Thursday, April 5, 2018
गोबर की होली... छी छी..
जब होली आती है तो सभी के मन रंगों से खेलने लग जाते हैं। लाल, हरा, ग़ुलाबी, पीला, नीला, हर रंग सबको अपनी तरफ खींचता है। वैसे तो होली खेलने का मज़ा बचपन में आता था। हर किसी के ऊपर रंग डाल देते थे। आजकल तो किसी के पास टाइम ही नहीं होली खेलने के लिए। जिसके पास है वो वैसे नहीं खेलता। उसका एक ही डायलॉग होता है, कि हम न किसी के ऊपर रंग डालते हैं, और न किसी से डलवाते हैं। रंग डालने वाला भी कई बार डर जाता है कि चलो क्यों पंगा लेना। पर इस बार की होली जैसी होली मैंने खेली ही नहीं थी। गांव में कई जगह लोग गोबर घोल घोल कर लोगों पर डाल देते हैं। वो ये भी नहीं सोचते कि वो क्या सोचेगा। होली में गोबर,, छी छी ... , सोचकर ही घृणा सी होने लगती है। जो लोग गोबर में जूता पड़ जाने से भी कतराते हैं, उनके ऊपर गोबर डाल दिया जाये तो सोचो उसे कैसा महसूस होता होगा। कई तो होली के दिन रिश्तेदारी में जाने से भी कतराते हैं। हमारे घर में भी इस होली के दिन एक रिश्तेदार आ गया और वो भी साला, तो बोलो उसे कौन नहीं रंगना चाहेगा। ताया जी के लड़के का साला सुखबीर। हम सब घर पर ही थे। चाचा के लड़के राजेश की घरवाली ने अपने घर में गोबर घोल कर रखा हुआ था होली खेलने के लिए। सभी बच्चे रंगों से होली खेल रहे थे, और वो गोबर से। गली में आने जाने वाले भी वहां से गुजरते समय ध्यान रखते थे कि पता नहीं किस तरफ गोबर की बाल्टी आ जाये। कई जगह नालियों का चीक भी होली के लिए काम आता है। हम सब गली में खड़े थे। चाचा की लड़की ने उस दिन अपने आंगन में गोबर फेरा हुआ था। सुखबीर हमारे पास से गुजरा, तो किसी ने कहा कि आ गया सुखबीर, आ गया सुखबीर, पकड़ लो, पकड़ लो, जाने ना पाए। पर हम रिश्तेदार का ख्याल रख रहे थे, बस वैसे ही मज़े ले रहे थे उसे छेड़ कर। पर शुरुआत उसने ही कर दी। वो पानी का मग भर कर हमारे ऊपर डाल गया। और जाकर कमरे में बैठ गया। फिर हम भी उसे लेने चले गए। बड़ी मुश्किल से उसे बाहर तक ले आये। इतना ज़ोर उसमे कि हम दो के पास भी नहीं आ रहा था। खैर उसे गली में ले आये। और उस के मुँह पर गुलाल लगा दिया। पहले सोचा कि बस अब छोड़ दें। पर उसने हमारी इतनी ताकत लगवाई थी बाहर आने में, कैसे जाने देते। मैं उसको पकड़ कर उस जगह ले आया, जहां आंगन में गोबर फेरा हुआ था। सब एक दूसरे पर पानी फेंक रहे थे, जिससे वो गोबर पतला हो गया। मैं सुखबीर को लेकर गोबर में ले आया और एकदम नीचे बैठ गया। मेरे कपडे तो पहले से ही गोबर में लिब्डे हुए थे, राजेश की घरवाली की मेहरबानी से। सुखबीर के कपडे भी लिबेड़ दिए। उसने डाला भी हुआ सफेद कुरता पजामा था। उधर राजेश की घरवाली गोबर का गिलास ले के इस ताक में खड़ी रहती कि इधर से निकलेगा तो गोबर डाल दूंगी। पर ख़ुफ़िया जानकारी मिल जाती थी मुझे, मैं चुपके से जाके पानी डाल आता। फिर मैंने भी एक बाल्टी में गोबर घोल लिया। उसने एक डिब्बा गोबर का भर के छोटे भाई की घरवाली के ऊपर फेंकना चाहा, पीछे मैं खड़ा था, तभी मैंने पानी की बाल्टी फेंक दी। जो गोबर उसने फेंका था, वो पानी के साथ उसके ऊपर ही जाकर गिरा। वो गोबर फेंकने से बाज़ नहीं आ रही था। फिर हमने भी उसको उसी के रंग में, यानि कि गोबर में पूरी तरह से लिबेड़ दिया। जो जिस तरह से खेलना चाहे, उसके साथ उसी तरफ से पेश आना चाहिए।
ये दिन मेरे लिए एक यादगार बन कर रह गया।
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