लेखक: Suresh Kumar
आज भाई दूज का दिन था। सुबह की हल्की ठंडक और त्यौहार की रौनक दोनों ही महसूस हो रही थी। बहनों के घर जाने की उत्सुकता में हम सब सुबह-सुबह तैयार हो गए। मैं, मेरी पत्नी और बेटा अक्षित — तीनों जैसे ही मोटरसाइकिल लेकर गली में निकले, तभी छोटा भतीजा नूर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। वह अभी डेढ़ साल का ही है, पर बाइक से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था।
हमने सोचा कि चलो, उसे थोड़ा घुमा लाते हैं, पर वह तो मानो सवारी के मूड में ही था। आखिरकार तय किया कि नूर को भी साथ ले चलेंगे। उसे नए कपड़े पहनाए, जूते डाले और जैसे ही वह आईने में खुद को देखता है — उसका चेहरा खिल उठा। अब सब खुश थे और हमारी भाई दूज की यात्रा शुरू हुई।
रास्ते की शुरुआत
सुबह की धूप सुनहरी और सुकून भरी थी। रास्ते में खेतों की हरियाली, हवा में उड़ती धूल और गाँवों की मिट्टी की महक — सब मिलकर एक सुंदर अनुभव दे रहे थे। करीब 7–8 किलोमीटर चलने के बाद हम रसूलपुर गाँव को पार कर चुके थे। तभी मुझे महसूस हुआ कि बाइक के साइड में बंधा बैग शायद टायर से टकरा रहा है। रुककर देखा तो सचमुच बैग टायर से सटा हुआ था। उसे ठीक किया और फिर आगे बढ़े।
कुछ ही दूर चले थे कि बाइक थोड़ी डगमगाने लगी। मन में शक हुआ — कहीं टायर पंक्चर तो नहीं हो गया? रुककर देखा तो शंका सच निकली। पीछे का टायर बिल्कुल पिचक चुका था।
परेशानी की शुरुआत
चारों ओर सुनसान सड़क और नज़दीक कोई दुकान नहीं। तभी एक बाइक सवार रुका और बोला, “भाई, यहाँ से दो-तीन किलोमीटर पीछे पंक्चर वाला मिलेगा। आगे तो कुछ नहीं है।”
यह सुनकर लगा जैसे रास्ता और लंबा हो गया हो। मन में आया — अब तो बाइक को पैदल ही घसीटना पड़ेगा। वही सज्जन बोले, “आप यहीं रुको, मैं गाँव से पंप ले आता हूँ, हवा भर लो और फिर धीरे-धीरे ले जाओ।”
हमने उम्मीद बाँध ली, सड़क किनारे बैठ गए। पर आधा घंटा गुजर गया, कोई नहीं आया। आखिर मैंने ठान लिया कि अब तो पैदल ही जाना होगा। बाइक को संभालते हुए, धीरे-धीरे सड़क पर आगे बढ़ा। धूप तेज़ थी, और पसीना चूने लगा था। करीब आधा घंटा पैदल चलने के बाद आखिर मैं रसूलपुर पहुँच गया।
वहाँ पूछताछ कर पंक्चर वाले तक पहुँचा, जिसने मुस्कराते हुए कहा, “घबराओ मत, पाँच मिनट में ठीक कर दूँगा।” उसके शब्द जैसे किसी ठंडे झोंके की तरह लगे। उसने टायर ठीक किया और मैंने राहत की साँस ली।
बहनों के घर की ओर
अब रास्ता कुछ आसान लगा। बैग फिर से बाँधा, पत्नी और बेटे को बैठाया, नूर को गोद में लिया और हम फिर चल पड़े। बीच-बीच में बहनों के फोन आते रहे —
“भैया, कहाँ पहुँचे?”
“बस थोड़ी दूर और,” मैं हर बार मुस्कुराकर जवाब देता।
करीब दो घंटे बाद हम आखिरकार बहनों के घर पहुँचे। दोपहर ਹੋ चुकी थी, पर चेहरों पर थकान से ज़्यादा खुशी थी। बहनों ने आरती उतारी, तिलक लगाया, और प्यार से थाली आगे बढ़ाई। घर के बने पकवानों की खुशबू पूरे आँगन में फैली हुई थी। खाने के बाद थोड़ी देर आराम किया, पर मन में यही था कि नूर छोटा है, इसलिए देर नहीं करनी चाहिए।
वापसी की मुश्किल
शाम के चार बजे जब वापसी के लिए तैयार हुए, तो देखा — बाइक का टायर फिर से बैठ गया है! अब समझ नहीं आया क्या करें। जीजा जी ने बताया कि गाँव में कोई पंक्चर वाला नहीं है, पर सौभाग्य से एक पंप था। उससे टायर में हवा भरी और पास के गाँव लंग की ओर चल दिए।
वहाँ पहुँचते ही टायर ने फिर जवाब दे दिया। सौभाग्य से थोड़ी दूर ही एक छोटी-सी दुकान दिखी — पंक्चर वाला! उसने टायर खोला, जाँच की और कहा — “भैया, इसमें दो पंक्चर हैं।”
मैं मुस्कुरा पड़ा, जैसे दिन की सारी थकान अब एक कहानी में बदलने लगी थी। थोड़ी देर में उसने टायर ठीक किया, और हम फिर से सफर पर निकल पड़े।
घर वापसी
शाम ढल चुकी थी, रास्ते में अंधेरा छा गया था। गाँव की पगडंडी पर मोटरसाइकिल की लाइटें ही हमारा रास्ता दिखा रही थीं। जब हम घर पहुँचे, तो नूर की मम्मी गली में खड़ी इंतजार कर रही थीं। जैसे ही नूर ने उन्हें देखा, वह झट से उनकी गोद में जा चिपका। उस पल की मुस्कान ने दिनभर की सारी थकान मिटा दी।
हमने खाना खाया, सबने दिनभर की कहानी सुनते हुए खूब हँसी-मज़ाक किया, और फिर अगले दिन दीवाली की तैयारियों में जुट गए।
अनुभव
इस भाई दूज की यात्रा ने सिखाया कि कभी-कभी रास्ते की मुश्किलें भी यादगार बन जाती हैं। थकान, धूप और परेशानियाँ सब भुला दी जाती हैं जब घर पहुँचकर अपने अपनों के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है।
“सफर कितना भी कठिन क्यों न हो,
जब मंज़िल अपना घर हो,
तो हर कदम पूजा बन जाता है।”
