Saturday, June 30, 2018
क्या चाय के लिए कोई अपनी जान भी गँवा देता है ?
मैं दफ्तर में बैठा काम कर रहा था। शाम के करीब 7 बज रहे होंगे। बाहर एकदम से झमाझम बारिश शुरू हो गयी। दीवार में बहुत बड़ा शीशा लगा हुआ था, जिसमें से बाहर सब कुछ आसानी से दिखाई देता है। बारिश का आनद मैं शीशे में से ही ले रहा था। तभी गरमा गरम चाय आ गयी। बारिश का मौसम और गरमा गरम चाय, मज़ा ही कुछ और है। मन ही मन मैं बारिश में झूम रहा था। मुझे कुछ अंदाज़ा भी नहीं था कि इस अच्छे मौसम मैं कुछ ऐसा भी सकता है। मैंने चाय की एक चुस्की लेकर कप नीचे रखा ही था कि वो पीछे से आ गयी। उसका नाम मैं नहीं जानता था। दफ्तर में मैं और मेरे बॉस थे। मैं कंप्यूटर पर काम कर रहा था, और मेरे बॉस अपने कमरे में काम कर रहे थे। वो आकर पास ही एक मेज पर बैठ गयी। मैंने उसकी तरफ देखा, फिर अपने काम में लग गया। ना उसने मुझे कुछ कहा, ओर ना मैंने उससे कुछ पूछा। मैं काम करते हुए बीच बीच में चाय की घूंट भी भर रहा था। फिर अचानक से मुझे लगा कि उसकी नज़र मेरी चाय पर थी। पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। जैसे ही मैं चाय की चुस्की लेकर कप नीचे रखता, वो कप के पास आ जाती। एक दो बार तो मैंने कुछ नहीं कहा, फिर मैंने उसे वहां से चले जाने को कहा। मैं सोच रहा था कि मेरे बॉस ही बाहर आ जाये, और उसे वहां से भेज दें। पर वो बाहर नहीं आये। मेरे लिए मुसीबत बनती जा रही थी वो। मैंने कई बार उसे कहा कि वो वहां से चली जाये। पर उसे शायद मेरी चाय चाहिए थी। ऐसे मौसम में मेरा भी चाय पीने का बहुत मन कर रहा था, इसलिए मैंने उसे मना कर दिया कि उसे चाय नहीं मिलेगी। मैंने उसे धमकी दी कि वो चुपचाप वहां से चली जाये, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। मुझे लगा कि मेरी धमकी का कुछ तो असर हो रहा है। तभी वो वहां से चली गयी। मैंने कहा, चलो शुक्र है बला टली। और मैं अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बाद मुझे अहसास हुआ कि वो फिर से आ गयी। पास में पड़े सोफे पर बैठ गयी। मैंने सोचा कि अपने आप चली जाएगी। पर वो तो आज ठान कर आयी थी कि चाय लेकर रहेगी। पर मैं भी कहां मानने वाला था। तभी बॉस अंदर से निकल कर आये। पर उनके आने से पहले ही शायद वो परदे के पीछे छिप गयी थी। बॉस फिर से अंदर चले गए। वो भी परदे के पीछे से बाहर निकल आयी। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। वो बार बार मेरे कप की तरफ देखे जा रही थी। कोई मेरी चाय पर नज़र रखे, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। मैंने चुपके से कप दूसरी तरफ रख दिया। मुझे लगा कि इतनी तो शर्म होगी इसमें, कि इस तरफ नहीं आएगी। पर वो भी बड़ी बेशरम निकली। पहले तो कप को देख ही रही थी। अब तो कप के पास आ के बैठ गयी। मैंने उसे कहा कि कप को हाथ भी ना लगाए। जैसे ही उसने हाथ आगे बढ़ाया, मैंने उसे एक तरफ धकेल दिया। और उससे कहा कि अगर नहीं मानी तो मेरे हाथ से कतल हो जायेगा उसका। मेरे मन तो नहीं कर रहा था उसे मरने को, पर जब वो मान नहीं रही थी तो मैं भी क्या करता। मैंने उसे एक दो चेतावनी दी और अपने काम में लग गया। मुझे परेशान करने के इरादे से जिस किताब से मैं पढ़ कर काम कर रहा था, उन शब्दों को ढक लेती। मैं भी उसकी चाल समझ गया था। मैं उस पर हाथ नहीं उठाना चाहता था। तभी मैंने सोचा कि जिस चीज़ के लिए झगड़ा हो रहा है, उसे ही खत्म कर दो, मैंने सारी चाय पी ली। धीरे धीरे करके मैंने सारी चाय पी ली और कप खाली करके रख दिया। बेशर्मी की हद तो देखो, वो खाली कप को भी घूर रही थी। जैसे उसे खा जाएगी। मैं काम करने लगा, उसने जैसे ही फिर से किताब के शब्दों को ढका मैंने उसे एक धक्का दिया, और वो दूर जा गिरी। मुझे बुरा तो बहुत लगा पर वो भी मान नहीं रही थी। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस हुआ कि उसने मेरे कन्धों पर अपने हाथ रख लिए। मैं थोड़ा डर सा गया। फिर उसने धीरे से मेरे कान में आकर कुछ कहा जिसे सुनकर मैंने अपना आपा खो दिया और उसे वहीं पर एक दो बार ज़ोर ज़ोर से पटका । मुझे लगा कि उसकी सांसें रुक गयी थी। मुझसे उसका कतल हो गया था मुझे बहुत अफ़सोस हुआ। किसी को इसका पता ना लगे इसलिए उसे पर्दे के पीछे छुपा दिया। आप सोच रहे होंगे कि उसने मेरे कान में ऐसा क्या कहा जिससे ये नौबत आयी। उसने मेरे काम में आकर कहा ''भीं भीं''। जी हाँ, यही कहा था उसने।
Thursday, June 28, 2018
क्या खुशियां मोल मिल सकती हैं?
खुशियों भरी ज़िंदगी कौन नहीं जीना चाहता। सभी चाहते हैं की उसकी ज़िंदगी खुशियों से भरी हो, हर तरफ ख़ुशी ही ख़ुशी नज़र आये। पर क्या ये संभव है? तो इसका जवाब होगा हां। हाँ! ये संभव है। पर उसके लिए हैं अपना नज़रिया बदलना होगा। क्या किसी दुकान से खुशियां मोल मिल सकती हैं? कि किसी परचून की दुकान पर जाओ और 10 - 20 रूपये की खुशियां ले आओ। फिर तो अमीर लोग ज्यादा खुश होते और गरीब लोग तो कभी खुश हो ही नहीं पाते। अगर ऐसा होता तो सोचो, कि शादी का माहौल है, और लड़की खुश नहीं है। क्यों, क्यूंकि दो दिन पहले उसने 50 रूपये कि खुशियां ली थी, जो कल ख़तम हो गयी, अब उसके पास खुशीयाँ नहीं रही। अब उसे दुकान से और खुशियां लानी पड़ेंगी, तब जाकर दुल्हन खुश हो सकेगी। हा, हा, हा, कैसी होती दुनिया।
हम क्या करते हैं ज़िंदगी तो जी रहे हैं। पर खुशियों से भरी ज़िंदगी नहीं। जिंदगी में जैसे ख़ुशी को ढूंढ रहे हों। पर हमें ये नहीं पता कि ज़िंदगी खुशियों से भरी हुई है, बस ज़रूरत है तो उसे पहचानने की। बचपन ही जीवन का एकमात्र ऐसा पड़ाव है जिसमें खुशियों का खज़ाना भरा होता है। पर आजकल का बचपन भी इन खुशियों से वंचित नज़र आ रहा है। इसके उनसे ज्यादा दोषी बच्चों के माता पिता हैं, जो उनके उज्वल भविष्य के लिए उनका आज चिंताओं से भर रहे हैं। सभी माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा ज़िंदगी में तरक्की करे। ज़िंदगी की उंचाईयों को छुए, चाहे उसके लिए उसका आज ही दुखों से भर जाये। स्कूल में अच्छे नंबर लाने की होड़ हर किसी में देखी जा सकती है। माता पिता का दबाव बच्चों को दिन रात पढ़ने पर मजबूर कर देता है। इसी चिंता में कि अगर मेरे नंबर दूसरे बच्चे से काम आ गए तो माता पिता से मार पड़ेगी। कई बार तो दबाव इतना बढ़ जाता है कि बच्चा अपनी क़ाबलियत के हिसाब से भी नहीं पढ़ पाता और उसके कम नंबर आते हैं या कई बार फेल भी हो जाता है। जिसका नतीजा ये होता है कि या तो वो डिप्रेशन में चला जाता है या ख़ुदकुशी कर लेता है। आज स्कूल के बच्चों में ख़ुदकुशी का रुझान बहुत बढ़ गया है। हर साल जब परीक्षाओं के नतीजे आते हैं तो कहीं न कहीं से ये ख़बरें भी सुनाई देती हैं कि नंबर कम आने से छात्र या छात्रा ने ख़ुदकुशी कर ली। इसके लिए उनके माता पिता भी जिम्मेदार होते हैं। जिनके दबाव का नतीजा होता है ये ख़ुदकुशी। हमें ज़िंदगी में छोटी छोटी खुशियों को ढूंढ़ना चाहिए। आजकल पैसे कमाने की दौड़ में भी खुशियां पीछे छूटती जा रही हैं। मैं एक धारावाहिक देख रहा था, जिसका नाम था 'ये प्यार नहीं तो क्या है'। उसमें अनुष्का उदास रहती है। सिद्धांत सोचता है कि कैसे उसके चेहरे पर ख़ुशी लायी जा सके। उसने सिक्योरिटी गार्ड को पैसे देकर कहा कि तुम आज अपना जन्म दिन बोलकर सबको फार्च्यून कूकी बांटो, उसमे कुछ मीठा होता है। जैसे वो फार्च्यून कूकी अनुष्का के पास लेकर गया तो फार्च्यून कूकी को देखकर अनुष्का को अपने बचपन कि याद आ गयी, बचपन में वो फार्च्यून कूकी ही खाती थी। उसमे एक पर्ची डाली होती है, जिसमे भविष्य लिखा होता है। जैसे ही अनुष्का ने वो पर्ची खोली, उसमें वही लाइन लिखी होती है जो बचपन में लिखी होती थी। वो सोचती है कि जो बात उस समय लिखी होती थी, आज भी वही बात लिखी होती है। उस पर्ची में लिखा था ''हम ये क्यों सोचते हैं कि जब दुनिया बदलेगी तो हम खुश होंगे, हम ये क्यों नहीं सोचते कि हम खुश हो जाएँ जिससे दुनिया ही बदल जाये''। बहुत अच्छी लाइन है। अगर हम भी इसे अपनी ज़िंदगी में उतार लें तो सचमुच ही ज़िंदगी हसीन हो जाएगी। पर हम कोशिश भी नहीं करते, बस हर समय सढ़ा हुआ सा मुंह बनाकर सबको दिखाते रहते हैं कि मैं उदास हूँ। किसी को तुम्हारी उदासी से क्या लेना। वो तो खुद उदास घूम रहा है। यहां कोई किसी के लिए ख़ुशी नहीं ला सकता, न ही कोई ख़ुशी लाना चाहता है। कोशिश तो हमें ही करनी होगी। और अपने साथ साथ इस दुनिया को भी हसीन बनाना होगा। तो आयो, ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश करके देखें और ज़िंदगी में हमेशा खुश रहने का प्रण करें।
Wednesday, June 27, 2018
क्या आज के सूरज को ज्यादा गुस्सा आता है?
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| गांव में धुप में खेलते बच्चे |
गर्मी! ये नाम सुनते ही सूरज की लाल आँखें हमारी आँखों के सामने आ जाती हैं। जैसे आज कल इमोजी बने होते हैं, सूरज बड़े गुस्से से देखता हुआ, सूरज का वैसा ही चेहरा हमारे सामने आ जाता है। क्या सूरज को अब गुस्सा पहले से ज्यादा आने लगा है, जो आजकल इतनी गर्मी बरसाता है। पहले जैसे नरम दिल था, जो आज सख्त स्वभाव का हो गया है। शायद उसकी भी सहनशक्ति इंसान की तरह कम हो गयी है। पता नहीं किस का गुस्सा पृथ्वी पर निकालता है। जब हम छोटे थे, आपस में खेलते रहते थे, पर कभी कभी किसी बात से नाराज़ हो कर हम एक दूसरे से लड़ पड़ते थे। तो उसका गुस्सा हम घर पर आ कर निकालते थे, वैसे ही सूरज को भी उसके दोस्तों ने अपने साथ खिलाने से मना कर दिया होगा, जो अपना गुस्सा पृथ्वी पर निकाल रहा है। क्या कभी आपने सोचा है कि उसका ये गुस्सा अब ज्यादा बढ़ गया है या शुरू से ऐसे ही गुस्सैल स्वभाव का था। मुझे लगता है कि वो तो शुरू से ही ऐसा है, पर अब हमें गर्मी ज्यादा लगने लगी है। गांवों में तो लोग आज भी इतना महसूस नहीं करते । ये सिर्फ शहर में रहने वालों को ही इतनी महसूस होती है। पहले लोग खेतों में, या कहीं और धुप में काम करते थे। आजकल शहर में AC वाले कमरों में काम करते हैं। उनको तब तक गर्मी महसूस नहीं होती जब तक वो उस AC वाले कमरे में हैं। जैसे ही काम ख़तम करके बाहर धुप में निकलेंगे तो उनको लगेगा कि आज तो धुप कहर ढा रही है। दरअसल धुप तो हर रोज़ की तरह ही है। गॉव में धुप में जो लोग काम करते हैं उन्हें गर्मी महसूस ही नहीं होती। मैं जब गांव जाता हूँ, कई बार ताया जी के पास बैठ जाता हूँ, उनको बोलता हूँ कि आज तो गर्मी बहुत ज्यादा है। पर वो बोलते हैं कि हर रोज़ इतनी ही होती है। जैसे ही आसमान में बदल उमड़ पड़ते हैं, दिल बाग़ में मोर की तरह नाचने लगता है। दिल कहता है कि ज़ोरों से बरस जा, और गर्मी को कम कर दे। पर आजकल तो गांव में भी इन्वर्टर आ गए हैं, दोपहर में बच्चे घर में ही खेलते रहते हैं, टीवी देखते रहते हैं। जैसे ही बच्चे धुप में निकलेंगे, उनकी माता जी उनको झट से डांट डपट कर अंदर बुला लेती है और बोलती है कि बाहर धूप है, गर्मी लग जाएगी। बच्चों के मन में भी बैठ गया है कि धुप में जाने से गर्मी लग जाएगी। पहले हम स्कूल से छुट्टी होते ही, घर पर बैग फेंककर बाहर खेलने चले जाते थे। ये भी नहीं देखते थे कि बाहर धुप है, गर्मी लग जाएगी। और सच पूछो तो कभी लगी भी नहीं। और आज जरा सा धुप में जाओ, बस गर्मी लग जाएगी। पहले नींबू पानी हम सिर्फ स्वाद के लिए पीते थे, पर आजकल गर्मी के कारन पीना पड़ता है। पहले भरी दोपहरी में गरम सड़क पर, खेत में, गरम रेत पर खेलते रहते थे। और पांव में चप्पल तक नहीं होती थी। सड़क पर तेज धुप के कारन लुक पिघल जाया करती थी, फिर हम डंडे से उसे खरोच कर इकठी कर लेते थे। उसका गोला बना कर खेलते थे। कभी कभी तो कपड़ों पर भी चिपक जाती थी। जब मम्मी को कपडे धोने होते थे, जब पता चलता कि लुक लगी हुई है, तो उनका पारा भी सूरज के पारे के समान हो जाता था। अपने लिए और मुश्किल तब और बढ़ जाती थी, जब वही लुक बालों में चिपक जाती थी। या तो कैंची से बाल काटने पड़ते थे, या डीज़ल लगा कर धोने पड़ते थे। हमे डराया भी जाता था कि दोपहर में पेड़ों पर भूत होते हैं, पर हम कहां मानने वाले थे। दोपहर में पेड़ों पर झूले डाल कर खेलना, पील पलंगड़ा, खेलना, जूत पलो, ये सब खेल दोपहर में स्कूल की छुट्टी होने पर ही खेले जाते थे। भूत भी शायद उस समय के बच्चों का इतना उत्पात देखकर भाग जाये। पूरी दोपहर भैंसों को लेकर चराने निकल जाना। गांव में आज भी बच्चों को इस तरह के काम करते देखता हूँ तो अपना बचपन याद आ जाता है। और सुकून सा मिलता है कि चलो हमारे ज़माने के कुछ अंश तो अभी भी बच्चे हुए हैं। आजकल किसी को धुप में कहीं जाना पड़ जाये, पहले तो वो जाने को टाल देगा, फिर भी अगर जाना ही पड़ गया तो छतरी लेकर जायेगा। जैसे धुप उसका खून ना चूस ले। धुप में सारा मुंह सर कपडे से बांध कर निकलना, जैसे कोई डाकू हो। ये परम्परा लड़किओं में ज्यादा देखने को मिलती है। पता नहीं ये धुप से बचने के लिए करती हैं या आजकल का फैशन है। भगवान् ही जाने।
Friday, June 15, 2018
हैप्पी बरसात !
आज गर्मी बहुत ज्यादा लग रही है। बादलों में सूरज भी कम ही दिखाई दे रहा है। पर सूरज तो सूरज है, अपनी हठ कैसे छोड़ सकता है। गर्मी बरसा कर लोगों को परेशान करना ही उसका काम है। दो तीन दिन से आसमान में धुल का गुबार फैला हुआ है। दिन में रात जैसा अहसास हो रहा है और रात को दिन जैसा आभास होता है। क्यूंकि दिन में धुल ने सूरज को ढका हुआ है और रात को धुल सफेद चादर ने रात के अँधेरे को भी प्रकाशनुमा किया हुआ है। पर आज गर्मी ने ये कहने पर मजबूर कर दिया है कि हे रब मींह तो बरसा दे। इस धुल की चादर को सिर्फ बरसात ही साफ़ कर सकती है। सूरज तो इस धुल को जला नहीं सकता, उसे तो खुद धुल ने ढक लिया है। दिन भर गर्मी में बाइक पर घूमना भी ऐसा लगता है जैसे कोई सज़ा मिली हुई हो। आज प्यास भी बहुत लग रही है। पंचकूला से बाइक पर आते हुए सेक्टर 17 के पास से गुजर रहा था। मैं सोच रहा था कि इतने दिनों से लोग छबील लगा रहे हैं, पर आज कहीं भी छबील नहीं मिली। प्यास ने बुरा हाल किया हुआ है। जैसे मेरे कहने की देर थी कि सरकारी प्रेस के पास छबील लगी हुई मिल गयी। मैंने तभी बाइक को मोड़ कर टेंट के सामने लगा दिया। दो गिलास ठन्डे पानी के पिए तो जा के प्यास बुझी। कहते हैं कि जब हम दिल से मांगते हैं तो भगवान उसे हमारी झोली में डाल ही देता है। पानी पी कर मैं अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चला। आज कहीं भी जाते हैं तो पानी साथ ले कर चलना पडता है। क्यूंकि पहले की तरह आज कहीं भी पानी पीने को आसानी से नहीं मिलता। हम चलते जाते हैं, कि थोड़ा आगे चलके देखते हैं, पानी मिलेगा तो पिएंगे। पहले तो हर जगह पानी आसानी से मिल जाता था। नलकूप होते थे, जिनको हाथ से चलाया और पानी बाहर। जी भर कर पानी पी सकते थे। आज तो नलकूप कहीं देखने को भी नहीं मिलते। सरकार ने नलकूप कि जगह नल लगाए हुए हैं। पर उनमे पानी टाइम टाइम से आता है। ये नहीं कि जब प्यास लग रही हो, तभी चलाया और पी लिया। या फिर टंकियां लगा दी, उनमे से जब मर्ज़ी पानी पी सकते हैं, पर वो पानी कैसे होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। उस टंकी में कितनी गंदगी होगी, पता नहीं, क्यूंकि सरकार ने एक बार अपना काम किया उसके बाद भगवान भरोसे। आज दो दिन हो गए आसमान में धुल को उड़ते हुए। मुझे कल किसी बन्दे ने बताया कि ये धुल अफ़ग़ानिस्तान से आयी है। ईरान, इराक होते हुए, राजस्थान, दिल्ली और अब हरियाणा और पंजाब में पहुंच गयी है। जितने मुंह, उतनी बातें। पर शायद आज किसी धर्मात्मा बन्दे ने भगवान से प्रार्थना कि होगी कि बारिश कर दे। क्यूंकि इतने दिन से हम प्रार्थना कर रहे हैं, और भी सारे लोग बारिश की मांग कर रहे थे पर भगवान था कि किसी की सुनने को राजी ही नहीं था। जैसे उसे भी किसी की सिफारिश का इंतज़ार था। आज सुबह 2 बजे से झम झमाझम बारिश हो रही है। और धुल धरती पर आ गिरी है। सुबह अपनी बाइक को साफ किया, बहुत मिटटी थी। अभी भी बादल झूम रहा है बरसने को तैयार खड़ा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे लिखते लिखते ही बरस पड़ेगा। चलो अब बारिश का आनंद लेते हैं। कहीं मेरे कहने से बादल को नज़र ना लग जाये। आप भी बरसात का आनंद लीजिये। हैप्पी बरसात!
Thursday, June 7, 2018
गुमसुम सी हो गयी रेडियो की वो धुनें....
आज कहीं से अचानक मेरे कानों में पुराने गाने के बोल सुनाई पड़े। बोल थे : नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राजदुलारा, सुनके पहले तो मैंने इधर उधर देखा कि ये आवाज़ आ कहां से रही है। क्यूंकि आजकल की नौजवान पीढ़ी तो बस आजकल के मोड्रन गाने ही सुनती है। तड़क भड़क वाले गीत, जिनमें से कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता। गाने के बोल क्या हैं, कुछ नहीं पता चलता। बस ढिंका चिंका चिंका चिका होती रहती है। मैंने देखा सड़क किनारे एक ढाबे वाले ने रेडिओ चलाया हुआ था। शायद वो रेडिओ नहीं था, है तो मोबाइल ही था, पर मोबाइल में FM चलाया हुआ था। जिसमें ज्यादातर पुराने गीत ही आते हैं, जो कानों में रस घोल जाते हैं। पुराने गीत सुन कर मुझे भी पुरानी यादों ने घेर लिया। पहले ज़माने में शादी में रेडिओ दिया करते थे। मुझे याद है मेरे ताया जी को शादी में रेडिओ मिला था जो शायद आज भी पड़ा होगा। पहले TV जितने बड़े बड़े रेडियो भी होते थे। धीरे धीरे रेडियो का साइज घटने लगा। थोड़े छोटे कर दिए गए। आजकल तो मोबाइल के अंदर ही रेडियो आ गया है। पर शायद कोई कोई होगा जो उसमे रेडियो को ओन करता हो। क्यूंकि पुराने गाने कोई सुनना ही नहीं चाहता। आज किसी के घर में पुराने रेडियो पड़े होंगे तो शायद किसी कोने में धूल खा रहे होंगे। क्यूंकि अब वो बेकार हो चुके हैं। उनका काम अब मोबाइल से होने लगा है। जिसने जो भी गाना सुनना हो MP3 player में से वही सुन लेता है। जब मोबाइल फ़ोन शुरू हुए थे तो रेडियो के साइज भी मोबाइल जैसे ही बना दिए थे। हम रेडियो खरीद कर मोबाइल की फीलिंग ले लेते थे। ऐसा लगता था जैसे हाथ में मोबाइल फ़ोन पकड़ा हुआ हो। मेरे पिता जी के पास जो फ़ोन है, उसमे FM चलता है। उनको एक बार सीखा दिया कि FM कैसे चलता है। तो बस अब हर समय उनके फ़ोन में FM चलता रहता है। रात तक पुराने गाने चलते रहते हैं। कई बार मेरा भी दिल पुराने गाने सुनने को करता है। इसलिए मैंने अपने फ़ोन में पुराने गाने डाले हुए हैं। जब दिल करता हैं, उनको सुन लेता हूँ। पहले रेडियो में बड़ी बड़ी बैटरियां डाली होती थी। आज कल छोटी बैटरियां ही काम चला देती हैं। और तो और अब तो चार्जिंग की सुविधा मिल गयी है। एक बार चार्ज किया, पूरा दिन चलता रहता है। पहले का ज़माना भी क्या ज़माना था, हर तरफ रेडियो की धुनें गूंजती थी। आज कल तो कहीं देखने को भी नहीं मिलते । नाई के खोखे में, चाय की दुकान में, डॉक्टर की दुकान में। हर कोई अपनी दुकान में, घर में रेडियो चला के रखता था। रेडियो का रिवाज़ धीरे धीरे TV के आने से कुछ काम हो गया। मोबाइल ने तो बिलकुल ही ख़तम कर दिया है। आज जहां कहीं भी रेडियो के गाने सुनता हूँ, उनको सलाम करने को दिल करता है, जिसने रेडियो चलाया हुआ है। रेडिओ पर जो पैमाना लगा होता था, उसका तो हमे पता ही नहीं होता था, कि इसका काम काम क्या है इस रेडिओ के अंदर। हम बस घूमते रहते थे, सुई जहां मर्जी जाये, बस जब आवाज़ सही आये, वहां रोक देते थे। कई बार तो सुई घूमते घूमते पैमाने के ऊपर चढ़ जाती थी। और हम बटन घूमते रहते थे। हमें सुई का और पैमाने का काम ही अब मालूम हुआ है। जब रेडिओ शायद कहीं खो से गए हैं।
Tuesday, June 5, 2018
कुत्ते लगे शेर घेरने
आजकल कुत्तों के बारे में भी बहुत सारी ख़बरें ऐसी सुनने को मिल रही हैं, जिसको सुन कर और उनकी वीडियो देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कुत्तों को अक्सर वफादारी की मिसाल के लिए याद किया जाता है। आजकल बहुत ज्यादा ऐसी ख़बरें आ रही हैं। कई दिन पहले फेसबुक पर एक वीडियो देखी थी कि एक कुत्ते ने एक आदमी को नोच नोच कर मार डाला। लोगों ने लाठी लेकर छुड़वाया, पर माँ के बच्चे ने उसे नहीं छोड़ा। डरता ही नहीं है। आज ही मैंने एक खबर पढ़ी, जिसमे लिखा था कि कुत्तों ने शेर को घेर लिया। एक ने तो इसकी वीडियो भी डाली हुई थी । एक कुत्ते ने सड़क पर दूसरे कुत्ते को जो एक बार पकड़ा, बस फिर कितना ही ज़ोर लगा लिया लोगों ने उसे छुड़वाने के लिए, पर माई के लाल ने उसे नहीं छोड़ा। हम छोटे थे। तब बेगाने कुत्तों से डर लगता था। हमने भी दो कुत्ते पाले हुए थे, धर्मेंदर और जितेंदर। बहुत अच्छे थे वो, कभी किसी को बिना वजह नहीं डराया। हमारे गांव के पास सड़क पर दूसरे गाँव के लोगों ने डेरे बनाये हुए हैं। उन्होंने कुत्ते पाले हुए थे। मुझे याद है, जब हम खेत में घास लेने जाते थे, या कोई किसी काम से दूसरे गांव या उस सड़क से गुजरना होता था। बड़ी मुश्किल से उन डेरों को पार करते थे। कहीं से कुत्ते के भोंकने की आवाज़ भी आ जाये , या तो वापस मुड़ आते थे, या दूसरे खेतों में से हो के गुज़रना पड़ता था। वो कुत्ते बहुत बड़े बड़े थे। काले रंग के दो या तीन कुत्ते थे। थोड़ी थोड़ी दूर उनके दो डेरे थे। अगर पहला डेरा पार कर लिया, फिर दूसरा डेरा पार करना ही पडता था, नहीं तो पिछले डेरे से किसी भी समय आ के काट सकते थे। एक बार हमारे ही सामने उन कुत्तों ने एक साइकल वाले को पकड़ लिया। उसके कपडे तक फाड़ डाले। बड़ी मुश्किल से बच कर निकला वो बेचारा। जब साइकल वाले को नहीं छोड़ा , फिर हम तो पैदल होते थे। मोटरसाइकिल वाले भी बच बच के निकलते थे। कई बार तो वो कार के पीछे भी बहुत दूर तक दौड़ लगाते थे। पर वो उनके वश से बाहर थी, सो वो बच जाते थे। ऐसे भी खतरनाक होते हैं ये कुत्ते। और दूसरी तरफ ऐसे कुत्ते भी होते हैं, जब ज़रूरत हो, तब नहीं भोंकते। कुछ महीने पहले चोर हमारी दो भैंसों को चोरी करके ले गए। गली में इतने कुत्ते घूमते हैं। पर मजाल जो कोई भोंक भी पाया हो। कई कहते हैं कि चोर पहले कुत्ते को कुछ सुंघा देते हैं, जिससे वो भोंके ना। अब ये तो वो कुत्ता ही जाने या फिर वो चोर , जो कुछ सुंघाता है। आजकल हमारी गली में एक कुत्ता रहने लगा है। पता नहीं कुत्ता है या कुतिया। नाम जिम्मी है शायद, इसलिए कुतिया ही होगी। वो रखवाली तो क्या करेंगे, अभी तो परेशान ही करके रखते हैं।
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