आज पूर्णमासी के दिन गरबड़े का त्यौहार मनाया जाता है। त्योहारों की रौनक अब साल दर साल फीकी होती जा रही है। अब कोई भी त्योहार जैसे मस्ती भरा नहीं रहा। आज के समय में सभी त्योहार जैसे सिर्फ खानापूर्ति मात्र रह गए हैं। जब हम छोटे थे तो छोटे से छोटा त्योहार फुल मस्ती भरा होता था। हर त्योहार पर नए नए कपड़े डालने का चाव ही अलग था।
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| ताई गर्बड़े में पैसे डालती हुई |
एक बार तो चाचा के लड़के की शादी की चिट्ठी लेकर नाई आया तो मैंने नए कपड़े डाल लिए। सभी मुझे चिढाने लगे कि तेरी शादी की चिट्ठी नहीं आईं है। जिसकी चिट्ठी आईं है वो तो पुराने कपड़े पहने हुए है। पर जैसे हमें तो बस बहाना चाहिए था नए कपड़े डालने का। आज में शाम को दुकान पर बैठा था। घर से फोन आया कि घर आकर गरबढ़े का माथा टेक लो। मैंने पहले तो टाल दिया कि तुम टेक को, मुझसे नहीं आया जाएगा। पर घर से बार बार फोन आता रहा कि ज्यादा टाइम नी लगेगा, माथा टेक कर चले जाना। दुकान गांव में होने का ये तो फायदा है कि जब भी काम हो, घर जा सकते हैं।
खैर मैं भानजे ख़ुशी को दुकान पर बिठा कर माथा टेकने चला गया। माथा टेक कर मैंने एक गरबड़ा उठाया और उसमे तेल डलवाने के लिए चला गया। दिल कर था था कि आज भी बच्चे बन जाएं। जैसे पहले सभी बच्चे इकट्ठे गर्बड़े लेकर घर घर जाते थे। पहले तो घर में ही माता जी से पैसे डलवाए। फिर मैं ताया जी के घर तेल डलवाने।चला गया। भतीजी ख़ुशी ने एक रुपए का सिक्का डाल दिया। फिर ताई ने तेल डाला और एक रुपए का सिक्का भी डाला। उसके बाद मैंने अपनी फोटो खींची गर्बड़े के साथ। उसके बाद मैं चाचा के घर गया। पर मेरे साथ कोई नहीं था। में अकेला ही गर्बड़े लेकर घूम रहा था। चाची ने तेल डाला और 10 रुपए भी डाले। फिर चाचा के दूसरे घर जा के तेल डलवाया। वहां से उन्होंने 5 रुपए का सिक्का डाला। फिर मैं घूम कर वापस घर आ गया।
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| गर्बड़े लेेेकर जाते हुए, चेहरे पर खुशी लाने की कोशिश करते हुए। |
मैंने गर्बड़े को बचाने वाले गीत भी गाया, नाच मेरी गरबड़ी, गर्बड़े का ब्याह। मैंने पूरी कोशिश की कि अपने बचपन वाली गर्बड़े नचाने वाली ख़ुशी को वापस पा सकूं, परंतु वह बात नहीं बनी। मन में सुकून ही नहीं आ रहा था। फिर मैं घर जाकर गर्बड़े रखकर वापस दुकान पर आ गया। पहले तो काफी देर बैठकर सोचता रहा कि आखिर क्या कमी है अब जो उस ख़ुशी को वापस नहीं आने दे रही। मन में पहले जैसा सुकून क्यों नहीं है अब। इस कश्मकश में ही बैठा रहा। तभी मैंने अपने भांजे ख़ुशी को घर भेजा की तुम्हारे दोस्त भूरे ने तुम्हे बुलाया है। गर्बड़े लेकर जाना है। शायद उन्हें को ख़ुशी मिले जो हमें अपने बचपन में मिलती थी।