभी दूसरे चाचा का लड़का विक्की भी कहने लगा कि मैं भी मेथी काटूंगा। फिर में अपना काम निपटा कर वापस आ गया। तभी खेत से पिताजी ने फोन किया की आए हुए चाय बनवा कर ले आना। जैसे ही मैं घर पहुंचा, तो देखा कि महिंदर सिंह चाचा खड़े थे। तब मुझे पता नहीं था कि वो भी मेथी काटने गए थे। मैं और विक्की चाय लेकर खेत में चले गए। खेत में जाकर उन्होंने बताया कि चाचा भी आया था, पर थोड़ा सा काट कर वापस चले गए कि ये मेरे बस का नहीं है। फिर हमने चाय पी। मेथी काटनी शुरू की। 
थोड़ी देर में मुझे महसूस हुआ कि विक्की भी तक गया था। वो बार बात खड़ा होकर गांव की तरफ देखने लगता। थोड़ी थोड़ी देर में पानी पीने लगता। मैंने उससे कहा कि मुझे नहीं लगता कि तू दोपहर बाद भी मेथी काटने आएगा। उसने कहा कि नहीं नहीं अब तो शुरू कर दिया है, अब तो पूरी मेथी काटेंगे। मुझे भी लगा कि शायद सच कह रहा है। वैसे थक तो में भी गया था। परंतु फिर सोचा कि अब ओखली में सिर दे दिया है, तो आने दो मुसलों को।   काटते काटते दोपहर हो गई थी। हमने सोचा कि खाना यहीं मंगवा लेते हैं। पेड़ की छाया में बैठकर खा लेंगे, यहीं थोड़ा आराम कर लेंगे। लेकिन विक्की कहने लगा कि की नहीं नहीं घर ही जाएंगे, घर से ही खाना खा कर वापस आएंगे। तब मेरा मथा ठनका और मैंने मन ही मन कहा कि अब ये पक्का नहीं आएगा। खैर थोड़ी देर बाद सभी घर जाने को तैयार हो गए। हम सभी खेतों के बीच में से होते हुए चले जा रहे थे। विक्की गेहूं कि फसल को देखकर बोल रहा था कि मेथी काट कर फिर गेहूं की फसल भी काटेंगे। मैंने कहा कि पहले मेथी तो काट ले। एक दो नहीं बल्कि सवा तीन एकड़ मेथी है। 
फिर धीरे धीरे थके मांदे घर को चल पड़े। घर पहुंच कर विक्की तो सबसे पहले नहाया। हमने हाथ मुंह धोकर खाना खाया। इस सीजन में शक्कर को खासतौर पर खाने में शामिल किया जाता है। फिर में खाना खा कर आराम करते हुए सो गया। दोपहर 3 बजे के बाद मेरी आंख खुली तो बाहर चाचा का लड़का संजय आवाज़ें दे रहा था खेत में जाने के लिए। हम भी जाने के लिए तैयार हो गए लेकिन विक्की.....
x

Friday, May 1, 2020

आज गर्मियों का पहला ठंडा आया घर....

गर्मियों में ठंड की बात करने पर एकदम ठंडक ही महसूस होने लगती है। दिल करता है कि गर्मी से निजात पाने के लिए जल्दी से जल्दी कुछ ठंडी चीज मिल जाए, चाहे बर्फ ही मिल जाए। आज मई का महीना शुरू हो चुका है। आज 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वैसे हमारे यहां 24 घंटे बिजली रहती थी, शायद इसलिए कि हमारे गांव के सत्संग घर में कुछ प्रवासी मजदूर जो यूपी और बिहार के थे, लॉक डाउन में फैंस गए थे। उनको सत्संग घर में ठहराया गया था, उनके लिए बिजली का कट नहीं लगता था। जैसे ही वो यहां से चले गए, तभी से पूरे दिन का बिजली कट लगाना शुरू हो गया है। सुबह 9 बजे बिजली चली जाती है और शाम को 6 बजे आती है। गर्मी ने भी लोगों के बल निकले पड़े है। कनक की कटाई हो चुकी है। भूस बनाने वाली मशीनें चल रही हैं। हमारे भी शायद आज शाम को या कल सुबह भूस की मशीन आएगी, एक किल्ले का भूस बनवाना है। 

गर्मी को देखकर घर से निकलने को दिल ही नहीं करता। आज सुबह मेरे चाचा की लड़की ने मुझे कहा कि हमारे छत वाले पंखे में रात को स्पार्किंग हो रही थी, उसे देख कर जाना, हो सके तो ठीक कर देना। 10 बजे के आसपास में उनके घर पंखा देखने गया, तब तक बिजली जा चुकी थी, गर्मी भी बहुत थी। चाचा ने कहा कि पंखे को उतार दो और अन्दर से पंखा उतार कर बाहर बरामदे में लगा दो। मैंने एक सीढ़ी के सहारे चड़कर पंखा उतार दिया। फिर अन्दर कमरे से पंखा उतरने के लिए उनकी लोहे की पेटी के ऊपर चढ़कर पंखा उतरने लगा। पंखे के पास हाथ ठीक से नहीं पहुंच रहा था। गर्मी ने भी ऐसी तैसी कर रखी थी। मैंने टीशर्ट पहन रखी थी जो पसीने से भीग चुकी थी। जैसे तैसे करके मैंने पंखा उतार दिया। फिर बरामदे में उस पंखे को लगा दिया। मैंने सोचा कि चलो काम पूरा हो गया है। परंतु अभी कहां।  

शायद अभी गर्मी को और भी परीक्षा देनी थी मुझे। चाचा ने कहा कि अब को पंखा बरामदे से उतारा था, उसे बरामदे में ही दूसरी तरफ लगा दो, वहां भी पंखे की जरूरत पड़ती है। पहले तो मैंने सोचा कि ये तो कोई बात नहीं बनी, मैंने उंगली पकड़ाई उन्होंने तो कलाई ही पकड़ ली। गर्मी ने बस करवा रखी थी। चाची मंजे पर बैठी पंखा झल रही थी। उस देख देख कर मुझे गुस्सा आ रहा था कि में यहां गर्मी में पंखे लगता फिर रहा हूं, और चाची मौज से मंजे पर बैठी पंखा झल रही है। फिर सोचा कि चलो अब काम शुरू कर है दिया है तो फिर पूरा तो करना पड़ेगा। वैसे तो काम कोई ज्यादा नहीं था, परंतु गर्मी की वजह से बहुत मुश्किल लग रहा था। फिर दूसरी तरफ सीढ़ी लगाकर पंखे को लगाने चढ़ गया। परंतु वहां भी हाथ ठीक से नहीं पहुंच रहा था। सीढ़ी दूर लग रही थी। 

फिर चाचा ने चाची को कहा कि चाय बना लो, ये भी पी लेगा। मैंने सोचा कि पहले ही बहुत गर्मी है। ऊपर से आप चाय पिला दो, में तो पहले ही गरमी से तंग हो गया। जैसे तैसे करके मैंने पंखा लगा दिया। तभी चाचा की लड़की ने कहा कि पहले ही गरमी है, चाय रहने दो, ठंडा ले आते हैं। मैंने मन ही मन सोचा कि ये मेरे लिए भगवान बन कर आई है। इसने मेरे मन की सुनी है। ठंडे का नाम सुनकर मेरी बांछे खिल गई। मैं मन ही मन खुश हो गया। फिर पता ही नहीं कब मैंने बिजली कि तारों के कुनैक्शन भी बना दिए। 

पंखा लगा कर मैं नीचेे उतर आया। चाचा की लड़की ने गिलास में ठंडा डाल दिया। मैंने पहले ना नुकर सी की, कि मैंने नहीं पीना। फिर उसने कहा कि नहीं नहीं ले लो। फिर मैंने ज्यादा मना नहीं किया, सोचा कि कहीं सच में ही ना दे। गिलास पूरा भरा हुआ था। मैंने उसमें से कुछ निकालने की कोशिश की पर उसने निकालने से मना कर दिया। फिर मैंने पूरा गिलास ठंडे का पी लिया। तब मैंने देखा कि मेरा बेटा और बेटी बाहर गेट पर खड़े मुझे बुला रहे थे। में ठंडा पी रहा था, तो मुझे ठीक नहीं लगा। फिर मैं घर आ गया। 

तभी खेत से फोन आया कि खेत में कंबाइन आ गई है, मैथा निकालना है। मैं, पिता जी और चाचा का लड़का बाइक पर खेत में चले गए। करीब एक घंटा हमने वहां मैथा कंबाइन में डाला। उसके बाद बहुत प्यास लगी। मुझे फिर वहीं ठंडा याद आ गया। फिर मैंने एक बोतल में पाइपलाइन से पानी भरके पिया। फिर डेढ़ घंटे बाद हम घर आ गए। मैंने अपनी बेटी को बोला कि जाओ दुकान से ठंडे की बोतल ले आओ। वो जाकर दुकान से ठंडे की बोतल ले आती। सबने ठंडा पिया और गर्मियों की तपिश को कम किया। मुझे भी सुकून मिला कि अब मेरे साथ साथ सबने ठंडा पिया है। शरीर के साथ साथ दिमाग में भी ठंड पड़ गई। 


उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...