गाँव की जिंदगी अपने आप में एक अलग ही दुनिया होती है। यहाँ त्योहार और मेले सिर्फ कैलेंडर में आने वाली तारीखें नहीं होते, बल्कि इनके आने से कई दिन पहले ही पूरे गाँव का माहौल बदलने लगता है। घरों में तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं, रिश्तेदारों के आने-जाने की बातें होने लगती हैं और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के चेहरे पर एक अलग ही उत्साह दिखाई देने लगता है।
इन दिनों हमारे गाँव में भी नौमी के मेले की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। गाँव में गोगा माड़ी पर जाने की तैयारी हर घर में अपने-अपने तरीके से चल रही है। हमारे चार-पाँच घरों में भी कई दिनों से इसी की चर्चा है। कोई सामान जुटाने में लगा है, कोई घर की सफाई में, तो कोई यह सोच रहा है कि माड़ी पर कब और किस तरह जाना है।
नौमी नजदीक आते ही घरों का माहौल कुछ अलग सा हो जाता है। वैसे तो गाँव में रोजमर्रा की जिंदगी अपने कामों में व्यस्त रहती है, लेकिन मेले और गोगा माड़ी की बात आते ही जैसे सभी कामों के बीच एक नया उत्साह शामिल हो जाता है।
हमारे चार-पाँच घरों में भी इन दिनों यही माहौल है। घर के लोग अपने-अपने हिसाब से जरूरी सामान तैयार करने में लगे हुए हैं। किसी को पूजा के लिए सामान जुटाना है, किसी को साथ ले जाने वाली चीजों की चिंता है और किसी को रात में माड़ी पर चौकी भरने की तैयारी करनी है।
इन तैयारियों में एक खास बात यह होती है कि कोई एक व्यक्ति ही सब कुछ नहीं करता। घर का हर सदस्य किसी न किसी काम में हाथ बँटाता है। बड़े लोग जरूरी चीजों का ध्यान रखते हैं, महिलाएँ घर की तैयारियों में जुटी रहती हैं और बच्चे तो बस मेले के नाम से ही खुश हो जाते हैं।
बच्चों के लिए तो मेले का मतलब ही कुछ और होता है—नए खिलौने, मिठाइयाँ, पकौड़े, झूले और घूमने-फिरने का मौका।
गाँव में नौमी के अवसर पर गोगा माड़ी पर जाकर रात को चौकी भरने की परंपरा भी अपने आप में खास होती है। शाम ढलने के बाद जब लोग माड़ी की तरफ जाना शुरू करते हैं तो गाँव की गलियों में भी एक अलग चहल-पहल दिखाई देने लगती है।
दिनभर की भागदौड़ के बाद जब रात का समय आता है, तब लोग एक साथ इकट्ठा होकर माड़ी की तरफ जाते हैं। वहाँ श्रद्धा और आस्था का माहौल रहता है। रात में होने वाली चौकी में लोग अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार शामिल होते हैं।
गाँव के बुजुर्गों के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी पुरानी परंपराओं और यादों से जुड़ने का अवसर भी होता है। उन्होंने बचपन से इन आयोजनों को देखा है और अब वही परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँचती हुई दिखाई देती है।
शायद यही गाँव की सबसे खूबसूरत बात है—परंपराएँ सिर्फ किताबों में नहीं रहतीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के साथ चलती रहती हैं।
रात की चौकी के बाद अगली सुबह गोगा माड़ी पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है। सुबह होते ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है।
कोई परिवार के साथ आता है, कोई अकेला, तो कोई बच्चों को साथ लेकर। जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, माड़ी पर माथा टेकने वालों की लाइन लंबी होती जाती है।
लोग श्रद्धा के साथ माड़ी पर माथा टेकते हैं और अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। किसी के चेहरे पर विश्वास दिखाई देता है तो किसी के चेहरे पर संतोष।
इस पूरे माहौल में गाँव की सामूहिकता भी दिखाई देती है। यहाँ आने वाले लोगों में सिर्फ एक घर या परिवार नहीं होता, बल्कि आसपास के कई गाँवों और परिवारों के लोग भी शामिल होते हैं।
गोगा माड़ी के आसपास नौमी के अवसर पर लगने वाला मेला इस पूरे आयोजन को और भी खास बना देता है।
जहाँ एक तरफ माड़ी पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, वहीं दूसरी तरफ मेले में दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें सजाकर बैठ जाते हैं।
सबसे ज्यादा आकर्षण बच्चों के लिए होता है। खिलौने बेचने वाले दुकानदार रंग-बिरंगे खिलौने सजाकर रखते हैं। कहीं गुब्बारे दिखाई देते हैं, कहीं छोटे बच्चों के खिलौने और कहीं तरह-तरह की चीजें।
बच्चे अपने माता-पिता का हाथ पकड़कर एक दुकान से दूसरी दुकान तक घूमते रहते हैं। किसी को खिलौना पसंद आ जाता है तो किसी को कोई दूसरी चीज। बच्चों की जिद और माता-पिता की समझाइश के बीच मेले का अपना ही मनोरंजन होता है।
मेले की बात हो और खाने-पीने की दुकानों का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है?
मेले में पकौड़े की दुकानें भी सज जाती हैं। गर्म तेल में पकौड़े तलने की आवाज और उनकी खुशबू दूर से ही लोगों को अपनी तरफ खींचने लगती है।
मेले में घूमते हुए गर्मागर्म पकौड़े खाना भी अपने आप में एक अलग आनंद है। घर में चाहे कितनी ही बार पकौड़े बन जाएँ, लेकिन मेले में मिलने वाले पकौड़ों का स्वाद कुछ अलग ही लगता है।
शायद इसका कारण पकौड़ों का स्वाद नहीं, बल्कि मेले का माहौल होता है। आसपास लोगों की भीड़, बच्चों की आवाजें, दुकानदारों की पुकार और परिवार के साथ घूमने की खुशी—इन सबके बीच साधारण सा खाना भी खास बन जाता है।
गाँव के मेलों की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इनसे हमारी बहुत सी पुरानी यादें जुड़ी होती हैं।
बचपन में मेले में जाना किसी बड़े त्योहार से कम नहीं लगता था। नए कपड़े पहनना, घरवालों के साथ मेला देखने जाना, खिलौने खरीदना और लौटते समय हाथ में कोई छोटी सी चीज लेकर आना—ये छोटी-छोटी खुशियाँ आज भी याद आती हैं।
समय बदल गया है। मोबाइल और इंटरनेट ने मनोरंजन के बहुत से नए रास्ते खोल दिए हैं। अब बच्चे घर बैठे वीडियो और गेम में व्यस्त हो सकते हैं। लेकिन गाँव का मेला आज भी अपनी जगह बनाए हुए है।
क्योंकि मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं है। मेला लोगों को लोगों से जोड़ता है।
नौमी के अवसर पर होने वाला यह आयोजन गाँव की उस संस्कृति की याद दिलाता है, जिसमें धार्मिक आस्था, पारिवारिक मेल-जोल और सामुदायिक जीवन एक साथ दिखाई देते हैं।
चार-पाँच घरों से शुरू हुई तैयारियाँ धीरे-धीरे पूरे गाँव की चहल-पहल का हिस्सा बन जाती हैं। किसी घर में तैयारी चल रही होती है, किसी घर में रिश्तेदार आने की चर्चा होती है और कहीं बच्चे मेले में जाने की योजना बना रहे होते हैं।
रात की चौकी, सुबह माड़ी पर लगने वाली श्रद्धालुओं की कतार और उसके पास सजा रंग-बिरंगा मेला—ये सब मिलकर नौमी को गाँव के जीवन का एक यादगार हिस्सा बना देते हैं।
शहरों में बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, चमकदार बाजार होते हैं और मनोरंजन के हजारों साधन होते हैं, लेकिन गाँव के मेले की बात ही अलग है।
यहाँ भीड़ में भी अपनेपन का एहसास होता है। यहाँ मिलने वाला हर परिचित चेहरा पुरानी यादों का कोई न कोई हिस्सा साथ लेकर आता है।
नौमी का यह मेला हमारे लिए केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। यह आस्था, परंपरा, परिवार, रिश्तों और बचपन की यादों का मिलाजुला उत्सव है।
जब रात को गाँव से लोग गोगा माड़ी की ओर जाते हैं और अगली सुबह माड़ी पर माथा टेकने वालों की कतार लगती है, फिर पास में मेले की दुकानें सजती हैं, पकौड़ों की खुशबू हवा में घुलती है और बच्चों की आँखों में खिलौनों की चमक दिखाई देती है—तब लगता है कि गाँव की असली जिंदगी अभी भी इन छोटी-छोटी खुशियों में ही बसती है।
और शायद यही वजह है कि हर साल नौमी का इंतजार सिर्फ कैलेंडर नहीं करता, हमारे गाँव के लोग भी करते हैं।


















