Sunday, July 22, 2018
पार्क में गुजरी एक शाम...
शाम के 6 बज रहे थे। धुप निकली हुई थी। बाजार में घूमने के बाद मैंने सोचा कि पार्क में बैठ के आराम करते हैं। शाम के समय पार्क में काफी भीड़ हो जाती है। शाम को सभी अपने बच्चों को लेकर पार्क में घूमने आ जाते हैं। मैं भी पार्क में चला गया। वहां पर जितनी भी कुर्सियां लगी हुई थी, सभी पर कोई न कोई बैठा हुआ था। मुझे एक कुर्सी नज़र आयी जिस पर एक व्यक्ति बैठा हुआ था। मैं भी उस कुर्सी पर जाकर बैठ गया। काफी देर पार्क में इधर उधर देखता रहा। पार्क के एक कोने में बच्चों के लिए झूले लगे हुए थे। छोटे छोटे बच्चे उन पर मस्ती कर रहे थे। झूले कई तरह के थे। सभी बारी बारी से बदल बदल के झूले ले रहे थे। बच्चों को ऐसे करते देखता रहा। बहुत आनंद आ रहा था। एक सी-सा झूला होता है, जिस पर दोनों तरफ एक एक बच्चा बैठता है। कभी एक बच्चा ऊपर उठ जाता है, तो कभी दूसरा। उस झूले पर एक तरफ एक छोटा बच्चा बैठा था, पर दूसरी तरफ कोई बच्चा नहीं था। दूसरी तरफ उसका पापा उसे झूले दे रहा था। आज कल कई बच्चों के माता पिता नहीं चाहते की उनका बच्चा किसी दूसरे बच्चे के साथ घुल मिल कर खेले। अगर वो बच्चा दूसरे बच्चों के साथ घुल मिल जाता तो वह भी वही मस्ती कर पाता जो दूसरे बच्चे कर रहे थे। एक तरफ से उसका पापा झूले को हाथ से नीचे दबाता तो बच्चा ऊपर उठ जाता, फिर वो अपना हाथ उठा देता, तो बच्चा नीचे आ जाता। पर ऐसा करते हुए बच्चे के चेहरे पर वो ख़ुशी नहीं झलक रही थी, जो होनी चाहिए थी। उसका पापा भी सिर्फ उसको झूला दिलाने के लिए ये सब कर रहा था, पर दिल से वो उस बच्चे के साथ नहीं था। तभी वहां पर एक छोटा बच्चा अपने मम्मी पापा के साथ वहां आया। उस बच्चे के पापा ने उसे कहा कि तुम जाओ खेलो, और वो दूसरे बच्चों के साथ घुल मिल गया। उसके मम्मी पापा ने चिड़ी छक्का (बैडमिंटन रैकेट) निकाला और वो भी खेलने लगे। उन सब को देख कर मैं भी आनंदित हो रहा था। काफी देर वो खेलते रहे, फिर थक कर वो आराम करने बैठ गए। उनका बच्चा भी उनके पास आ गया। फिर मैं अपनी कुर्सी से उठ कर दूसरी तरफ चला गया। पार्क के बीच में फुहारा लगा हुआ था। वैसे दिन में तो उसे बंद रखते हैं, शाम के समय उसे चला देते हैं। मैंने एक बात पर गौर किया कि जितने भी वहां घूम रहे थे, उनमे ज्यादातर लड़कियां अपने फ़ोन में ही लगी हुई थी। वो चाहे अकेली हो, या 2, 3 का ग्रुप हो, फुटपाथ पर चलते हुए थी फ़ोन में पता नहीं क्या ढूंढ रही थी। कोई अपने फ़ोन में सेल्फी ले रही थी, तो कोई एक दूसरे की फोटो खींच रही थी। फुहारे के चारों तरफ लड़कियां अपनी सल्फी लेने में मशरूफ थी। फुहारे के एक तरफ कुछ बज़ुरग लोक बैठे थे। कई नीचे घास पर बैठे थे। कुछ कुर्सियों पर बैठ फुहारे को देखे जा रहे थे। वो सभी एकटक ऐसे निहार रहे थे, जैसे उसमे से अभी कुछ चमत्कार होने वाला है, अगर उन्होंने अपनी नज़र हटाई तो कहीं वो उस चमत्कार को देखने से वंचित न रह जाएँ। मुझे उन सबको देखकर बहुत हैरानी हो रही थी। पर कहते हैं कि छोटी छोटी बातों में खुशियां ढूंढ़नी चाहियें। कई पार्क में फुटपाथ पर अपने शरीर को फिट रखने के लिए कसरत कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे बाजार की सारी भीड़ यहां इस पार्क में ही आ गयी हो। हर तरफ रंग बिरंगे कपड़ों में लोग पार्क में लगे फूलों का भरम पैदा कर रहे थे। धीरे धीरे अँधेरा भी बढ़ने लगा था। पार्क में लाइटें जलने लगी थी। मैंने अपना बैग उठाया और पार्क से बहार आ गया। पार्क के एक कोने में कुल्फी वाला अपनी रेहड़ी लिए खड़ा था। जैसे ही बच्चे पार्क से निकलते तो कुल्फी वाले की तरफ दौड़ पड़ते। कुल्फी वाले से कुल्फी लेने वालों में बच्चों के इलावा बड़े लोग भी थे। फिर मैंने अपनी बाइक उठायी और वहां से निकल पड़ा।
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