Tuesday, January 12, 2021

आज की सर्दी भी मोड्रन हो गयी है

 आज की सर्दियाँ भी पहले जैसी नहीं रही। लगता है जैसे इंसान के साथ साथ कुदरत भी बदलती जा रही है।  आज के मौसम पहले जैसे मौसम जैसे नहीं रहे।  गर्मियों  की बात करें तो गर्मियां अब पहले जैसी गरमाहट का अहसास ही नहीं करवाती। गर्मी तो होती है पर गर्माहट नही।   घरों पंखे, कूलर, ऐ सी ने गर्मियों की अहमियत को ही ख़त्म कर दिया है।  सर्दियों में ठण्ड नाम भी धुंधला सा हो गया है। पहले सर्दियों का नाम जाड़ा हुआ करता था, पर जैसे जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ा वैसे वैसे जाड़ा भी अपना नाम खो गया और जाड़ा से सर्दी हो गया है।  

 पहले जाड्डे के मौसम में कम्बल की बुक्कल मार कर जंडी सेका करते थे, (जंडी जिसे धूनी भी कहते हैं।  जंडी का सेक ठण्ड को पास भी फटकने नहीं देता था।  और ऊपर से अपने ऊपर ओढ़ा हुआ कम्बल, मजाल जो ठण्ड अंदर भी घुस जाये।  आज कम्बल की जगह लोई, शॉल ने ले ली है।  जितनी पतली लोई होती है, मुझे लगता है कि जाड़ा भी उससे मोटा होगा। जंडी के पास आज कोई एकसाथ देखने को भी नहीं मिलते।  

आज सभी अपने अपने घरों, दुकानों पर गर्म हीटर लगा कर बैठे रहते हैं।  आज किसी के पास समय नहीं है एक  जगह बैठने का, तो वहीं कुछ हालत भी ऐसे हो गए हैं, इकठे होने ही नहीं देते।  सभी अपने अपने कामों में मशरूफ हो गए हैं।  पहले जंडी पर बैठकर मूंगफली चबाना, गजक, गुड़ खाना, एक अलग ही आनंद का अहसास होता था। आज के समय में जंडी जलाने को पराली, गन्ने की पत्ती भी नहीं रही।  अब खेतों में फसलों की कटाई मशीन से हो जाती है, पराली होती ही नहीं, जिस किसी के पास होती है, वो उसके पशुओं को भी मुश्किल से पर्याप्त  होती है। अब न रही पराली न रही जंडी, न रहे इकठे बैठ के सेकने वाले लोग। आज एक पुराणी फोटो सामने आ गयी तो कुछ यादें ताजा हो गयी। 

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...