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Tuesday, September 8, 2026

गाँव में नौमी — गोगा माड़ी और मेले की तैयारियों का वो पुराना रंग


गाँव की जिंदगी अपने आप में एक अलग ही दुनिया होती है। यहाँ त्योहार और मेले सिर्फ कैलेंडर में आने वाली तारीखें नहीं होते, बल्कि इनके आने से कई दिन पहले ही पूरे गाँव का माहौल बदलने लगता है। घरों में तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं, रिश्तेदारों के आने-जाने की बातें होने लगती हैं और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के चेहरे पर एक अलग ही उत्साह दिखाई देने लगता है।  


इन दिनों हमारे गाँव में भी नौमी के मेले की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। गाँव में गोगा माड़ी पर जाने की तैयारी हर घर में अपने-अपने तरीके से चल रही है। हमारे चार-पाँच घरों में भी कई दिनों से इसी की चर्चा है। कोई सामान जुटाने में लगा है, कोई घर की सफाई में, तो कोई यह सोच रहा है कि माड़ी पर कब और किस तरह जाना है।

नौमी नजदीक आते ही घरों का माहौल कुछ अलग सा हो जाता है। वैसे तो गाँव में रोजमर्रा की जिंदगी अपने कामों में व्यस्त रहती है, लेकिन मेले और गोगा माड़ी की बात आते ही जैसे सभी कामों के बीच एक नया उत्साह शामिल हो जाता है।

हमारे चार-पाँच घरों में भी इन दिनों यही माहौल है। घर के लोग अपने-अपने हिसाब से जरूरी सामान तैयार करने में लगे हुए हैं। किसी को पूजा के लिए सामान जुटाना है, किसी को साथ ले जाने वाली चीजों की चिंता है और किसी को रात में माड़ी पर चौकी भरने की तैयारी करनी है।

इन तैयारियों में एक खास बात यह होती है कि कोई एक व्यक्ति ही सब कुछ नहीं करता। घर का हर सदस्य किसी न किसी काम में हाथ बँटाता है। बड़े लोग जरूरी चीजों का ध्यान रखते हैं, महिलाएँ घर की तैयारियों में जुटी रहती हैं और बच्चे तो बस मेले के नाम से ही खुश हो जाते हैं।

बच्चों के लिए तो मेले का मतलब ही कुछ और होता है—नए खिलौने, मिठाइयाँ, पकौड़े, झूले और घूमने-फिरने का मौका।

गाँव में नौमी के अवसर पर गोगा माड़ी पर जाकर रात को चौकी भरने की परंपरा भी अपने आप में खास होती है। शाम ढलने के बाद जब लोग माड़ी की तरफ जाना शुरू करते हैं तो गाँव की गलियों में भी एक अलग चहल-पहल दिखाई देने लगती है।

दिनभर की भागदौड़ के बाद जब रात का समय आता है, तब लोग एक साथ इकट्ठा होकर माड़ी की तरफ जाते हैं। वहाँ श्रद्धा और आस्था का माहौल रहता है। रात में होने वाली चौकी में लोग अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार शामिल होते हैं।

गाँव के बुजुर्गों के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी पुरानी परंपराओं और यादों से जुड़ने का अवसर भी होता है। उन्होंने बचपन से इन आयोजनों को देखा है और अब वही परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँचती हुई दिखाई देती है।

शायद यही गाँव की सबसे खूबसूरत बात है—परंपराएँ सिर्फ किताबों में नहीं रहतीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के साथ चलती रहती हैं।

रात की चौकी के बाद अगली सुबह गोगा माड़ी पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है। सुबह होते ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है।

कोई परिवार के साथ आता है, कोई अकेला, तो कोई बच्चों को साथ लेकर। जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, माड़ी पर माथा टेकने वालों की लाइन लंबी होती जाती है।

लोग श्रद्धा के साथ माड़ी पर माथा टेकते हैं और अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। किसी के चेहरे पर विश्वास दिखाई देता है तो किसी के चेहरे पर संतोष।

इस पूरे माहौल में गाँव की सामूहिकता भी दिखाई देती है। यहाँ आने वाले लोगों में सिर्फ एक घर या परिवार नहीं होता, बल्कि आसपास के कई गाँवों और परिवारों के लोग भी शामिल होते हैं।

गोगा माड़ी के आसपास नौमी के अवसर पर लगने वाला मेला इस पूरे आयोजन को और भी खास बना देता है।

जहाँ एक तरफ माड़ी पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, वहीं दूसरी तरफ मेले में दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें सजाकर बैठ जाते हैं।

सबसे ज्यादा आकर्षण बच्चों के लिए होता है। खिलौने बेचने वाले दुकानदार रंग-बिरंगे खिलौने सजाकर रखते हैं। कहीं गुब्बारे दिखाई देते हैं, कहीं छोटे बच्चों के खिलौने और कहीं तरह-तरह की चीजें।

बच्चे अपने माता-पिता का हाथ पकड़कर एक दुकान से दूसरी दुकान तक घूमते रहते हैं। किसी को खिलौना पसंद आ जाता है तो किसी को कोई दूसरी चीज। बच्चों की जिद और माता-पिता की समझाइश के बीच मेले का अपना ही मनोरंजन होता है।

मेले की बात हो और खाने-पीने की दुकानों का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है?

मेले में पकौड़े की दुकानें भी सज जाती हैं। गर्म तेल में पकौड़े तलने की आवाज और उनकी खुशबू दूर से ही लोगों को अपनी तरफ खींचने लगती है।

मेले में घूमते हुए गर्मागर्म पकौड़े खाना भी अपने आप में एक अलग आनंद है। घर में चाहे कितनी ही बार पकौड़े बन जाएँ, लेकिन मेले में मिलने वाले पकौड़ों का स्वाद कुछ अलग ही लगता है।

शायद इसका कारण पकौड़ों का स्वाद नहीं, बल्कि मेले का माहौल होता है। आसपास लोगों की भीड़, बच्चों की आवाजें, दुकानदारों की पुकार और परिवार के साथ घूमने की खुशी—इन सबके बीच साधारण सा खाना भी खास बन जाता है।

गाँव के मेलों की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इनसे हमारी बहुत सी पुरानी यादें जुड़ी होती हैं।

बचपन में मेले में जाना किसी बड़े त्योहार से कम नहीं लगता था। नए कपड़े पहनना, घरवालों के साथ मेला देखने जाना, खिलौने खरीदना और लौटते समय हाथ में कोई छोटी सी चीज लेकर आना—ये छोटी-छोटी खुशियाँ आज भी याद आती हैं।

समय बदल गया है। मोबाइल और इंटरनेट ने मनोरंजन के बहुत से नए रास्ते खोल दिए हैं। अब बच्चे घर बैठे वीडियो और गेम में व्यस्त हो सकते हैं। लेकिन गाँव का मेला आज भी अपनी जगह बनाए हुए है।

क्योंकि मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं है। मेला लोगों को लोगों से जोड़ता है।

नौमी के अवसर पर होने वाला यह आयोजन गाँव की उस संस्कृति की याद दिलाता है, जिसमें धार्मिक आस्था, पारिवारिक मेल-जोल और सामुदायिक जीवन एक साथ दिखाई देते हैं।

चार-पाँच घरों से शुरू हुई तैयारियाँ धीरे-धीरे पूरे गाँव की चहल-पहल का हिस्सा बन जाती हैं। किसी घर में तैयारी चल रही होती है, किसी घर में रिश्तेदार आने की चर्चा होती है और कहीं बच्चे मेले में जाने की योजना बना रहे होते हैं।

रात की चौकी, सुबह माड़ी पर लगने वाली श्रद्धालुओं की कतार और उसके पास सजा रंग-बिरंगा मेला—ये सब मिलकर नौमी को गाँव के जीवन का एक यादगार हिस्सा बना देते हैं।

शहरों में बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, चमकदार बाजार होते हैं और मनोरंजन के हजारों साधन होते हैं, लेकिन गाँव के मेले की बात ही अलग है।

यहाँ भीड़ में भी अपनेपन का एहसास होता है। यहाँ मिलने वाला हर परिचित चेहरा पुरानी यादों का कोई न कोई हिस्सा साथ लेकर आता है।

नौमी का यह मेला हमारे लिए केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। यह आस्था, परंपरा, परिवार, रिश्तों और बचपन की यादों का मिलाजुला उत्सव है।

जब रात को गाँव से लोग गोगा माड़ी की ओर जाते हैं और अगली सुबह माड़ी पर माथा टेकने वालों की कतार लगती है, फिर पास में मेले की दुकानें सजती हैं, पकौड़ों की खुशबू हवा में घुलती है और बच्चों की आँखों में खिलौनों की चमक दिखाई देती है—तब लगता है कि गाँव की असली जिंदगी अभी भी इन छोटी-छोटी खुशियों में ही बसती है।

और शायद यही वजह है कि हर साल नौमी का इंतजार सिर्फ कैलेंडर नहीं करता, हमारे गाँव के लोग भी करते हैं।

Thursday, August 13, 2026

किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना ही प्यार है


प्यार… शायद दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास है। लेकिन प्यार को समझने के लिए सिर्फ किसी के साथ होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी प्यार उस वक्त सबसे ज्यादा दिखाई देता है, जब हम किसी अपने की खुशी के लिए अपनी खुशी को पीछे कर देते हैं। 


किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना ही शायद सच्चा प्यार है।

जब हम किसी को दिल से चाहते हैं, तो उसकी मुस्कान हमारे लिए खास हो जाती है। उसका खुश होना हमें भीतर से सुकून देता है। उसकी छोटी-सी कामयाबी पर हमें ऐसा लगता है जैसे जीत हमारी हुई हो।

प्यार सिर्फ यह नहीं कहता कि “तुम मेरे साथ रहो।”
सच्चा प्यार कभी-कभी यह भी कहता है—
“तुम जहां भी रहो, खुश रहो।”

हम अक्सर प्यार को पाने से जोड़कर देखते हैं। हमें लगता है कि जिसे हम चाहते हैं, वह हमारे साथ रहे, हमारी जिंदगी का हिस्सा बने, तभी हमारा प्यार पूरा होगा। लेकिन हर चाहत का मिलना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी जिंदगी में कोई ऐसा इंसान आता है, जिसके साथ बिताया थोड़ा-सा समय भी पूरी जिंदगी की याद बन जाता है। हम उसके करीब रहना चाहते हैं, लेकिन परिस्थितियां हमें अलग कर देती हैं। ऐसे समय में प्यार की असली परीक्षा शुरू होती है।

क्या हम उसकी खुशी के लिए उसे जाने दे सकते हैं?

क्या हम उसे किसी और के साथ खुश देखकर भी उसके लिए खुश हो सकते हैं?

अगर जवाब हां है, तो शायद हमने प्यार को सच में समझ लिया है।

क्योंकि किसी को अपना बनाना आसान है, लेकिन किसी की खुशी को अपनी खुशी मान लेना बहुत मुश्किल है।

सच्चा प्यार अधिकार नहीं जताता। वह सामने वाले की जिंदगी को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि “तुम सिर्फ मेरे हो।” बल्कि वह कहता है—
“तुम्हारी खुशी मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखती है।”

मां-बाप का अपने बच्चों के प्रति प्यार इसका सबसे खूबसूरत उदाहरण है। वे अपनी कितनी ही इच्छाएं छोड़ देते हैं, ताकि उनके बच्चे अपने सपने पूरे कर सकें। बच्चे की सफलता में उनकी आंखों की चमक बताती है कि प्यार में अपनी खुशी और दूसरे की खुशी के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता।

दो दोस्तों के बीच भी ऐसा ही प्यार होता है। दोस्त की सफलता पर ईर्ष्या करने के बजाय अगर दिल से खुशी हो, तो वह रिश्ता सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि सच्चे अपनापन का रिश्ता बन जाता है।

रिश्तों में भी यही बात लागू होती है। अगर हम किसी को सच में चाहते हैं, तो उसकी खुशी सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए क्योंकि वह हमारे साथ है। उसकी खुशी तब भी महत्वपूर्ण रहनी चाहिए, जब वह हमारी जिंदगी से दूर हो।

यही वह जगह है जहां प्यार और मोह के बीच का अंतर दिखाई देता है।

मोह कहता है—“तुम मेरे हो।”
प्यार कहता है—“तुम खुश रहो।”

मोह में खोने का डर होता है, प्यार में देने की खुशी।

मोह में हम सामने वाले को अपने पास रखना चाहते हैं, प्यार में हम उसकी खुशियों को प्राथमिकता देते हैं।

कई बार हम किसी को इतना चाहते हैं कि उसकी खुशी के लिए अपनी नाराजगी तक भूल जाते हैं। उसकी एक मुस्कान हमारे पूरे दिन का गुस्सा खत्म कर देती है। उसकी परेशानी हमें बेचैन कर देती है और उसकी सफलता हमें गर्व से भर देती है।

यही तो प्यार है।

प्यार हमेशा बड़े-बड़े वादों में नहीं होता। वह कभी एक कप चाय में होता है, कभी बिना पूछे हाल जान लेने में, कभी किसी की परेशानी सुनने में और कभी चुपचाप उसके लिए दुआ करने में।

और कभी-कभी प्यार का सबसे खूबसूरत रूप वह होता है, जिसमें हम किसी को बिना किसी उम्मीद के खुश देखना चाहते हैं।

क्योंकि आखिर में प्यार पाने का नाम नहीं है।

प्यार तो वह एहसास है, जिसमें किसी दूसरे की मुस्कान देखकर हमारे चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है।

अगर किसी की खुशी देखकर आपका दिल खुश हो जाता है, उसकी परेशानी आपको परेशान करती है और उसकी सफलता पर आपको अपने सफल होने जैसा एहसास होता है, तो शायद आप प्यार को सिर्फ महसूस नहीं कर रहे…

आप प्यार को जी रहे हैं।

और शायद इसी वजह से कहा जाता है—

“किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना ही प्यार है।”

Wednesday, August 12, 2026

हर चाहत मुकम्मल हो, यह जरूरी तो नहीं

 किसी को चाहना… सुनने में जितना आसान लगता है, महसूस करने में उतना ही गहरा होता है। हम अक्सर प्यार को पाने से जोड़कर देखते हैं। हमें लगता है कि अगर हम जिसे चाहते हैं, वह हमारे साथ है, तभी हमारा प्यार सफल है। लेकिन क्या सच में किसी को चाहना, उसे पा लेना ही होता है? 


शायद नहीं।

किसी को चाहना सिर्फ उसे अपने पास रखने की इच्छा नहीं है। किसी को चाहना उसके चेहरे की मुस्कान में अपनी खुशी ढूंढना है। उसकी परेशानियों को बिना कहे समझने की कोशिश करना है। उसकी खुशियों में खुश होना है और कभी-कभी उसकी खुशी के लिए अपने मन की इच्छा को भी पीछे छोड़ देना है।

कई बार जिंदगी हमें उस इंसान के करीब लाती है, जिसे देखकर लगता है कि शायद यही वह व्यक्ति है जिसका इंतजार था। उसके साथ बिताया हर पल खास लगने लगता है। उसकी आवाज सुनकर मन शांत होता है और उसकी एक छोटी-सी खुशी भी अपने दिन को बेहतर बना देती है।

लेकिन हर चाहत का मुकाम मिलना जरूरी नहीं होता।

कुछ लोग हमारी जिंदगी में हमेशा के लिए नहीं, बल्कि हमें कुछ सिखाने के लिए आते हैं। वे हमें बताते हैं कि किसी को पसंद करना क्या होता है, किसी की चिंता करना क्या होता है और किसी के बिना भी उसके लिए खुश रहना कितना मुश्किल, लेकिन खूबसूरत एहसास है।

कभी-कभी हम किसी को बहुत चाहते हैं, लेकिन वह हमें नहीं चाहता। कभी परिस्थितियां दो लोगों के बीच दीवार बन जाती हैं। कभी दूरी रिश्ते से बड़ी हो जाती है और कभी समय उन लोगों को अलग कर देता है, जो एक-दूसरे के बेहद करीब थे।

ऐसे में क्या प्यार खत्म हो जाता है?

नहीं।

प्यार हमेशा साथ रहने का नाम नहीं है। प्यार कभी-कभी किसी की याद बनकर भी जिंदगी में रहता है। कोई व्यक्ति हमारे साथ न होकर भी हमारी सोच, हमारी यादों और हमारी मुस्कान का हिस्सा बना रह सकता है।

किसी को चाहने का सबसे खूबसूरत रूप शायद यही है कि हम उसके बदले में कुछ मांगना छोड़ दें।

हम यह न सोचें कि उसने हमारे लिए क्या किया। हम यह भी न सोचें कि वह हमारा क्यों नहीं हुआ। बस इतना काफी हो कि कभी हमने उसे सच्चे मन से चाहा था।

क्योंकि पाने और चाहने में बहुत फर्क है।

पाना अपने हिस्से में किसी को शामिल करना है,
लेकिन चाहना उसके हिस्से की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना है।

कभी-कभी हम किसी को पाकर भी उसे खो देते हैं और कभी किसी को खोकर भी उसे हमेशा अपने भीतर पाए रखते हैं।

इसलिए अगर आपकी जिंदगी में भी कोई ऐसा इंसान है जिसे आप चाहते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि वह हमेशा आपके पास रहे। जरूरी यह है कि आपकी चाहत में स्वार्थ कितना कम और अपनापन कितना ज्यादा है।

अगर वह आपके साथ है, तो उसकी कद्र कीजिए।

अगर वह आपके साथ नहीं है, तो उसकी यादों की कद्र कीजिए।

और अगर वह किसी और के साथ खुश है, तो शायद उसके लिए खुश होना ही आपकी चाहत की सबसे सच्ची परीक्षा है।

किसी को चाहना हमेशा किसी को पाना नहीं होता।
कभी-कभी किसी को दिल से चाहकर, उसे आज़ाद छोड़ देना भी प्यार होता है।

और शायद प्यार की सबसे खूबसूरत बात यही है—

जिसे हम पाना चाहते हैं, वह जरूरी नहीं कि हमारा हो;
लेकिन जिसे हम सच्चे दिल से चाहते हैं, उसकी खुशी हमेशा हमारे दिल का हिस्सा रह सकती है।

Friday, July 10, 2026

कुछ सफर सिर्फ रास्तों के नहीं, एहसासों के भी होते हैं

 घर गए हुए पूरे पंद्रह दिन हो चुके थे। इस बार मंगलवार को ऑफिस का काम थोड़ा जल्दी खत्म होने वाला था, इसलिए मन पहले से ही घर पहुंचने की खुशी से भरा हुआ था। लेकिन पिछले एक-दो दिनों से सोशल मीडिया पर मौसम को लेकर लगातार डराने वाली खबरें दिखाई दे रही थीं। कहीं भारी बारिश की चेतावनी, तो कहीं दो-तीन दिन लगातार तेज़ बारिश होने की संभावना जताई जा रही थी। 

रात के लगभग दस बजे ऑफिस का काम खत्म हुआ और मैं अपनी बाइक लेकर घर की ओर निकल पड़ा। बाहर अंधेरा था, इसलिए मौसम का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। आसमान में बादल ज़रूर थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। मन ही मन यही उम्मीद थी कि बस किसी तरह घर तक पहुंच जाऊँ, उसके बाद चाहे जितनी बारिश हो जाए।

सफर के दौरान कई बार नज़र आसमान की तरफ चली जाती। बादलों को देखकर खुद को तसल्ली देता कि अभी मौसम संभला हुआ है। लगभग रात के बारह बजे मैं घर पहुंच गया। हल्की ठंडक महसूस होने लगी थी और सफर की थकान भी थी, इसलिए खाना खाकर जल्दी ही सो गया।

अगली सुबह बाइक की सर्विस करवाने इस्माइलाबाद जाना था। वैसे तो पिछले महीने ही सर्विस करवाई थी, लेकिन कहते हैं न कि हर मैकेनिक का हाथ अलग होता है। पिछली सर्विस से मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं था और बाइक में कुछ छोटी-छोटी दिक्कतें अभी भी बनी हुई थीं।

सुबह कुछ ज़रूरी काम निपटाकर मैं इस्माइलाबाद की ओर निकल पड़ा। रास्ते में मेरा दोस्त सुरेंद्र खेत में काम कर रहा था। कई दिनों से उससे मुलाकात भी नहीं हुई थी। मैंने बाइक रोकी तो वह खेत से बाहर सड़क तक आ गया। कुछ देर हाल-चाल पूछे, दो-चार बातें हुईं और फिर मैं आगे बढ़ गया।

मैकेनिक की दुकान पर पहुंचकर मैंने बाइक की सारी समस्याएँ बताईं। वह अपने काम में लग गया और मैं इंतज़ार करता रहा। करीब दो घंटे बाद बाइक तैयार हो गई। अब वह पहले से काफी बेहतर चल रही थी। मैं वापस घर लौट आया और देखते ही देखते पूरा दिन निकल गया।

घर पर नूर का अपना ही उत्साह था। उसे बाइक पर घूमना इतना पसंद है कि बस चाबी दिखनी चाहिए। दिन में मैंने उसे दो-तीन बार बाइक पर घुमाया, लेकिन उसका मन कहाँ भरने वाला था। थोड़ी देर बाद फिर वही आवाज़...

"चाबी उठाओ... बाइक चलाओ..."

शाम को जब मैं स्कूटी से थोल गया, तब भी वह मेरे साथ ही था। लौटते-लौटते अंधेरा हो चुका था। बादल फिर से घिर आए थे। ऐसा लग रहा था कि कभी भी बारिश शुरू हो सकती है, लेकिन उस दिन किस्मत अच्छी रही और बारिश नहीं हुई।

अगले दिन मुझे वापस ऑफिस जाना था।

सुबह आंख खुली तो देखा कि रात में अच्छी बारिश हो चुकी थी। बाहर अब भी हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी। ऐसी बूंदाबांदी जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

नूर भी खेलने के लिए बाहर आ चुका था। मैंने बैग कंधे पर डाला और जैसे ही बाइक की चाबी उठाई, उसके चेहरे का रंग बदल गया।

वह रो तो नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें सब कुछ कह रही थीं।

मैंने मुस्कुराकर उसे "बाय" कहा, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसका उदास चेहरा देखकर मेरा भी मन भारी हो गया।

मैंने उसे बाइक पर बैठाया और सड़क तक लेकर आया। अंजली उसे उतारने लगी, लेकिन वह उतरने को तैयार ही नहीं था। आखिरकार अंजली उसे दुकान से कुछ दिलाने का बहाना बनाकर अपने साथ ले गई। मैं बाइक मोड़कर चल पड़ा। पीछे मुड़कर देखा तो वह बस मुझे जाता हुआ देख रहा था।

शायद मेरे निकलने के बाद वह थोड़ा रोया भी होगा...

बाहर अभी भी हल्की फुहार पड़ रही थी। शुरुआत में तो लगा कि आराम से सफर निकल जाएगा, लेकिन अंबाला पार करके बनूर पहुंचने से पहले वही हल्की-हल्की बूंदें धीरे-धीरे मुझे पूरी तरह भिगोने लगीं। मैंने अपना बैग बाइक के आगे रख लिया ताकि कम से कम उसमें रखा सामान बच जाए।

करीब दो घंटे बाद मैं अपने कमरे पर पहुंच गया। भीगे हुए कपड़े बदले और थोड़ा आराम करने के लिए बिस्तर पर लेट गया।

पता ही नहीं चला कि कब नींद आ गई।

जब आंख खुली तो ऑफिस जाने का समय हो चुका था। जल्दी-जल्दी तैयार होकर फिर ऑफिस के लिए निकल पड़ा। इस बार बारिश पहले से तेज़ थी। ऑफिस पहुंचते-पहुंचते मैं पूरी तरह भीग चुका था।

भीगे कपड़ों की वजह से ठंड भी लगने लगी थी, लेकिन काम तो करना ही था। देखते ही देखते पूरी रात ऑफिस में निकल गई।

रात को जब वापस कमरे की ओर लौटा, तब भी हल्की बारिश जारी थी। कमरे पर पहुंचकर भीगे कपड़े बदले और बिस्तर पर लेट गया।

उस दिन ऐसी गहरी नींद आई कि कब रात बीत गई, पता ही नहीं चला।

सुबह लगभग सात बजे आंख खुली।

खिड़की के बाहर अब भी बारिश की नमी हवा में घुली हुई थी। मन में घर की यादें, नूर का मासूम चेहरा और बारिश में भीगा पूरा सफर एक-एक करके फिर से ताज़ा हो गया।

ज़िंदगी शायद ऐसे ही छोटे-छोटे पलों से खूबसूरत बनती है। कभी घर लौटने की खुशी, कभी अपनों से बिछड़ने का दर्द, कभी बारिश का सफर और कभी किसी मासूम बच्चे का चुपचाप दरवाज़े पर खड़े होकर आपको जाते हुए देखना...

Tuesday, June 30, 2026

ज़िंदगी से जंग हार गया बोरवेल में गिरा 4 साल का निरवैर… आखिर कब सीखेंगे हम?

 चार साल का मासूम निरवैर अपने पिता के साथ खेत में अपने दादा जी को खाना देने गया था। उसे क्या पता था कि यह दिन उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन बन जाएगा। 


वह न किसी से वैर रखता था, न किसी से कोई शिकायत। उसका नाम भी निरवैर था और उसका मासूम स्वभाव भी। फिर आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ?

जब यह खबर सामने आई कि हरियाणा के अंबाला जिले के गांव धनौरा में एक चार वर्षीय बच्चा खुले बोरवेल में गिर गया है, तो पूरे इलाके के साथ-साथ देशभर के लोगों की निगाहें उसी ओर टिक गईं। हर कोई भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि किसी तरह यह मासूम सुरक्षित बाहर आ जाए।

बोरवेल के आसपास हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। NDRF, SDRF और प्रशासन की टीमें लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी थीं। मशीनें चल रही थीं, सुरंग खोदी जा रही थी, अधिकारी पूरी कोशिश कर रहे थे। लेकिन दूसरी ओर ज़मीन पर बैठे उसके पिता, माँ और दादा की आँखों में सिर्फ एक उम्मीद थी—कोई आकर बस इतना कह दे, "चिंता मत करो... निरवैर सुरक्षित बाहर आ गया है।"

उनके कान केवल यही एक वाक्य सुनने के लिए तरस रहे थे।

सच कहूँ, मैं भी उन लाखों लोगों में शामिल था जो लगातार सोशल मीडिया पर हर छोटी-बड़ी अपडेट देख रहे थे। रात को कार्यालय से लौटने के बाद देर रात तक नींद नहीं आई। बार-बार मोबाइल उठाकर यही देखता रहा कि शायद कोई अच्छी खबर मिल जाए।

रात के दो-तीन बजे भी जब नींद खुली, तो सबसे पहले हाथ मोबाइल की ओर गया। मन में यही उम्मीद थी कि शायद अब तक निरवैर बाहर आ चुका होगा। लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी।

सुबह जब आँख खुली तो मोबाइल उठाने से पहले ही दिल घबराने लगा। डर था कि कहीं कोई बुरी खबर न पढ़नी पड़ जाए। रात में ही रेस्क्यू टीमों ने संकेत देना शुरू कर दिया था कि बोरवेल में पानी भरने के कारण बच्चे के बचने की संभावना बहुत कम होती जा रही है।

और वही हुआ, जिसका डर था।

करीब 21 घंटे की कठिन मशक्कत के बाद निरवैर को बोरवेल से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसका शरीर तो बाहर आ गया, पर उसकी मासूम साँसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं।

यह समाचार पढ़कर आँखें नम हो गईं। बार-बार यही सोचता रहा कि उस मासूम ने उन 21 घंटों में क्या-क्या सहा होगा। तंग पाइप में फँसा हुआ, ऊपर से गिरता पानी, अंधेरा, घुटन... यह कल्पना मात्र ही मन को विचलित कर देती है।

सोशल मीडिया पर जब उसकी बोरवेल के अंदर की तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे थे, तो उन्हें देखकर मन रो पड़ता था। फिर भी उम्मीद नहीं टूट रही थी कि शायद कोई चमत्कार हो जाए।

खेत में हजारों लोग मौजूद थे, लेकिन उस एक मासूम की जान बचाने के सामने सब खुद को असहाय महसूस कर रहे थे।

आज सवाल केवल एक परिवार का नहीं है।

सवाल यह है कि आखिर खुले बोरवेल अब भी क्यों छोड़ दिए जाते हैं?

देश अंतरिक्ष में नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। हम चाँद और मंगल तक पहुँचने की बातें करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और आधुनिक तकनीकों पर गर्व करते हैं। लेकिन क्या हम आज भी एक मासूम बच्चे को ओपन बोरवेल से नहीं निकाला जा सकता?

तकनीक पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ा काम है ऐसी दुर्घटनाओं को होने से रोकना।

हर साल न जाने कितने बच्चे खुले बोरवेल में गिरकर अपनी जान गंवा देते हैं। हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, फिर सब भूल जाते हैं। लेकिन जिन परिवारों के घरों के चिराग बुझ जाते हैं, उनके लिए यह दर्द कभी खत्म नहीं होता।

यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है।

जिस खेत में बोरवेल हो, उसे सुरक्षित ढकना मालिक का कर्तव्य है। प्रशासन को भी ऐसे खुले बोरवेलों की पहचान कर उन्हें तुरंत बंद करवाना चाहिए। यदि कोई लापरवाही करता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और निरवैर इस तरह अपनी जान न गंवाए।

निरवैर अब वापस नहीं आएगा।

उसकी मासूम मुस्कान, उसकी बातें, उसके सपने सब अधूरे रह गए।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह मासूम निरवैर सिंह की आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और उसके माता-पिता तथा पूरे परिवार को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें।

एक मासूम चला गया, लेकिन उम्मीद है कि उसकी यह दर्दनाक कहानी समाज को जगाएगी।

क्योंकि एक खुला बोरवेल केवल एक गड्ढा नहीं होता, वह किसी परिवार की पूरी दुनिया निगल सकता है।

Saturday, June 27, 2026

झुलसती धूप और ठंडी पड़ती इंसानियत

 जिंदगी हर रोज़ कोई बड़ा किस्सा नहीं सुनाती। कई बार एक साधारण-सा दिन भी हमें ऐसे अनुभव दे जाता है, जो देर तक मन में घूमते रहते हैं। कभी गर्मी परेशान करती है, कभी किसी अनजान इंसान का व्यवहार, तो कभी एक छोटा-सा बीस रुपये का नोट हमें इंसानियत का असली मतलब सोचने पर मजबूर कर देता है। यह भी ऐसा ही एक दिन था, जो आम होते हुए भी मेरे लिए खास बन गया। 




आज सुबह जब मेरी आँख खुली तो घड़ी में सात बज रहे थे। बाहर अभी शांति थी। मैंने सोचा, "थोड़ी देर और सो लेता हूँ।" पता ही नहीं चला कि कब फिर से नींद आ गई।

दुबारा आँख खुली तो नौ बज चुके थे। बाहर सूरज पूरी तरह अपना कब्जा जमा चुका था। धूप की तपिश कमरे के अंदर तक महसूस हो रही थी। हालांकि कमरे में कूलर चल रहा था, जिसकी ठंडी हवा गर्मी के प्रकोप को कुछ हद तक कम कर रही थी, लेकिन बाहर निकलने का ख्याल ही मन को बेचैन कर रहा था।

सोचा कि अब और देर नहीं करनी चाहिए। नहाकर तैयार हुआ। नाश्ता भी करना था और अगर ज्यादा देर हो जाती तो धूप और भी तेज़ हो जाती। गर्मियों की दोपहर में बाहर निकलना ऐसा लगता है, जैसे कोई अंगारों पर चल रहा हो।

मैं पैदल ही चाय पीने के लिए निकल पड़ा। सिर पर पड़ती धूप की गर्मी पूरे शरीर में उतरती महसूस हो रही थी। सड़क के किनारे लगे पेड़ों की छाया से होकर गुजर रहा था, लेकिन उन पेड़ों की छांव भी गर्म हवा को रोक नहीं पा रही थी।

थोड़ी देर बाद मैं अपनी रोज़ वाली चाय की दुकान पर पहुँच गया। चाय वाले ने भी एक पेड़ के नीचे अपनी छोटी-सी टपरी लगा रखी थी, लेकिन उस पेड़ की शाखाएँ इतनी घनी नहीं थीं कि अच्छी छाया दे सकें। वहाँ खड़े होने और सीधी धूप में खड़े होने में बहुत ज्यादा फर्क महसूस नहीं हो रहा था।

मैंने एक कुल्हड़ चाय मंगवाई और साथ में एक मठी भी ले ली। गर्म चाय का हर घूंट जैसे शरीर की थकान मिटा रहा था। चाय खत्म करके मैं वापस लौटने लगा।

तभी मेरी नजर सड़क किनारे लगे एक टेंट पर पड़ी। वहाँ ठंडे पानी की छबील लगाने की तैयारी चल रही थी। मन हुआ कि थोड़ी देर बाद वापस आकर ठंडा पानी जरूर पियूँ। लेकिन अभी तैयारी पूरी नहीं हुई थी, इसलिए मैं कमरे पर लौट आया।

करीब दो घंटे बाद फिर से मैं उसी जगह पहुँचा। इस बार अपनी बाइक लेकर गया था, क्योंकि लौटते समय पेट्रोल भी डलवाना था।

पहले छबील का ठंडा पानी पिया। उस भीषण गर्मी में ठंडे पानी का एक गिलास किसी अमृत से कम नहीं लग रहा था।

इसके बाद मैं सीधे पेट्रोल पंप पहुँच गया। बाइक में पेट्रोल भरवाया और पैसे देने लगा। मेरी जेब में एक बीस रुपये का नोट था, जिसका एक कोना हल्का-सा जला हुआ था।

पेट्रोल पंप के कर्मचारी ने नोट देखते ही कहा, "ये नोट नहीं चलेगा।"

मैंने समझाने की कोशिश की, "भाई, सिर्फ कोना ही तो जला है। ये नोट मुझे भी कहीं से मिला है। ऐसे छोटे नोट तो हर जगह चल जाते हैं।"

लेकिन उसने साफ मना कर दिया। बात बहस तक पहुँच गई। मैंने कहा, "अगर आपको भरोसा नहीं है तो अपने मैनेजर से बात करवा दीजिए।"

मैनेजर भी आ गया, लेकिन उसने भी वही बात दोहरा दी कि यह नोट स्वीकार नहीं किया जा सकता।

उस समय मेरे पास दूसरा कोई पैसा भी नहीं था। वैसे तो मैं ऑनलाइन भुगतान कर सकता था, लेकिन पता नहीं क्यों उस समय मेरा मन ही बदल गया। शायद बात अब पैसों की नहीं, व्यवहार की हो चुकी थी।

मैंने कहा, "अगर नोट नहीं ले सकते, तो फिर बाइक से पेट्रोल ही वापस निकाल लीजिए।"

मेरी बात सुनकर शायद उन्हें भी एहसास हुआ कि मामला जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। उन्होंने कहा, "कोई बात नहीं... आप कल आकर दूसरे पैसे दे जाना।"

मैं बिना कुछ बोले वहाँ से लौट आया।

रास्ते भर मेरे मन में एक ही बात घूमती रही। मैं रोज़ उसी पेट्रोल पंप से पेट्रोल भरवाता हूँ। अब तो वहाँ के लोग मुझे पहचानने भी लगे हैं। लेकिन सिर्फ बीस रुपये के लिए जिस तरह का व्यवहार हुआ, उसने मन को कहीं न कहीं दुखी कर दिया।

मुझे उस जले हुए नोट से ज्यादा तकलीफ उस बदले हुए रवैये से हुई। आज के समय में पैसों की कीमत शायद रिश्तों और विश्वास से भी ज्यादा हो गई है। एक छोटा-सा नोट किसी की नीयत नहीं बताता, लेकिन इंसान का व्यवहार जरूर बहुत कुछ बता देता है।

कमरे पर लौटकर मैंने फिर से कूलर चला दिया। बाहर की झुलसाती गर्मी और अंदर की उधेड़बुन, दोनों ही मन को बेचैन कर रही थीं। पता नहीं कब इन्हीं सोचों के बीच आँख लग गई।

जब नींद खुली तो घड़ी में तीन बजने वाले थे। ऑफिस जाने का समय हो चुका था। जल्दी-जल्दी कपड़े बदले, बाइक उठाई और फिर रोज़ की तरह अपनी जिम्मेदारियों की ओर निकल पड़ा।

लेकिन उस दिन की गर्मी और वो बीस रुपये का नोट... दोनों आज भी याद हैं।



जिंदगी में अक्सर बड़ी घटनाएँ नहीं, बल्कि ऐसे छोटे-छोटे अनुभव हमें बहुत कुछ सिखा जाते हैं। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि इंसान की पहचान उसके पैसों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से होती है। शायद बीस रुपये का नोट बदला जा सकता है, लेकिन किसी का टूटा हुआ विश्वास इतनी आसानी से नहीं जुड़ता।

Tuesday, June 2, 2026

मेले वाली जिद और बचपन की मुस्कान

 बचपन और मेले का रिश्ता शायद उतना ही पुराना है जितना गांवों की परंपराएं। मेले का नाम सुनते ही बच्चों की आंखों में चमक आ जाती है। उन्हें ना भीड़ की परवाह होती है, ना धूप की और ना थकान की। उनके लिए मेला मतलब खिलौने, झूले, मिठाइयां और ढेर सारी खुशियां। जब हम छोटे थे, तब मेले में जाने के लिए जिद किया करते थे। आज अपने बच्चों को देखकर लगता है कि समय बदल गया है, लेकिन बच्चों की मासूमियत बिल्कुल नहीं बदली।  


19 अक्टूबर 2018 को दशहरे का दिन था। गांव में मेले की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो चुकी थीं। सुबह मैं अभी सो ही रहा था कि मेरा बेटा अक्षित उठकर बैठ गया। उसे पता था कि आज स्कूल की छुट्टी है और मेले का दिन भी।

उठते ही उसने अपनी पहली फरमाइश रख दी—"पापा, मुझे मेले में जाना है और खिलौना लेना है।"

मैंने उसे समझाया कि अभी सुबह है, दुकानें भी नहीं लगी होंगी। लेकिन बच्चों को तर्क कहां समझ आते हैं। थोड़ी देर चुप रहता, फिर आकर वही बात दोहरा देता।

"पापा, चलो ना... खिलौना लेकर आते हैं।"

समय बीतता गया। सुबह से दोपहर होने लगी, लेकिन उसकी जिद कम होने का नाम नहीं ले रही थी। आखिरकार जब वह बार-बार वही बात दोहराने लगा तो मुझे थोड़ा सख्त होना पड़ा। वह कुछ देर के लिए चुप तो हो गया, लेकिन उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था कि उसने अपनी मांग छोड़ी नहीं है

मैं कमरे में जाकर लेट गया। थोड़ी देर बाद अक्षित भी वहीं आकर बैठ गया। वह कुछ बोल नहीं रहा था, लेकिन उसकी हर हरकत बता रही थी कि वह अभी भी मुझसे नाराज़ है।

पास में मेरा बैग रखा हुआ था। उसने धीरे-धीरे बैग खोलना शुरू कर दिया। फिर उसमें रखे कपड़े और सामान एक-एक करके बाहर निकालने लगा। कुछ देर में पूरा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था।

जब मैं उसकी तरफ देखता तो वह अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लेता। कभी बैग के पीछे छिप जाता, कभी चुपचाप बैठ जाता। यह उसका विरोध जताने का तरीका था।

मुझे उस पर गुस्सा भी आ रहा था और हंसी भी। मन ही मन सोच रहा था कि बच्चे भी अपनी बात मनवाने के कितने अनोखे तरीके ढूंढ़ लेते हैं।

दोपहर बाद मेरे ताऊ जी ने कहा कि पास के गांव जनसुई में कुश्तियों का आयोजन है, वहां चलना चाहिए। उन्हें कुश्तियां देखने का बहुत शौक था।

हम बाइक निकालकर चलने लगे तो सबसे पहले अक्षित दौड़कर आया और बाइक पर सबसे आगे बैठ गया। जैसे उसे डर हो कि कहीं उसे पीछे ना छोड़ दिया जाए।

करीब दस मिनट बाद हम मेले में पहुंच गए। वहां लोगों की भारी भीड़ थी। अखाड़े में कुश्तियां चल रही थीं और चारों तरफ मेले की रौनक फैली हुई थी।

लेकिन अक्षित का ध्यान कुश्तियों में कहां था।

कुछ ही देर बाद उसने कहा, "पापा, भूख लगी है।"

मैं समझ गया कि उसे भूख खाने की नहीं, खिलौनों की लगी हुई है।

मैं उसे लेकर खिलौनों की दुकानों की तरफ निकल गया। दुकानें रंग-बिरंगे खिलौनों से भरी हुई थीं।

पहले उसने एक हेलीकॉप्टर देखा। उसे बहुत पसंद आया। लेकिन वह धागे से चलने वाला था और कीमत भी ज्यादा थी। मैंने उसे समझाया कि यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा।

फिर उसकी नजर एक रिमोट वाली कार पर पड़ी। उसने कहा कि यही चाहिए।

मैंने उसे याद दिलाया कि घर पर ऐसी कार पहले से है। दुकानदार ने भी बताया कि बस डिजाइन अलग है, काम वही है। काफी समझाने के बाद वह मान गया।

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

वह मुझे एक दुकान से दूसरी दुकान और दूसरी से तीसरी दुकान तक घुमाता रहा। उसे याद था कि किस दुकान पर कौन-सा खिलौना रखा था। मैं थक गया था, लेकिन उसके उत्साह में कोई कमी नहीं आई थी।

आखिरकार उसे "मोटू-पतलू" वाला एक खिलौना पसंद आ गया। कीमत भी ठीक थी और वह उसे देखकर बहुत खुश था।

खिलौना खरीदने के बाद मैंने उससे पूछा, "अंजलि के लिए भी कुछ ले लें?"

उसने तुरंत कहा, "उसके लिए गुड़िया ले लो। उसने मुझसे कहा था कि मेरे लिए भी लेकर आना।"

हमने एक छोटी सी गुड़िया भी खरीद ली।

बाद में घर पहुंचकर उसने हंसते हुए बताया कि अंजलि ने तो उससे कुछ कहा ही नहीं था। उसने खुद ही सोचा कि बहन के लिए भी कुछ ले जाना चाहिए।

उसकी यह बात सुनकर मुझे उसकी समझदारी पर प्यार आ गया।

इसके बाद हमने आइसक्रीम खाई और मेले में घूमते रहे। रास्ते में भांजा विजय और दूसरे रिश्तेदार भी मिल गए। वे गोलगप्पे खा रहे थे।

मैंने भी एक गोलगप्पा खाया, लेकिन उसका पानी बिल्कुल फीका लगा। गांव के मेलों का मजा वैसे भी खाने से ज्यादा माहौल में होता है।

शाम ढलने लगी थी। कुश्तियां समाप्त हो चुकी थीं और लोग रावण दहन वाली जगह की तरफ बढ़ने लगे थे।

हमने काफी देर तक अपने ताऊ जी को ढूंढ़ा। जब वे नहीं मिले तो हमें लगा कि शायद वे पैदल ही गांव की तरफ निकल गए होंगे।

घर लौटते समय मैंने पकौड़े खरीदे। जब मैं उन्हें पैक करवा रहा था तो अक्षित ने कहा,

"पापा, मुझे नहीं खाने, मुझे भूख नहीं है।"

मैंने हंसते हुए कहा, "ये तेरे लिए नहीं, घर वालों के लिए हैं।"

इतना सुनते ही उसने कहा, "फिर एक मुझे भी दे दो।"

मैंने एक गरम पकौड़ा उसके हाथ में रख दिया। उसने जल्दी-जल्दी खाने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ से छूटकर नीचे गिर गया।

उसका चेहरा देखने लायक था।

कुछ देर बाद रास्ते में ताऊ जी मिल गए और हम उन्हें साथ लेकर घर पहुंच गए।

रात को गांव में रावण दहन हुआ। आतिशबाजी हुई, भीड़ जमा हुई और दशहरे का दिन खत्म हो गया।

आज जब उस दिन को याद करता हूं तो मेले की भीड़, कुश्तियां, खिलौनों की दुकानें या रावण दहन से ज्यादा एक चीज याद आती है—अक्षित का वह मासूम चेहरा।

सुबह से शाम तक उसकी वही एक जिद, "पापा, मेले में चलो।"

उसकी मिन्नतें, उसकी नाराज़गी, बैग का सामान बिखेरना और फिर खिलौना मिलने के बाद चेहरे पर लौट आई मुस्कान—ये सब याद करके आज भी हंसी आ जाती है।

शायद यही बचपन की सबसे बड़ी खूबसूरती है। छोटी-छोटी चीजों में इतनी बड़ी खुशियां ढूंढ़ लेना, जो बड़े होने पर कहीं खो जाती हैं।

Monday, June 1, 2026

बारिश की बूंदें और तीज की यादें


गांव की ज़िंदगी में हर मौसम अपने साथ कुछ खास यादें लेकर आता है, लेकिन सावन का महीना कुछ अलग ही होता था। गर्मियों की तपती दोपहरों के बाद जब आसमान में काले बादल उमड़ने लगते थे और पहली बारिश की बूंदें मिट्टी को छूती थीं, तो पूरे गांव का माहौल बदल जाता था। खेतों में हरियाली लौट आती थी, पेड़ों की टहनियां झूमने लगती थीं और लोगों के चेहरों पर भी एक अलग ही रौनक दिखाई देने लगती थी। लेकिन सावन की सबसे बड़ी पहचान होती थी – तीज का त्योहार और पेड़ों पर पड़ने वाले झूले। 


जुलाई-अगस्त का महीना शुरू होते ही गांव में तीज की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। बरसात के कारण चारों तरफ हरियाली छा जाती थी। आम, नीम, पीपल और बरगद के बड़े-बड़े पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सियों के झूले डाल दिए जाते थे।

सुबह से लेकर शाम तक झूलों पर लड़कियों और बच्चों की भीड़ लगी रहती थी। कोई धीरे-धीरे झूलता था, तो कोई आसमान को छू लेने की कोशिश करता था। झूले के साथ-साथ हंसी की आवाजें पूरे गांव में गूंजती रहती थीं। ऐसा लगता था जैसे सावन अपने साथ खुशियों की पूरी बारात लेकर आया हो।

तीज का त्योहार सिर्फ एक त्योहार नहीं होता था, बल्कि बेटियों के लिए अपने बचपन से दोबारा मिलने का बहाना भी होता था। शादीशुदा बेटियां अपने मायके आने का इंतजार करती थीं। कई दिन पहले ही संदेश भेज दिए जाते थे कि तीज पर घर जरूर आना।

जब कोई बेटी अपने मायके पहुंचती थी, तो घर का माहौल ही बदल जाता था। मां की आंखों में खुशी दिखाई देती थी, भाई बहन के लिए बाजार से मिठाई और चूड़ियां लाता था और पिता जी बार-बार पूछते थे कि रास्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई।

कुछ दिन के लिए ही सही, लेकिन मायका फिर से बचपन की तरह जीवंत हो उठता था।

सावन के दिनों में महिलाएं और लड़कियां एक जगह इकट्ठा होकर तीज के गीत गाती थीं। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले लोकगीतों की अपनी ही मिठास होती थी।

शाम के समय गांव के किसी बड़े आंगन या चौपाल में महिलाएं बैठ जाती थीं। गीतों में कभी ससुराल की बातें होती थीं, कभी मायके की यादें और कभी सावन की मस्ती। उन गीतों में गांव की संस्कृति और जीवन की सादगी दोनों दिखाई देती थीं।

आज मोबाइल और इंटरनेट के दौर में शायद वो सामूहिक बैठकों की परंपरा कम हो गई है, लेकिन जिन लोगों ने वो समय देखा है, उनके लिए वे यादें आज भी ताजा हैं।

हम बच्चों के लिए तो सावन किसी त्योहार से कम नहीं होता था। बारिश शुरू होते ही घर से बाहर भाग जाते थे। कभी बारिश में भीगना, कभी खेतों की मेड़ों पर दौड़ लगाना और कभी कीचड़ में फिसल जाना।

कई बार तो मां डांटती थी कि बीमार पड़ जाओगे, लेकिन उस समय इन बातों की कहां परवाह होती थी। बारिश का पानी, मिट्टी की खुशबू और दोस्तों का साथ ही हमारी दुनिया हुआ करता था।

गांव के जोहड़ों में पानी भर जाता था। भैंसें पानी में बैठी रहती थीं और हम भी उनके आसपास खेलते रहते थे। गर्मियों और सावन के दिन जैसे बचपन की सबसे सुंदर यादों का हिस्सा बन गए थे।

गर्मियों के दिनों में जब तेज धूप पड़ती थी, तब हर कोई बारिश का इंतजार करता था। खेत सूखे दिखाई देते थे, पेड़ों के पत्ते मुरझाए से लगते थे। लेकिन जैसे ही सावन आता था, पूरी प्रकृति बदल जाती थी।

खेतों में नई फसल की उम्मीद जागती थी। किसानों के चेहरों पर मुस्कान लौट आती थी। गांव की गलियों में भी पहले से ज्यादा चहल-पहल दिखाई देने लगती थी।

सावन सिर्फ मौसम नहीं था, बल्कि उम्मीदों और खुशियों का महीना था।

आज भी तीज का त्योहार मनाया जाता है, लेकिन पहले जैसी बात कहीं-कहीं ही देखने को मिलती है। बड़े-बड़े पेड़ों की संख्या कम हो गई है, झूले भी कम दिखाई देते हैं और रिश्तों में भी पहले जैसी फुर्सत नहीं रही।

फिर भी जब कभी सावन की पहली बारिश होती है, तो मन अनायास ही उन पुराने दिनों में पहुंच जाता है। झूलों की पींगें, तीज के गीत, मायके आई बहनों की हंसी और मिट्टी की खुशबू सब कुछ फिर से आंखों के सामने घूमने लगता है।

सावन और तीज सिर्फ त्योहार नहीं थे, बल्कि रिश्तों को जोड़ने वाले अवसर थे। यह वह समय था जब बेटियां मायके आती थीं, परिवार एक साथ बैठता था और गांव खुशियों से भर जाता था। शायद इसी वजह से आज भी सावन का नाम सुनते ही मन में एक अलग ही मिठास घुल जाती है।

वक्त बदल गया है, लेकिन सावन की वो यादें आज भी दिल के किसी कोने में झूला झूल रही हैं।

Sunday, May 31, 2026

जब समय ठहरने वाला था


ज़िंदगी में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। हम उस समय तो उन्हें एक सामान्य घटना की तरह जी रहे होते हैं, लेकिन बाद में वही दिन यादों का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन जाते हैं। वर्ष 2020 का मार्च महीना भी कुछ ऐसा ही था। पूरी दुनिया एक अनजाने डर के साये में जी रही थी। एक ऐसा वायरस, जिसके बारे में किसी ने पहले कभी नहीं सुना था, धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका था। हर दिन टीवी पर नई खबरें आ रही थीं। कहीं लॉकडाउन की चर्चा थी, कहीं अस्पतालों की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। लोगों के मन में डर था और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी। 


उसी समय भारत में भी कोरोना वायरस के मामले बढ़ने लगे थे। देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 22 मार्च 2020 को "जनता कर्फ्यू" का पालन करने की अपील की। लोगों से कहा गया कि वे अपने घरों में रहें और अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। यह एक ऐसा दिन होने वाला था, जब पूरा देश स्वेच्छा से अपने घरों में रहने वाला था।

उस समय मैं चंडीगढ़ में काम करता था। चारों तरफ कोरोना वायरस की खबरें सुनकर मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। ऐसा लग रहा था कि आने वाले दिनों में हालात और भी बदल सकते हैं। इसलिए मैंने तय किया कि जनता कर्फ्यू से पहले अपने गांव चला जाऊं।

शुक्रवार की रात को ही मैंने अपना बैग तैयार करके रख दिया था। शनिवार को सुबह अपने जरूरी काम निपटाए और करीब दोपहर बारह बजे बाइक लेकर चंडीगढ़ से गांव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में सड़कों पर सामान्य दिनों की तुलना में कम भीड़ दिखाई दे रही थी। लोगों के चेहरों पर भी चिंता साफ नजर आ रही थी।

चंडीगढ़ से डेराबस्सी, बरवाला, शहजादपुर होते हुए मैं साहा पहुंच गया। वहां मेरी मौसी का घर था। मेरी पत्नी और भांजी जस्सू भी वहीं आई हुई थीं, जिन्हें साथ लेकर गांव जाना था। मौसी के घर पहुंचकर चाय पी, खाना खाया और कुछ देर आराम किया। 

शाम करीब चार बजे हम साहा से गांव के लिए निकल पड़े। आसमान में काले बादल घिरने लगे थे। मौसी ने हमें रोकने की कोशिश भी की। उन्होंने कहा कि मौसम ठीक नहीं लग रहा, थोड़ी देर रुक जाओ। लेकिन घर पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए हमने सफर जारी रखा।

अभी हम शाहबाद के आसपास ही पहुंचे थे कि बारिश शुरू हो गई। मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगीं। सड़क किनारे एक पेट्रोल पंप देखकर हम वहां रुक गए। लगभग आधे घंटे तक बारिश रुकने का इंतजार करते रहे।

बारिश कुछ कम हुई तो हमने फिर से यात्रा शुरू कर दी। लेकिन प्रकृति जैसे उस दिन बार-बार हमारी परीक्षा ले रही थी। कुछ दूरी तय करने के बाद फिर तेज बारिश शुरू हो गई। इस बार हम दिल्ली-अमृतसर हाईवे पर एक पुल के नीचे जाकर खड़े हो गए।

करीब दस मिनट बाद बारिश हल्की हुई और हम फिर आगे बढ़ गए। जैसे-जैसे गांव करीब आ रहा था, वैसे-वैसे मौसम का मिजाज भी बदल रहा था। लेकिन आगे जाकर देखा कि कई जगह बारिश बिल्कुल नहीं हुई थी। कुछ ही समय बाद हम सुरक्षित अपने गांव पहुंच गए।

घर पहुंचकर चाय पी और थोड़ा आराम किया। लेकिन गांव में आराम ज्यादा देर कहां टिकता है। शाम करीब छह बजे पिताजी का फोन आया। उन्होंने खेत में बुला लिया। पशुओं के लिए दो दिन का चारा लाना था।

मैं खेत पहुंचा। वहां पराली का काम करवाया और फिर पास के गन्ने के खेत की तरफ चला गया। खेत में प्रवासी मजदूर ट्रैक्टर-ट्रॉली में गन्ना भर रहे थे। मैंने वहीं से दो गन्ने तोड़ लिए। ताजा और मीठे गन्ने का स्वाद आज भी याद है।

कुछ देर बाद पशुओं के लिए हरे चारे की गठरी बाइक पर रखवाई और घर की ओर चल पड़ा। पिताजी वहीं खेत में रुक गए। उन्होंने कहा कि वे बाद में आ जाएंगे।

रात करीब नौ बजे तक भी वे घर नहीं पहुंचे तो मेरे भाई ने उन्हें फोन किया। उन्होंने बताया कि अभी रास्ते में हैं। हम दोनों भाई उन्हें लेने खेत की ओर निकल पड़े।

जब हम वहां पहुंचे तो पता चला कि वे अभी चले ही नहीं थे। फिर हमने उन्हें बाइक पर बैठाया और चारे से भरी रेहड़ी को साथ लेकर चल पड़े। कुछ रास्ता कच्चा था, इसलिए रेहड़ी को पैदल ही निकालना पड़ा। सड़क पर आने के बाद मेरे भाई ने पीछे से पैर लगाकर रेहड़ी को गति दी और मैं उसकी सीट पर बैठकर उसे संभालने लगा।

गांव की शांत रात, हल्की ठंडी हवा और खेतों की खुशबू के बीच हम धीरे-धीरे घर की तरफ बढ़ते रहे। कुछ ही देर में घर पहुंच गए। चारा उतारा, हाथ-मुंह धोया और खाना खाकर सो गए।

उस रात सोते समय मन में एक अलग ही भावना थी। अगले दिन पूरा देश अपने घरों में रहने वाला था। शायद पहली बार ऐसा होने जा रहा था कि करोड़ों लोग एक साथ अपनी दिनचर्या रोक देंगे।

तब किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले दिन और भी कठिन होने वाले हैं। लॉकडाउन, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और अनगिनत नई बातें हमारी जिंदगी का हिस्सा बनने वाली थीं। लेकिन उस रात हम सिर्फ इतना जानते थे कि कल जनता कर्फ्यू है और देश एक नई चुनौती का सामना करने जा रहा है।

आज जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि वह सिर्फ एक सफर नहीं था, बल्कि इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ का हिस्सा था। बारिश से भरा वह रास्ता, खेतों में बिताई गई शाम, गन्ने की मिठास और अगले दिन के अज्ञात भविष्य की चिंता—सब कुछ आज भी यादों में ताजा है।

कोरोना ने दुनिया को बहुत कुछ सिखाया। उसने हमें परिवार की अहमियत समझाई, गांव की शांति का महत्व बताया और यह एहसास भी कराया कि जिंदगी कितनी अनिश्चित हो सकती है। शायद इसी कारण मार्च 2020 की वह यात्रा मेरी यादों का हमेशा के लिए हिस्सा बन गई।

Saturday, May 30, 2026

बारिश, खेत और बचपन की वो आज़ादी


बचपन की यादें भी कितनी अजीब होती हैं। समय चाहे कितना भी आगे निकल जाए, लेकिन गांव की मिट्टी, बारिश की खुशबू और गर्मियों की वो शरारतें कभी दिल से दूर नहीं जातीं। आज शहरों की भागदौड़ में रहते हुए जब कभी बारिश की बूंदें गिरती हैं, तो मन अचानक उन्हीं पुराने दिनों में पहुंच जाता है, जब जिंदगी बहुत छोटी-छोटी खुशियों में सिमटी होती थी। ना किसी बात की चिंता, ना भविष्य की फिक्र। बस खेलना, घूमना और हर मौसम को खुलकर जीना।  


गर्मियों के दिन शुरू होते ही गांव की जिंदगी जैसे बदल जाती थी। दोपहर की तेज धूप में खेतों की मिट्टी से गर्म हवा उठती थी, लेकिन हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। सुबह होते ही दोस्तों के साथ खेतों की तरफ निकल जाते थे। दूर-दूर तक फैले हरे खेत, कच्ची पगडंडियां और पेड़ों पर लगे अमरूद जैसे हमें अपनी तरफ बुलाते रहते थे।

बरसात का मौसम तो जैसे हमारे बचपन का सबसे प्यारा मौसम हुआ करता था। जैसे ही बादल घिरते, मन अपने आप खुश हो जाता था। बारिश शुरू होते ही हम खेतों की तरफ भाग जाते। कई बार तो बिना किसी को बताए अमरूद तोड़ने निकल जाते थे। खेतों में लगे पेड़ों पर चढ़ना, कच्चे-पक्के अमरूद तोड़ना और वहीं बैठकर नमक लगाकर खाना — उस स्वाद का मुकाबला शायद आज की कोई चीज नहीं कर सकती। 

बारिश में खेतों की मेड़ों पर चलना भी किसी रोमांच से कम नहीं होता था। मिट्टी इतनी फिसलन भरी हो जाती थी कि हर दो कदम बाद कोई ना कोई फिसल ही जाता था। कई बार तो हम जानबूझकर कीचड़ में फिसलते थे और फिर एक-दूसरे को देखकर खूब हंसते थे। कपड़े मिट्टी से भर जाते थे, लेकिन उस समय ना डांट की चिंता होती थी और ना गंदे कपड़ों की। 

गांव का जोहड़ भी हमारे बचपन का सबसे बड़ा खेल का मैदान था। गर्मियों की दोपहर में जब भैंसों को नहलाने ले जाया जाता, तो हम भी उनके साथ पानी में उतर जाते थे। भैंसें आराम से पानी में बैठ जाती थीं और हम उनके ऊपर चढ़कर खेलते रहते थे।

सबसे ज्यादा मजा तब आता था जब हम भैंस की पूंछ पकड़कर पानी में आगे तक चले जाते थे। हमें लगता था जैसे कोई नाव हमें खींचकर ले जा रही हो। कई बार डर भी लगता था कि कहीं गहरे पानी में ना चले जाएं, लेकिन बचपन में डर भी ज्यादा देर टिकता नहीं था।

पानी में घंटों नहाते रहते थे। कभी एक-दूसरे पर पानी फेंकते, कभी जोहड़ में छलांग लगाते। घर से आवाजें भी आती रहती थीं कि बाहर निकलो, बीमार पड़ जाओगे, लेकिन उस समय कौन सुनता था।

बरसात के बाद खेतों की मिट्टी से जो सोंधी-सोंधी खुशबू आती थी, वो आज भी याद है। ऐसा लगता था जैसे पूरी धरती ने ठंडी सांस ली हो। शाम को जब घर लौटते थे, तो कपड़े मिट्टी और पानी से भरे होते थे। कई बार डांट भी पड़ती थी, लेकिन अगले दिन फिर वही शरारतें शुरू हो जाती थीं। 


उस समय जिंदगी कितनी आसान थी। छोटी-छोटी चीजों में ही खुशी मिल जाती थी। ना मोबाइल थे, ना इंटरनेट, ना किसी चीज की जल्दी। बस दोस्त थे, खेत थे, बारिश थी और खुला आसमान था।

आज गांव भी बदल गए हैं। जोहड़ छोटे हो गए हैं, खेतों में पहले जैसी रौनक नहीं रही और बच्चों के खेल भी बदल गए हैं। अब शायद ही कोई बच्चा बारिश में भीगने या भैंस की पूंछ पकड़कर तैरने का मजा जानता हो।

लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूं, मन के किसी कोने में वही बचपन फिर से जाग उठता है। ऐसा लगता है जैसे आज भी कहीं खेतों की मेड़ पर बारिश हो रही है, और हम मिट्टी में फिसलते हुए हंस रहे हैं।

बचपन के वो दिन शायद कभी वापस नहीं आ सकते, लेकिन उनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहती हैं। जिंदगी चाहे कितनी भी बदल जाए, गांव की बारिश, खेतों की मिट्टी और जोहड़ का पानी हमेशा दिल में एक अलग ही सुकून छोड़ जाते हैं। शायद असली खुशी भी वही थी, जब जिंदगी बहुत छोटी थी और खुशियां बहुत बड़ी।

Tuesday, May 26, 2026

रंगों के बीच संघर्ष के दिन

ज़िंदगी हमेशा एक जैसी नहीं चलती। कभी सब कुछ ठीक होता है, तो कभी अचानक ऐसा मोड़ आ जाता है जहां इंसान खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करने लगता है। कई बार हमें लगता है कि हमने जो रास्ता चुना है, वही सही है, लेकिन समय धीरे-धीरे हमें सिखाता है कि हर अनुभव अपने साथ कोई सीख लेकर आता है। कुछ दिन ऐसे भी आते हैं जब मेहनत बहुत होती है, लेकिन उसके बदले कुछ हासिल नहीं होता। फिर भी इंसान उम्मीद का हाथ नहीं छोड़ता। शायद यही उम्मीद हमें टूटने नहीं देती। 


ये उन दिनों की बात है जब मैंने अंबाला स्थित Embassy of Singapore से नौकरी छोड़ दी थी। उस समय मुझे लगा था कि अब घर से अपने कंप्यूटर पर काम करके बेहतर जिंदगी जी लूंगा। मैंने राजपुरा के एक बुक डिपो के साथ बुक डिजाइनिंग का काम शुरू कर दिया। शुरुआत में सब ठीक लग रहा था। मैं रोज़ मेहनत से काम करता था, घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर डिजाइन बनाता था। मुझे उम्मीद थी कि मेहनत का फल जरूर मिलेगा।

लगभग तीन महीने तक लगातार काम करने के बाद जब हाथ में एक भी रुपया नहीं आया, तब पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत करके भी पैसा ना मिलना कितना दर्द देता है। मैं बार-बार पैसे मांगता, लेकिन हर बार कोई नया बहाना सुनने को मिलता। कभी कहा जाता कि कंपनी से पैसे नहीं आए, कभी कहा जाता कि अगले हफ्ते मिल जाएंगे। बाद में पता चला कि वो किसी कंपनी के लिए नहीं, बल्कि अपने ही काम के लिए हमसे डिजाइन बनवा रहा था।

उस समय ऐसा लगने लगा था जैसे मेहनत की कोई कीमत ही नहीं रही। धीरे-धीरे उम्मीद टूटने लगी। आखिरकार मैंने भी पैसे मिलने की आस छोड़ दी।

उसी दौरान गांव के मेरे दो दोस्त लोगों के घरों में पेंट और सफेदी का काम करते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि अगर चाहो तो हमारे साथ काम कर सकते हो। उस समय मेरी आर्थिक हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि मैंने बिना कुछ सोचे तुरंत हां कर दी। मजदूरी सिर्फ 350 रुपये मिलनी थी, लेकिन उस समय वही भी बहुत लग रहे थे।

सर्दियों के दिन थे। सुबह करीब आठ बजे हम काम पर निकल जाते। पहला काम गांव के शिव मंदिर में मिला था। मैंने अपने घर के अलावा कभी कहीं मजदूरी वाला पेंट का काम नहीं किया था। शुरुआत में हाथ भी ठीक से नहीं चलते थे। धीरे-धीरे मैं उनके साथ काम सीखने लगा। मंदिर की दीवारों पर सफेदी करते हुए, रंग घोलते हुए और सीढ़ियों पर चढ़कर पेंट करते हुए मुझे जिंदगी का एक बिल्कुल अलग रूप देखने को मिला।

शिव मंदिर में करीब चार-पांच दिन काम चला। उसके बाद किसी के घर में सफेदी का काम मिला। उनके घर में दो महीने बाद शादी थी, इसलिए काम जल्दी खत्म करना था। एक साथ दो-तीन काम मिल गए थे। सुबह एक जगह काम करते, फिर दूसरी जगह चले जाते। दिन कब निकल जाता, पता ही नहीं चलता था।

गांव के कुछ लोग ताने भी मारते थे। कहते थे, “चंडीगढ़ जाकर अब फिर से यही मजदूरी करनी पड़ रही है?” उनकी बातें सुनकर कभी-कभी दिल दुखता था। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो हौसला देते थे। वो कहते थे कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत से किया गया हर काम सम्मान के लायक होता है।

धीरे-धीरे हमने गांव के सरपंच धर्मे जी का काम पकड़ लिया। उनके घर में जागरण था, इसलिए वहां भी जल्दी काम खत्म करना था। दिनभर काम करते-करते शरीर थक जाता था, लेकिन फिर भी मन में यही रहता था कि किसी तरह जिंदगी दोबारा संभल जाए।

इसी बीच एक दिन हमने काम से छुट्टी ली और Geeta Jayanti देखने कुरुक्षेत्र चले गए। वहां जाकर कुछ समय के लिए ऐसा लगा जैसे जिंदगी की परेशानियां थोड़ी हल्की हो गई हों।

वापस आने के बाद हमने रविदास मंदिर में पेंट का काम शुरू कर दिया। वहां मंदिर का गुंबद काफी ऊंचा था। उस पर चढ़कर पेंट करना आसान नहीं था। मैं और मेरा दोस्त सुरेंद्र मिलकर ऊपर काम करते थे। नीचे देखने पर डर भी लगता था, लेकिन काम करना जरूरी था। हमारा तीसरा साथी सुच्चा उन दिनों छुट्टी पर चला गया था।

उस समय हमारी दिनचर्या लगभग एक जैसी हो गई थी। सुबह आठ बजे घद फिर से खुद को जोड़ना और उम्मीद का हाथ कभी ना छोड़ना।

मुश्किल समय इंसान को बहुत कुछ सिखा देता है। वो हमें यह एहसास करवार से निकलना, दोपहर को थोड़ी देर खाना खाने घर आना, फिर तीन बजे दोबारा काम पर लग जाना और शाम तक पेंट करना। करीब दो महीने तक जिंदगी इसी तरह चलती रही।

फिर गांव के डेरे में काम मिला। वहां भी हमने करीब एक हफ्ता काम किया। लेकिन धीरे-धीरे मन में सवाल उठने लगे कि आखिर ये सब कब तक चलेगा। मजदूरी से घर का खर्च तो किसी तरह चल रहा था, लेकिन जो पुराने उधार और जिम्मेदारियां थीं, वो और मुश्किल लगने लगी थीं।

कुछ समय तक छोटे-मोटे काम करता रहा। फिर एक दिन मैंने चंडीगढ़ में अपने पुराने ऑफिस में बात की। किस्मत से उन्होंने मुझे दोबारा काम पर बुला लिया।

जब मैं वापस चंडीगढ़ गया और फिर से अपने पुराने काम पर बैठा, तो ऐसा लगा जैसे जिंदगी धीरे-धीरे फिर से अपनी पटरी पर लौटने लगी है। अभी सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ है, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी है।

आज भी रोज़ काम पर जाते समय मन में यही विश्वास रहता है कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। शायद जिंदगी का असली मतलब भी यही है — गिरने के बाद फिर से उठना, टूटने के बाता है कि जिंदगी में कोई भी काम छोटा नहीं होता और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। कुछ रास्ते कठिन जरूर होते हैं, लेकिन वही रास्ते इंसान को अंदर से मजबूत भी बना देते हैं। आज पीछे मुड़कर उन दिनों को देखता हूं तो लगता है कि शायद वही संघर्ष मुझे जिंदगी को समझना सिखा गए।

Monday, May 25, 2026

जिंदगी को समझने के लिए कभी-कभी धीरे चलना पड़ता है

आज की जिंदगी इतनी तेज हो गई है कि इंसान हर समय कहीं ना कहीं भागता हुआ नजर आता है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, कोई कामयाबी के पीछे, तो कोई दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में लगा हुआ है। लेकिन इस भागदौड़ में हम अक्सर जिंदगी को जीना ही भूल जाते हैं। कई बार जिंदगी हमें इशारे देती है कि थोड़ा रुक जाओ, थोड़ा धीरे चलो, खुद को और अपने आसपास की दुनिया को महसूस करो। क्योंकि कुछ बातें सिर्फ वही इंसान समझ पाता है, जो जिंदगी को थोड़ा ठहरकर देखता है। 



कभी-कभी लगता है कि जिंदगी किसी तेज रफ्तार ट्रेन की तरह हो गई है। सुबह आंख खुलते ही दिमाग दौड़ना शुरू कर देता है। क्या करना है, कहां जाना है, कितना कमाना है, कौन आगे निकल गया, कौन पीछे रह गया।

दिन गुजर जाते हैं, महीने निकल जाते हैं, लेकिन हम खुद से मिल ही नहीं पाते।

पहले समय ऐसा नहीं था। गांवों में लोग धीरे जीते थे। खेतों में काम जरूर कठिन होता था, लेकिन जिंदगी में एक ठहराव था। लोग शाम को घर लौटकर चैन से बैठते थे। आंगन में चारपाई डालकर बातें होती थीं। कोई जल्दी नहीं होती थी।

आज हर किसी के हाथ में मोबाइल है, लेकिन समय किसी के पास नहीं है।

हमने जिंदगी को इतना उलझा लिया है कि छोटी-छोटी खुशियां भी अब बड़ी लगने लगी हैं।

कभी गौर किया है…
बारिश की बूंदें हमेशा धीरे गिरती हैं, लेकिन सुकून बहुत देती हैं।
सूरज भी धीरे-धीरे निकलता है, लेकिन पूरी दुनिया रोशन कर देता है।
पेड़ भी धीरे-धीरे बढ़ते हैं, लेकिन सालों तक छांव देते हैं।

प्रकृति हमें हमेशा यही सिखाती है कि जो चीजें धीरे बनती हैं, वही सबसे ज्यादा टिकती हैं।

लेकिन इंसान सब कुछ जल्दी चाहता है।

जल्दी पैसा…
जल्दी सफलता…
जल्दी पहचान…

और इसी जल्दी में वो खुद को खो देता है।

कई बार जिंदगी हमें रोकती भी है। कभी किसी परेशानी के रूप में, कभी किसी हार के रूप में, तो कभी अकेलेपन के रूप में। उस समय हमें लगता है कि सब गलत हो रहा है। लेकिन सच तो यह है कि शायद जिंदगी हमें थोड़ा धीमे चलना सिखा रही होती है।

जब इंसान धीरे चलता है, तभी वो रिश्तों को महसूस करता है।
मां की आवाज में छिपी चिंता समझ आता है।
पिता की खामोशी में छिपा प्यार नजर आता है।
पुरानी यादों की कीमत समझ आती है।

तेज भागती जिंदगी में इंसान सिर्फ मंजिल देखता है।
धीरे चलने पर रास्ते भी खूबसूरत लगने लगते हैं।

कभी गांव की किसी पुरानी गली में धीरे-धीरे चलकर देखो…
किसी पेड़ की छांव में कुछ देर बैठकर देखो…
छत पर जाकर रात के आसमान को बिना मोबाइल के देखो…

दिल खुद कहेगा कि असली सुकून अभी भी छोटी-छोटी चीजों में ही छिपा हुआ है।

जिंदगी सिर्फ बड़े सपनों का नाम नहीं है।
जिंदगी वो भी है —
जब मां बिना कहे पानी का गिलास रख जाती है।
जब पुराना दोस्त अचानक याद कर लेता है।
जब बचपन की कोई खुशबू अचानक दिल को छू जाती है।

इन चीजों को महसूस करने के लिए थोड़ा धीमे चलना पड़ता है।

क्योंकि बहुत तेज भागने वाले लोग अक्सर मंजिल तो पा लेते हैं, लेकिन रास्ते में जिंदगी कहीं पीछे छूट जाती है।



जिंदगी कोई दौड़ नहीं है कि हर समय बस आगे ही भागते रहो। कभी-कभी रुकना, सांस लेना और खुद को महसूस करना भी जरूरी होता है। शायद जिंदगी का असली मतलब भी वहीं छिपा है — थोड़ी सी शांति, थोड़े अपने लोग और कुछ पल, जिन्हें दिल हमेशा याद रखना चाहता है।

Sunday, May 24, 2026

मिट्टी की वो सोंधी खुशबू


बारिश की पहली बूंद जैसे ही सूखी धरती को छूती है, हवा में एक ऐसी खुशबू फैल जाती है जिसे शब्दों में पूरी तरह बयान करना मुश्किल है। वो खुशबू सिर्फ मिट्टी की नहीं होती, वो हमारे बचपन की यादों की होती है, गाँव की गलियों की होती है, कच्चे आंगन की होती है और उन दिनों की होती है जब जिंदगी इतनी भाग-दौड़ वाली नहीं थी।

आज शहरों में रहते हुए जब कभी बारिश होती है, तो सीमेंट और धुएँ की गंध ज्यादा महसूस होती है। लेकिन गाँव की मिट्टी की वो सोंधी खुशबू आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसी हुई है। जैसे ही बारिश शुरू होती थी, हम बच्चे घरों से बाहर निकल आते थे। कच्ची गलियों में पानी बहने लगता था और मिट्टी की वो महक पूरे माहौल को जादुई बना देती थी। ऐसा लगता था जैसे धरती खुद सांस ले रही हो। 


बचपन में उस खुशबू का मतलब सिर्फ बारिश नहीं होता था। उसका मतलब था – स्कूल की छुट्टी, भीगते हुए दौड़ना, पेड़ों के नीचे खड़े होकर बारिश देखना और माँ की आवाज़ सुनना कि “बीमार हो जाओगे, अंदर आ जाओ।” लेकिन उस समय बारिश और मिट्टी का रिश्ता इतना प्यारा लगता था कि डांट भी अच्छी लगती थी।

गाँव के कच्चे घरों में बारिश का अपना ही आनंद था। छत से कहीं-कहीं पानी टपकता रहता था। आंगन में छोटी-छोटी कीचड़ बन जाती थी। कई बार हम उसी कीचड़ में फिसल जाते थे और फिर हँसते-हँसते खुद ही उठ जाते थे। उस समय कपड़े गंदे होने की चिंता नहीं होती थी, मोबाइल खराब होने का डर नहीं होता था, बस बारिश का मज़ा लेना ही सबसे बड़ी खुशी होती थी।

मुझे आज भी याद है, खेतों की तरफ जाते हुए जब हल्की बारिश होती थी, तो मिट्टी की खुशबू और भी गहरी हो जाती थी। दूर-दूर तक फैली हरियाली, बैलों की आवाज़, पेड़ों से गिरती पानी की बूंदें और मिट्टी की महक… ऐसा लगता था जैसे पूरी प्रकृति कोई गीत गा रही हो। शायद इसी वजह से गाँव की यादें कभी पुरानी नहीं होतीं।

आज की पीढ़ी शायद उस एहसास को पूरी तरह समझ भी नहीं पाएगी। अब बच्चों का बचपन मोबाइल की स्क्रीन में कैद होता जा रहा है। उन्हें शायद ये नहीं पता कि बारिश में भीगते हुए मिट्टी की खुशबू महसूस करना कितना बड़ा सुख होता है। वो खुशी किसी महंगे खिलौने या बड़े मॉल में भी नहीं मिल सकती।

समय बदल गया है, लोग बदल गए हैं, लेकिन मिट्टी की वो सोंधी खुशबू आज भी वैसी ही है। जब भी बारिश होती है, वो खुशबू पुराने दिनों का दरवाजा खोल देती है। कुछ पल के लिए लगता है जैसे हम फिर से उसी बचपन में लौट गए हों, जहाँ न कोई चिंता थी और न ही किसी चीज़ की होड़।

शायद जिंदगी की असली खुशी भी यही है — छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाना। बारिश की बूंदों में, मिट्टी की खुशबू में, और उन यादों में जो कभी पुरानी नहीं होतीं।

Saturday, May 23, 2026

मामा के गांव वाली गर्मियों की छुट्टियां

 

बचपन की गर्मियों की छुट्टियां सिर्फ छुट्टियां नहीं होती थीं, वो पूरे साल का सबसे खूबसूरत इंतजार होती थीं। जैसे ही स्कूल बंद होते, मन में बस एक ही बात घूमती थी — “इस बार मामा जी के घर कब जाना है?” पता नहीं ऐसा क्या जादू होता था मामा के गांव में कि बाकी सारी रिश्तेदारियां पीछे छूट जाती थीं। वहां की मिट्टी, आम के पेड़, रात की खुली हवा, और बिना किसी रोक-टोक के खेलना — सब कुछ किसी सपने जैसा लगता था। आज जब जिंदगी भागती रहती है, तब वो धीमे और सुकून भरे दिन बहुत याद आते हैं।


स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही हमारे अंदर जैसे नई जान आ जाती थी। उस समय न मोबाइल थे, न टीवी का ज्यादा शौक। छुट्टियों का मतलब ही होता था — मामा जी के गांव जाना। 


आज सोचता हूं तो समझ नहीं आता कि आखिर मामा जी के घर में ऐसा क्या खास होता था। मासी भी थीं, बुआ भी थीं, और भी रिश्तेदार बुलाते थे। लेकिन मन सिर्फ मामा के गांव जाने के लिए ही मचलता था।

शायद इसलिए क्योंकि वहां आजादी थी…
कोई पढ़ाई की चिंता नहीं, कोई डांट नहीं, बस खेलना, घूमना और खुश रहना।

मामा जी के गांव पहुंचते ही हम सब बच्चे एक टोली बन जाते थे। सबसे मजेदार काम होता था — कच्चे आम तोड़ना।

हम पेड़ों पर चढ़ जाते, डंडों से आम गिराते और फिर उन्हें उठाकर घर ले आते। घर में एक कमरा था जिसमें भूसा भरा रहता था। हम उन कच्चे आमों को भूसे में दबा देते थे। कुछ दिनों बाद वो धीरे-धीरे पक जाते।

असल में पेड़ों पर आम पक ही कहां पाते थे। पकने से पहले ही हम उन्हें तोड़ लाते थे।

गर्मियों की रातें भी किसी जादू से कम नहीं थीं। रात को पूरा परिवार आंगन में चारपाइयां डालकर सोता था। ऊपर खुला आसमान, दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज और हल्की गर्म हवा।

हम बच्चे देर रात तक जागते रहते थे। सबसे ज्यादा मजा आता था जुगनू पकड़ने में। हम इधर-उधर भागकर जुगनू पकड़ते और उन्हें किसी डिब्बे में इकट्ठा कर लेते। जब कई सारे जुगनू एक साथ चमकते थे, तो लगता था जैसे छोटा सा आसमान हमारे हाथ में आ गया हो।

उस समय इतनी समझ कहां थी कि उन्हें पकड़कर रखने से वो मर भी सकते हैं। हम तो बस अपनी छोटी-छोटी खुशियों में खुश रहते थे।

एक बार हमने घर में जिद पकड़ ली कि हमें छुट्टियों में मामा जी के गांव छोड़कर आओ।

मां पहले तो मना करती रहीं, लेकिन आखिर बहुत कहने पर उन्होंने पिताजी को तैयार कर लिया।

उस दिन पिताजी मुझे और मेरी बड़ी बहन को लेकर चल पड़े। मुझे आज भी याद है, मैंने खाकी रंग की पैंट और उसी रंग की कमीज पहनी हुई थी। उस समय वही कपड़े मुझे सबसे अच्छे लगते थे।

मामा जी के गांव का बस अड्डा गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर पड़ता था। वहां से पैदल ही गांव जाना पड़ता था। उस समय आगे जाने के लिए कोई साधन नहीं होता था।

पिताजी ने हमें बस अड्डे पर बैठाया और कहा कि उन्हें शहर से थोड़ा सामान लेना है। तब हमें क्या पता था कि सामान तो बस बहाना था, वो शराब लेने गए थे।

वो हमें वहीं छोड़कर बस से शहर चले गए।

मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा। फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आया। मैं धीरे-धीरे वहां से खिसकने लगा और बहन को वहीं छोड़कर अकेला ही गांव की तरफ चल पड़ा।

मुझे बस इतना पता था कि रास्ता सीधा है।

करीब पंद्रह-बीस मिनट पैदल चलने के बाद मैं गांव पहुंच गया।

घर के बाहर मेरे नाना जी चारपाई पर बैठे थे। मैं उनके पास गया, नमस्ते की और चुपचाप बैठ गया।

लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। उन्हें लगा कि पड़ोस का कोई लड़का होगा।

थोड़ी देर बाद मामी जी आईं। वो मुझे देखकर हैरान हो गईं कि मैं अकेला कैसे पहुंच गया।

उधर पिताजी और बहन मुझे ढूंढते हुए परेशान हो रहे थे। बहन तो रोने लगी थी। उन्हें डर था कि कहीं मैं रास्ता भटक न गया होऊं।

कुछ देर बाद जब वो गांव पहुंचे और मुझे सही सलामत बैठे देखा, तब जाकर उनकी जान में जान आई।

फिर पिताजी ने मुझे खूब डांटा —
“ऐसे अकेले नहीं आते। कोई उठा ले जाता तो?”

उस समय मैं डर तो गया था, लेकिन मन में खुशी भी थी कि मैं खुद अकेला गांव पहुंच गया।

अगले दिन पिताजी हमें छोड़कर वापस घर जाने वाले थे। दिन भर तो हम खेलते रहे, लेकिन जैसे ही अगले दिन वो वापस जाने लगे, मेरा मन घबरा गया।

मैं भागकर उनके पास पहुंच गया और बोला —
“मैं भी आपके साथ जाऊंगा। यहां मेरा मन नहीं लगेगा।”

उन्होंने बहुत समझाया, लेकिन मैं नहीं माना। आखिर मुझे भी अपने साथ वापस ले आए।

घर पहुंचते ही मां ने फिर डांटा —
“बस परेशान करने में लगे रहते हो। आज के बाद छुट्टियों में कहीं नहीं जाना।”

लेकिन सच कहूं, आज उन्हीं डांटों में भी प्यार नजर आता है।

अब जब बचपन की वो छुट्टियां याद आती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा वही था।

ना ज्यादा खिलौने थे, ना पैसे, ना सुविधाएं…
फिर भी खुशियां इतनी थीं कि छोटी-छोटी बातों में पूरा दिन निकल जाता था।

कभी-कभी दिल सच में चाहता है कि वो बचपन फिर लौट आए…
वो आम के पेड़, वो जुगनू, वो चारपाइयां और वो मामा के गांव वाली छुट्टियां।



बचपन की गर्मियों की छुट्टियां सिर्फ बीते हुए दिन नहीं हैं, वो हमारी जिंदगी का सबसे मासूम और सुकून भरा हिस्सा हैं। समय भले आगे बढ़ गया हो, लेकिन दिल आज भी कहीं न कहीं उन्हीं गलियों, उन्हीं पेड़ों और उन्हीं रिश्तों में अटका हुआ है। शायद इसलिए बचपन हमेशा सबसे खूबसूरत लगता है।

Friday, May 22, 2026

जब मेहमान कई-कई दिन ठहरते थे

एक समय ऐसा भी था जब मेहमान सिर्फ घर आने वाले लोग नहीं होते थे, बल्कि पूरे घर की रौनक बन जाते थे। उनके आने से घर का माहौल बदल जाता था। आंगन में हंसी गूंजने लगती थी, रसोई में चहल-पहल बढ़ जाती थी और बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठते थे। उस दौर में रिश्तों में अपनापन ज्यादा था और समय की भागदौड़ कम। लोग मिलने के लिए समय निकालते थे, और मेहमान भी एक-दो घंटे नहीं, बल्कि कई-कई दिन रहकर जाते थे। आज जब जिंदगी तेज हो गई है, तब वो पुराने दिनों वाली मेहमाननवाज़ी और अपनापन बहुत याद आता है।


गांव के दिनों में मेहमानों का आना किसी छोटे त्योहार से कम नहीं होता था। उस समय न मोबाइल थे, न पहले से कोई सूचना मिलती थी। बस अचानक कोई रिश्तेदार दरवाजे पर खड़ा दिखाई देता और घर में खुशी फैल जाती।

मां तुरंत समझ जाती थीं कि अब घर में खास इंतजाम करने होंगे। वो चुपके से हमें कुछ पैसे पकड़ा देतीं और धीरे से कहतीं — 



“जल्दी से दुकान से नमकीन और बिस्कुट ले आना… और ध्यान रहे, मेहमान को पता नहीं चलना चाहिए कि अभी-अभी लाए हैं।”

बस फिर क्या था, हम भी पूरे जोश में गांव की दुकान की तरफ दौड़ पड़ते थे। रास्ते भर मन में खुशी होती थी। एक तो मेहमान आए हैं, ऊपर से नमकीन और बिस्कुट भी घर में आएंगे।

लेकिन असली मजा तब होता था जब हम सामान छुपाकर घर लाते थे। ऐसा लगता था जैसे कोई बहुत बड़ा मिशन पूरा कर रहे हों। मन में ये उम्मीद भी रहती थी कि जब मेहमान खाकर थोड़ा छोड़ देंगे, तो बाकी हमें खाने को मिलेगा।

उस समय मेहमान सिर्फ एक कमरे में बैठकर मोबाइल नहीं चलाते थे। उनके आने पर पूरा परिवार एक साथ बैठता था। रात को आंगन में चारपाइयां डाल दी जाती थीं। गर्मियों की हल्की हवा चलती रहती और देर रात तक बातें होती रहतीं।

सबसे ज्यादा इंतजार मुझे नाना जी के आने का रहता था।

जब वो आते थे, तो घर का माहौल ही बदल जाता था। हमारे ताया जी, चाचा जी और पिता जी सभी उनके पास बैठ जाते थे। फिर शुरू होती थीं पुरानी यादों की बातें।

मुझे बचपन से ही पुराने किस्से सुनना बहुत अच्छा लगता था। नाना जी बताते थे कि उनके समय में लोग बैलों से खेती करते थे। खेतों तक जाने के लिए कच्चे रास्ते होते थे। रिश्तेदारी में लोग कई-कई किलोमीटर पैदल ही चले जाते थे। उस समय सफर कठिन था, लेकिन रिश्ते मजबूत थे।

मैं उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनता रहता था। ऐसा लगता था जैसे उनकी कहानियों के साथ मैं भी उस पुराने समय में पहुंच गया हूं।

मुझे आज भी वो दिन याद है जब नाना जी हमारे घर आए हुए थे और उसी समय हमारे घर में पहली बार टेलीविजन आया था। हमारे आसपास के घरों में सबसे पहले टीवी हमारे घर में ही आया था।

वो टेक्सला का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था।

उस दिन टीवी पर “महाराणा प्रताप” का धारावाहिक आ रहा था। गांव के बच्चे और बड़े सभी हमारे घर में इकट्ठा हो गए थे। कोई जमीन पर बैठा था, कोई चारपाई पर। सबकी नजरें टीवी पर टिकी थीं।

नाना जी भी बड़े ध्यान से टीवी देख रहे थे। उस समय टीवी सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि पूरे गांव के लिए एक नया अनुभव था।

उस दौर में मेहमान कई-कई दिन रहकर जाते थे। किसी को जल्दी वापस जाने की चिंता नहीं होती थी। लोग समय लेकर आते थे और दिल भरकर मिलते थे।

कई बार तो हमें खुद इंतजार रहता था कि अब कब कोई मेहमान आएगा। क्योंकि उनके आने से घर में अलग ही रौनक हो जाती थी।

और जब हम खुद किसी रिश्तेदारी में मेहमान बनकर जाते थे, तो ऐसा महसूस होता था जैसे हम बहुत खास हैं। लोग बड़े प्यार से सेवा करते थे। खाने-पीने से लेकर सोने तक हर छोटी बात का ध्यान रखा जाता था।

आज समय बदल गया है।

अब घरों में पहले से ज्यादा सामान है, सुविधाएं हैं, लेकिन वो अपनापन कहीं कम हो गया है। लोग मिलने से पहले फोन करते हैं, आने से पहले समय देखते हैं, और आने के बाद जल्दी लौटने की चिंता भी बनी रहती है।

अब ना वो आंगन रहे, ना चारपाइयों वाली रातें, ना देर रात तक चलने वाली बातें।

कभी-कभी मन करता है कि जिंदगी फिर से थोड़ी धीमी हो जाए…
और कोई रिश्तेदार अचानक दरवाजे पर आकर कहे —
“सोचा तुम लोगों से मिलते चलें।”



पुराने समय में मेहमान सिर्फ रिश्तेदार नहीं होते थे, वो खुशियां लेकर आते थे। उनके साथ बिताया गया समय आज भी यादों में वैसे ही ताजा है। शायद जिंदगी की असली गर्माहट उन्हीं रिश्तों और उन्हीं बैठकों में छिपी थी, जो आज धीरे-धीरे कहीं खोती जा रही हैं।

Thursday, May 21, 2026

मां की मार से बड़ा कोई डर नहीं था

 बचपन में कई बार हम ऐसी हरकतें कर जाते हैं, जिन्हें उस समय खेल या मज़ाक समझते हैं, लेकिन बाद में सोचकर खुद ही डर जाते हैं। उस उम्र में ना खतरे का अंदाज़ा होता था और ना ही अंजाम का। बस मन में जो आया, वही कर दिया। गांव का बचपन तो वैसे भी शरारतों, डर, डांट और मासूमियत से भरा होता था। आज जब उन पुरानी घटनाओं को याद करता हूं, तो हंसी भी आती है और यह सोचकर डर भी लगता है कि अगर उस दिन कुछ गलत हो जाता, तो शायद कहानी कुछ और ही होती।


एक बार हमारे घर मेहमान आए हुए थे। गांव में जब भी मेहमान आते थे, घर में अचानक हलचल बढ़ जाती थी। कभी चाय बन रही है, कभी खाना तैयार हो रहा है, और बीच-बीच में बच्चों को दुकान की तरफ दौड़ाया जाता था।

उस दिन माता जी ने मुझे और मेरी बड़ी बहन ममता को दुकान से कुछ सामान लाने भेजा। जाते समय हमेशा की तरह एक खास हिदायत जरूर दी गई — 



“जल्दी आना… और सामान छुपाकर लाना।”

उस समय गांवों में ऐसा ही होता था। अगर कोई देख ले कि घर में मेहमान आए हैं और क्या-क्या सामान जा रहा है, तो अगले दिन आधे गांव को खबर हो जाती थी।

हम दोनों गांव की रामदिये की दुकान की तरफ चल पड़े।

रास्ते में गांव का बड़ा जोहड़ पड़ता था। वो इतना बड़ा और गहरा था कि बच्चों को उसके पास अकेले जाने से भी रोका जाता था। बरसात के दिनों में तो उसका पानी और भी डरावना लगता था। किनारों पर घास उगी रहती थी और जगह-जगह छोटे मेंढक बैठे रहते थे।

जब हम जोहड़ के पास पहुंचे, तो पता नहीं मेरे मन में क्या शरारत सूझी। मैंने बहन ममता से कहा —
“देख, मैं तुम्हें एक जादू दिखाता हूं।”

वो उत्सुक होकर देखने लगी।

मैं जोहड़ के किनारे खड़ा हुआ और पैर हिलाने लगा। जैसे ही मैंने पैर मारा, किनारे पर बैठे ढेर सारे छोटे-छोटे मेंढक पानी में कूद गए। मुझे बहुत मजा आया।

लेकिन उसी समय मेरी एक चप्पल भी पैर से निकलकर सीधे पानी में जा गिरी।

पहले तो मैं कुछ पल उसे देखता रहा। फिर अचानक याद आया —
“अगर चप्पल खो गई, तो घर जाकर बहुत मार पड़ेगी।”

उस समय चप्पल खो जाना कोई छोटी बात नहीं होती थी। नई चप्पल आसानी से नहीं मिलती थी।

बस फिर क्या था, बिना ज्यादा सोचे मैं सीधे जोहड़ में उतर गया।

शुरू में पानी घुटनों तक था, फिर कमर तक पहुंच गया। मैं धीरे-धीरे चप्पल की तरफ बढ़ता रहा। लेकिन थोड़ी दूर जाते ही मेरे पैरों ने जमीन छोड़ दी।

अचानक मैं पानी में ऊपर-नीचे होने लगा।

मेरी ठोड़ी तक पानी आ चुका था।

बाहर खड़ी ममता जोर-जोर से रोने लगी। वो डर गई थी। शायद उसे लगा कि मैं डूब जाऊंगा।

मैं खुद भी डर गया था, लेकिन उस समय मन में बस एक ही बात थी —
“चप्पल लेकर ही बाहर जाना है।”

मैंने किसी तरह हाथ बढ़ाकर तैरती हुई चप्पल पकड़ ली और वापस किनारे की तरफ आने लगा।

लेकिन जैसे ही किनारे के पास पहुंचा, मेरे दूसरे पैर की चप्पल भी निकलकर पानी में तैरने लगी।

अब तो हालत और खराब हो गई।

मन में आया कि कम से कम एक चप्पल तो बाहर निकाल लेता, लेकिन उस समय इतनी समझ कहां थी।

अब दूसरी चप्पल के लिए फिर पानी में उतरना पड़ा।

ममता बाहर से डांट भी रही थी और रो भी रही थी —
“मत जा दोबारा… बाहर आ जा।”

लेकिन मुझे तो घर की पिटाई ज्यादा बड़ी लग रही थी।

मैं फिर पानी में उतर गया। इस बार और ज्यादा डर लग रहा था। नीचे पैर नहीं लग रहे थे। ऊपर से जोहड़ में समुंद्रशोक और घास बहुत थी। मन में बार-बार सांप का डर भी आ रहा था। गांव में लोग कहते थे कि ऐसे जोहड़ों में सांप जरूर होते हैं।

लेकिन बचपन का डर भी अजीब होता है। मौत का डर कम और मां की मार का डर ज्यादा लगता था।

आखिर काफी कोशिश के बाद दूसरी चप्पल भी मिल गई।

जब बाहर निकला तो मेरे सारे कपड़े भीग चुके थे। मैं पूरा कांप रहा था।

मैंने ममता से कहा —
“तू दुकान से सामान ले आ। तब तक मैं धूप में खड़ा होकर कपड़े सुखा लेता हूं।”

वो दुकान की तरफ चली गई और मैं वहीं धूप में खड़ा होकर अपने कपड़े सुखाने लगा।

थोड़ी देर बाद वो सामान लेकर आ गई और हम दोनों घर की तरफ चल पड़े।

लेकिन रास्ते भर मेरे मन में एक ही डर था —
“अगर मां को पता चल गया तो क्या होगा?”

और वही हुआ।

घर पहुंचते ही किसी तरह पूरी बात मां तक पहुंच गई।

उस दिन जितनी पिटाई हुई, उतनी शायद चप्पल खो जाने पर भी नहीं होती।

लेकिन आज जब उस घटना को याद करता हूं, तो समझ आता है कि मां की मार में गुस्से से ज्यादा डर और चिंता छिपी हुई थी।

आज वो पुराना जोहड़ भी नहीं रहा। उसे भरकर वहां वृद्धाश्रम और आंगनवाड़ी बना दी गई है।

समय बदल गया, जगहें बदल गईं, लेकिन बचपन की वो भीगी हुई चप्पलें और मां की डांट आज भी यादों में वैसी ही ताजा हैं।

बचपन की गलतियां उस समय भले ही छोटी शरारत लगती थीं, लेकिन आज सोचो तो एहसास होता है कि हम कितनी मासूमियत और नासमझी में जी रहे थे। शायद यही वजह है कि बचपन की हर छोटी घटना भी आज एक बड़ी कहानी बनकर दिल में बस जाती है।

Wednesday, May 20, 2026

बचपन की वो चवन्नी और मासूम खुशियां

 बचपन की दुनिया कितनी अलग होती थी। ना भविष्य की चिंता, ना जिम्मेदारियों का बोझ। जो मन में आया, वही कर दिया। उस समय न सही-गलत का ज्यादा हिसाब होता था और न ही ये समझ कि हमारे किसी काम से किसी और को दुख भी हो सकता है। शायद इसी मासूमियत की वजह से बचपन इतना खूबसूरत लगता है। आज जब जिंदगी हर बात को सोचने और समझने में निकल जाती है, तब वो पुराने दिन और भी ज्यादा याद आते हैं।


ये उन दिनों की बात है जब गांव की गलियां ही हमारी दुनिया हुआ करती थीं। स्कूल से आते ही हम सब लड़के बाहर निकल जाते और कभी खेतों में, कभी चौपाल में, तो कभी गांव के पुराने कुएं के पास खेलते रहते। 


उस समय गांव का कुआं सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं था, बल्कि गांव की यादों और मान्यताओं का हिस्सा भी था। लोग उसे सम्मान देते थे। कई बार वहां पूजा भी होती थी। आज तो उस कुएं को लोहे के जाल से ढक दिया गया है। अब कोई वहां पानी भरने नहीं जाता। वैसे भी आजकल गांवों में पुराने कुएं लगभग खत्म ही हो चुके हैं।

उस दिन मैं, दर्शन, उसका छोटा भाई पवन, छज्जू और मोहल्ले के कुछ दूसरे लड़के कुएं के पास खेल रहे थे। खेलते-खेलते बातों का विषय अचानक पूजा और दान पर आ गया।

तभी किसी लड़के ने मजाक-मजाक में कहा —
“कुएं में दान करना चाहिए, आशीर्वाद मिलता है।”

पवन के हाथ में उस समय एक अठन्नी थी। शायद उसी को देखकर सबने कहना शुरू कर दिया —
“चल, इसमें से कुछ पैसे कुएं में डाल दे। पुण्य मिलेगा।”

पवन शायद अपने पैसे खर्च नहीं करना चाहता था। वो बस मुस्कुरा रहा था और टालने की कोशिश कर रहा था।

लेकिन उस समय मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था।

मैंने अचानक उसके हाथ से अठन्नी छीनी और सीधा गांव की रामदिये की दुकान की तरफ भाग गया। दुकान पर जाकर कहा —
“इस अठन्नी के खुले पैसे दे दो।”

रामदिये ने मुझे दो चवन्नियां दे दीं।

मैं बड़ी शान से वापस आया और पवन के हाथ में एक चवन्नी रखते हुए बोला —
“देख, मैंने पैसे खुलवा दिए। अब दान कर दे।”

लेकिन वो फिर भी दान करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

तभी मैंने दूसरी चवन्नी अपने हाथ में ली, और बिना उसे कुछ समझने का मौका दिए सीधे कुएं में फेंक दी। फिर दोनों हाथ जोड़कर माथा टेक लिया।

मुझे लगा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा पुण्य कर दिया हो।

इससे पहले कि पवन कुछ बोलता या मेरे पीछे भागता, मैं वहां से दौड़ गया।

भागते हुए भी मेरे चेहरे पर खुशी थी। मन में यही चल रहा था कि —
“दान तो हो गया। चाहे पैसे पवन के थे, लेकिन आशीर्वाद का थोड़ा हिस्सा तो मुझे भी मिलेगा।”

आज जब उस घटना को याद करता हूं, तो खुद पर हंसी भी आती है। उस समय बचपन इतना सीधा था कि हमें लगता था भगवान भी शायद इसी तरह खुश हो जाते होंगे।

न कोई चालाकी थी, न ज्यादा समझदारी। बस मन जैसा कहता था, वैसा कर देते थे। शायद इसी वजह से जिंदगी हल्की लगती थी।

आज हर काम करने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। क्या सही है, क्या गलत, कौन क्या सोचेगा, किसे बुरा लगेगा। दिमाग हर समय चलता रहता है।

लेकिन बचपन में दिमाग कम और दिल ज्यादा चलता था।

और शायद इसी कारण वो छोटी छोटी बातें भी आज इतनी बड़ी याद बन गई हैं।

कभी-कभी मन करता है कि जिंदगी फिर से वैसी ही हो जाए —
जहां एक चवन्नी दान करने भर से लगता था कि भगवान खुश हो गए होंगे, और हम पूरे दिन उसी खुशी में घूमते रहते थे।



बचपन की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि वहां खुशियां बहुत छोटी छोटी चीजों में मिल जाती थीं। ना पैसों का हिसाब, ना दुनियादारी की समझ। बस एक मासूम दिल और ढेर सारी सच्ची खुशियां। आज जिंदगी भले ही आसान दिखती हो, लेकिन बचपन जैसी सुकून भरी मुस्कान शायद कहीं पीछे छूट गई है।

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