Thursday, April 26, 2018

माँ तुम धन्य हो.....


बचपन की ज़िंदगी की बातें खत्म ही नहीं हो सकती। और उनको चाहकर भी भुला नहीं सकते। बचपन में ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं, जिनको बाद में याद करें तो अपने आप के बारे में सोचना पड़ जाता है कि क्या मैं ऐसे कारनामे करता था। जिनको आज याद करके हसी भी आती है और अपनी बेवकूफियों पर शर्म भी। 

दिवाली की पूजा के समय माँ, छोटा भाई और मेरी बेटी निकिता।

आज भी जेहन में कई घटनाएं आ जाती हैं। जिस काम से घरवाले मना करते हैं, हम उनको ज़रूर करते हैं।और उसका खामिआज़ा भी भुगतना पड़ता है। हमारा घर सड़क के पास पड़ता है। सड़क पर वाहन चलते रहते हैं, तो माँ हमें सड़क पर जाने से रोकती थी, और आज भी हम बच्चों को सड़क से दूर रहने की हिदायतें देते रहते हैं। झूले लेने का बड़ा शौक था। इधर से ट्राली के पीछे लटक कर थोड़ी दूर जा के उतर जाना। फिर उधर से पैदल वापस आना या फिर दूसरी तरफ से आती हुई ट्राली के पीछे लटक कर आ जाना। 

ऐसे ही एक बार मैं सड़क पर जाती हुई ट्रेक्टर ट्राली के पीछे लटक गया। ट्राली की रफ़्तार काफी ज्यादा थी, जब मैं उतरने लगा तो मेरी कमीज़ ट्राली में फंस गयी। अब मैं न तो ट्राली से उतर सका और न ही ट्राली पर था। ट्राली के साथ साथ घिसटता जा रहा था। तभी अचानक कमीज़ फट गयी तो मैं सड़क पर गिर गया। मुझे काफी चोट लगी थी।सड़क से आती हुई एक औरत ने घर जा के बताया कि तुम्हारा लड़का सड़क पर गिर गया है। माँ दौड़ कर सड़क पर आयी और मुझे गोद में उठाया। मुझे डर लग रहा था कि अब माँ से भी मार पड़ेगी। पर माँ मुझे गोद में उठाकर घर लायी, फिर डॉक्टर के पास ले के गयी। मरहम पट्टी करके घर आया। माँ की ममता तो माँ ही जान सकती है।

ऐसे ही एक बार मैं अपने चाचा के घर खेल रहा था। मैं और मेरा चचेरा भाई सुशिल की आपस में जिद हो गयी कि बिजली का बल्ब मैं बंद करूंगा। वो कहता कि मैं बंद करूंगा, मैं कहता कि मैं बंद करूंगा। नीचे से बटन पर हाथ नहीं जाता था, तो हम खिड़की के ऊपर चढ़ गए।  तभी मैं खिड़की पर से नीचे गिर गया और नीचे दरवाज़े में लगी मेख (कील) मेरे आँख के ऊपर लगी। शुक्र हुआ कि आँख बच गयी पर माथे से खून बह रहा था। तभी माँ ने मुझे गोद में उठाया और डॉक्टर के पास ले गयी। गांव में चतन्ना डॉक्टर की दुकान थी, पर वो दुकान पर नहीं था। मेरे चाचा की दुकान पास के गांव जनसुई में थी। माँ मुझे पैदल ही गोद में उठा कर जनसुई ले गयी जो 4 -5 किलोमीटर दूर पड़ता है। फिर मुझे दवाई दिलवाई।

 एक और कारनामा याद आया है। दिवाली का दिन था। सारी रात पटाखे चला के अगले दिन जले हुए पटाखों में से बिना जले पटाखे ढूंढ़ने का काम बाकी था। जो भी पटाखा मिलता उसमें से मसाला निकाल कर हथेली पर रख लेता। जब काफी सारा मसाला इकठा हो गया तो मैंने हाथ को आग के ऊपर करके मसाला डालने की कोशिश की। आग मेरे हाथ में लगे मसले में लग गयी। मेरा हाथ जल गया। फिर माँ प्रकट हुई। जले हुए हाथ पर हल्दी वगैरा लगाई और चतन्ना डॉक्टर के पास से दवाई दिलवाई। हम उन्हें दुःख देने से बाज़ नहीं आते और वो हमें अपने आँचल की छाँव देने से। माँ तुम धन्य हो।

Friday, April 20, 2018

शहर की शादी में भीड़, भीड़ में भी मैं अकेला....


मैंने कई ऐसी शादियां अटैंड की जिनको देख के लगता भी नहीं था कि ये कोई शादी का माहौल होगा। गांव की शादी में तो आज भी शादी में तो कई दिन पहले से रौनक लगनी शुरू हो जाती है और शादी के कई दिन बाद भी बनी रहती है। पर शहर में तो शादी के 1  घंटे बाद लगता ही नहीं कि शादी हुई है। मुझे शहर की एक शादी में जाने का मौका मिला। मेरा दोस्त रंजीत जो अपने दोस्तों के साथ उस शादी में जा रहा था। वो मुझे कहने लगा कि तुम भी आ जाओ। मुझे कोई काम नहीं था, सो मैं भी चला गया। 

हम वहां शाम को 7 बजे पहुंचे। शादी एक पैलेस में थी। जब हम पैलेस की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने गए तो देखा कि लगभग 500 गाड़ियाँ होंगी। जिनमे मेहमान आये हुए थे। हम भी अपनी गाडी खड़ी करके पैलेस में चले गए। जब हम गेट पर पहुंचे तो स्वागत करने के लिए घरवाले और रिश्तेदार दरवाज़े पर खड़े थे। तरह तरह के फूलों से पुरे पैलेस को सजाया हुआ था। कई तरह की बिजली की झालरें लगाई हुई थी। एक दो दरवाजे पार करके हम पैलेस के अंदर दाखिल हो गए। 

अंदर जा के देखा तो लोग इधर उधर ऐसे टहल रहे थे, मानो दिवाली वाले दिन बाजार में खरीददारी करने आये हुए हों। इतने लोग देखकर मैं हैरान रह गया। सभी अपने अपने मोबाइल फ़ोन में सेल्फियां लेने में मशगूल थे। शादी में बड़े बड़े मंत्री, अफसर आये हुए थे। जितने भी परिवार आये हुए थे सभी अलग अलग मेज़ों पर बैठे हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे सभी होटल में आये हुए हों, और एक दूसरे को जानते ही ना हों।  हम 5-6 थे, जो एक दो गाड़यों में गए थे। 

पहले घरवालों के साथ फोटो खिचवाई, फिर सभी अपने अपने रस्ते हो लिए। पैलेस के एक कोने में शराब की स्टाल लगी हुई थी। वो आगे जा रहे थे, हम उनके पीछे। जब हम स्टाल पर पहुंचे तो सभी के हाथ में शराब के गिलास थे। मैं तो उनको देख कर वापस मुड़ गया। और दूसरी स्टालों की तरफ चला गया। वहां रबड़ी, फ्रूट चाट, टिक्की, कोल्ड ड्रिंक, और और शाकाहारी स्टाल लगी हुई थी। मैंने सभी स्टालों से कुछ न कुछ खा पी के देखा। कुछ वेटर मेज़ों पर बैठे परिवारों को खाने के चीजें परोस रहे थे। वहीं पर ड्रोन कैमरे भी उड़ रहे थे। बच्चे तो ड्रोन कैमरे को देख ही खुश हो रहे थे। ड्रोन कैमरा सभी के लिए खींच का केंदर बना हुआ था। रात के 10  बज गए थे।  

फिर हम सब खाना खाने हाल में चले गए। वहां भी हर तरह का खाना लगा हुआ था। नॉन-वेज, और वेज दोनों तरह का खाना मेज पे सजाया हुआ था। मैंने प्लेट में पुलाव डाल लिए और दाल डाल कर खाने लगा। तभी मुझे लगा कि कहीं मैंने नॉन-वेज तो नहीं डाल लिए। क्यंकि अगर उन पर टैग न लगा हो तो पता ही नहीं चलता कि कौन सा वेज है और कौन सा नॉन-वेज। मैंने मेज पर खाने के सामने लगे टैग देखे। मैंने वेज ही डाला था। खाना खा कर, फिर कुछ मीठा खाने के लिए स्टाल की तरफ गया। मिठाई में भी कई स्टालें लगी हुई थी। गरम गुलाबजामुन, गुड़ की डिश, खीर, आइस-क्रीम, कई के तो मुझे नाम भी नहीं पता। 

मैंने तो सिर्फ आइस-क्रीम ही खाई, क्यूंकि अब पेट में जगह भी नहीं बची थी। दिल कर रहा था कि यहीं किसी सोफे पर लेट जाऊं। सब ने अपनी अपनी पेट पूजा की और चलने की तैयारी की। हम सभी गाडी में बैठे और मोहाली आ गए। उस शादी में इतनी भीड़ थी, पर मुझे इतनी भीड़ में भी अकेलापन ही महसूस हो रहा था। क्यूंकि अपनापन भीड़ में नहीं अपनों के बीच होता है। जितने भी लोग उस शादी में आये हुए थे, मुझे नहीं लगता कि वो  किसी को जानते भी होंगे।


Tuesday, April 17, 2018

आतंकवाद ऑनलाइन


आज के युग में सोशल मीडिया ने इंसान की ज़िंदगी में अहम् जगह बना ली है। फेसबुक, व्हाट्सप्प के बिना ज़िंदगी में कोई कमी सी लगती है। किसी वजह से जब किसी दिन इंटरनेट बंद रहता है और पूरा दिन बिना व्हाट्सप्प और फेसबुक के गुजरता है तो ज़िंदगी का जैसे कोई जरूरी हिस्सा छूट गया लगता है। आज इंटरनेट बंद है, पता नहीं व्हाट्सप्प पर क्या आया होगा, फेसबुक पर पता नहीं कौनसी नई जानकारी आयी होगी। लोग इनका इस्तेमाल बिना सोचे समझे कर रहे हैं। आज की ज़िंदगी में इनका बहुत महत्व है, एक ज़रूरी हिस्सा बन चुके हैं। टेक्नोलॉजी ने इंसान की ज़िंदगी में बहुत तरक्की ला दी है। इंसान ने इनके इस्तेमाल से अपनी ज़िंदगी की रफ़्तार जैसे बढ़ा दी है। घर बैठे हर जानकारी उसे मिल रही है। फेसबुक उसे दुनिया की सारी जानकारी घर बैठे दे रही है, पर वो है कि अपना इतना सा भी दिमाग इस्तेमाल नहीं करता कि ये सच है या झूठ। बस जो फेसबुक पर आ गया, उसे ही सच मान बैठा है। और बिना सोचे समझे आगे फॉरवर्ड कर देता है।
किसी शहर से एक लड़का लापता हो गया था। उसके दोस्तों ने उसकी फोटो फेसबुक पर डाल दी। साथ में लिख दिया कि ये लड़का कल से लापता है, जिसे भी मिले उसे घर पहुंचा दे। पता और फ़ोन नम्बर भी दे दिया। साथ में लिखा दिया कि इस पोस्ट को इतना फैलाओ, इतना शेयर करो कि ये लड़का इसके माँ बाप तक पहुंच जाये। शाम वो लड़का वापस घर आ गया। पर फेसबुक पर जो फोटो डाली थी, लोगों की रहमदिली की वजह से पुरे भारत में फैला दी गयी। लोगों ने बड़े ज़ोर शोर से पोस्ट को शेयर किया, हर किसी ने अपने दिल की ममता दिखाई और पोस्ट को शेयर किया। कुछ दिन बाद लड़के का घर से निकलना बंद हो गया। क्यों? क्यूंकि फेसबुक पर पोस्ट फैली हुई थी। जब भी घर से बाहर जाता, लोग उसे पकड़ कर घर छोड़ जाते। रहमदिली, इंसानियत जो थी लोगों के दिलों में। और फेसबुक 2 साल बाद भी लोगों को जागरूक कर रही है कि ये लड़का लापता है, हर कोई शेयर कर रहा है। सलूट करता हूँ, फेसबुक का इस तरह से इस्तेमाल करने वालों को। लोगों को जैसे इनके सिवाय कोई काम ही नहीं रहा आज। किसी के गुम हुए कागज़ात मिल जाते हैं तो उनकी फोटो खींच के फेसबुक पर डाल देते हैं और साथ में लिख देते हैं कि इस पोस्ट को इतना फैलाओ कि कागज़ात इसके असली मालिक तक पहुंच जाएँ। और लोग भी उसको शेयर करते रहते हैं, कागज़ात को उसके असली मालिक तक पहुंचा के ही रहते हैं। शायद पोस्ट डालने वाले को ये नहीं पता कि उन कागज़ातों पर पता लिखा होता है। अगर उसके दिल में इतनी ही दया होती है, तो वो उन कागज़ातों को डाकखाने से पोस्ट भी कर सकता है। पर उसकी पोस्ट डाकखाने में नहीं, फेसबुक पर होती है। आज दरयादिली सिर्फ फेसबुक के लिए ही रह गयी है। फेसबुक पर ही मोमबत्ती मार्च निकाल देते हैं, फेसबुक पर ही श्रधांजलि दे देते हैं। धरम के नाम पर लोग फेसबुक पर लड़ रहे हैं। हिंदुस्तान के लिए लाइक बढ़ा के पाकिस्तान को घर बैठे ही हरा देते हैं। मुझे लगता है कि आज इंटरनेट की वजह से दूरियां घट गयी हैं पर शायद दिलों में नफरत बढ़ गयी है। क्या ये आतंकवाद से कम है? ये इंटरनेट आतंकवाद के नाम से जाना जायेगा। जैसे अमरीका घर बैठे ड्रोन से सीरिया में हमला करता है, वैसे ही लोग घर बैठे इंटरनेट का गलत इस्तेमाल करके हमला कर रहे हैं। नफरत फैला रहे हैं। अगर आप के पास कोई काम नहीं है तो कृपया करके इस तरह के घटिया काम भी मत करो। लोगों को शांति की ज़िंदगी जीने दो। मेरी सभी से यही अपील है।

Saturday, April 14, 2018

एक था मोची.....


हमे जिस चीज का शौक होता है, हम उसे किसी न किसी बहाने से पाना चाहते हैं। अगर हमें वो कहीं से मिल जाये, तो क्या कहना। जब मैं साइकिल चलाना सीख रहा था, तो किसी ना किसी बहाने से साइकिल चलाने का मौका ढूंढ़ते थे। हमारे गांव के पास वाले गांव सौन्टी से एक मोची आता था। वो अपने साइकिल पर सामान रखकर गाँव  गाँव में घूमता रहता था। वो बेचारा सीधा सादा सा था। हम उससे जूते ठीक करवा लेते थे। एक दिन वो हमारी गली में बैठा था। उसने मुझसे कहा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है, तुम जा के डॉक्टर से दवाई ले आओ मेरे लिए। मैंने पहले तो मना करना चाहा, पर जब उसने कहा कि मेरी साइकिल ले जाओ। मेरी तो जैसे बांछें खिल गयी, मुझे और क्या चाहिए था। मैंने झट से हां कर दी। मैंने साइकिल उठाया। साइकिल का अगला मगराड नहीं था। पीछे देखा तो पिछला मगराड भी नहीं था। चेन कवर भी नहीं था। बिलकुल छकड़ा ही कह सकते हैं उसे। एक बार तो दिल किया कि रहने ही दूँ, इस साइकिल से अच्छा पैदल ही जा के ले आउ। फिर सोचा जैसा भी है, चलाने को तो मिलेगा। मैं उसका साइकिल ले गया। मैं उसके गांव सौन्टी में जा पहुंचा, जो वहां से कोई डेढ़ या दो किलोमीटर होगा। सौन्टी जा के पशुओं के हस्पताल में चला गया। और पशुओं के डॉक्टर को जा के बोलै की मोची की दवाई दे दो। डॉक्टर ने सोचा कि मोची की दवाई वो भी पशुओं के हस्पताल में। उसने कहा कि मोची कौन। मैंने कहा कि आपके गांव सौन्टी का ही है। पर वो डॉक्टर गांव ठोल से आता था। उसने कहा कि मुझे नहीं पता, उसे कहना आ के खुद ले जाये। मैं वापस मुड़ गया। वापस आ के मोची को बोला कि डॉक्टर ने मना कर दिया, और बोला कि वो खुद आ के ले जाये। मोची ने कहा कि इतनी देर कैसे लग गयी। डॉक्टर तो आपके गांव सोँटा में ही था। मुझे लगा कि शायद गलत डॉक्टर के पास चला गया। उसने बताया कि गुरमेल डॉक्टर के पास जाना था। जो हमारे ही गांव में था। पर मुझे लगा कि वो सौन्टी का है, तो सौन्टी में जाना होगा। वो बेचारा अपना सामान साइकिल पर रखकर चला गया। चलो मुझे तो साइकिल चलाने को मिल गया था बेशक उसकी दवाई ना मिली तो ना सही। ये बात आज भी छिड़ जाती है तो वो मोची याद आ जाता है। कुछ दिनों बाद पता चला कि वो मोची अब इस दुनिया में नहीं रहा। बेचारा मोची, जब भी आ जाता था, हम उसके साथ मज़ाक करते रहते थे।

Thursday, April 12, 2018

झूठी चाय वो भी मेहमान को......


आज किसी के घर में कोई मेहमान आ जाये तो मुश्किल से ही एक रात लगाता है। वो भी अगर बस में आया हो तो। अपनी गाडी में या बाइक पर आया तो ज्यादा से ज्यादा सुबह को आकर शाम को वापस चला जाता है। पहले मेहमान के आने का पता तभी चलता था जब वो आ कर दरवाजे पर खड़ा हो जाता था। आज तो घर से चलने से पहले फ़ोन कर देते हैं। पता लगता रहता है कि अब कहां पहुंच गया, अब 10  मिनट तक पहुंच जायेगा। पहले किसी मेहमान को दरवाजे पर देख कर एकदम से कितनी ख़ुशी मिलती थी। 

मेहमान भी 3 -4 दिन आराम से लगा देता था। दिन में काम कर के सभी मेहमान के पास इकठे हो जाते थे। आंगन में चार पांच चारपाई डाल देते थे। सबके आँगन खुले होते थे। आज तो सबके घरों में दीवारें हो गयी हैं। पहले एक आंगन में बैठा मेहमान सभी को मिल लेता था, पर आज दिवार पार दूसरे घर में जाना ज़रूरी होता है। अगर न जाएँ तो गुस्सा हो जाते हैं, कि हमारे घर नहीं आना चाहते। जिस जिस को खबर मिलती कि फलाने के घर मेहमान आया है, वो अपना काम निपटा कर मेहमान के पास आ जाता था। पहले सबके मेहमान सांझे होते थे। 

आज किसी के पास टाइम ही नहीं हैं। पड़ोस में भी पता नहीं लगता कि किसी के घर कोई मेहमान कब आया और कब चला गया। एक बार हमारे घर एक मेहमान आये, वो बज़ुर्ग थे। उनका नाम बाबू था। हमारे ताया जी, बापू जी, चाचा जी, सभी उनके पास बैठे थे। मैं उनके पीछे खड़ा चाय पी रहा था। अचानक उस मेहमान को लगा कि शायद मेरे लिए चाय ले के आया है। उसने हाथ आगे कर दिया, कि ला दे चाय। मैं झिझक रहा था चाय देने में। क्यूंकि वो चाय मेरी थी, और झूठी भी हो गयी थी। तभी ताया जी भी कहने लगे कि जब चाय ले के आया है तो दे दे। मैंने चाय दे दी। 

सब देख रहे थे, पर कोई कुछ नहीं बोला। मुझे लगा कि मेरी चाय ले के पी ली। पर उस समय कुछ नहीं कह सका। बाद में मैने ताया जी को बताया कि वो चाय मेरी झूठी थी। आप ने उसे पिला दी।ताया जी ने कहा कि चलो कोई बात नहीं, पर अब उसको मत बोलना। अब भी कई बार वो पुरानी बातें शुरू हो जाती हैं, तो ये झूठी चाय वाली बात भी ज़रूर होती है। अब तो वो मेहमान (बाबू) भगवन को प्यारा हो गया है। आज कल के मेहमान ज्यादा टिकते भी नहीं हैं। सुबह आये, शाम को वापस चले जाते हैं। घर में अब मेहमान वाली ख़ुशी भी नहीं रही। किसी मेहमान आने से वो ख़ुशी महसूस ही नहीं होती जो एकदम दरवाजे पर दिखने वाले मेहमान से होती थी। काश वो ज़माना फिर से आ जाये, और हम वो ज़िंदगी फिर से शुरू कर सकें।

Saturday, April 7, 2018

किनमण काणि कौन कीन्या.....


इस दुनिया में कौन है, जो अपने बचपन के दिन भूलना चाहेगा? मुझे लगता है कि कोई भी नहीं भूलना चाहेगा। शायद भगवन ने पूरी ज़िंदगी में बचपन को ही इतना प्यारा बनाया है। पर कहते हैं कि जो हमें मिला है, उसमे हम खुश नहीं रहते। बचपन में लगता था कि कब बड़े हो जाएँ, स्कूल जाने से छुट्टी मिल जाएगी। मां बाप की डांट से छुटकारा मिल जायेगा। पर शायद ज़िंदगी के वो ही दिन सबसे कीमती थे। बचपन जाने के बाद तो ज़िंदगी भागदौड़ में भी ठहरी हुई है। बचपन के दिन कब गुज़र गए, पता ही नहीं चला। छोटे होते जो शरारतें करते थे, आज उन्हें याद करने का भी समय किसी के पास नहीं है। घर में, आंगन में, जहां भी थोड़ी खुली जगह दिख जाती थी, बस थोड़ा खोद कर कंचे खेलने लग जाते थे। आज ना तो आँगन रहे, ना कंचे खेलने वाले बच्चे। कंचे की  बोतलें भर लेते थे। झकरीयाँ भी कंचों से भरी रहती थी। जैसे वो हमारी ज़िंदगी का कोई खज़ाना हो, जिसको इकठा करके बड़ा मज़ा आता था। नीम के पेड़ पर पील पलंगड़ा खेलना। पेड़ से गिरने का डर तो होता ही नहीं था। उस समय तो बस खेल में ही ध्यान रहता था। गुल्ली डंडा खेलना, साइकल के पुराने टायर ले के सड़क पर खेलना, खो-खो, लुक मचाई, पकडन पकड़ाई, किनमन-कानी कौन कीन्या,  ऊंच-नीच वगैरा वगैरा। किनमन-कानी कौन कीन्या में एक लाइन बोलते थे, (लुकजो छिपजो कनक का दाणा, टोहा न पाणा )। हाहाहा , अजीब नाम होते थे खेलों के भी। एक खेल और भी था, (कोरडा सा जुमे रात आयी ए, आईये बई आईये, जेहड़ा आगे पीछे देखा ओह्दी श्यामत आईये, आईये बई आईये )।  इस खेल पर गुरदास मान का गीत भी बना हुआ है। मुड़-मुड़ याद सतावे पिंड दिन गलियां दी। इस गीत को सुनके वही खेल, वही बचपन के दिन याद आ जाते हैं। आजकल के बच्चों को तो इनके नाम सुने भी नहीं होंगे। लड़कियां इकठी हो कर किकली डालती थी। वो एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल गोल घूमती थी। गीटे खेलने, पुर पुर, सड़क से पत्थर की रोड़ी इकठी कर के पुर पुर खेलते थे। दुपहर इन खेलों में ही कटती थी। हम अपने घर में तो कम ही टिकते थे। दोपहर में भी बाहर खेलते रहना। धुप भी जैसे हमारे साथ ही खेलती थी। आज लोग धुप में निकलते हैं, तो छाता लेकर निकलते। माँ जब दोपहर को घर से बाहर नहीं आने देती थी कि धुपमें खेलोगे, गर्मी लग जाएगी। पर जैसे ही वो सो जाते, फिर से निकल पड़ते बाहर खेलने। बरसात के मौसम में जोहड़ पानी से लबालब भरे रहते थे। आज कल तो पानी निकलने के लिए भी खाई नहीं छोड़ी। बरसात होने पर खेतों में अमरुद तोड़ने निकल जाना, भैंसों को पानी पिलाने के लिए जोहड़ में जाना और उन पर पर चढ़कर खुद भी पानी में तैरना। जिस पानी में भैसों को पानी पिलाना, उसी पानी में नहाना, तैरना। बरसात के पानी में जोक से भी डर लगता था। कई बार टांग पर जोक चिंबड जाती थी, साथ में सफेद नमक रखते थे। तभी जोक के ऊपर उस नमक को डालते और वो उतर के मर जाती। स्कुल से छुट्टी होने के बाद भैंसों को चराने ले जाना। जामुन के पेड़ पर चढ़कर जामुन तोड़ना। कई बार ये सुना करते थे कि जामुन के पेड़ पर भूत होता है। कई बार कोई पेड़ गिर भी जाता तो यही सोचते कि शायद उसी भूत ने गिराया है। कई लोग ये झूठी अफवाहें इसलिए भी फैलाते थे कि उनके खेत में लगे जामुन के पेड़ पर कोई बच्चा जामुन तोड़ने ना जाये। जब कभी आंधी चलती थी, सभी सड़क पर दौड़ आते थे। क्यूंकि आंधी में किक्कर के पेड़ से सूखी लकड़ियां टूट कर गिर जाती थी। जिस दिन ज्यादा लकड़ियां ले कर आते, तो घर से शाबाशी भी मिलती थी। छुट्टी वाले दिन तो सवेरे से ही घर से बाहर निकल जाना, दोपहर को खाना खाने आना, फिर निकल जाना, फिर शाम को, या रात को ही घर आते थे। वो समय था, जब ना कोई फ़िक्र होती थी। बस मौज मस्ती करना। बरसात होने पर बरसात में बहाना भी बहुत कमाल था। गीली मिटटी पर पानी डाल कर फिसलना, गारे में लिब्ड जाना। घर कि छतें कच्ची होती थी, बरसात होने पर वो चूने लग जाती थी। छत से गिरते पानी को रोकना के लिए छत पर जा कर वो जगह ठीक करना जहां से पानी आ रहा हो। नीचे बाल्टी, डोलू या पतीली रखकर पानी से बचने का इंतज़ाम किया जाता था। 
 जो छतें आज भी कच्ची है, बरसात का मौसम शुरू होने से पहले उन पर भी गारा लगाया जाता है।  मैं तो कभी अपने बचपन को भूल नहीं सकता, कोई भी नहीं भूल सकता। बचपन कि इतनी यादें होती है, जो एक छोटे से लेख में नहीं लिखी जा सकती। सो, बाकि यादें फिर सांझी करेंगे।

Thursday, April 5, 2018

गोबर की होली... छी छी..


जब होली आती है तो सभी के मन रंगों से खेलने लग जाते हैं। लाल, हरा, ग़ुलाबी, पीला, नीला, हर रंग सबको अपनी तरफ खींचता है। वैसे तो होली खेलने का मज़ा बचपन में आता था। हर किसी के ऊपर रंग डाल देते थे। आजकल तो किसी के पास टाइम ही नहीं होली खेलने के लिए। जिसके पास है वो वैसे नहीं खेलता। उसका एक ही डायलॉग होता है, कि हम न किसी के ऊपर रंग डालते हैं, और न किसी से डलवाते हैं। रंग डालने वाला भी कई बार डर जाता है कि चलो क्यों पंगा लेना। पर इस बार की होली जैसी होली मैंने खेली ही नहीं थी। गांव में कई जगह लोग गोबर घोल घोल कर लोगों पर डाल देते हैं। वो ये भी नहीं सोचते कि वो क्या सोचेगा। होली में गोबर,, छी छी ... , सोचकर ही घृणा सी होने लगती है। जो लोग गोबर में जूता पड़ जाने से भी कतराते हैं, उनके ऊपर गोबर डाल दिया जाये तो सोचो उसे कैसा महसूस होता होगा। कई तो होली के दिन रिश्तेदारी में जाने से भी कतराते हैं। हमारे घर में भी इस होली के दिन एक रिश्तेदार आ गया और वो भी साला, तो बोलो उसे कौन नहीं रंगना चाहेगा। ताया जी के लड़के का साला सुखबीर। हम सब घर पर ही थे। चाचा के लड़के राजेश की घरवाली ने अपने घर में गोबर घोल कर रखा हुआ था होली खेलने के लिए। सभी बच्चे रंगों से होली खेल रहे थे, और वो गोबर से। गली में आने जाने वाले भी वहां से गुजरते समय ध्यान रखते थे कि पता नहीं किस तरफ गोबर की बाल्टी आ जाये। कई जगह नालियों का चीक भी होली के लिए काम आता है। हम सब गली में खड़े थे। चाचा की लड़की ने उस दिन अपने आंगन में गोबर फेरा हुआ था। सुखबीर हमारे पास से गुजरा, तो किसी ने कहा कि आ गया सुखबीर, आ गया सुखबीर, पकड़ लो, पकड़ लो, जाने ना पाए। पर हम रिश्तेदार का ख्याल रख रहे थे, बस वैसे ही मज़े ले रहे थे उसे छेड़ कर। पर शुरुआत उसने ही कर दी। वो पानी का मग भर कर हमारे ऊपर डाल गया। और जाकर कमरे में बैठ गया। फिर हम भी उसे लेने चले गए। बड़ी मुश्किल से उसे बाहर तक ले आये। इतना ज़ोर उसमे कि हम दो के पास भी नहीं आ रहा था। खैर उसे गली में ले आये। और उस के मुँह पर गुलाल लगा दिया। पहले सोचा कि बस अब छोड़ दें। पर उसने हमारी इतनी ताकत लगवाई थी बाहर आने में, कैसे जाने देते। मैं उसको पकड़ कर उस जगह ले आया, जहां आंगन में गोबर फेरा हुआ था।  सब एक दूसरे पर पानी फेंक रहे थे, जिससे वो गोबर पतला हो गया। मैं सुखबीर को लेकर गोबर में ले आया और एकदम नीचे बैठ गया। मेरे कपडे तो पहले से ही गोबर में लिब्डे हुए थे, राजेश की घरवाली की मेहरबानी से। सुखबीर के कपडे भी लिबेड़ दिए। उसने डाला भी हुआ सफेद कुरता पजामा था। उधर राजेश की घरवाली गोबर का गिलास ले के इस ताक में खड़ी रहती कि इधर से निकलेगा तो गोबर डाल दूंगी। पर ख़ुफ़िया जानकारी मिल जाती थी मुझे, मैं चुपके से जाके पानी डाल आता। फिर मैंने भी एक बाल्टी में गोबर घोल लिया। उसने एक डिब्बा गोबर का भर के छोटे भाई की घरवाली के ऊपर फेंकना चाहा, पीछे मैं खड़ा था, तभी मैंने पानी की बाल्टी फेंक दी। जो गोबर उसने फेंका था, वो पानी के साथ उसके ऊपर ही जाकर गिरा। वो गोबर फेंकने से बाज़ नहीं आ रही था। फिर हमने भी उसको उसी के रंग में, यानि कि गोबर में पूरी तरह से लिबेड़ दिया। जो जिस तरह से खेलना चाहे, उसके साथ उसी तरफ से पेश आना चाहिए।
ये दिन मेरे लिए एक यादगार बन कर रह गया।

Tuesday, April 3, 2018

फोटो सेशन उस जमाने का....

तांगे पर खींची एक पुरानी फोटो 

आजकल फोटो खींचना बिलकुल आम बात हो गयी है। पहले क्या होता था, स्पेशल फोटोग्राफर को बुलाते थे। पर उससे पहले पक्का करना होता था कि किस किस ने फोटो खिचवानी है। अगर हमने फोटो खिचवानी होती थी, तो एक दिन पहले फोटोग्राफर को बता देते थे कि हमने फोटो खिचवानी है। उसके आने से पहले सभी तैयार हो जाते थे। एक बार हम वन में गए हुए थे। उस समय स्कूल से छुट्टी होने के बाद भैंसों को चराने के लिए वन में ले जाते थे। घर पे फोटोग्राफर आया हुआ था। बलकार सैनी, जो धगड़ौली गांव का है। वो गांव में स्पेशल जाता था फोटो खींचने। सभी अपने मनपसंद की फोटो खिचवाते थे। मुझे भी फोटो खिचवाने का बहुत शौक था। अब भी है, पर अब खुद मोबाइल से फोटो खींच लेते हैं। पहले मैंने रील वाला कैमरा लिया था 450 रूपये में। खुद के पास कैमरा होना भी बहुत बड़ी बात लगती थी। उस समय फोटो खींच कर साथ की साथ नहीं देख सकते थे। धुलवानी पड़ती थी। तब पता चलता था कि फोटो कैसी आयी है। कई बार आँखें बंद आ जाती थी। आजकल तो उसी समय देख लेते हैं कि कहीं आँखें तो बंद नहीं आयी हैं। चलो मैं उसी बात पर आता हु। फोटोग्राफर घर पर बैठा हुआ था। हम सभी (मैं, दर्शन, पवन, संजय, छाजू, माँगा, नरेश) वन से आ गए। कच्चा रास्ता होता था, जिस करके सभी धुल मिटटी में अटे पड़े थे। हम सभी को बड़ा चाव चढ़ रहा था फोटो खिचवाने का। हमने कपडे भी नहीं बदले, जैसे आये थे, वैसे ही खड़े हो गए। हमारे फूफा जी आये हुए थे, सुमेर चंद। उनके पास घोडा होता था। मेरे ताया जी भी तब तांगा चलाते थे। हमारे घर के सामने कब्रिस्तान होता था। हम सभी वहीं पर खेलते रहते थे। उसी कब्रिस्तान में हमने फोटो खिचवाई थी। हमने छोटे भाई नरेश को घोड़े पर बिठा दिया। एक तरफ बड़ी बहन ममता खड़ी हो गयी।  एक तरफ मैं घोड़े के ऊपर हाथ रख कर खड़ा हो गया। अब डर भी लग रहा था कि कहीं घोडा न चला जाये। इसलिए फूफा जी घोड़े को पकड़ कर खड़े हो गए। सभी ने कुछ फोटोज खिचवाई। तब ये  भी ध्यान नहीं रहता था कि मैं ठीक लग रहा हु या नहीं। दर्शन, पवन और संजय ने (तीनों भाई) ने एकसाथ फोटो खिचवाई। जब वो फोटो बन कर आयी, तब देखा, दर्शन कि कमीज के बटन ऊपर नीचे लगे हुए थे। उस फोटो को देखकर बहुत हसी आती है। हमारे ताया जी घोडा तांगा रखते थे। तब बसें नहीं चलती थी। तांगे  ही सवारियों को ढ़ोने के काम आते थे। आजकल तो बहुत ही कम दिखाई देते हैं। ताया जी ने सुरेंदर चाचा के साथ तांगे पर बैठकर फोटो खिचवाई थी, साथ में ताया जी कि बेटी पूनम भी खड़ी हो गयी। आज उस फोटो को देखो तो पहचान भी नहीं पाते कि ये पूनम है। मैंने डिजिटल कैमरा लिया था, जिससे मैं कभी भी, कोई भी फोटो खींच के अपने पास रख लेता था। जब से मोबाइल लिया है, वो कैमरा भी वेहला पड़ा है। आज मोबाइल ही सब कुछ बन गया है। समय के पता ही नहीं चलता कब चला जाता है। जैसे पंख लगा कर उड़ रहा हो। ऐसा लगता है जैसे अभी कल की ही बातें हैं ये। उन फोटोज को देखकर अतीत में चले जाते हैं। जैसे अभी भी वहीं ज़िंदगी जी रहे हों। दिल करता है की काश ऐसा कोई सॉफ्टवेयर बन जाये जिससे हम अपने बचपन के दिनों में जा सकें और वही आनंद ले सकें जो उस समय लेते थे।


   

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...