Friday, October 31, 2025

गाँव के जोगी – फरिश्ते से कम नहीं होते 'झोलाछाप' डॉक्टर

 भारत के गाँवों में अगर किसी की तबियत रात के समय अचानक बिगड़ जाए, तो सबसे पहले जो नाम याद आता है, वो किसी बड़े अस्पताल या एम.बी.बी.एस. डॉक्टर का नहीं, बल्कि उसी "झोलाछाप डॉक्टर" का होता है, जिसे शहर के लोग मज़ाक में “नकली डॉक्टर” कह देते हैं। पर सच्चाई ये है कि जब सुविधाएँ दूर होती हैं और वक्त कम, तब यही झोलाछाप डॉक्टर किसी फरिश्ते से कम साबित नहीं होते। 



गाँव की सच्चाई – जहाँ अस्पताल दूर हैं, सड़कें टूटी हैं

गाँव का जीवन शहर जैसा आसान नहीं होता। न वहाँ हर गली में अस्पताल हैं, न हर कोने पर दवाइयों की दुकान। कई गाँव ऐसे हैं जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) 10–15 किलोमीटर दूर होते हैं। ऊपर से वहाँ डॉक्टर का मिलना भी किसी किस्मत से कम नहीं।

ऐसे में जब किसी किसान के बच्चे को बुखार हो जाए, या किसी महिला को पेट दर्द या चोट लग जाए, तो गाँव का आदमी सबसे पहले भागता है — अपने इलाके के “रामलाल डॉक्टर” या “मुकुंद दाई” के पास। ये वही झोलाछाप डॉक्टर हैं जो थोड़ी बहुत दवा और अनुभव के सहारे गाँव के लोगों की जान बचाते हैं।


एक सच्ची कहानी – रात के अंधेरे में उम्मीद की लौ

मेरे गाँव की एक घटना आज भी याद है। बरसात की रात थी, बिजली कड़क रही थी और चारों ओर कीचड़ ही कीचड़। अचानक गाँव के हरि चाचा की बहू की तबियत बिगड़ गई। पेट दर्द असहनीय था।
कोई एंबुलेंस उस रात आ नहीं सकती थी, और पास का अस्पताल 12 किलोमीटर दूर था।

तब गाँव का रामलाल डॉक्टर आया — वही, जिसे सब “झोलाछाप” कहते थे। पुराने बैग में उसने कुछ दवाइयाँ और इंजेक्शन रखे थे। उसने नाड़ी देखी, दर्द का इंजेक्शन दिया, और कुछ घंटों तक वहीं बैठा रहा। धीरे-धीरे तबियत सुधरी और सुबह होते-होते खतरा टल गया।

उस रात अगर रामलाल डॉक्टर न होता, तो शायद हालात कुछ और होते।
कहने को वो “क्वालीफाइड” डॉक्टर नहीं था, लेकिन अनुभव और इंसानियत दोनों में वो कई पढ़े-लिखों से आगे था।


झोलाछाप डॉक्टर क्यों ज़रूरी हैं गाँवों के लिए

  1. पहुँच और उपलब्धता – ये डॉक्टर गाँव के हर कोने में मिल जाते हैं। ज़रूरत पड़ते ही आ जाते हैं, चाहे आधी रात हो या तेज़ बारिश।

  2. कम खर्च में इलाज – जहाँ शहरों में डॉक्टर की फीस सैकड़ों में होती है, वहीं झोलाछाप डॉक्टर 20–50 रुपये में इलाज कर देते हैं।

  3. अनुभव से सीखा इलाज – ये लोग अपने अनुभव और पुराने डॉक्टरों की संगत से बहुत कुछ सीख जाते हैं। छोटे-मोटे बुखार, खाँसी, चोट, या डायरिया जैसे मामलों में इन्हें अच्छी जानकारी होती है।

  4. मानवीय संबंध – ये गाँव वालों के अपने होते हैं। वे सिर्फ मरीज नहीं देखते, उनके हाल भी पूछते हैं, उनकी मुश्किल समझते हैं।


गलतियाँ और जोखिम – सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता

अब ये भी सच है कि हर झोलाछाप डॉक्टर अच्छा नहीं होता।
कुछ लोग बिना ज्ञान के इंजेक्शन लगा देते हैं या गलत दवाइयाँ दे देते हैं, जिससे नुकसान हो सकता है।
इसलिए ज़रूरी है कि सरकार ऐसे लोगों को खत्म करने के बजाय प्रशिक्षित करे, ताकि वो सही दवाइयों और उपचार का उपयोग करें।


सरकारी व्यवस्था और हकीकत का अंतर

सरकार कहती है कि गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन क्या वो वास्तव में काम कर रहे हैं?
कई जगह डॉक्टर हफ्तों तक नहीं आते, दवाइयाँ खत्म रहती हैं, और बिजली-पानी की व्यवस्था भी नहीं होती।
तब गाँव का गरीब किसान कहाँ जाए?
उसके लिए झोलाछाप डॉक्टर ही “पहला और आख़िरी सहारा” है।


एक और उदाहरण – इंसानियत की मिसाल

बिहार के एक छोटे से गाँव में रहने वाले “डॉ. हरीश” (जो असल में नर्सिंग कंपाउंडर थे) ने कोरोना महामारी के दौरान सैकड़ों लोगों का मुफ्त इलाज किया।
दवा दी, आइसोलेशन में मदद की, और ऑक्सीजन की कमी के बावजूद दर्जनों लोगों की जान बचाई।
सरकार ने कभी उन्हें सम्मान नहीं दिया, पर गाँव वाले आज भी उन्हें “देवता” कहते हैं।


झोलाछाप नहीं, ‘जनसेवक डॉक्टर’ कहिए

हम शहर से बैठे लोग सिर्फ डिग्री और प्रमाणपत्र देखते हैं, पर गाँव वाले दिल से देखते हैं।
उनके लिए “रामलाल डॉक्टर” या “हरीश भैया” वो लोग हैं जिन्होंने मुश्किल समय में हाथ थामा।
हमें इन लोगों को “नकली डॉक्टर” नहीं, बल्कि “जनसेवक” कहना चाहिए।

अगर सरकार चाहे तो इन्हें प्रशिक्षण देकर “ग्रामीण स्वास्थ्य सहायक” बना सकती है।
इससे एक तरफ गाँवों में स्वास्थ्य सेवाएँ बढ़ेंगी, दूसरी ओर गलत इलाज का खतरा भी कम होगा।


गाँवों के ये झोलाछाप डॉक्टर, असल में वो दीपक हैं जो अंधेरे में भी जलते रहते हैं।

शहरों में लोग चाहे इन्हें हँसी में उड़ा दें, पर गाँव में इनके बिना ज़िंदगी अधूरी है।


क्या आपने भी कभी किसी झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करवाया है?

शायद आपको भी याद होगा वो एक चेहरा — जिसने बिना डिग्री के, पर पूरी सच्चाई से आपकी जान बचाई हो।


झोलाछाप डॉक्टर भले ही किताबों में “गलत” कहलाएँ, लेकिन हकीकत में वो कई बार “भगवान” साबित होते हैं।
क्योंकि जब दूर तक कोई और नज़र नहीं आता — तब यही लोग उम्मीद की आख़िरी किरण बन जाते हैं।

Thursday, October 30, 2025

इंसान बनो तो ऐसा

आज की दुनिया में इंसान होने का मतलब सिर्फ शारीरिक रूप से जिंदा होना नहीं रह गया है। असली इंसान वही है, जो अपने जीवन में कुछ मूल्य और आदर्श लेकर चलता है। सोचिए, अगर हर इंसान में ये पांच गुण हों – जेब में पैसा, दिमाग में ज्ञान, दिल में दया, चेहरे पर आत्मविश्वास और आत्मा में जिम्मेदारी – तो दुनिया कितनी बेहतर होती! 


 जेब में पैसा – आत्मनिर्भरता का प्रतीक
पैसा जीवन में सुविधाएँ देता है, लेकिन केवल पैसा होना ही इंसान को महान नहीं बनाता। जेब में पैसा होना इस बात का संकेत है कि इंसान अपने और अपने परिवार के लिए जिम्मेदार है। इससे वह दूसरों पर निर्भर नहीं रहता और जरूरत पड़ने पर समाज के लिए भी मदद कर सकता है। मगर ध्यान रहे, पैसा संग्रह करना उद्देश्य नहीं, बल्कि साधन होना चाहिए।

 दिमाग में ज्ञान – सोच और समझ की शक्ति
ज्ञान सबसे बड़ी पूँजी है। इंसान वही सफल होता है, जो अपने दिमाग का इस्तेमाल सही दिशा में करता है। ज्ञान न केवल किताबों से आता है, बल्कि अनुभव, पर्यावरण और लोगों से मिलने-जुलने से भी मिलता है। दिमाग में ज्ञान होने से इंसान निर्णय लेने में समझदार बनता है, समस्याओं का हल निकाल पाता है और दूसरों को भी मार्गदर्शन दे सकता है।

 दिल में दया – सहानुभूति और मानवता
दया इंसानियत की पहचान है। अगर दिल में दया नहीं होगी, तो इंसान सिर्फ एक मशीन बनकर रह जाएगा। दूसरों की तकलीफ को महसूस करना, जरूरतमंद की मदद करना और समाज में सकारात्मक बदलाव लाना, यही असली मानवता है। दया का मतलब कमजोर होना नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति संवेदनशील और मददगार होना है।

 चेहरे पर आत्मविश्वास – व्यक्तित्व की चमक
आत्मविश्वास वह शक्ति है जो इंसान को अपने लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करती है। बिना आत्मविश्वास के ज्ञान और पैसा भी अपने सही इस्तेमाल में नहीं आ पाते। आत्मविश्वासी इंसान दूसरों के सामने अपनी बात रखने में सक्षम होता है, अपने निर्णयों पर कायम रहता है और मुश्किल परिस्थितियों में डगमगाता नहीं। यह न सिर्फ उसकी सफलता की कुंजी है, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बनता है।

 आत्मा में जिम्मेदारी – जीवन का नैतिक आधार
सबसे महत्वपूर्ण गुण है जिम्मेदारी। इंसान अपने कर्मों के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए – चाहे वह अपने परिवार के प्रति हो, समाज के प्रति हो या पर्यावरण के प्रति। जिम्मेदारी वह शक्ति है जो इंसान को सही और गलत में अंतर समझाती है, और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित करती है। आत्मा में जिम्मेदारी होने से इंसान जीवन में स्थिरता और संतुलन बनाए रख सकता है।

असल में इंसान वही है, जो अपने जीवन में इन पांच गुणों का संतुलन बनाए रखता है – पैसा, ज्ञान, दया, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी। ये गुण न केवल उसे व्यक्तिगत रूप से सफल बनाते हैं, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक बदलाव लाते हैं। इसलिए खुद को विकसित करें, इन गुणों को अपनाएं और एक ऐसा इंसान बनें, जिसे देखकर लोग न केवल प्रेरित हों, बल्कि जिनसे सीखने की चाहत रखें।

याद रखिए: इंसान वही नहीं जो बड़ा घर, महंगी कार या ऊँची नौकरी रखता है, बल्कि इंसान वही है, जो अपने अंदर के गुणों से दूसरों के जीवन में उजाला भरता है।

Wednesday, October 29, 2025

सड़क किनारे जामुन के पेड़

गर्मियों की छुट्टियों का वो दिन आज भी दिल में ताज़ा है। गाँव की वो लंबी, धूल भरी कच्ची सड़क — जिसके दोनों ओर कतार में लगे जामुन के पेड़ जैसे हमें पुकारते थे — “आओ, फिर से वही बचपन जी लो।” 


हम चार-पाँच दोस्त सुबह-सुबह निकल पड़ते थे। जेब में नमक-मिर्च की छोटी सी पुड़िया, एक झोला, सिर पर टोपी और दिल में उत्साह। गर्मी जरूर थी, लेकिन जामुन का लालच उससे कहीं ज़्यादा मीठा था।

जैसे ही हम पहले पेड़ के नीचे पहुँचे, देखा कि काले-नीले जामुन ज़मीन पर बिखरे पड़े थे — कुछ ऐसे जैसे पेड़ ने खुद हमारे लिए तोड़कर फेंके हों।

"चलो जल्दी उठाओ, इससे पहले कोई और आ जाए!" मैंने आवाज़ लगाई, और फिर सब टूट पड़े। कोई झोले में डाल रहा था, कोई सीधे खा रहा था, कोई बीज फेंकते हुए हँस रहा था।

कुछ जामुन ऊपर शाखों पर झूम रहे थे, तो मेरे दोस्त मुनिया ने कहा —
“अरे मुनिया, तू चढ़ जा पेड़ पर! हम नीचे पकड़ लेंगे।”

वो फुर्ती से ऊपर चढ़ गया। पत्तों की सरसराहट और उसकी हरकतों से जामुन झरने लगे — और हमारे बीच गूंज उठी बचपन की ठहाकेदार हँसी।

तभी अचानक पीछे से आवाज़ आई —
“अबे ओ लड़को! नीचे आओ, ये सरकारी पेड़ हैं!”

हम सब चौकन्ने होकर एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। फिर देखा — वो तो गाँव का ही हरिया था, जो हँसते हुए हमें छेड़ रहा था।

हमने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया —
“सरकारी पेड़ हैं, पर जामुन तो जनता की मिठास है!”

सभी जोर से हँस पड़े।
थोड़ी देर में हमारी जीभ नीली पड़ गई थी, और हथेलियाँ चिपचिपी। पर क्या मज़ा आया था उस चोरी में!

वापसी में गाँव के नल पर पहुँचकर हमने हाथ-मुँह धोए, और फिर पेड़ों की छाँव में बैठकर नमक-मिर्च छिड़क कर बचे हुए जामुन खाए। हर जामुन के साथ जैसे एक याद भी जी ली हो — बचपन की, दोस्तों की, उस बेफिक्र हँसी की।

वो दिन, वो दोस्त, वो सादगी — आज सोचकर भी चेहरा मुस्करा उठता है।
अब जब कभी सड़क किनारे किसी जामुन के पेड़ को देखता हूँ, तो लगता है जैसे वो पेड़ मुझसे कह रहा हो —
“तेरा बचपन आज भी मेरी शाखों में लटका है…”


क्या आपने भी कभी सड़क किनारे पेड़ों से जामुन तोड़े हैं?
तो जरूर बताइए — कौन-सी याद आज भी आपके साथ चल रही है?


वो जामुन सिर्फ फल नहीं थे, वो हमारे बचपन की मिठास थे — जो अब हर गर्मियों में दिल के किसी कोने में फिर से पकने लगती है।

Tuesday, October 28, 2025

आज मेरी बाइक ने नहाया — और शहर में तहलका मचा दिया!”

(लेखक:  Suresh Kumar)


सुबह-सुबह जैसे ही आँगन में कदम रखा, मेरी नजर अपनी प्यारी बाइक पर पड़ी — धूल से लथपथ, टायरों पर मिट्टी की परतें, और शीशे पर “धो मुझे प्लीज़” लिखा हुआ था। 


लगा जैसे वो मुझसे कह रही हो —
“भाई, तेरा क्या है, तू तो रोज नहा लेता है, पर मैं तो दो महीने से रेगिस्तान बनी पड़ी हूँ!”

सच कहूँ, जब मैंने उसे देखा तो शर्म आ गई।
सोचा, चलो आज इस बिचारी को भी इंसानियत दिखा दूँ। 
बाल्टी में पानी भरा, शैम्पू निकाला (जो शायद बाइक से ज़्यादा मैं खुद पर इस्तेमाल करता हूँ), और शुरू हो गया उसका “स्पा सेशन”।


 पहला छींटा – बाइक का बदला!

जैसे ही पानी का पहला छींटा मारा, बाइक ने ऐसा छींटा वापस उछाला कि मेरी टी-शर्ट पर सीधा निशाना लगा।
लगा जैसे कह रही हो —
“अबे, तू भी ले मज़ा मेरे साथ! सिर्फ मैं ही गंदी क्यों रहूँ?”

फिर मैंने ब्रश से टायर घिसे, हैंडल पोंछा, और सीट पर झाग लगाई।
अचानक लगा, ये बाइक तो आज अपने ससुराल जाने की तैयारी कर रही है — इतनी चमक तो शादी के दिन भी नहीं थी!


 दूसरा पड़ाव – बाइक का रूपांतरण

धोते-धोते जब सूरज थोड़ा ऊपर आया, बाइक की बॉडी ऐसे चमकने लगी जैसे नई शादी की साड़ी।
पड़ोसी पास से गुज़रा और बोला —
“भाई, नई बाइक ले ली क्या?”
मैंने कहा — “नहीं, बस पुरानी को धो दिया है।”
वो बोला — “अच्छा है, अब खुद को भी धो ले!”

हम दोनों हँस पड़े, पर मन ही मन मुझे अपनी बाइक पर गर्व महसूस हुआ।
इतनी चमक तो मेरी खुद की मुस्कान में भी नहीं थी।


 तीसरा मोमेंट – बाइक का एटीट्यूड

जैसे ही बाइक सूखी, मैंने किक मारी —
और एक दमदार ढूं...ढूं...ढूं...! की आवाज़ निकली।
मुझे लगा जैसे वो कह रही हो —
“अब बताओ, कौन बाईक सुंदर है पूरे मोहल्ले में?”

सड़क पर निकली तो हवा खुद रुककर पूछ रही थी —
“भाई, ये कौन सी ब्रांड है?”
और बच्चे पीछे से चिल्ला रहे थे —
“देखो, हीरो की बाइक जा रही है!”


 क्लाइमेक्स – बाइक का स्वैग

अब हालत ये थी कि बाइक खुद को सुपरमॉडल समझने लगी।
ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ी होकर बगल की बाइक से कहती —
“देख भाई, नहाना ज़रूरी है। चमक दिखेगी तो इज्जत मिलेगी!”

और मैं सोच में पड़ गया —
कई बार इंसान भी तो बाइक की तरह होता है — जब तक खुद को साफ न करे, चमक नहीं आती।
बस ज़िंदगी का धूल झाड़ते रहो, और खुद को हर दिन नया महसूस करो।



अब मेरी बाइक रोज सुबह मुझसे पूछती है —
“आज फिर नहलाओगे क्या?”
और मैं कहता हूँ —
“अरे मैडम, रोज़ नहीं, वरना फिर मुझे ही जलन होगी तुम्हारी चमक से!”



क्या आपकी बाइक भी हफ्तों से धूल में लिपटी खड़ी है?
तो जनाब, उसे भी एक बार नहला दीजिए —
क्योंकि कभी-कभी बाइक की सफाई से ज़्यादा दिल की सफाई ज़रूरी होती है!

सर्दियों की सुबह और हरे साग की खुशबू

सर्दियों की वो कड़कड़ाती सुबह थी — जब ओस की बूंदें पत्तों पर ऐसे चमक रही थीं, मानो किसी ने मोतियों की माला बिखेर दी हो। सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था, लेकिन गांव की पगडंडियों पर लोगों की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। हर कोई अपने-अपने खेतों की ओर बढ़ रहा था। मैं भी अपने पिता और चाचा जी के साथ साइकिल पर खेत की राह पकड़ चुका था। 


खेत में पहुंचते ही ठंडी हवा का झोंका चेहरे से टकराया — ऐसा लगा जैसे किसी ने बर्फ का पानी उड़ा दिया हो। पर जैसे ही नजर हरे-भरे खेतों पर पड़ी, सारी ठंड पल भर में गायब हो गई। सामने फैला हुआ हरियाली का संसार — सरसों, बथुआ, पालक और मेथी के पौधे ओस की बूंदों से नहाए हुए, मानो धरती ने हरी चादर ओढ़ रखी हो।

हमने टोकनियां निकालीं और साग तोड़ना शुरू किया। उंगलियां ठंड से सुन्न थीं, लेकिन जब साग की नर्म पत्तियों को छुआ, तो एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई — जैसे प्रकृति खुद अपने हाथों से सर्दी का एहसास मिटा रही हो। चाचा जी मुस्कुराते हुए बोले,
“सर्दी में साग का मज़ा ही कुछ और है — और अगर खुद तोड़ा हो, तो स्वाद दोगुना!”

धीरे-धीरे सूरज की सुनहरी किरणें खेतों में उतरने लगीं। ओस की बूंदें चमक उठीं, और खेतों में जीवन जैसे झिलमिला उठा। तभी पास ही से एक चायवाले की घंटी की आवाज आई। हम सबने वहीं खेत के किनारे मिट्टी के कुल्हड़ों में गर्म-गर्म चाय का आनंद लिया। ठंडी हवा, मिट्टी की खुशबू और चाय की भाप — उस सुबह की याद को आज भी दिल के कोनों में ताज़ा कर देती है।

सारे साग इकट्ठा करने के बाद हमने मां के लिए एक पोटली अलग की, जिससे वो घर जाकर ताज़ा साग बनाएंगी। घर लौटते हुए साइकिल की टोकरी में रखी हरी पत्तियाँ हवा में लहराती जा रही थीं — जैसे वो भी खुश हों कि किसी ने उन्हें सहेजा है, अपनाया है।

वो सुबह सिर्फ खेतों की नहीं थी, वो याद थी अपनत्व की, मेहनत की, और उस सुकून की जो शहर की भागदौड़ में कहीं खो गया है।


क्या आपने भी कभी सर्दी की सुबह खेतों में साग तोड़ा है? अगर हाँ, तो चलिए — फिर से चलते हैं उन मीठी यादों की गलियों में, जहाँ हर सांस में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली रहती है।  शहर की भागदौड़ में आज जब बाज़ार से साग लाते हैं, तो वो खेत वाली ताजगी और अपनापन कहीं खो गया लगता है। मगर उन सुबहों की गर्माहट, वो मिट्टी की खुशबू, और अपने हाथों से तोड़ा गया साग — अब भी दिल को सुकून दे जाता है। 


Monday, October 27, 2025

छठ पूजा – आस्था और अपनत्व का पर्व

दिवाली की जगमगाहट जैसे ही ढली, उसी के बाद से ही चंडीगढ़ में छठ पूजा की तैयारियाँ शुरू हो गईं। हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में भले ही यह पर्व स्थानीय तौर पर न मनाया जाता हो, लेकिन बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत से यहाँ आकर बसे लोग इसे अपनी पूरी श्रद्धा और भक्ति से निभाते हैं।

गाँव से चंडीगढ़ आने से पहले मैंने कभी छठ पूजा के बारे में नहीं सुना था। लेकिन यहाँ आकर जब पहली बार इस पर्व को नज़दीक से देखा, तो एहसास हुआ कि यह केवल एक त्योहार नहीं बल्कि एक गहरी आस्था का उत्सव है।

सेक्टर 42 की झील और खरड़ का अजनौली सरोवर इन दिनों पूरी तरह छठ माई के नाम हो जाते हैं। बाजारों में भी खास रौनक देखने को मिलती है। हर तरफ गन्ने की गठरियाँ, केले की गढ़, रंग-बिरंगी टोकरियाँ, छाज, मिट्टी के दीये और पूजा का सामान सजा होता है। मानो पूरा शहर इस विशेष पर्व के रंग में डूब गया हो।

जब मैं झील के किनारे पहुँचा, तो वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था। बच्चे हँसते-खेलते इधर-उधर दौड़ रहे थे, माता-पिता बार-बार उन्हें समझा रहे थे कि भीड़ में संभलकर रहना। हर कोई नए कपड़ों में सजा हुआ, चेहरे पर उत्साह और आँखों में भक्ति की चमक लिए हुए था।

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लोग अपने-अपने पूजा के सामान को बड़े स्नेह से सजो रहे थे। कहीं शामियाने लगे थे, कहीं DJ पर भक्ति गीत गूँज रहे थे। लाउडस्पीकर से बजते भोजपुरी गीत पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना रहे थे। चंडीगढ़ पुलिस भी पूरी सजगता से ड्यूटी निभा रही थी, ताकि हर कोई सुरक्षित रह सके।

भीड़ के बीच खड़ा मैं सब देख रहा था। कहीं परिवार मिलकर पूजा की तैयारी कर रहे थे, कहीं लोग झील के किनारे हाथ जोड़कर सूर्य देवता को प्रणाम कर रहे थे। कुछ लोग अपने मोबाइल से इन क्षणों को कैद कर रहे थे – शायद यादों में सँजोकर रखने के लिए। मैंने भी कुछ तस्वीरें खींचीं, लेकिन मन ही मन सोच रहा था कि तस्वीरों से ज़्यादा सुंदर तो यह माहौल दिल में बस रहा है।


उस पल मुझे लगा – त्योहार केवल रस्मों का नाम नहीं होते। ये रिश्तों को जोड़ने का, बिछड़े लोगों को करीब लाने का और अपनेपन को महसूस कराने का माध्यम होते हैं। आज की व्यस्त जिंदगी में जब लोगों को अपनों से मिलने का भी समय नहीं मिलता, तब ऐसे पर्व दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।

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मुझे भले ही छठ पूजा की सारी परंपराएँ और इतिहास विस्तार से न पता हो, लेकिन एक बात ज़रूर समझ आई – यह पर्व सिर्फ पूजा का नहीं, बल्कि आस्था, एकता और परिवार के साथ बिताए गए अनमोल पलों का पर्व है।

मैं सोचता हूँ, जल्द ही छठ पूजा के इतिहास और उसकी मान्यताओं के बारे में और गहराई से जानूँ और उसे आप सबके साथ साझा करूँ। लेकिन इस बार का अनुभव मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा – जब मैंने देखा कि कैसे आस्था और भक्ति लोगों को एक धागे में पिरो देती है।

खुद पर विश्वास करना सबसे बड़ा साहस है

ज़िंदगी के इस सफर में हर इंसान कई उतार-चढ़ावों से गुजरता है। कभी रास्ते आसान लगते हैं, तो कभी मंज़िल तक पहुँचने में मुश्किलों के पहाड़ सामने खड़े हो जाते हैं। पर इन सबके बीच जो चीज़ इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देती है, वह है – “खुद पर विश्वास”। क्योंकि जब आप अपने ऊपर भरोसा करना सीख लेते हैं, तो दुनिया की कोई ताकत आपको रोक नहीं सकती। 


अक्सर लोग हालात, किस्मत या दूसरों की राय के सहारे अपने फैसले लेते हैं। लेकिन सच्चा साहस वही है, जब आप अपनी सोच पर यकीन करते हैं, अपने फैसलों की जिम्मेदारी खुद उठाते हैं। खुद पर विश्वास करना मतलब है, अपनी क्षमताओं को पहचानना और यह मानना कि “मैं कर सकता हूँ” — चाहे दुनिया कुछ भी कहे।

अगर इतिहास की ओर देखें, तो हर सफल व्यक्ति की कहानी में “खुद पर विश्वास” की मिसाल मिलती है। चाहे वो महात्मा गांधी हों, जिन्होंने अहिंसा की राह चुनी, या अब्दुल कलाम, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी सपनों को सच कर दिखाया। उन्होंने भी कई असफलताएँ देखीं, पर खुद पर भरोसा कभी नहीं खोया। यही विश्वास उन्हें महान बनाता है।

कई बार हम अपनी असफलताओं से डर जाते हैं। लोग क्या कहेंगे, ये सोचकर कदम पीछे खींच लेते हैं। पर याद रखिए — डर हमेशा वहीं पैदा होता है जहाँ भरोसा कमजोर पड़ता है। अगर हम हर गिरावट के बाद उठ खड़े होने का हौसला रखते हैं, तो वही असली जीत है। खुद पर विश्वास रखना मतलब है, अंधेरे में भी रोशनी की किरण ढूँढ लेना।

खुद पर भरोसा तभी आता है जब हम खुद को समझते हैं — अपनी कमजोरियों को स्वीकारते हैं और अपनी खूबियों पर काम करते हैं। यह कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि लगातार अभ्यास है। हर दिन खुद से कहना कि “मैं कर सकता हूँ, मैं योग्य हूँ, मैं हार मानने वाला नहीं हूँ।”

कभी-कभी लोग आपका मज़ाक उड़ाएँगे, आपके इरादों पर शक करेंगे, लेकिन यही वो वक्त होता है जब आपको अपने अंदर की आवाज़ सुननी होती है। दूसरों की सोच को नहीं, अपने दिल की आवाज़ को महत्व दीजिए। क्योंकि जो खुद पर विश्वास रखता है, वही दूसरों का भी विश्वास जीतता है।

इसलिए, अगर जिंदगी में आगे बढ़ना है, तो सबसे पहले अपने ऊपर भरोसा करना सीखिए। क्योंकि सफलता का पहला कदम बाहर नहीं, भीतर से शुरू होता है।

याद रखिए:

“जब तक तुम खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक कोई और तुम पर विश्वास नहीं करेगा।”

अंत में एक बात :
खुद पर विश्वास करना अहंकार नहीं, आत्मबल है। यह वो ताकत है जो आपको गिरने के बाद फिर से उठने की हिम्मत देती है, जो हर अंधेरे में रोशनी की ओर ले जाती है। इसलिए खुद पर यकीन रखिए, क्योंकि यही सबसे बड़ा साहस है, और यही जीवन की असली जीत है।

Sunday, October 26, 2025

भीड़ भरे बाजार में छठ पूजा की रौनक — एक सजीव अनुभव

आज सुबह दफ्तर जाने के लिए जैसे ही कमरे से निकला, रोज़ की तरह बाइक स्टार्ट की और रास्ते पर चल पड़ा। ठंडी हवाओं में एक प्याली चाय का मज़ा लेने की चाहत मन में उठी, तो मैं हमेशा की तरह अपने पसंदीदा चायवाले के पास रुक गया। मैंने उसे कहा, “भाई, एक चाय बना दो।” उसने सिर हिलाया, चाय बनाई, कप में डालकर सामने रख दी और दो कप लेकर पास की दुकान पर देने चला गया। मैं इंतज़ार करता रहा कि वह लौटेगा, पर वह बिना चाय दिए प्लेट उठाकर चला गया। आख़िरकार मैंने खुद ही कप उठाया, गरमागरम चाय का मज़ा लिया, पैसे दिए और अपनी बाइक पर सवार होकर आगे बढ़ गया। 


रास्ते में जैसे ही फेज-1 की खोखा मार्केट के पास पहुँचा, मैंने बाइक को बीच की सड़क पर डाल दिया और धीरे-धीरे आगे बढ़ा। पर कुछ ही दूर चला था कि भीड़ देखकर सिर चकरा गया। चारों ओर लोगों का सैलाब था। सड़कें मानो लोगों से भर गई थीं। समझ नहीं आ रहा था कि बाइक को आगे कैसे ले जाऊं या पीछे कैसे मोड़ूं। तभी याद आया — आज छठ पूजा के दिन चल रहे हैं, और यही वजह है कि बाजार में इतनी भीड़ है।

छठ पूजा बिहार और पूर्वी भारत के लोगों के लिए सिर्फ़ एक पर्व नहीं, बल्कि एक श्रद्धा और उल्लास का उत्सव है। और आज उस उत्सव का रंग पूरे बाजार में घुला हुआ था। दुकानों पर लोगों की इतनी भीड़ थी कि दुकानवालों को अपनी सहायता के लिए एक-दो आदमी साथ रखने पड़े थे। कुछ दुकानदारों ने तो सड़कों पर ही चारपाइयां बिछाकर दुकानें सजा रखी थीं। टिन की छतों वाली छोटी दुकानों से लेकर ठेलों तक, हर जगह खरीददारों की रौनक थी।

तीन पहियों वाली रेहड़ियों पर गन्ने, फल और पूजा का सामान बिक रहा था। पर यही वजह थी कि जाम बढ़ता जा रहा था। लोग जब किसी रेहड़ी के पास आते, तो वहीं रुक जाते, जिससे वाहनों की लाइन लग जाती। गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ें चारों तरफ़ गूंज रही थीं, पर भीड़ में किसी को फर्क नहीं पड़ रहा था। सब अपने अपने उत्सव में मग्न थे।

भीड़ के बीच चलते हुए मेरी नज़र एक दुकान पर पड़ी — एक चारपाई पर रंग-बिरंगी चूड़ियों की दुकान सजी थी। उसके पास कुछ छोटी-छोटी लड़कियां खड़ी थीं, जिनकी आंखों में चमक थी। वे चूड़ियों की चमक देखकर मुस्कुरा रही थीं। वह दृश्य इतना सुंदर था कि मैं कुछ देर वहीं ठहर गया। चूड़ियों की वह चमक जैसे छठ के उत्सव की खुशियों को दर्शा रही थी।

तभी पीछे से एक कार वाले ने हॉर्न बजाया। आगे एक रेहड़ी वाला गन्ने बेचते हुए सड़क के बिल्कुल किनारे खड़ा था, जिससे रास्ता और भी तंग हो गया था। गाड़ियां निकल नहीं पा रही थीं। कई मिनटों बाद जब उसने ग्राहकों के साथ थोड़ा आगे बढ़ाया, तभी जाम खुला।

भीड़ में हर तरफ़ रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे लोग नज़र आ रहे थे — महिलाएं, बच्चे, युवक-युवतियां सब एक मेले के माहौल में डूबे थे। कई महिलाओं ने सिर पर टोकरियां उठाई हुई थीं, जिनमें पूजा का सामान और फल रखे थे। उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि श्रद्धा की चमक थी। सच कहूं तो पूरा बाजार किसी लोक मेले में तब्दील हो चुका था।

धीरे-धीरे मैं बाइक को आगे बढ़ाता रहा और आखिरकार बाजार के दूसरे छोर तक पहुंच गया। वहां से आगे एक चौक आया — और वहाँ तो जैसे जाम का ज्वालामुखी फूट पड़ा था। हर तरफ गाड़ियों का जाम, हॉर्न की आवाज़ें और लोग इधर-उधर भागते नज़र आ रहे थे। पर उस अफरातफरी में भी एक अलग ही आनंद था — यह एहसास कि हम एक जीवंत त्यौहार का हिस्सा हैं, जहां लोगों की भीड़ श्रद्धा से भरी है।

कुछ मिनटों की मशक्कत के बाद, एक खाली सा रास्ता दिखाई दिया। मैंने फुर्ती से बाइक उस गली में डाल दी। कुछ बाइकें आगे बढ़ रही थीं, मैं भी धीरे-धीरे निकल गया। करीब बीस मिनट की जद्दोजहद के बाद आखिरकार मैं उस जाम से बाहर निकला।

जैसे ही खुली सड़क पर पहुंचा, मैंने बाइक की रफ़्तार बढ़ा दी। अब सूरज ऊपर था, हवा में हल्की ठंडक थी, और मन में एक ही ख्याल — आज ऑफिस देर से पहुंचूंगा, पर यह अनुभव याद रहेगा।

दफ्तर पहुंचकर सबसे पहले पानी पिया, फिर कंप्यूटर खोला। पर दिमाग अब भी उसी भीड़, उसी गहमागहमी में था। मैंने सोचा — कल से इस रास्ते से नहीं आऊंगा, क्योंकि छठ पूजा का उत्सव अब अगले दो-तीन दिन इसी तरह जोश से मनाया जाएगा।

छठ पूजा की यही तो खूबसूरती है — यह त्योहार सूर्य भगवान और छठी मैया को समर्पित है। इसमें लोग व्रत रखते हैं, नदियों या तालाबों के किनारे जाकर अर्घ्य देते हैं, और पूरे परिवार के साथ श्रद्धा व प्रेम से पूजा करते हैं। यही कारण है कि बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और अब उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसकी धूम रहती है।

आज बाजार में जो भी भीड़ थी, वह सिर्फ़ खरीदारी के लिए नहीं थी — वह भावना और आस्था की प्रतीक थी। और उस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति की आंखों में यही चमक थी — अपने परिवार, अपनी परंपरा और अपने त्योहार के प्रति गर्व की चमक।

इस अनुभव ने सिखाया कि हर त्योहार सिर्फ़ रीति-रिवाज नहीं, बल्कि जीवन की रौनक है।
हर भीड़ एक कहानी है — प्रेम, परिश्रम और परंपरा की।

“Happy Chhath Puja” — इस आस्था के उत्सव में हर दिल में सूर्य-सा प्रकाश और माँ छठी का आशीर्वाद बना रहे।

फिल्म इंडस्ट्री में मौत की दौड़ – जब एक-एक कर बुझने लगे सितारे

फिल्म इंडस्ट्री… वो दुनिया जहाँ रोशनी कभी कम नहीं होती थी, जहाँ हँसी, तालियों और शोर के बीच ज़िन्दगी झिलमिलाती थी। पर आज ऐसा लगता है जैसे इस चमकती हुई दुनिया पर किसी ने सन्नाटा फैला दिया हो। जैसे एक-एक कर सितारे बुझ रहे हों, और आसमान धुंधला पड़ता जा रहा हो। 


कुछ ही समय पहले पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री (Pollywood) के जाने-माने अभिनेता जसविंदर भल्ला, राजवीर ज्वांधा, और वरिंदर घुमन के निधन की खबरों ने सबको गहरा झटका दिया था। और अब बॉलीवुड से भी दर्दनाक खबरें आ रही हैं। पहले पंकज धीर, फिर असरानी, और अब एक और प्यारे कलाकार — सतीश शाह — हमें हमेशा के लिए छोड़कर चले गए।

सतीश शाह… वो नाम जिसे सुनते ही चेहरा मुस्कुरा उठता था। चाहे “ये जो है जिंदगी” का हास्य हो या “जाने भी दो यारों” की कॉमिक टाइमिंग — उन्होंने अपने अभिनय से हर दिल में जगह बनाई। उनकी हँसी सिर्फ हँसी नहीं थी, वो ज़िंदगी की सच्चाई को हल्के अंदाज़ में कह जाने की कला थी।
आज जब वो हमारे बीच नहीं हैं, तो ऐसा लगता है जैसे बॉलीवुड की हँसी पर किसी ने विराम लगा दिया हो।


 यादों की परछाइयाँ

आज सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक, हर जगह सिर्फ एक ही चर्चा है — “क्या हो रहा है फिल्म इंडस्ट्री में?”
हर कुछ दिन बाद किसी बड़े कलाकार के जाने की खबर दिल को झकझोर देती है।
कभी वो चेहरे जिन्होंने हमें ज़िन्दगी भर हँसाया, रुलाया, और सिखाया — आज उनकी जगह सिर्फ यादें बची हैं।

ये सिर्फ एक संयोग नहीं लगता, बल्कि जैसे एक मौन अध्याय चल पड़ा हो।
जहाँ हर कलाकार अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा हो, और हम दर्शक बस यह सोच रहे हों कि अगली दुखद खबर कहाँ से आएगी।


 कलाकार अमर होते हैं

लेकिन सच्चाई ये है — कलाकार कभी मरते नहीं।



उनकी फिल्में, उनके डायलॉग, उनकी हँसी, उनका असर — सब अमर हो जाते हैं।
जब भी स्क्रीन पर उनका कोई दृश्य दिखता है, ऐसा लगता है जैसे वो फिर से लौट आए हों।

सतीश शाह जैसे कलाकारों की सबसे बड़ी पहचान यही है — उन्होंने जीवन को सरल, सच्चा और मुस्कुराता बनाया।
आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो दिल भारी ज़रूर होता है, पर एक मुस्कान भी आती है — वही जो उन्होंने अपने अभिनय से हमें दी थी।


समय की रफ़्तार किसी के लिए नहीं रुकती।

हर कलाकार अपने हिस्से की कहानी पूरी कर के आगे बढ़ जाता है।
पर जो दिलों को छू जाते हैं — वो हमेशा के लिए वहीं बस जाते हैं।

सतीश शाह, असरानी, पंकज धीर और उन तमाम सितारों को सलाम — जिन्होंने अपनी कला से हमें हँसना, रोना, और जीना सिखाया।
फिल्में खत्म हो सकती हैं, पर कलाकारों की आत्मा नहीं…


क्या आपने भी किसी ऐसे कलाकार को खोया है, जिसने आपके बचपन या जवानी के दिनों को रोशन किया था?

आइए, उन्हें याद करें — उनके संवादों में, उनकी हँसी में, उनकी कहानियों में।


जिन्होंने हँसी बाँटी, वो कभी ख़ामोश नहीं होते —

वो हर मुस्कान में ज़िन्दा रहते हैं, हमेशा के लिए।

Saturday, October 25, 2025

लोहे से सीखिए – असली कीमत तो घढ़ाई में है”

ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक यह है कि हमारी कीमत जन्म से तय नहीं होती, बल्कि उस मेहनत, लगन और सुधार से तय होती है जो हम अपने अंदर लाते हैं। एक साधारण-सी कहानी इसे बहुत खूबसूरती से समझा देती है।  


कहानी कुछ यूं है — 
एक किलो लोहे की कीमत बाज़ार में मात्र 65 रुपये होती है। अगर आप उसी लोहे से घोड़े की नाल बना दें, तो उसकी कीमत करीब 500 रुपये तक पहुँच जाती है। और अगर उसी लोहे को आप मेहनत और बारीकी से ढालकर सुई बना दें, तो उसकी कीमत 40,000 रुपये तक हो जाती है।

अब ज़रा सोचिए, वही लोहा है — न उसमें कोई कमी आई, न कोई नई चीज़ जुड़ी — फर्क सिर्फ रूपांतरण का है, फर्क सिर्फ मेहनत और कला का है।

ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है

हम सब इस दुनिया में एक जैसे ही आते हैं — दो हाथ, दो पैर, एक दिमाग और एक दिल लेकर। पर वक्त के साथ जो खुद को तराशते रहते हैं, वही दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाते हैं। जो व्यक्ति परिस्थितियों से लड़ता है, सीखता है, गिरकर फिर उठ खड़ा होता है — वही अपनी “कीमत” बढ़ाता है।

हर एक इंसान में असीम संभावनाएं होती हैं, पर बहुत से लोग उन्हें पहचान ही नहीं पाते। वे 65 रुपये वाले लोहे की तरह ही रह जाते हैं, जबकि उनमें सुई जैसा बनने की पूरी क्षमता होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग तकलीफ़ से डरते हैं, और कुछ उसी तकलीफ़ को अपना शिक्षक बना लेते हैं।

घढ़ाई का दर्द ही चमक बनता है

लोहे को जब आग में तपा-तपा कर, हथौड़े से पीट-पीट कर आकार दिया जाता है, तभी वह उपयोगी वस्तु बनता है। वही प्रक्रिया इंसान के जीवन में भी लागू होती है।
मुश्किलें, असफलताएँ, आलोचनाएँ — ये सब हमारी “घढ़ाई” का हिस्सा हैं।
अगर हम इनसे डर जाएँ, तो हम अधूरे रह जाते हैं। लेकिन अगर हम इन सबका सामना करते हुए आगे बढ़ें, तो हमारी ज़िंदगी भी 65 रुपये से 40,000 रुपये वाली “कीमत” पा लेती है।

कीमत दिखावे में नहीं, काबिलियत में है

आज की दुनिया में बहुत से लोग अपने कपड़ों, गाड़ियों, या शोहरत से अपनी कीमत साबित करना चाहते हैं। लेकिन असली मूल्य तो हमारे चरित्र, कर्म, और संवेदनशीलता में होता है।
जिस तरह लोहा अपनी पहचान बदलकर नई उपयोगिता पाता है, वैसे ही इंसान भी अपनी सोच और कर्मों से अपनी पहचान बना सकता है।

अपने भीतर की ‘सुई’ खोजिए

हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई कला, प्रतिभा, या गुण छिपा होता है — बस उसे पहचानने और निखारने की जरूरत है। अपने समय, विचारों और प्रयासों को सही दिशा दें। तब देखिए, आपकी ज़िंदगी भी एक साधारण से धातु के टुकड़े से एक कीमती कृति में बदल जाएगी।

इस छोटी-सी कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि हमारी असली कीमत हमें कोई और नहीं बताता, उसे हमें खुद गढ़ना होता है।

जैसे लोहा तपकर सुई बनता है, वैसे ही इंसान भी संघर्षों से गुजरकर अपनी पहचान बनाता है।

याद रखिए — “आपकी कीमत आपकी परिस्थितियाँ नहीं, आपकी प्रतिक्रिया तय करती है।”


आज ही अपने भीतर के “कच्चे लोहे” को पहचानिए, उसे मेहनत, लगन और आत्मविश्वास की भट्टी में तपाइए —
क्योंकि कीमत बढ़ाने की ताकत आपके हाथ में है।

जान लगा दो कमाने में, क्योंकि पैसा बहुत जरूरी है जमाने में

आज की दुनिया में पैसा सिर्फ जीवन की जरूरत नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक अहम साधन बन चुका है। कहा जाता है कि “पैसा खुशी नहीं खरीद सकता”, यह सच है। लेकिन यह सच भी है कि बिना पैसों के जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए अगर आप अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर जीवन चाहते हैं, तो कमाने में पूरी मेहनत और लगन लगाना जरूरी है।  


आज की दुनिया में यह एक कड़वा सच है कि पैसा होने पर ही लोग आपकी कदर करते हैं, और पैसा नहीं होने पर आपकी कोई अहमियत नहीं रहती। यह सिर्फ यकीन या अफसोस की बात नहीं, बल्कि समाज की वास्तविकता है। हालांकि यह कड़वा सच है, इसे समझना और इसके अनुसार अपने जीवन की तैयारी करना बहुत जरूरी है।

 पैसा – जीवन की जरूरत और साधन
पैसा केवल एक चीज़ नहीं, बल्कि यह जीवन के लिए आधार है। घर चलाना, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, और आपातकालीन स्थिति – सब में पैसा जरूरी होता है। बिना पैसे के आत्मनिर्भर बनना लगभग असंभव है। इसलिए अगर हम मेहनत और लगन से कमाएँ, तो न सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी होती हैं, बल्कि दूसरों की मदद करने का अवसर भी मिलता है।

 पैसा और समाज में मान-सम्मान
पैसा केवल जरूरत नहीं, बल्कि समाज में आत्मसम्मान का प्रतीक भी है। जब आपके पास संसाधन होते हैं, लोग आपकी मदद करने, सलाह लेने और आपके विचार को महत्व देने लगते हैं। वहीं, जब पैसे की कमी होती है, तो चाहे आप कितने भी योग्य, शिक्षित या नेक हों, समाज में आपकी उपेक्षा होना आम बात है। यह बिल्कुल कड़वा है, लेकिन वास्तविकता है।

नैतिकता और पैसा – संतुलन बनाए रखना
यह भी सच है कि केवल पैसा ही सबकुछ नहीं है। नैतिकता, ईमानदारी और अच्छे व्यवहार से भी समाज में सम्मान मिलता है। लेकिन बिना पैसे के ये गुण समाज में पूरी तरह काम नहीं आते। इसलिए जीवन में पैसे के साथ नैतिकता और मेहनत का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

 मेहनत का महत्व
किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए मेहनत जरूरी है। सिर्फ सोचने और इच्छा रखने से कोई सफलता नहीं मिलती। जो लोग जान लगाकर काम करते हैं, वे जीवन में स्थिरता और सम्मान प्राप्त करते हैं। मेहनत सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मसंतुष्टि पाने के लिए भी जरूरी है।

पैसों की अहमियत समझना जरूरी
यह समझना जरूरी है कि पैसा केवल विलासिता का साधन नहीं है, बल्कि जीवन की बुनियादी जरूरतों और सुरक्षा का आधार है। घर चलाना, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य की देखभाल – इन सबमें पैसा एक जरूरी भूमिका निभाता है। इसके बिना इंसान कठिनाइयों में फंस जाता है और समाज में उसकी अहमियत कम हो जाती है।

 पैसे के सही उपयोग की कला
कमाना जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण है उसे सही जगह और सही तरीके से खर्च करना। पैसे का दुरुपयोग करना आसान है, लेकिन समझदारी वही है जो अपने पैसों को निवेश, बचत और आवश्यकता के अनुसार इस्तेमाल करे। जान लगाकर कमाया हुआ पैसा तब सबसे ज्यादा मूल्यवान होता है, जब वह जीवन में स्थिरता और सुरक्षा लाता है।

 संघर्ष और सफलता
पैसे कमाने की राह में अक्सर कठिनाइयाँ आती हैं। यह कठिनाइयाँ हमें मजबूत बनाती हैं। जो लोग संघर्ष से डरते नहीं, बल्कि उसे अवसर मानकर काम करते हैं, वही अपने जीवन में सफलता पाते हैं। पैसा केवल मेहनत का फल नहीं, बल्कि समर्पण और समझदारी का परिणाम भी होता है।

 पैसे से जीवन में आत्मनिर्भरता और सम्मान
पैसा सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रतीक भी है। जो व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होता है, अपने पैसों से अपनी जरूरतें पूरी करता है, वह समाज में विश्वास और सम्मान अर्जित करता है। इसके अलावा, आर्थिक रूप से मजबूत होने से मन में शांति और आत्मविश्वास भी आता है।

आखिरकार, जान लगाओ कमाने में, क्योंकि पैसा केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन को सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वतंत्र बनाने का साधन है। मेहनत, लगन, और समझदारी से कमाया हुआ पैसा हमें जीवन में स्थिरता, आत्मविश्वास और संतोष देता है। इसलिए आलस्य और निष्क्रियता को त्यागिए, मेहनत कीजिए, सीखते रहिए और अपने सपनों को साकार करने में पूरी लगन लगाइए। 

असल में यह सच है कि पैसे के बिना कोई नहीं पूछता, लेकिन इसे एक सीख के रूप में लेना चाहिए। यह हमें जीवन में आर्थिक रूप से मजबूत बनने, मेहनत करने और अपने सपनों को पूरा करने की प्रेरणा देता है। पैसा केवल विलासिता का साधन नहीं, बल्कि जीवन में स्थिरता, सम्मान और स्वतंत्रता का आधार है।

इसलिए आलस्य को छोड़िए, मेहनत कीजिए, सीखते रहिए और अपने पैसों के साथ अपनी योग्यता और नैतिकता को भी मजबूत बनाइए। याद रखिए, पैसा केवल जीवन की जरूरत नहीं, बल्कि समाज में आपकी अहमियत और आत्मनिर्भरता की पहचान भी है।

याद रखिए, पैसा सिर्फ जीवन की जरूरत नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा, स्वतंत्रता और खुशहाली का आधार है।

Friday, October 24, 2025

बटेश्वर मेला, आगरा – आस्था, संस्कृति और पशुधन का संगम

उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में स्थित बटेश्वर मेला भारत के सबसे प्राचीन और भव्य मेलों में से एक है। यह मेला यमुना नदी के तट पर बसे छोटे से कस्बे बटेश्वरनाथ में आयोजित होता है। बटेश्वर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी इसका गहरा महत्व है। यहाँ स्थित बटेश्वरनाथ महादेव मंदिर में स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं, और माना जाता है कि इस स्थल का नाम भी भगवान बटेश्वर से ही पड़ा। 



आस्था और परंपरा का प्रतीक

बटेश्वर मेला हर वर्ष कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर) में लगता है, जब पूर्णिमा के अवसर पर यमुना नदी के घाटों पर हजारों श्रद्धालु स्नान करते हैं और भगवान बटेश्वरनाथ के दर्शन करते हैं। यह मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, व्यापार और लोक-संस्कृति का केंद्र भी बन जाता है।
कहा जाता है कि यह मेला लगभग 400 वर्षों से निरंतर आयोजित होता आ रहा है और इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है।


बटेश्वर मंदिरों की श्रृंखला

बटेश्वर के मुख्य आकर्षणों में से एक है — यमुना तट पर बने 101 शिव मंदिरों की श्रृंखला। यह मंदिर एक सीध में ऐसे बने हैं जैसे मोतियों की माला हो। हर मंदिर की अपनी अलग छटा और स्थापत्य कला है। सूर्योदय के समय इन मंदिरों की परछाइयाँ यमुना के जल में पड़ती हैं, तो दृश्य अद्भुत लगता है — मानो पूरा आकाश शिव भक्ति में डूब गया हो।


पशु मेला – ग्रामीण जीवन की झलक

बटेश्वर मेले की एक बड़ी पहचान है पशु मेला। यहाँ पर देश के कोने-कोने से व्यापारी अपने पशु लेकर आते हैं। गाय, बैल, ऊँट, घोड़े और भैंसों की खरीद-बिक्री यहाँ धूमधाम से होती है।
कई किसान महीनों की तैयारी के बाद अपने पशुओं को सजाकर लाते हैं। पशुओं पर रंग-बिरंगे गोटे, घंटियाँ और पैटर्न बनाए जाते हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक सबके लिए यह मेला एक उत्सव जैसा होता है।

यह मेला राजस्थान के पुष्कर मेले के बाद दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। व्यापारी, ग्रामीण, और पर्यटक — सब इस मेले के रंग में खो जाते हैं।


रंग-बिरंगी रौनक और लोक-संस्कृति

बटेश्वर मेला सिर्फ धार्मिक या व्यापारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह लोक जीवन का उत्सव है।
यहाँ जगह-जगह लोक कलाकार नृत्य, संगीत और नौटंकी का प्रदर्शन करते हैं।
बच्चे झूलों, चूड़ी-बिंदी की दुकानों और मिठाइयों के ठेलों में मस्त रहते हैं।
मेले की रौनक इतनी होती है कि शाम होते-होते पूरा इलाका रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा उठता है।

गुड़, रेवड़ी, गजक, खील-बताशे और चाट-पकौड़ी की खुशबू हर ओर फैली रहती है।
ग्राम्य महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर आती हैं, और गाँव के पुरुष आपसी मिलन का आनंद लेते हैं।


धार्मिक अनुष्ठान और स्नान

मेले की शुरुआत कार्तिक पूर्णिमा के स्नान से होती है। इस दिन हजारों श्रद्धालु सुबह-सुबह यमुना नदी में स्नान करते हैं और फिर बटेश्वरनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।
भक्त भगवान शिव से आशीर्वाद मांगते हैं कि उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे।
रात्रि में दीपदान का दृश्य मन मोह लेता है — जब यमुना तट पर दीपों की कतारें जलती हैं, तो पूरा क्षेत्र काव्यात्मक सौंदर्य से भर जाता है।


इतिहास और मान्यता

किंवदंती के अनुसार, बटेश्वर वही स्थान है जहाँ भगवान राम ने अपने पुत्रों लव और कुश का अश्वमेध यज्ञ के दौरान सामना किया था।
एक अन्य मान्यता यह भी है कि यहाँ पांडवों ने अपने वनवास के समय कुछ समय बिताया था।
इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थल गुप्त और मौर्य काल से ही व्यापार और तीर्थ का केंद्र रहा है।


प्राकृतिक सौंदर्य

बटेश्वर के आसपास का वातावरण अत्यंत मनमोहक है। यमुना का किनारा, हरे-भरे खेत और दूर तक फैली पहाड़ियाँ इस स्थान को और भी आकर्षक बना देती हैं।
सुबह के समय यमुना के जल पर उगते सूरज की किरणें जब मंदिरों पर पड़ती हैं, तो दृश्य अत्यंत रमणीय प्रतीत होता है।
फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं।


आध्यात्मिक अनुभव

जो लोग यहाँ आते हैं, वे केवल मेले की चहल-पहल नहीं देखते, बल्कि आध्यात्मिक शांति का अनुभव भी करते हैं।
शिव मंदिरों की घंटियों की गूँज, यमुना की कलकल ध्वनि और श्रद्धालुओं का उत्साह एक ऐसा माहौल रचता है जो आत्मा को छू जाता है।
कई साधु-संत यहाँ ध्यान, पूजा और कथा-प्रवचन करते हैं।


अंतिम अनुभव

बटेश्वर मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गाँव की आत्मा का उत्सव है।
यह हमें याद दिलाता है कि भारत की असली पहचान उसकी परंपराओं, आस्था और आपसी मेल-जोल में बसती है।
जो लोग एक बार यहाँ आते हैं, वे इस मेले की गर्मजोशी, मिट्टी की खुशबू और भक्ति की गहराई कभी नहीं भूल पाते।


क्या आपने कभी बटेश्वर मेले की रौनक देखी है?

अगर नहीं, तो इस साल जरूर जाइए — वहाँ न केवल भारत का ग्रामीण जीवन दिखेगा, बल्कि आपको अपनी जड़ों से जुड़ने का एहसास भी होगा।


बटेश्वर मेला — जहाँ आस्था का दीप, संस्कृति की रौनक, और गाँव की सादगी एक साथ चमकती है।

गोशालधाम बगड़ की गोगापीर यात्रा – आस्था, भक्ति और परंपरा का संगम

हरियाणा के अंबाला से लेकर राजस्थान के बगड़ तक की यह यात्रा केवल दूरी तय करने की नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और लोकविश्वास की एक पवित्र परिक्रमा है। यह यात्रा गोगा पीर के प्रति अटूट श्रद्धा और जनसमर्पण का अद्भुत उदाहरण है। हर साल सावन और भादों के महीनों में हजारों श्रद्धालु अंबाला, कुरुक्षेत्र, सिरसा, हनुमानगढ़ और झुंझुनूं से होकर बगड़ स्थित गोगाजी धाम तक पहुँचते हैं। इस यात्रा को लोग “गोगा जी की जात” या “गोगा नवमी यात्रा” के नाम से जानते हैं। 



 यात्रा की शुरुआत

यात्रा की शुरुआत हर साल अंबाला जिले से होती है। भक्त गोगाजी के ध्वज और निशान के साथ अपने गाँव-शहर से पैदल या ट्रैक्टर-ट्रॉली, मोटरसाइकिल, और कभी-कभी साइकिलों पर भी रवाना होते हैं। सुबह के समय ढोल-नगाड़ों और जयकारों की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठता है –

“जयहो गोगा जी महाराज की!”
“गोगा जी का घोड़ा नीला, भक्ति रंग में रँगा पीला!”

यात्रा के पहले दिन श्रद्धालु अपने घरों से मिट्टी लेकर चलते हैं, जिसे बगड़ धाम में गोगाजी के चरणों में चढ़ाया जाता है। यह परंपरा धरती माँ और गोगा देव के प्रति सम्मान का प्रतीक मानी जाती है।


 कौन हैं गोगा पीर?

गोगा जी, जिन्हें जाहरवीर गोगा, गोगा पीर, या गोगाजी महाराज कहा जाता है, लोकदेवता और वीर योद्धा थे। उनका जन्म राजस्थान के गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) में हुआ था। कहा जाता है कि उन्होंने नागों से वरदान प्राप्त किया था और सर्पदंश से पीड़ित लोगों की रक्षा करते थे। इसी कारण उन्हें “नागवंश के रक्षक” भी कहा जाता है।

हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय गोगाजी को समान श्रद्धा से पूजते हैं। एक ओर उन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है, तो दूसरी ओर सूफी संत के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।


 रास्ते का अनुभव – गाँवों की रौनक

अंबाला से बगड़ तक की यात्रा करीब 400 किलोमीटर की है। यह यात्रा कई जिलों से होकर गुजरती है – कुरुक्षेत्र, कैथल, फतेहाबाद, सिरसा, पिलानी और अंत में झुंझुनूं।
रास्ते में गाँव-गाँव से लोग यात्रियों का स्वागत करते हैं। कहीं ठंडे पानी की छबील लगाई जाती है, कहीं दूध-शरबत और भोजन की सेवा। महिलाएँ गीत गाती हैं –

“गोगा जी के नाम की जोत जली रे,
धरती पर अमर कहानी चली रे।”

रात में यात्रा ठहरती है, जहाँ भजन-कीर्तन और लोकनृत्य होते हैं। लोग गोगा जी की कथा सुनते हैं — कैसे उन्होंने अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया, कैसे नागदेवता ने उन्हें वरदान दिया और कैसे वे लोकदेवता बने।


 बगड़ में प्रवेश

जैसे ही यात्रा राजस्थान की सीमा में प्रवेश करती है, वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। बगड़ गाँव में प्रवेश के समय सैकड़ों लोगों की भीड़, फूलों की वर्षा, और गोगा ध्वजों की कतारें दृश्य को अलौकिक बना देती हैं।
बगड़ का गोगाजी मंदिर, जिसे “गोगा गोशालधाम” भी कहा जाता है, आस्था का केंद्र है। यह मंदिर झुंझुनूं जिले में स्थित है और राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध गोगा धामों में से एक माना जाता है।

यहाँ भक्त सबसे पहले ध्वजा चढ़ाते हैं, फिर नागदेवता की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि गोगाजी की समाधि यहाँ अद्भुत ऊर्जा से भरी हुई है। भक्त जब सिर झुकाते हैं, तो मानो सारी थकान मिट जाती है।


 अनुष्ठान और परंपराएँ

गोगाजी की यात्रा के दौरान कुछ विशेष रस्में निभाई जाती हैं:

  1. निशान यात्रा: भक्त अपने गाँव की ओर से एक ध्वज लेकर चलते हैं, जिसे गोगाजी के मंदिर में चढ़ाया जाता है।

  2. भजन-कीर्तन: यात्रा के दौरान रात में गोगाजी के भजन गाए जाते हैं।

  3. भोग और लंगर: बगड़ पहुँचने के बाद विशाल लंगर का आयोजन होता है, जिसमें सभी यात्रियों को प्रसाद मिलता है।

  4. नाग पूजा: गोगाजी को नागों के देवता माना जाता है, इसलिए नाग पंचमी और गोगा नवमी दोनों ही इस यात्रा से जुड़ी हैं।


 गोगाजी के संदेश

गोगाजी के जीवन से समाज को कई प्रेरणाएँ मिलती हैं —

  • साहस और न्याय: गोगाजी ने सदैव अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।

  • समानता: उन्होंने जात-पात, धर्म और भेदभाव को नकारते हुए सबको समान दृष्टि से देखा।

  • सेवा और भक्ति: उन्होंने अपने जीवन को लोगों की रक्षा और सेवा के लिए समर्पित किया।

आज भी उनके अनुयायी यह मानते हैं कि सच्चे मन से “गोगा जी” का नाम लेने से सर्पदंश और संकटों से मुक्ति मिलती है।


 वापसी की यात्रा

जब यात्रा समाप्त होती है, तो भक्त भाव-विभोर होकर लौटते हैं। वे गोगाजी की कृपा से भरे मन से वापस अपने गाँवों की ओर बढ़ते हैं। यह यात्रा केवल दर्शन का साधन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक शुद्धि का अनुभव होती है।

गोगाजी की यात्रा के दौरान जो प्रेम, भाईचारा, और आपसी सहयोग देखने को मिलता है, वह आज के समाज के लिए प्रेरणा है। लोग चाहे किसी भी धर्म या जाति के हों, गोगाजी के नाम पर सब एक हो जाते हैं — यही उनकी सबसे बड़ी महिमा है।


अंबाला से बगड़ तक की यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है — यह जीवन का दर्शन है। यह सिखाती है कि विश्वास और प्रेम में कितनी शक्ति होती है।

गोगा पीर केवल एक देवता नहीं, बल्कि लोकविश्वास के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने सिखाया कि सच्ची भक्ति वही है जो मानवता को जोड़ती है, और यह यात्रा उसी भावना की परंपरा को जीवित रखती है।

जब बगड़ की मिट्टी पर पाँव पड़ते हैं, तो मन अनायास ही कह उठता है —

“जय गोगा देव, नागवंश के रक्षक,
तेरी महिमा अपार, तेरा नाम अमर।

Thursday, October 23, 2025

बेहतर दिनों के लिए बुरे दिनों से लड़ना पड़ता है

जीवन एक सफर है, जिसमें हर इंसान को सुख और दुख, सफलता और असफलता, खुशी और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अक्सर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी हमेशा आसान और खुशहाल रहे, लेकिन असली बात यह है कि बेहतर और सुनहरे दिन बुरे दिनों की चुनौतियों से ही जन्म लेते हैं। 


 बुरे दिन – जीवन का शिक्षक
बुरे दिन हमें कमजोर नहीं बनाते, बल्कि हमारी ताकत और हिम्मत को परखते हैं। जब जीवन में समस्याएँ आती हैं, तब ही हम अपने अंदर छिपी शक्तियों को पहचान पाते हैं। कठिनाइयाँ हमें धैर्य सिखाती हैं, समझ बढ़ाती हैं और अनुभव से भर देती हैं। यही अनुभव आगे चलकर हमारे जीवन को सही दिशा में ले जाता है।

 संघर्ष से मिलता है मूल्य
किसी भी सफलता की कीमत संघर्ष के बिना पूरी नहीं होती। जो लोग आसानी से सबकुछ पा लेते हैं, वे जीवन की असली मेहनत और संघर्ष की कद्र नहीं कर पाते। बुरे दिन हमें यह एहसास कराते हैं कि कोई भी उपलब्धि बिना प्रयास के हासिल नहीं होती। जब हम मुश्किलों से लड़ते हैं, तब हमारी क्षमताएँ विकसित होती हैं और हम मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं।

 धैर्य और साहस का महत्व
बुरे दिन हमारे धैर्य और साहस की परीक्षा लेते हैं। अगर हम जल्दी हार मान लेते हैं, तो जीवन हमें वही सबक बार-बार सिखाता है। लेकिन जो लोग धैर्य के साथ मुश्किलों का सामना करते हैं, उनका साहस उन्हें नए अवसरों और बेहतर परिस्थितियों की ओर ले जाता है। हर अंधेरी रात के बाद सूरज जरूर निकलता है – यही जीवन का नियम है।

 सकारात्मक सोच बनाए रखना
मुश्किल समय में सकारात्मक सोच रखना आसान नहीं होता, लेकिन यही सोच हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जब हम यह मान लेते हैं कि यह समय भी गुजर जाएगा और मैं इससे कुछ सीखकर आगे बढ़ूँगा, तो बुरे दिन भी हमारे लिए एक शिक्षक बन जाते हैं। सकारात्मक सोच से हमारी मानसिक स्थिति मजबूत होती है और हम चुनौतियों का बेहतर सामना कर पाते हैं।

 बेहतर दिन की मिठास
बुरे दिनों का सामना करने के बाद जो सफलता और खुशियाँ मिलती हैं, उनकी मिठास कहीं अधिक होती है। जब हम जानते हैं कि हमने कठिन समय में हार नहीं मानी और पूरी मेहनत की, तो उस सफलता का आनंद और भी गहरा होता है। यही कारण है कि जीवन में हर चुनौती हमें बेहतर दिनों की तैयारी कराती है।

हमेशा याद रखिए, बेहतर दिनों के लिए बुरे दिनों से लड़ना पड़ता है। कठिनाइयाँ हमें मजबूत बनाती हैं, संघर्ष हमें सीख देता है, और अनुभव हमारे व्यक्तित्व को आकार देता है। बुरे दिन सिर्फ क्षणिक होते हैं, लेकिन उनके अनुभव जीवनभर हमारे साथ रहते हैं। इसलिए जब भी मुश्किलें आएँ, उन्हें अवसर की तरह देखें, संघर्ष करें, धैर्य रखें और सकारात्मक सोच बनाए रखें।

याद रखिए, जीवन का हर अंधेरा अंततः रोशनी की ओर ले जाता है। बेहतर दिन आने वाले हैं, बस हमें अपने अंदर की हिम्मत और विश्वास को मजबूत रखना है।

Wednesday, October 22, 2025

अंग्रेजों के जमाने के जेलर नहीं रहे

हँसी का सफ़र असरानी के बिना अधूरा है

भाषा की सीमाएँ कभी-कभी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पातीं, और आज ऐसी ही एक गहरी भावुकता हमें घेरे हुए है। 20 अक्टूबर 2025 को, 84 वर्ष की आयु में, हास्य-जगत के एक महान सितारे, गोवर्धन असरानी का निधन हो गया। इस क्षति ने सिर्फ एक अभिनेता को खोने का अर्थ नहीं रखा — एक उस युग की हास्य-विरासत को भी अलविदा कहना पड़ा, जिसने दशकों तक हमें हँसाया, मुस्कुराया और ज़िंदगी की हल्की-हल्की चुनौतियों को जीने योग्य बना दिया। 


प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

उनका जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर (तत्कालीन जयपुर राज्य) में हुआ था। परिवार की पृष्ठभूमि सामान्य थी — उनके पिता काल-पछी के काल में कालीन का व्यवसाय करते थे। लेकिन असरानी को बचपन से ही अभिनय का शौक था। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई के साथ साथ रेडियो में वॉयस आर्टिस्ट का काम किया ताकि अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। फिर उन्होंने प्रशिक्षण के लिए पुणे के फिल्म संस्थान में शिक्षा ली और 1960-70 के दशक में अभिनय के रास्ते पर कदम रखा।

सिनेमा में शानदार सफर

असरानी ने अपने करियर में 350 से अधिक हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया। उनकी सबसे मशहूर भूमिका शायद 1975 की क्लासिक फिल्म Sholay में जेलर की थी, जहाँ उनका संवाद “हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं” आज भी लोगों की यादों में ताज़ा है। 1970-80 के दशक में उनकी कॉमेडी की धार इतनी मजबूत थी कि उन्होंने एक दशक में 101 फिल्मों में काम किया।

उनका कॉमेडी का अंदाज़ अनूठा था—वो सिर्फ चुटकुले या मज़ाक नहीं थे, बल्कि अभिनय की सूफियत में पगे होते थे। दोस्तों के, हीरो के साथ-साथ एक ऐसा कॉमेडियन जिसने स्वाभाविक अभिनय से दर्शक-दिल तक पहुँचने का रास्ता बना लिया। उनके साथ काम करने वाले निर्देशक और अभिनेता बाद में कह गए कि सेट पर असरानी अक्सर कैमरे से आगे भी मज़ाक करते रहते थे, और वही सहजता उनकी असली ताकत थी। 

यादगार फिल्में और योगदान

उनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करती थीं—वे समय, समाज और इंसानी भावनाओं को हँसी-मज़ाक के माध्यम से बयान करती थीं। आज की ताज़ा खबर (1973) में उन्होंने चम्पक बूमिया का किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके अलावा छोटी सी बात, बावर्ची, हेराफेरी आदि फिल्मों में उनकी भूमिकाएँ आज भी फिल्म-प्रेमियों को गुदगुदाती हैं।

उन्हें सिर्फ एक कॉमेडियन के रूप में नहीं, बल्कि एक समय-परीक्षण अभिनेता के रूप में देखा जाता है, जिसने भाषा-संदर्भ बदलते रहे, पर अपनी कला का स्वर नहीं बदला।

अंतिम वर्ष और निधन

2025 की अक्टूबर तिथि ने बॉलीवुड को एक बड़ा धक्का दिया। असरानी 16 अक्टूबर को मुंबई के आरोग्य निधि हॉस्पिटल, जुहू में भर्ती हुए थे, जहाँ उन्हें श्वसन संबंधी जटिलताएँ थीं। 20 अक्तूबर को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी मृत्यु ने न सिर्फ उद्योग बल्कि आम दर्शकों के बीच भी शोक की लहर दौड़ाई। 

विरासत और प्रेरणा

जब हम असरानी को याद करते हैं, तो हमें सिर्फ उनकी फिल्मों में देखा गया हास्य नहीं बल्कि उनकी सरलता, मानवता, और काम के प्रति समर्पण याद आता है। वह एक बंगले में नहीं रहते थे, सुपर-हीरो जैसा रूप नहीं धारण करते थे—वह “हम-सबके बीच वो शख्स” थे, जो सहजता से हँसी लाते थे। उनके जाने से एक युग ख़त्म हो गया, लेकिन उनकी फिल्में, डायलॉग्स और चेहरे-झलकें आज भी हमारी स्क्रीन और यादों में जिंदा हैं।

कई युवा अभिनेता सोचते हैं कि वे कॉमेडी कर सकते हैं — लेकिन कॉमेडी में “वक्त”, “तालमेल”, “मानव समझ” चाहिए होती है, और असरानी ने इसे सालों-साल में विकसित किया। उनसे यह सीख मिलती है कि हँसी भी एक कला है, और इसे निभाना सिर्फ मज़ाक नहीं बल्कि सही समय-समय पर सही भाव देने की बात है।

आज हम असरानी को सादर विदा कहते हैं — उस कलाकार को जिसने हँसी को आसान बनाया, कठिन समय में मुस्कुराहट दी, और फिल्मों को रंग-बिरंगे एहसासों का सफर दिया। उनकी कमी हमेशा महसूस होगी, पर उनका अस्तित्व हमारी खेल-क्लिप्स, टीवी-स्क्रिप्ट्स, याद-दाश्तों और दिलों में हमेशा रहेगा।

“हंसी का काम हमेशा उम्र नहीं देखता — उसने अपना मुकाम बनाया, और उसने उसे असरानी के हाथों में सौंपा।”

गोवर्धन असरानी, आपके बिना फिल्में कम-कम लगेंगी, लेकिन आपके साथ-साथ बची हमारी हँसी कभी कम नहीं होगी। आपकी याद ऐसी रहेगी जैसे फिल्मी पर्दे पर वो वहम-फिरकी, वो तुरंत कह दिया गया मज़ाक, वो मचलती मुस्कुराहट — जो आज भी हमें कहती है: “चुटकुला चला गया, याद उसके साथ रह गया।”

भाई दूज की यात्रा – जब रास्ते ने भी परीक्षा ली

लेखक:  Suresh Kumar

आज भाई दूज का दिन था। सुबह की हल्की ठंडक और त्यौहार की रौनक दोनों ही महसूस हो रही थी। बहनों के घर जाने की उत्सुकता में हम सब सुबह-सुबह तैयार हो गए। मैं, मेरी पत्नी और बेटा अक्षित — तीनों जैसे ही मोटरसाइकिल लेकर गली में निकले, तभी छोटा भतीजा नूर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। वह अभी डेढ़ साल का ही है, पर बाइक से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था।

हमने सोचा कि चलो, उसे थोड़ा घुमा लाते हैं, पर वह तो मानो सवारी के मूड में ही था। आखिरकार तय किया कि नूर को भी साथ ले चलेंगे। उसे नए कपड़े पहनाए, जूते डाले और जैसे ही वह आईने में खुद को देखता है — उसका चेहरा खिल उठा। अब सब खुश थे और हमारी भाई दूज की यात्रा शुरू हुई। 



 रास्ते की शुरुआत

सुबह की धूप सुनहरी और सुकून भरी थी। रास्ते में खेतों की हरियाली, हवा में उड़ती धूल और गाँवों की मिट्टी की महक — सब मिलकर एक सुंदर अनुभव दे रहे थे। करीब 7–8 किलोमीटर चलने के बाद हम रसूलपुर गाँव को पार कर चुके थे। तभी मुझे महसूस हुआ कि बाइक के साइड में बंधा बैग शायद टायर से टकरा रहा है। रुककर देखा तो सचमुच बैग टायर से सटा हुआ था। उसे ठीक किया और फिर आगे बढ़े।

कुछ ही दूर चले थे कि बाइक थोड़ी डगमगाने लगी। मन में शक हुआ — कहीं टायर पंक्चर तो नहीं हो गया? रुककर देखा तो शंका सच निकली। पीछे का टायर बिल्कुल पिचक चुका था।


 परेशानी की शुरुआत

चारों ओर सुनसान सड़क और नज़दीक कोई दुकान नहीं। तभी एक बाइक सवार रुका और बोला, “भाई, यहाँ से दो-तीन किलोमीटर पीछे पंक्चर वाला मिलेगा। आगे तो कुछ नहीं है।”
यह सुनकर लगा जैसे रास्ता और लंबा हो गया हो। मन में आया — अब तो बाइक को पैदल ही घसीटना पड़ेगा। वही सज्जन बोले, “आप यहीं रुको, मैं गाँव से पंप ले आता हूँ, हवा भर लो और फिर धीरे-धीरे ले जाओ।”

हमने उम्मीद बाँध ली, सड़क किनारे बैठ गए। पर आधा घंटा गुजर गया, कोई नहीं आया। आखिर मैंने ठान लिया कि अब तो पैदल ही जाना होगा। बाइक को संभालते हुए, धीरे-धीरे सड़क पर आगे बढ़ा। धूप तेज़ थी, और पसीना चूने लगा था। करीब आधा घंटा पैदल चलने के बाद आखिर मैं रसूलपुर पहुँच गया।

वहाँ पूछताछ कर पंक्चर वाले तक पहुँचा, जिसने मुस्कराते हुए कहा, “घबराओ मत, पाँच मिनट में ठीक कर दूँगा।” उसके शब्द जैसे किसी ठंडे झोंके की तरह लगे। उसने टायर ठीक किया और मैंने राहत की साँस ली।


 बहनों के घर की ओर

अब रास्ता कुछ आसान लगा। बैग फिर से बाँधा, पत्नी और बेटे को बैठाया, नूर को गोद में लिया और हम फिर चल पड़े। बीच-बीच में बहनों के फोन आते रहे —
“भैया, कहाँ पहुँचे?”
“बस थोड़ी दूर और,” मैं हर बार मुस्कुराकर जवाब देता।

करीब दो घंटे बाद हम आखिरकार बहनों के घर पहुँचे। दोपहर ਹੋ चुकी थी, पर चेहरों पर थकान से ज़्यादा खुशी थी। बहनों ने आरती उतारी, तिलक लगाया, और प्यार से थाली आगे बढ़ाई। घर के बने पकवानों की खुशबू पूरे आँगन में फैली हुई थी। खाने के बाद थोड़ी देर आराम किया, पर मन में यही था कि नूर छोटा है, इसलिए देर नहीं करनी चाहिए।


 वापसी की मुश्किल

शाम के चार बजे जब वापसी के लिए तैयार हुए, तो देखा — बाइक का टायर फिर से बैठ गया है! अब समझ नहीं आया क्या करें। जीजा जी ने बताया कि गाँव में कोई पंक्चर वाला नहीं है, पर सौभाग्य से एक पंप था। उससे टायर में हवा भरी और पास के गाँव लंग की ओर चल दिए।

वहाँ पहुँचते ही टायर ने फिर जवाब दे दिया। सौभाग्य से थोड़ी दूर ही एक छोटी-सी दुकान दिखी — पंक्चर वाला! उसने टायर खोला, जाँच की और कहा — “भैया, इसमें दो पंक्चर हैं।”
मैं मुस्कुरा पड़ा, जैसे दिन की सारी थकान अब एक कहानी में बदलने लगी थी। थोड़ी देर में उसने टायर ठीक किया, और हम फिर से सफर पर निकल पड़े।


 घर वापसी

शाम ढल चुकी थी, रास्ते में अंधेरा छा गया था। गाँव की पगडंडी पर मोटरसाइकिल की लाइटें ही हमारा रास्ता दिखा रही थीं। जब हम घर पहुँचे, तो नूर की मम्मी गली में खड़ी इंतजार कर रही थीं। जैसे ही नूर ने उन्हें देखा, वह झट से उनकी गोद में जा चिपका। उस पल की मुस्कान ने दिनभर की सारी थकान मिटा दी।

हमने खाना खाया, सबने दिनभर की कहानी सुनते हुए खूब हँसी-मज़ाक किया, और फिर अगले दिन दीवाली की तैयारियों में जुट गए।


 अनुभव

इस भाई दूज की यात्रा ने सिखाया कि कभी-कभी रास्ते की मुश्किलें भी यादगार बन जाती हैं। थकान, धूप और परेशानियाँ सब भुला दी जाती हैं जब घर पहुँचकर अपने अपनों के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है।

“सफर कितना भी कठिन क्यों न हो,
जब मंज़िल अपना घर हो,
तो हर कदम पूजा बन जाता है।”

Tuesday, October 21, 2025

फुर्सत और व्यस्तता – ज़िंदगी को देखने का नजरिया

जीवन में दो तरह के लोग होते हैं — एक वे जो फुर्सत में रहते हैं, और दूसरे वे जो अपने काम में व्यस्त रहते हैं। फर्क बस इतना होता है कि जो फुर्सत में हैं, वे दूसरों की ज़िंदगी पर बातें करते हैं; और जो व्यस्त हैं, वे अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं।  



आज के समय में हर कोई किसी न किसी रूप में व्यस्त दिखना चाहता है, पर सच्ची व्यस्तता वह होती है जो आपके जीवन में मूल्य जोड़ती है। फुर्सत और व्यस्तता दोनों ही इंसान के सोचने और जीने के तरीके को दर्शाते हैं। जब व्यक्ति फुर्सत में होता है, तो उसका मन इधर-उधर भटकता है। वह दूसरों की गलतियाँ गिनने में, आलोचना करने में या गपशप में समय बिताता है।

लेकिन वही व्यक्ति अगर उसी समय को आत्मविकास, पढ़ाई, या किसी रचनात्मक कार्य में लगाए — तो उसका जीवन पूरी तरह बदल सकता है।


 फुर्सत – सोचने का समय या दूसरों पर चर्चा का साधन?

फुर्सत अपने आप में बुरी चीज़ नहीं है। असल में यह वह समय होता है जब व्यक्ति अपने जीवन को नए दृष्टिकोण से देख सकता है। परंतु जब फुर्सत का उपयोग केवल दूसरों की आलोचना, तुलना या ईर्ष्या में होता है, तब यही फुर्सत धीरे-धीरे जीवन की प्रगति को रोक देती है।
ऐसे लोग हमेशा दूसरों के कार्यों में गलतियाँ ढूंढते हैं, दूसरों की सफलता से असहज महसूस करते हैं, और खुद के विकास की ओर ध्यान ही नहीं देते।


 व्यस्तता – सफलता का दूसरा नाम

जो लोग अपने लक्ष्यों में, अपने सपनों में और अपने कर्म में व्यस्त रहते हैं, वे दूसरों की आलोचना में नहीं, बल्कि अपने सुधार में समय लगाते हैं।
व्यस्तता आपको उद्देश्य देती है।
व्यस्तता आपको सकारात्मक रखती है।
और सबसे ज़रूरी — व्यस्तता आपको “स्वयं” से जोड़ती है।

व्यस्त व्यक्ति को दूसरों की सफलता से प्रेरणा मिलती है, ईर्ष्या नहीं। वह यह सोचता है कि अगर कोई और कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं? यही सोच इंसान को आगे बढ़ाती है।


 जीवन का संतुलन

कभी-कभी फुर्सत में होना भी ज़रूरी है — पर यह फुर्सत “मन को शांत” करने के लिए होनी चाहिए, न कि “दूसरों की बुराई” के लिए।
फुर्सत के क्षणों में अगर आप आत्म-चिंतन करें, प्रकृति के साथ समय बिताएं, या कुछ नया सीखें — तो वही फुर्सत सोने के समान कीमती बन जाती है।

जबकि बेकार की चर्चाएँ, आलोचनाएँ या गपशप केवल नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती हैं।


जो फुर्सत में हैं, वे दूसरों की ज़िंदगी पर चर्चा करते हैं, और जो व्यस्त हैं, वे अपनी ज़िंदगी को सुधारते हैं — यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन का सिद्धांत है।

अगर आप सच में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो अपनी ऊर्जा दूसरों की बातों में नहीं, बल्कि अपने कर्मों में लगाइए।
हर मिनट, हर क्षण जो आप स्वयं को बेहतर बनाने में लगाते हैं, वही आपकी असली सफलता का निर्माण करता है।


इसलिए अगली बार जब आपको फुर्सत मिले — तो सोचे कि यह समय किसी की चर्चा में बीतना चाहिए या अपनी सफलता की कहानी लिखने में?

फैसला आपका है — आप “दूसरों की ज़िंदगी” में रहना चाहते हैं या “अपनी ज़िंदगी” को अर्थ देना चाहते हैं।

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...