बचपन की यादें भी कितनी अजीब होती हैं। समय चाहे कितना भी आगे निकल जाए, लेकिन गांव की मिट्टी, बारिश की खुशबू और गर्मियों की वो शरारतें कभी दिल से दूर नहीं जातीं। आज शहरों की भागदौड़ में रहते हुए जब कभी बारिश की बूंदें गिरती हैं, तो मन अचानक उन्हीं पुराने दिनों में पहुंच जाता है, जब जिंदगी बहुत छोटी-छोटी खुशियों में सिमटी होती थी। ना किसी बात की चिंता, ना भविष्य की फिक्र। बस खेलना, घूमना और हर मौसम को खुलकर जीना।
गर्मियों के दिन शुरू होते ही गांव की जिंदगी जैसे बदल जाती थी। दोपहर की तेज धूप में खेतों की मिट्टी से गर्म हवा उठती थी, लेकिन हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। सुबह होते ही दोस्तों के साथ खेतों की तरफ निकल जाते थे। दूर-दूर तक फैले हरे खेत, कच्ची पगडंडियां और पेड़ों पर लगे अमरूद जैसे हमें अपनी तरफ बुलाते रहते थे।
बरसात का मौसम तो जैसे हमारे बचपन का सबसे प्यारा मौसम हुआ करता था। जैसे ही बादल घिरते, मन अपने आप खुश हो जाता था। बारिश शुरू होते ही हम खेतों की तरफ भाग जाते। कई बार तो बिना किसी को बताए अमरूद तोड़ने निकल जाते थे। खेतों में लगे पेड़ों पर चढ़ना, कच्चे-पक्के अमरूद तोड़ना और वहीं बैठकर नमक लगाकर खाना — उस स्वाद का मुकाबला शायद आज की कोई चीज नहीं कर सकती।
बारिश में खेतों की मेड़ों पर चलना भी किसी रोमांच से कम नहीं होता था। मिट्टी इतनी फिसलन भरी हो जाती थी कि हर दो कदम बाद कोई ना कोई फिसल ही जाता था। कई बार तो हम जानबूझकर कीचड़ में फिसलते थे और फिर एक-दूसरे को देखकर खूब हंसते थे। कपड़े मिट्टी से भर जाते थे, लेकिन उस समय ना डांट की चिंता होती थी और ना गंदे कपड़ों की।
गांव का जोहड़ भी हमारे बचपन का सबसे बड़ा खेल का मैदान था। गर्मियों की दोपहर में जब भैंसों को नहलाने ले जाया जाता, तो हम भी उनके साथ पानी में उतर जाते थे। भैंसें आराम से पानी में बैठ जाती थीं और हम उनके ऊपर चढ़कर खेलते रहते थे।
सबसे ज्यादा मजा तब आता था जब हम भैंस की पूंछ पकड़कर पानी में आगे तक चले जाते थे। हमें लगता था जैसे कोई नाव हमें खींचकर ले जा रही हो। कई बार डर भी लगता था कि कहीं गहरे पानी में ना चले जाएं, लेकिन बचपन में डर भी ज्यादा देर टिकता नहीं था।
पानी में घंटों नहाते रहते थे। कभी एक-दूसरे पर पानी फेंकते, कभी जोहड़ में छलांग लगाते। घर से आवाजें भी आती रहती थीं कि बाहर निकलो, बीमार पड़ जाओगे, लेकिन उस समय कौन सुनता था।
बरसात के बाद खेतों की मिट्टी से जो सोंधी-सोंधी खुशबू आती थी, वो आज भी याद है। ऐसा लगता था जैसे पूरी धरती ने ठंडी सांस ली हो। शाम को जब घर लौटते थे, तो कपड़े मिट्टी और पानी से भरे होते थे। कई बार डांट भी पड़ती थी, लेकिन अगले दिन फिर वही शरारतें शुरू हो जाती थीं।
उस समय जिंदगी कितनी आसान थी। छोटी-छोटी चीजों में ही खुशी मिल जाती थी। ना मोबाइल थे, ना इंटरनेट, ना किसी चीज की जल्दी। बस दोस्त थे, खेत थे, बारिश थी और खुला आसमान था।
आज गांव भी बदल गए हैं। जोहड़ छोटे हो गए हैं, खेतों में पहले जैसी रौनक नहीं रही और बच्चों के खेल भी बदल गए हैं। अब शायद ही कोई बच्चा बारिश में भीगने या भैंस की पूंछ पकड़कर तैरने का मजा जानता हो।
लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूं, मन के किसी कोने में वही बचपन फिर से जाग उठता है। ऐसा लगता है जैसे आज भी कहीं खेतों की मेड़ पर बारिश हो रही है, और हम मिट्टी में फिसलते हुए हंस रहे हैं।
बचपन के वो दिन शायद कभी वापस नहीं आ सकते, लेकिन उनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहती हैं। जिंदगी चाहे कितनी भी बदल जाए, गांव की बारिश, खेतों की मिट्टी और जोहड़ का पानी हमेशा दिल में एक अलग ही सुकून छोड़ जाते हैं। शायद असली खुशी भी वही थी, जब जिंदगी बहुत छोटी थी और खुशियां बहुत बड़ी।



No comments:
Post a Comment