Sunday, November 25, 2018

हमारे बाहर बसने वाले भगवान - माँ बापू


माता पिता हमारी ज़िंदगी में भगवान की तरफ से दिया हुआ एक अनमोल तोहफा हैं। बचपन में हमें अपने माता पिता पर कई बार गुस्सा आता था, पर शायद हम उस अनमोल तोहफे की अहमियत को अनदेखा कर देते थे। माता पिता का साया हमारे सिर पर भगवान के समान ही है। लोगों को कहते सुनते हैं कि हमने भगवान नहीं देखा, तो लोग उसके जवाब में बोलते हैं कि भगवान तो हमारे अंदर है, पर मैं कहता हूँ कि भगवान हमारे बाहर भी है। हमारे माता पिता किसी भगवान से कम नहीं हैं। बचपन में हमसे कई गलतियां हो जाती थी, जिनके बदले में हमें माँ बाप से मार भी खानी पड़ जाती थी। पर उस मार के पीछे उनका प्यार छुपा होता था, जो हमें कहीं न कहीं बुरे कामों से बचने के लिए होता था। वो मार हमारे लिए दवाई के समान होती थी, जो कड़वी तो ज़रूर थी, पर हमारे फायदे के लिए भी बहुत ज़रूरी थी। जब कभी हमें बुखार हो जाता था, तो डॉक्टर से इंजेक्शन लगवाने ले जाते थे। उससे हमें दर्द तो ज़रूर होता था, पर वो सिर्फ हमारी भलाई के लिए ही होता था। पिता एक ऐसा रिश्ता  है जिसको कई नामों से बुलाया जाता है बापू, पिता, बा, बाब्बू, फादर, और आजकल डैड के नाम से जाना जाता है। नाम चाहे कोई भी हो, पर रिश्ता एक है। आजकल एक गीत बहुत मशहूर हो रहा है, ;बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है; इस गीत में बापू को हानिकारक बताया गया है, क्यूंकि वो उनकी भलाई के लिए उनसे मेहनत करवाता है। हमें भी अपना बापू हानिकारक लगता था, जब वो हमें डांटता था, हमें झिड़कता था, कोई काम न करने की सलाह देता था। सारी ज़िंदगी कमरतोड़ मेहनत करने वाला बापू हमारे भविष्य की चिंता में डूबा रहता है। वो नहीं चाहता कि उनका बेटा भी उसकी तरह मज़दूरी करे, लोगों के खेतों में काम करे। बापू अपने सपनों को मार कर हमारे सपनों को जीवन देता है। कभी कभी हम सोचते हैं, कि हम अपने सपनों के बारे में सोचते हैं, कि मैं ये करूंगा, वो करूंगा। पर कभी सोचा है कि सुबह काम पर निकल जाने वाले बापू ने भी कभी सपने देखे होंगे। सुबह अपने बच्चों के उठने से पहले काम पर निकल जाने वाला बापू रात को बच्चों के सो जाने के बाद काम से वापस आता है। उसके लिये धुप छाँव, गर्मी सर्दी, बरसात, आंधी कोई मायने नहीं रखती। बाहर से कठोर दिखाई देने वाले बापू के अंदर की नरमाई शायद किसी ने जान पाई हो। खुद काँटों पर चल कर अपने बच्चों को कंधे पर बिठाकर, खुद फाटे कपडे पहन कर बच्चों को नए कपड़े दिलवाने वाला बापू कितनी मेहनत करता होगा। और हम उनसे बात करते हुए भी शरमाते हैं।  कुछ दिन पहने ही हमारी गाय को चिचड़ लग गए थे, जिसके लिए मैंने गाय को इंजेक्शन लगाया। मुझे गाय को इंजेक्शन लगाते हुए महसूस हो रहा था कि इसे दर्द होगा, पर फिर भी मैंने उनको इंजेक्शन लगाया, क्यूंकि मैं जनता था कि ये इंजेक्शन लगाना उनकी भलाई के लिए है। अपनेी माँ बाप से प्यार करो, उनकी भावनाओं को समझो, ऐसा न हो कि कहीं समय निकल जाये और हमें पछताने के सिवा कुछ हासिल न हो।
सोशल मीडिया पर मैं एक पोस्ट देखी जिसमे पिता के कंधे पर बैठी उसकी बेटी को दिखाया गया है। वो फोटो मैं इसमें भी शेयर कर रहा हूँ।

Tuesday, November 13, 2018

चंडीगढ़ में छठ पूजा के लिए लोगों से सज गयी झील


दिवाली का तयोहार लोगों ने बड़ी धूमधाम से मनाया। उसके बाद से ही छठ पूजा की तैयारियां शुरू हो गयी। वैसे हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ में छठ पूजा सिर्फ वही लोग मनाते हैं जो बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल की तरफ के रहने वाले हैं। बिहार में ये तयोहार बड़े ज़ोरों शोरों से मनाया जाता है।  गांव से चंडीगढ़ आने से पहले मुझे छठ पूजा के बारे में पता ही नहीं था कि ये भी कोई त्योहार होता होगा। चंडीगढ़ आने के बाद ही मुझे जानकारी हुई कि बाहर से आये लोग छठ पूजा बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस त्यौहार को मनाने लोग यहां से अपने गांव भी चले जाते हैं, पर जो अब पक्के तौर पर यहीं रहने लगे हैं, वो अपना त्योहार यहीं मनाते हैं।

चंडीगढ़ में सेक्टर 42 में ख़ास तौर पर तैयार की गयी झील में लोग इकठे हो जाते हैं। खरड़ में अज सरोवर को छठ पूजा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बाज़ारों में छठ पूजा की तैयारी के लिए बड़े ज़ोर शोर से खरीददारी की जाती है। दिवाली की तरह ही बाजार खूब सजे होते हैं। हर तरफ गन्ने, टोकरियां, छाज, छोटे छोटे पौधे, केले की गढ़ और भी बहुत सारा सामान होता है पूजा के लिए। मैं भी आज छठ पूजा देखने गया। सभी ऑटो रिक्शा, मोटर साइकिल, और अपनी अपनी गाड़ियां ले के पूजा के लिए झील की तरफ जा रहे थे। मैंने सोचा कि मैं भी देखता हूँ कि वे कैसे पूजा करते हैं। मैं भी उनके पीछे पीछे झील के पास पहुँच गया। झील के पास तो जैसे मेला लगा हुआ था। बचे अपनी मस्ती में नाच गए रहे थे। और उनके माता पिता उनको साथ रहने की नसीहतें दिए जा रहे थे। उनको डर था कि कहीं वे भीड़ में खो ना जाएँ। 
सभी ने नए नए कपडे पहने हुए थे। लोग पूजा करने के लिए साथ लाये सामान को ठीक करके रख रहे थे।  लोगों ने झील के पास शामियाने भी सजाये हुए थे। DJ लगाए हुए थे। सामने बैठने के लिए कुर्सियां सजाई हुई थी। ऐसे ही 10-12 शामियाने लगे हुए थे। कई जगहों पर लाऊड स्पीकर लगे हुए थे जिनमे भोजा पुरी भाषा में छठ माता के गीत चल रहे थे। चंडीगढ़ पुलिस के सिपाही भी अपनी ड्यूटी दे रहे थे। वे लोगों पर लगातार नज़र रखे हुए थे, कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाये। क्यूंकि ऐसे मौके पर कुछ शरारती लोग शरारत कर जाते हैं। मैं भी एक तरफ खड़ा लोगों को देख रहा था। वहीं कुछ लोग झील के किनारे फ़ोन से सेल्फियां खींच रहे थे। मैंने भी कुछ फोटोज खींचे। 
हर त्योहार का अपना अपना महत्व होता है। मुझे वैसे इस त्योहार के बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं पता है। पर इन त्योहारों को देखकर लगता है कि लोगों में कितनी श्रद्धा होती है। और हमें उस श्रद्धा का सन्मान करना चाहिए। क्यूंकि किसी न किसी बहाने से ही सही लोग एक साथ एक जगह पर इकठे तो होते हैं वैसे तो आज कल काम में उलझे लोगों के पास अपनों से मिलने का भी समय नहीं है। छठ पूजा के बारे में पूरी जानकर लेकर इस त्यौहार का इतिहास भी आप लोगों के साथ किसी दिन ज़रूर शेयर करूंगा।


Monday, November 5, 2018

दिवाली में मार्किट की चहल पहल के अनोखे रंग

आज दिवाली के तयौहार की तैयारियां बड़े ज़ोर शोर से बाजार में देखी जा सकती हैं। हर तरफ रौनक ही रौनक नज़र आती है। हर किसी के लिये ये दिवाली का पर्व अलग अलग नज़रिये से मायने रखता है। पुरे भारत देश में दिवाली की आमद एक खास महत्व रखती है। पुरे साल का ये सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। 

कहते हैं कि इस त्यौहार के बाद सभी त्यौहार ख़त्म हो जाते हैं। फिर अगले साल से नए त्यौहार फिर शुरू हो जायेंगे। दिवाली सभी के लिए किसी न किसी रूप में खास होता है। आज बाजार में जाकर मैंने देखा कि सभी अपनी तयारियों में लगे हुए हैं। लोग बाज़ारों में अपनी अपनी दुकान के आगे स्टाल लगा रहे थे। चंडीगढ़ सेक्टर 41 कि कृष्णा मार्किट में गया तो वहां का नज़ारा कुछ और ही नज़र आया। कुछ दुकानदार अपनी दुकान लगाने के लिए जगह ढूंढ रहे थे। तो कुछ ने सड़क किनारे ही अपना सामान रखा हुआ था। कुछ लोग बिजली की लड़ियाँ लगा रहे थे। 

एक जगह दुकान लगाने के लिए लोगों की लड़ाई हो रही थी। एक औरत ने अपनी एक चारपाई डाल कर उस पर कपडे, शाल, चुन्नी, दुपट्टा, और भी बहुत कुछ रखा हुआ बेचने के लिए। उसके पास वाले ने चारपाई पर ही कुछ खाने का सामान रखा हुआ था। शायद वो एक दूसरे को अपनी दुकान उठाने के लिए बोल रहे थे। मैं कुछ देर खड़ा उनको देखता रहा। थोड़ी देर बाद वो औरत अपने साथ वाले दुकानदार के पास बंधी हुई रस्सी से अपने बेचने के सामन को ये कहते हुए उतर रही थी कि ठीक है, मैं ही उठा लेती हूँ दुकान, तू मोटा हो जा दुकान लगा के। मैं ही चली जाती हूँ। पर शायद वो गयी कहीं नहीं थी, उसने कुछ सामान उतारा, फिर ऐसे ही छोड़ दिया। तभी उसके पास कुछ लड़कियां कुछ सामान खरीदने आ गयी। शायद इसलिए उनका मामला कुछ ठंडा पड़ गया। औरत धीरे धीरे उस दुकानदार को गालियां ज़रूर निकल रही थी। 

मैं भी वहां से आगे चल पड़ा। एक तरफ एक लड़का मिटटी के दीपक लिए बैठा था। उसने भी अभी अभी अपनी दुकान सैट की थी। उसका बड़ा भाई उसको सब चीजों के रेट बता रहा था, शायद उसे किसी दूसरी जगह दुकान लगाने जाना था। एक जगह चाय की दुकान लगी हुई थी। पहले तो मन किया कि चाय पी लेता हूँ फिर सोचा कि पहले मार्किट घूम लूँ, उसके चाय पियूँगा। फिर मैंने एक दुकान पर रंगोली बनाने वाले सामान के बारे में पूछा तो उसने पैकेट दिखाए। फिर मुझे कहता कि अगर खुला सामान लेना है तो दूसरी दुकान से ले लो, मैंने सोचा कि अपना सामान बेचने कि बजाए दूसरी दुकान पैर क्यों भेज रहा है। 

तभी उसने कहा कि वो हमारी ही दुकान है। मैंने सोचा कि दिवाली पर कुछ लोग त्यौहार मनाने कि वजह से खुश होते हैं, और कुछ लोगों को अपनी आजीविका के लिए दुकान लगाने की ख़ुशी होती है। क्यूंकि उनके लिए भी ये एक सुनहरी मौका होता है अपनी आय बढ़ाने का। सभी चाहते हैं कि इस दिवाली पर उनकी आय में बढ़ोतरी हो जाये तो उनकी दिवाली भी अच्छी तरह से मन जाएगी। फिर मैंने रंगोली बनाने के कुछ पैकेट और दो फैंसी चिराग लिए। 

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...