जनवरी का महीना आते ही लगता है जैसे ज़िंदगी ने खुद पर हल्की-सी चादर डाल ली हो। सुबह उठते ही खिड़की के बाहर धुंध का समंदर पसरा होता है। दूर खड़े पेड़ दिखाई तो देते हैं, मगर पूरी तरह नहीं — जैसे किसी पुराने सपने की धुंधली यादें, जो अधूरी-सी रह जाती हैं।
हवा ठंडी होती है, पर उसके भीतर एक अजीब-सी शांति छुपी होती है।
सब कुछ धीमा हो जाता है — सड़कें, लोग, आवाज़ें… यहाँ तक कि दिल भी।
कभी-कभी मुझे लगता है कि जनवरी की धुंध, हमारी ज़िंदगी जैसी है।
कई बातें साफ़ दिखनी चाहिए — पर नहीं दिखतीं।
रास्ते मौजूद होते हैं — लेकिन नज़र नहीं आते।
और फिर भी, हम चलते रहते हैं, विश्वास के भरोसे, कि थोड़ी देर बाद सब साफ़ हो जाएगा।
बचपन की सर्दियों की सुबहें याद आती हैं।
हम ठंड में काँपते हुए भी स्कूल जाने को निकल पड़ते थे।
हाथों में ऊनी दस्ताने, कानों पर टोपी, और सांस से निकलती भाप —
जैसे हर बच्चा सर्द धुंध में छोटी-सी आग लेकर चल रहा हो।
रास्ते में कभी-कभी दूर से आती धुंधली-सी टल्ली (घंटी) सुनाई देती —
कोई साइकिल वाला, कोई दूध वाला, कोई किसान खेत की तरफ जाता हुआ।
सबके पास काम था, पर सब धीरे-धीरे, सुकून से कर रहे थे।
शायद इसलिए उस समय की ज़िंदगी थकाती नहीं थी — सँभालती थी।
आज शहर की जनवरी अलग लगती है।
धुंध अभी भी वही है —
पर हमारे भीतर की जल्दी बढ़ गई है।
हर कोई भाग रहा है,
मौसम को महसूस करने का भी वक़्त नहीं।
खिड़की के बाहर सफ़ेद धुंध फैली होती है,
और खिड़की के अंदर मोबाइल की चमक।
पर जब कभी मैं खुद से थोड़ा वक्त चुरा लेता हूँ,
और बस खामोशी में बैठकर धुंध को देखता हूँ,
तो एहसास होता है —
ज़िंदगी हमें धीमा होना सिखाना चाहती है।
रुककर सांस लेना,
वक्त को महसूस करना,
और दिल से जीना।
धुंध का भी अपना संदेश होता है।
वह कहती है:
“हर चीज़ तुरंत साफ़ नहीं होती…
थोड़ा इंतज़ार करो,
थोड़ा भरोसा रखो,
सुबह जरूर साफ़ होगी।”
और सच में होता भी यही है।
जैसे-जैसे सूरज ऊपर चढ़ता है,
धुंध खुद-ब-खुद हट जाती है।
उसी तरह
हमारी परेशानियाँ,
हमारे डर,
हमारी उलझनें —
समय के साथ धुंध की तरह छँट जाती हैं।
जनवरी की सर्द सुबह मुझे सिखाती है कि
गर्माहट हमेशा धूप से नहीं आती,
कभी-कभी एक चाय के कप से,
कभी माँ के हाथों के स्वेटर से,
और कभी किसी अपने के दो शब्दों से।
Meri Zindgi, शायद इसी वजह से खूबसूरत है —
क्योंकि इसमें धुंध भी है, धूप भी,
ठंड भी है, गर्माहट भी,
रुकना भी है, और फिर आगे बढ़ जाना भी।
जनवरी की धुंध भले ही रास्तों को छुपा दे,
लेकिन वह हमें यह भी सिखाती है —
ज़िंदगी में सब कुछ साफ़-साफ़ दिखना ज़रूरी नहीं,
बस चलना ज़रूरी है।
क्योंकि जो रास्ते हमारे लिए बने हैं,
वे धुंध के पीछे भी,
हमारा ही इंतज़ार कर रहे होते हैं।
अगर कभी जनवरी की धुंध में आपको लगता है
कि ज़िंदगी रुक-सी गई है —
तो बस याद रखिए:
धुंध हमेशा के लिए नहीं रहती,
पर उससे मिलने वाली सीख हमेशा साथ रहती है।




















