बचपन की ज़िंदगी की बातें खत्म ही नहीं हो सकती। और उनको चाहकर भी भुला नहीं सकते। बचपन में ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं, जिनको बाद में याद करें तो अपने आप के बारे में सोचना पड़ जाता है कि क्या मैं ऐसे कारनामे करता था। जिनको आज याद करके हसी भी आती है और अपनी बेवकूफियों पर शर्म भी।
| दिवाली की पूजा के समय माँ, छोटा भाई और मेरी बेटी निकिता। |
आज भी जेहन में कई घटनाएं आ जाती हैं। जिस काम से घरवाले मना करते हैं, हम उनको ज़रूर करते हैं।और उसका खामिआज़ा भी भुगतना पड़ता है। हमारा घर सड़क के पास पड़ता है। सड़क पर वाहन चलते रहते हैं, तो माँ हमें सड़क पर जाने से रोकती थी, और आज भी हम बच्चों को सड़क से दूर रहने की हिदायतें देते रहते हैं। झूले लेने का बड़ा शौक था। इधर से ट्राली के पीछे लटक कर थोड़ी दूर जा के उतर जाना। फिर उधर से पैदल वापस आना या फिर दूसरी तरफ से आती हुई ट्राली के पीछे लटक कर आ जाना।
ऐसे ही एक बार मैं सड़क पर जाती हुई ट्रेक्टर ट्राली के पीछे लटक गया। ट्राली की रफ़्तार काफी ज्यादा थी, जब मैं उतरने लगा तो मेरी कमीज़ ट्राली में फंस गयी। अब मैं न तो ट्राली से उतर सका और न ही ट्राली पर था। ट्राली के साथ साथ घिसटता जा रहा था। तभी अचानक कमीज़ फट गयी तो मैं सड़क पर गिर गया। मुझे काफी चोट लगी थी।सड़क से आती हुई एक औरत ने घर जा के बताया कि तुम्हारा लड़का सड़क पर गिर गया है। माँ दौड़ कर सड़क पर आयी और मुझे गोद में उठाया। मुझे डर लग रहा था कि अब माँ से भी मार पड़ेगी। पर माँ मुझे गोद में उठाकर घर लायी, फिर डॉक्टर के पास ले के गयी। मरहम पट्टी करके घर आया। माँ की ममता तो माँ ही जान सकती है।
ऐसे ही एक बार मैं अपने चाचा के घर खेल रहा था। मैं और मेरा चचेरा भाई सुशिल की आपस में जिद हो गयी कि बिजली का बल्ब मैं बंद करूंगा। वो कहता कि मैं बंद करूंगा, मैं कहता कि मैं बंद करूंगा। नीचे से बटन पर हाथ नहीं जाता था, तो हम खिड़की के ऊपर चढ़ गए। तभी मैं खिड़की पर से नीचे गिर गया और नीचे दरवाज़े में लगी मेख (कील) मेरे आँख के ऊपर लगी। शुक्र हुआ कि आँख बच गयी पर माथे से खून बह रहा था। तभी माँ ने मुझे गोद में उठाया और डॉक्टर के पास ले गयी। गांव में चतन्ना डॉक्टर की दुकान थी, पर वो दुकान पर नहीं था। मेरे चाचा की दुकान पास के गांव जनसुई में थी। माँ मुझे पैदल ही गोद में उठा कर जनसुई ले गयी जो 4 -5 किलोमीटर दूर पड़ता है। फिर मुझे दवाई दिलवाई।एक और कारनामा याद आया है। दिवाली का दिन था। सारी रात पटाखे चला के अगले दिन जले हुए पटाखों में से बिना जले पटाखे ढूंढ़ने का काम बाकी था। जो भी पटाखा मिलता उसमें से मसाला निकाल कर हथेली पर रख लेता। जब काफी सारा मसाला इकठा हो गया तो मैंने हाथ को आग के ऊपर करके मसाला डालने की कोशिश की। आग मेरे हाथ में लगे मसले में लग गयी। मेरा हाथ जल गया। फिर माँ प्रकट हुई। जले हुए हाथ पर हल्दी वगैरा लगाई और चतन्ना डॉक्टर के पास से दवाई दिलवाई। हम उन्हें दुःख देने से बाज़ नहीं आते और वो हमें अपने आँचल की छाँव देने से। माँ तुम धन्य हो।







