Sunday, May 31, 2026

जब समय ठहरने वाला था


ज़िंदगी में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। हम उस समय तो उन्हें एक सामान्य घटना की तरह जी रहे होते हैं, लेकिन बाद में वही दिन यादों का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन जाते हैं। वर्ष 2020 का मार्च महीना भी कुछ ऐसा ही था। पूरी दुनिया एक अनजाने डर के साये में जी रही थी। एक ऐसा वायरस, जिसके बारे में किसी ने पहले कभी नहीं सुना था, धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका था। हर दिन टीवी पर नई खबरें आ रही थीं। कहीं लॉकडाउन की चर्चा थी, कहीं अस्पतालों की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। लोगों के मन में डर था और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी। 


उसी समय भारत में भी कोरोना वायरस के मामले बढ़ने लगे थे। देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 22 मार्च 2020 को "जनता कर्फ्यू" का पालन करने की अपील की। लोगों से कहा गया कि वे अपने घरों में रहें और अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। यह एक ऐसा दिन होने वाला था, जब पूरा देश स्वेच्छा से अपने घरों में रहने वाला था।

उस समय मैं चंडीगढ़ में काम करता था। चारों तरफ कोरोना वायरस की खबरें सुनकर मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। ऐसा लग रहा था कि आने वाले दिनों में हालात और भी बदल सकते हैं। इसलिए मैंने तय किया कि जनता कर्फ्यू से पहले अपने गांव चला जाऊं।

शुक्रवार की रात को ही मैंने अपना बैग तैयार करके रख दिया था। शनिवार को सुबह अपने जरूरी काम निपटाए और करीब दोपहर बारह बजे बाइक लेकर चंडीगढ़ से गांव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में सड़कों पर सामान्य दिनों की तुलना में कम भीड़ दिखाई दे रही थी। लोगों के चेहरों पर भी चिंता साफ नजर आ रही थी।

चंडीगढ़ से डेराबस्सी, बरवाला, शहजादपुर होते हुए मैं साहा पहुंच गया। वहां मेरी मौसी का घर था। मेरी पत्नी और भांजी जस्सू भी वहीं आई हुई थीं, जिन्हें साथ लेकर गांव जाना था। मौसी के घर पहुंचकर चाय पी, खाना खाया और कुछ देर आराम किया। 

शाम करीब चार बजे हम साहा से गांव के लिए निकल पड़े। आसमान में काले बादल घिरने लगे थे। मौसी ने हमें रोकने की कोशिश भी की। उन्होंने कहा कि मौसम ठीक नहीं लग रहा, थोड़ी देर रुक जाओ। लेकिन घर पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए हमने सफर जारी रखा।

अभी हम शाहबाद के आसपास ही पहुंचे थे कि बारिश शुरू हो गई। मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगीं। सड़क किनारे एक पेट्रोल पंप देखकर हम वहां रुक गए। लगभग आधे घंटे तक बारिश रुकने का इंतजार करते रहे।

बारिश कुछ कम हुई तो हमने फिर से यात्रा शुरू कर दी। लेकिन प्रकृति जैसे उस दिन बार-बार हमारी परीक्षा ले रही थी। कुछ दूरी तय करने के बाद फिर तेज बारिश शुरू हो गई। इस बार हम दिल्ली-अमृतसर हाईवे पर एक पुल के नीचे जाकर खड़े हो गए।

करीब दस मिनट बाद बारिश हल्की हुई और हम फिर आगे बढ़ गए। जैसे-जैसे गांव करीब आ रहा था, वैसे-वैसे मौसम का मिजाज भी बदल रहा था। लेकिन आगे जाकर देखा कि कई जगह बारिश बिल्कुल नहीं हुई थी। कुछ ही समय बाद हम सुरक्षित अपने गांव पहुंच गए।

घर पहुंचकर चाय पी और थोड़ा आराम किया। लेकिन गांव में आराम ज्यादा देर कहां टिकता है। शाम करीब छह बजे पिताजी का फोन आया। उन्होंने खेत में बुला लिया। पशुओं के लिए दो दिन का चारा लाना था।

मैं खेत पहुंचा। वहां पराली का काम करवाया और फिर पास के गन्ने के खेत की तरफ चला गया। खेत में प्रवासी मजदूर ट्रैक्टर-ट्रॉली में गन्ना भर रहे थे। मैंने वहीं से दो गन्ने तोड़ लिए। ताजा और मीठे गन्ने का स्वाद आज भी याद है।

कुछ देर बाद पशुओं के लिए हरे चारे की गठरी बाइक पर रखवाई और घर की ओर चल पड़ा। पिताजी वहीं खेत में रुक गए। उन्होंने कहा कि वे बाद में आ जाएंगे।

रात करीब नौ बजे तक भी वे घर नहीं पहुंचे तो मेरे भाई ने उन्हें फोन किया। उन्होंने बताया कि अभी रास्ते में हैं। हम दोनों भाई उन्हें लेने खेत की ओर निकल पड़े।

जब हम वहां पहुंचे तो पता चला कि वे अभी चले ही नहीं थे। फिर हमने उन्हें बाइक पर बैठाया और चारे से भरी रेहड़ी को साथ लेकर चल पड़े। कुछ रास्ता कच्चा था, इसलिए रेहड़ी को पैदल ही निकालना पड़ा। सड़क पर आने के बाद मेरे भाई ने पीछे से पैर लगाकर रेहड़ी को गति दी और मैं उसकी सीट पर बैठकर उसे संभालने लगा।

गांव की शांत रात, हल्की ठंडी हवा और खेतों की खुशबू के बीच हम धीरे-धीरे घर की तरफ बढ़ते रहे। कुछ ही देर में घर पहुंच गए। चारा उतारा, हाथ-मुंह धोया और खाना खाकर सो गए।

उस रात सोते समय मन में एक अलग ही भावना थी। अगले दिन पूरा देश अपने घरों में रहने वाला था। शायद पहली बार ऐसा होने जा रहा था कि करोड़ों लोग एक साथ अपनी दिनचर्या रोक देंगे।

तब किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले दिन और भी कठिन होने वाले हैं। लॉकडाउन, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और अनगिनत नई बातें हमारी जिंदगी का हिस्सा बनने वाली थीं। लेकिन उस रात हम सिर्फ इतना जानते थे कि कल जनता कर्फ्यू है और देश एक नई चुनौती का सामना करने जा रहा है।

आज जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि वह सिर्फ एक सफर नहीं था, बल्कि इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ का हिस्सा था। बारिश से भरा वह रास्ता, खेतों में बिताई गई शाम, गन्ने की मिठास और अगले दिन के अज्ञात भविष्य की चिंता—सब कुछ आज भी यादों में ताजा है।

कोरोना ने दुनिया को बहुत कुछ सिखाया। उसने हमें परिवार की अहमियत समझाई, गांव की शांति का महत्व बताया और यह एहसास भी कराया कि जिंदगी कितनी अनिश्चित हो सकती है। शायद इसी कारण मार्च 2020 की वह यात्रा मेरी यादों का हमेशा के लिए हिस्सा बन गई।

Saturday, May 30, 2026

बारिश, खेत और बचपन की वो आज़ादी


बचपन की यादें भी कितनी अजीब होती हैं। समय चाहे कितना भी आगे निकल जाए, लेकिन गांव की मिट्टी, बारिश की खुशबू और गर्मियों की वो शरारतें कभी दिल से दूर नहीं जातीं। आज शहरों की भागदौड़ में रहते हुए जब कभी बारिश की बूंदें गिरती हैं, तो मन अचानक उन्हीं पुराने दिनों में पहुंच जाता है, जब जिंदगी बहुत छोटी-छोटी खुशियों में सिमटी होती थी। ना किसी बात की चिंता, ना भविष्य की फिक्र। बस खेलना, घूमना और हर मौसम को खुलकर जीना।  


गर्मियों के दिन शुरू होते ही गांव की जिंदगी जैसे बदल जाती थी। दोपहर की तेज धूप में खेतों की मिट्टी से गर्म हवा उठती थी, लेकिन हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। सुबह होते ही दोस्तों के साथ खेतों की तरफ निकल जाते थे। दूर-दूर तक फैले हरे खेत, कच्ची पगडंडियां और पेड़ों पर लगे अमरूद जैसे हमें अपनी तरफ बुलाते रहते थे।

बरसात का मौसम तो जैसे हमारे बचपन का सबसे प्यारा मौसम हुआ करता था। जैसे ही बादल घिरते, मन अपने आप खुश हो जाता था। बारिश शुरू होते ही हम खेतों की तरफ भाग जाते। कई बार तो बिना किसी को बताए अमरूद तोड़ने निकल जाते थे। खेतों में लगे पेड़ों पर चढ़ना, कच्चे-पक्के अमरूद तोड़ना और वहीं बैठकर नमक लगाकर खाना — उस स्वाद का मुकाबला शायद आज की कोई चीज नहीं कर सकती। 

बारिश में खेतों की मेड़ों पर चलना भी किसी रोमांच से कम नहीं होता था। मिट्टी इतनी फिसलन भरी हो जाती थी कि हर दो कदम बाद कोई ना कोई फिसल ही जाता था। कई बार तो हम जानबूझकर कीचड़ में फिसलते थे और फिर एक-दूसरे को देखकर खूब हंसते थे। कपड़े मिट्टी से भर जाते थे, लेकिन उस समय ना डांट की चिंता होती थी और ना गंदे कपड़ों की। 

गांव का जोहड़ भी हमारे बचपन का सबसे बड़ा खेल का मैदान था। गर्मियों की दोपहर में जब भैंसों को नहलाने ले जाया जाता, तो हम भी उनके साथ पानी में उतर जाते थे। भैंसें आराम से पानी में बैठ जाती थीं और हम उनके ऊपर चढ़कर खेलते रहते थे।

सबसे ज्यादा मजा तब आता था जब हम भैंस की पूंछ पकड़कर पानी में आगे तक चले जाते थे। हमें लगता था जैसे कोई नाव हमें खींचकर ले जा रही हो। कई बार डर भी लगता था कि कहीं गहरे पानी में ना चले जाएं, लेकिन बचपन में डर भी ज्यादा देर टिकता नहीं था।

पानी में घंटों नहाते रहते थे। कभी एक-दूसरे पर पानी फेंकते, कभी जोहड़ में छलांग लगाते। घर से आवाजें भी आती रहती थीं कि बाहर निकलो, बीमार पड़ जाओगे, लेकिन उस समय कौन सुनता था।

बरसात के बाद खेतों की मिट्टी से जो सोंधी-सोंधी खुशबू आती थी, वो आज भी याद है। ऐसा लगता था जैसे पूरी धरती ने ठंडी सांस ली हो। शाम को जब घर लौटते थे, तो कपड़े मिट्टी और पानी से भरे होते थे। कई बार डांट भी पड़ती थी, लेकिन अगले दिन फिर वही शरारतें शुरू हो जाती थीं। 


उस समय जिंदगी कितनी आसान थी। छोटी-छोटी चीजों में ही खुशी मिल जाती थी। ना मोबाइल थे, ना इंटरनेट, ना किसी चीज की जल्दी। बस दोस्त थे, खेत थे, बारिश थी और खुला आसमान था।

आज गांव भी बदल गए हैं। जोहड़ छोटे हो गए हैं, खेतों में पहले जैसी रौनक नहीं रही और बच्चों के खेल भी बदल गए हैं। अब शायद ही कोई बच्चा बारिश में भीगने या भैंस की पूंछ पकड़कर तैरने का मजा जानता हो।

लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूं, मन के किसी कोने में वही बचपन फिर से जाग उठता है। ऐसा लगता है जैसे आज भी कहीं खेतों की मेड़ पर बारिश हो रही है, और हम मिट्टी में फिसलते हुए हंस रहे हैं।

बचपन के वो दिन शायद कभी वापस नहीं आ सकते, लेकिन उनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहती हैं। जिंदगी चाहे कितनी भी बदल जाए, गांव की बारिश, खेतों की मिट्टी और जोहड़ का पानी हमेशा दिल में एक अलग ही सुकून छोड़ जाते हैं। शायद असली खुशी भी वही थी, जब जिंदगी बहुत छोटी थी और खुशियां बहुत बड़ी।

Friday, May 29, 2026

गीता जयंती की वो यादगार यात्रा


कई बार जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल अचानक बन जाते हैं। कोई बड़ी योजना नहीं होती, बस दोस्तों के साथ निकला एक छोटा सा सफर उम्रभर की याद बन जाता है। ये बात उन दिनों की है जब हम गांव के शिव मंदिर में पेंट का काम कर रहे थे। सुबह से शाम तक दीवारों पर रंग चढ़ाते हुए बातें भी चलती रहती थीं। उसी दौरान मैं, सुरेंद्र और सूचा आपस में बातें कर रहे थे कि इस बार Gita Jayanti के अवसर पर Kurukshetra जाकर सरोवर घाटों का नजारा देखा जाए। 


बस फिर क्या था, बिना ज्यादा सोच-विचार के योजना बन गई। अगले दिन सुबह जल्दी निकलने का तय हुआ। उस समय न मोबाइल में ज्यादा फोटो खींचने का शौक था और न ही घूमने-फिरने को लेकर कोई बड़ी तैयारी। दिल में बस उत्साह था और नई जगह देखने की खुशी।

सुबह करीब 7–8 बजे हम घर से निकल पड़े। ठंडी सुबह थी और गांव की गलियों में हल्की धुंध फैली हुई थी। बस अड्डे पर पहुंचकर हमने प्राइवेट बस पकड़ी, जो कुरुक्षेत्र की ओर जा रही थी। बस ज्यादा नई नहीं थी, लेकिन उस समय सफर का मजा गाड़ियों की सुविधा से नहीं, साथ चलने वाले दोस्तों से होता था।

बस धीरे-धीरे गांव से बाहर निकली और खुली सड़कों पर दौड़ने लगी। रास्ते में दोनों तरफ फैले खेत मन को बहुत सुकून दे रहे थे। कहीं गेहूं की फसल हवा में झूम रही थी, तो कहीं सरसों के पीले फूल दूर तक चमक रहे थे। पेड़ों की लंबी कतारें सड़क के किनारे ऐसे लग रही थीं जैसे सफर में हमारा स्वागत कर रही हों।

रास्ते में जब बस ने नहर के ऊपर बने पुल को पार किया, तो नीचे बहते पानी की “सांय-सांय” आवाज कानों में गूंजने लगी। उस समय गांवों की नहरों का पानी और आसपास की हरियाली मन को अलग ही शांति देती थी।

झांसा पार करने के बाद सड़क थोड़ी खराब थी। बस उछलती हुई चल रही थी और हर झटके पर हम तीनों हंस पड़ते थे। कभी कोई सीट से ऊपर उछल जाता, तो कभी किसी का सिर खिड़की से टकरा जाता। सफर की यही छोटी-छोटी बातें बाद में सबसे ज्यादा याद आती हैं।

रास्ते में अज्रानी कलां, हिंगाखेड़ी और दुराना जैसे गांव आए। गांवों के छोटे बाजार, चाय की दुकानें और खेतों में काम करते लोग उस समय की सादगी को दिखा रहे थे।

थोड़ी देर बाद बस Sheikh Chilli Tomb के पास से गुजरी। दूर से उसका सुंदर गुंबद दिखाई दे रहा था। उस समय वहां रेलवे लाइन का पुल बन रहा था, इसलिए बस को घुमावदार रास्ते से होकर जाना पड़ता था।

फिर धीरे-धीरे बस Kurukshetra University के पास से निकली। यूनिवर्सिटी का बड़ा परिसर देखकर अलग ही एहसास होता था। वहां की सड़कें और माहौल गांवों से बिल्कुल अलग लगते थे।

कुछ देर बाद हम घाट वाले चौक के पास पहुंच गए। बस से उतरते ही ऐसा लगा जैसे पूरा शहर किसी बड़े उत्सव में डूबा हुआ हो। हर तरफ लोगों की भीड़ दिखाई दे रही थी।

जब हम सरोवर के पास पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर मन खुश हो गया। घाट पूरी तरह पानी से लबालब भरे हुए थे। पानी में आसमान और आसपास की रोशनी का प्रतिबिंब बहुत सुंदर लग रहा था।

लोग दूर-दूर से वहां पहुंचे हुए थे। कोई पूजा कर रहा था, कोई परिवार के साथ घूम रहा था, तो कोई घाटों की सुंदरता को निहार रहा था।

पूरा परिसर किसी मेले जैसा लग रहा था। जगह-जगह हाथों से बनी चीजों की दुकानें सजी हुई थीं। कहीं मिट्टी के बर्तन बिक रहे थे, कहीं लकड़ी की कलाकृतियां और कहीं रंग-बिरंगी चूड़ियां।

कई जगह बड़े मंच बनाए गए थे, जहां संगीत और मनोरंजन का कार्यक्रम चल रहा था। भजन, लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की आवाज पूरे वातावरण को और भी जीवंत बना रही थी।

हम तीनों घाटों के चारों तरफ घूमते रहे। कभी कहीं बैठ जाते, कभी लोगों को देखते रहते। उस समय न कोई जल्दी थी और न ही किसी काम की चिंता।

घूमते-घूमते हमने कुल्फी खाई। ठंडी कुल्फी का स्वाद आज भी याद है। फिर कहीं रुककर चाय पी। सर्द मौसम में गर्म चाय का मजा ही अलग था।

थोड़ी देर बाद हमने भुने हुए मकई के दाने भी खाए। घाटों के पास बैठकर खाते हुए पानी की लहरों को देखना बहुत अच्छा लग रहा था।

ऐसे छोटे-छोटे पल ही जिंदगी को खूबसूरत बनाते हैं। उस समय न महंगे रेस्टोरेंट थे और न बड़ी-बड़ी सुविधाएं, लेकिन फिर भी दिल खुश था।

धीरे-धीरे शाम होने लगी। घाटों के आसपास लगी रोशनियां पानी में चमकने लगी थीं। पूरा वातावरण बेहद सुंदर और शांत लग रहा था।

सूरज ढल रहा था और हल्की ठंडी हवा चल रही थी। लोग अब धीरे-धीरे वापस लौटने लगे थे। हम भी काफी देर तक वहां बैठकर उस खूबसूरत माहौल को महसूस करते रहे।

शाम होने के बाद हम सड़क पर आ गए और घर लौटने के लिए बस का इंतजार करने लगे। कुछ देर बाद एक बस आई, लेकिन वह पहले से ही बहुत भरी हुई थी।

हमने सोचा कि शायद इसके बाद कोई और बस आएगी, लेकिन पता चला कि वही आखिरी बस थी। मजबूरी में हमें उसी में चढ़ना पड़ा।

बस में इतनी भीड़ थी कि ठीक से खड़े होने की जगह भी मुश्किल से मिल रही थी। लेकिन उस समय थकान के बावजूद चेहरे पर मुस्कान थी, क्योंकि पूरा दिन यादगार बन चुका था।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है कि जिंदगी की असली खुशी ऐसे ही छोटे-छोटे सफरों में छिपी होती है। दोस्तों के साथ बिताया गया वो दिन, रास्तों की हरियाली, घाटों की रौनक, कुल्फी और चाय का स्वाद — सब कुछ आज भी दिल के किसी कोने में जिंदा है।

समय भले ही बदल गया हो, लेकिन वो सफर आज भी मेरी जिंदगी की खूबसूरत यादों में शामिल है।

Thursday, May 28, 2026

संघर्ष के रंगों से भरे वो दिन


ज़िंदगी में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो इंसान को भीतर तक बदल देते हैं। वो दिन भले ही तकलीफों से भरे हों, लेकिन वही दिन हमें मजबूत बनाते हैं। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि संघर्ष के वो दिन ही असली शिक्षक थे। उन्हीं दिनों ने सिखाया कि मेहनत क्या होती है, जिम्मेदारी क्या होती है और उम्मीदों को टूटने नहीं देना कितना जरूरी होता है।  


एक समय ऐसा भी था जब जेब में पैसे कम होते थे, लेकिन सपने बहुत बड़े थे। सुबह उठते ही यही चिंता रहती थी कि आज का दिन कैसे निकलेगा। कभी काम की तलाश, कभी घर की जिम्मेदारियाँ, तो कभी अपने भविष्य की चिंता। लेकिन फिर भी दिल में एक उम्मीद थी कि शायद आने वाला कल आज से बेहतर होगा।

गर्मी के दिनों में पसीने से भीगा शरीर और थका हुआ मन लेकर जब घर लौटते थे, तो चेहरे पर मुस्कान फिर भी रहती थी। क्योंकि घर वालों की उम्मीदें हमसे जुड़ी होती थीं। कई बार ऐसा होता था कि खुद की इच्छाओं को दबाकर घर की जरूरतों को पूरा करना पड़ता था। नई चीज़ें खरीदने का मन होता था, लेकिन जिम्मेदारियाँ उससे बड़ी होती थीं।

संघर्ष के उन दिनों में छोटी-छोटी खुशियाँ भी बहुत बड़ी लगती थीं। अगर शाम को दोस्तों के साथ चाय मिल जाती, तो लगता था जैसे पूरा दिन सफल हो गया। कभी गांव की गलियों में घूमते हुए भविष्य के सपने देखते थे, तो कभी रात को छत पर लेटकर तारों से बातें करते थे। मन में हजार परेशानियाँ होती थीं, लेकिन फिर भी दिल हार मानने को तैयार नहीं होता था।

उस दौर में रिश्तों की असली पहचान भी हुई। कुछ लोग मुश्किल समय में साथ छोड़ गए, तो कुछ बिना कहे हर कदम पर खड़े रहे। तब समझ आया कि जिंदगी में हर मुस्कुराने वाला अपना नहीं होता, और हर चुप रहने वाला पराया नहीं होता।

कई रातें ऐसी भी थीं जब नींद आंखों से दूर रहती थी। मन में यही चलता रहता था कि क्या कभी हालात बदलेंगे? क्या कभी मेहनत का फल मिलेगा? लेकिन अगली सुबह फिर वही उम्मीद लेकर उठ जाते थे। शायद यही जिंदगी है — गिरना, संभलना और फिर आगे बढ़ जाना।

आज जब जिंदगी थोड़ी संभली हुई लगती है, तो संघर्ष के वो दिन याद आते हैं। वो दिन भले ही कठिन थे, लेकिन उन्हीं ने जीना सिखाया। अगर वो मुश्किलें नहीं आतीं, तो शायद हम इतने मजबूत भी नहीं बन पाते।

सच कहूँ तो संघर्ष इंसान को तोड़ता नहीं, बल्कि नया आकार देता है। जैसे आग में तपकर सोना और निखर जाता है, वैसे ही मुश्किलें इंसान को अंदर से मजबूत बना देती हैं।

आज भी जब किसी मेहनत करने वाले इंसान को देखता हूँ, तो अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं। तब दिल से यही दुआ निकलती है कि उसके संघर्ष भी एक दिन रंग लाएँ, क्योंकि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।

संघर्ष के रंगों से भरे वो दिन आज यादों का हिस्सा जरूर बन गए हैं, लेकिन उनकी सीख आज भी जिंदगी के हर मोड़ पर साथ चलती है।

Wednesday, May 27, 2026

दो वक्त की रोटी और टूटती उम्मीदें


आज की दुनिया में इंसान की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ पैसे कमाने की नहीं, बल्कि उम्मीदों को जिंदा रखने की है। बाहर से देखने पर लगता है कि सब ठीक चल रहा है — लोग नौकरी कर रहे हैं, दुकानें खुल रही हैं, मोबाइल पर हँसी वाले वीडियो चल रहे हैं। लेकिन अंदर ही अंदर बहुत से लोग हर दिन टूट रहे हैं।  


कई लोग सुबह उठते ही सबसे पहले ये सोचते हैं कि आज घर का खर्च कैसे चलेगा। गैस का सिलेंडर, बच्चों की फीस, बिजली का बिल, दवाई का खर्च — हर चीज़ जैसे जेब से नहीं, इंसान की हिम्मत से पैसा मांगती है। दो वक्त की रोटी जुटाना भी अब आसान नहीं रहा। महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि मेहनत करने वाला आदमी भी कई बार खाली जेब लेकर घर लौटता है।

सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब इंसान मेहनत पूरी करता है, लेकिन बदले में सिर्फ चिंता मिलती है। कई पढ़े-लिखे लोग नौकरी ढूंढते-ढूंढते थक जाते हैं। कुछ लोग छोटे काम शुरू करते हैं, लेकिन खर्च और जिम्मेदारियों के बीच उनका हौसला धीरे-धीरे टूटने लगता है। बाहर से वो मुस्कुरा देते हैं, लेकिन रात को सोने से पहले उन्हें अपने ही सवाल डराने लगते हैं — “क्या जिंदगी बस ऐसे ही कटेगी?”

आजकल लोग पहले से ज्यादा अकेले हो गए हैं। हर कोई अपने संघर्ष में उलझा है। किसी के पास इतना समय नहीं कि वह किसी की तकलीफ को सच में समझ सके। सोशल मीडिया पर सबकी जिंदगी खूबसूरत दिखती है, लेकिन असल जिंदगी में कई लोग अंदर से बिखरे हुए हैं। कोई अपने परिवार की चिंता में परेशान है, तो कोई अपने भविष्य को लेकर डरा हुआ है।

लेकिन सच यही है कि जिंदगी सिर्फ पैसों से नहीं चलती, उम्मीदों से भी चलती है। जिस दिन इंसान उम्मीद छोड़ देता है, उसी दिन अंदर से हार जाता है। मुश्किल वक्त हर किसी की जिंदगी में आता है, लेकिन वही लोग आगे बढ़ते हैं जो टूटने के बाद भी खुद को संभाल लेते हैं।

कभी-कभी जिंदगी हमें बहुत नीचे गिरा देती है, ताकि हम समझ सकें कि असली ताकत हमारे अंदर ही है। हर अंधेरी रात के बाद सुबह जरूर आती है। शायद देर लगे, लेकिन मेहनत और धैर्य कभी पूरी तरह बेकार नहीं जाते।

जरूरी नहीं कि हर इंसान अमीर बने, बड़ी गाड़ी खरीदे या बड़ा नाम कमाए। असली खुशी कई बार सिर्फ इस बात में होती है कि घर में शांति हो, परिवार साथ हो, और रात को चैन की नींद आ जाए।

आज जरूरत इस बात की है कि हम सिर्फ पैसे कमाने की दौड़ में खुद को खो न दें। अपने आसपास के लोगों की तकलीफ समझें, किसी टूटे हुए इंसान को दो अच्छे शब्द दें। क्योंकि कई बार इंसान को रोटी से ज्यादा सहारे की जरूरत होती है।

दो वक्त की रोटी शायद मेहनत से मिल जाए, लेकिन टूटती उम्मीदों को संभालने के लिए हिम्मत चाहिए। और वही हिम्मत इंसान को फिर से जीना सिखाती है।

Tuesday, May 26, 2026

रंगों के बीच संघर्ष के दिन

ज़िंदगी हमेशा एक जैसी नहीं चलती। कभी सब कुछ ठीक होता है, तो कभी अचानक ऐसा मोड़ आ जाता है जहां इंसान खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करने लगता है। कई बार हमें लगता है कि हमने जो रास्ता चुना है, वही सही है, लेकिन समय धीरे-धीरे हमें सिखाता है कि हर अनुभव अपने साथ कोई सीख लेकर आता है। कुछ दिन ऐसे भी आते हैं जब मेहनत बहुत होती है, लेकिन उसके बदले कुछ हासिल नहीं होता। फिर भी इंसान उम्मीद का हाथ नहीं छोड़ता। शायद यही उम्मीद हमें टूटने नहीं देती। 


ये उन दिनों की बात है जब मैंने अंबाला स्थित Embassy of Singapore से नौकरी छोड़ दी थी। उस समय मुझे लगा था कि अब घर से अपने कंप्यूटर पर काम करके बेहतर जिंदगी जी लूंगा। मैंने राजपुरा के एक बुक डिपो के साथ बुक डिजाइनिंग का काम शुरू कर दिया। शुरुआत में सब ठीक लग रहा था। मैं रोज़ मेहनत से काम करता था, घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर डिजाइन बनाता था। मुझे उम्मीद थी कि मेहनत का फल जरूर मिलेगा।

लगभग तीन महीने तक लगातार काम करने के बाद जब हाथ में एक भी रुपया नहीं आया, तब पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत करके भी पैसा ना मिलना कितना दर्द देता है। मैं बार-बार पैसे मांगता, लेकिन हर बार कोई नया बहाना सुनने को मिलता। कभी कहा जाता कि कंपनी से पैसे नहीं आए, कभी कहा जाता कि अगले हफ्ते मिल जाएंगे। बाद में पता चला कि वो किसी कंपनी के लिए नहीं, बल्कि अपने ही काम के लिए हमसे डिजाइन बनवा रहा था।

उस समय ऐसा लगने लगा था जैसे मेहनत की कोई कीमत ही नहीं रही। धीरे-धीरे उम्मीद टूटने लगी। आखिरकार मैंने भी पैसे मिलने की आस छोड़ दी।

उसी दौरान गांव के मेरे दो दोस्त लोगों के घरों में पेंट और सफेदी का काम करते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि अगर चाहो तो हमारे साथ काम कर सकते हो। उस समय मेरी आर्थिक हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि मैंने बिना कुछ सोचे तुरंत हां कर दी। मजदूरी सिर्फ 350 रुपये मिलनी थी, लेकिन उस समय वही भी बहुत लग रहे थे।

सर्दियों के दिन थे। सुबह करीब आठ बजे हम काम पर निकल जाते। पहला काम गांव के शिव मंदिर में मिला था। मैंने अपने घर के अलावा कभी कहीं मजदूरी वाला पेंट का काम नहीं किया था। शुरुआत में हाथ भी ठीक से नहीं चलते थे। धीरे-धीरे मैं उनके साथ काम सीखने लगा। मंदिर की दीवारों पर सफेदी करते हुए, रंग घोलते हुए और सीढ़ियों पर चढ़कर पेंट करते हुए मुझे जिंदगी का एक बिल्कुल अलग रूप देखने को मिला।

शिव मंदिर में करीब चार-पांच दिन काम चला। उसके बाद किसी के घर में सफेदी का काम मिला। उनके घर में दो महीने बाद शादी थी, इसलिए काम जल्दी खत्म करना था। एक साथ दो-तीन काम मिल गए थे। सुबह एक जगह काम करते, फिर दूसरी जगह चले जाते। दिन कब निकल जाता, पता ही नहीं चलता था।

गांव के कुछ लोग ताने भी मारते थे। कहते थे, “चंडीगढ़ जाकर अब फिर से यही मजदूरी करनी पड़ रही है?” उनकी बातें सुनकर कभी-कभी दिल दुखता था। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो हौसला देते थे। वो कहते थे कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत से किया गया हर काम सम्मान के लायक होता है।

धीरे-धीरे हमने गांव के सरपंच धर्मे जी का काम पकड़ लिया। उनके घर में जागरण था, इसलिए वहां भी जल्दी काम खत्म करना था। दिनभर काम करते-करते शरीर थक जाता था, लेकिन फिर भी मन में यही रहता था कि किसी तरह जिंदगी दोबारा संभल जाए।

इसी बीच एक दिन हमने काम से छुट्टी ली और Geeta Jayanti देखने कुरुक्षेत्र चले गए। वहां जाकर कुछ समय के लिए ऐसा लगा जैसे जिंदगी की परेशानियां थोड़ी हल्की हो गई हों।

वापस आने के बाद हमने रविदास मंदिर में पेंट का काम शुरू कर दिया। वहां मंदिर का गुंबद काफी ऊंचा था। उस पर चढ़कर पेंट करना आसान नहीं था। मैं और मेरा दोस्त सुरेंद्र मिलकर ऊपर काम करते थे। नीचे देखने पर डर भी लगता था, लेकिन काम करना जरूरी था। हमारा तीसरा साथी सुच्चा उन दिनों छुट्टी पर चला गया था।

उस समय हमारी दिनचर्या लगभग एक जैसी हो गई थी। सुबह आठ बजे घद फिर से खुद को जोड़ना और उम्मीद का हाथ कभी ना छोड़ना।

मुश्किल समय इंसान को बहुत कुछ सिखा देता है। वो हमें यह एहसास करवार से निकलना, दोपहर को थोड़ी देर खाना खाने घर आना, फिर तीन बजे दोबारा काम पर लग जाना और शाम तक पेंट करना। करीब दो महीने तक जिंदगी इसी तरह चलती रही।

फिर गांव के डेरे में काम मिला। वहां भी हमने करीब एक हफ्ता काम किया। लेकिन धीरे-धीरे मन में सवाल उठने लगे कि आखिर ये सब कब तक चलेगा। मजदूरी से घर का खर्च तो किसी तरह चल रहा था, लेकिन जो पुराने उधार और जिम्मेदारियां थीं, वो और मुश्किल लगने लगी थीं।

कुछ समय तक छोटे-मोटे काम करता रहा। फिर एक दिन मैंने चंडीगढ़ में अपने पुराने ऑफिस में बात की। किस्मत से उन्होंने मुझे दोबारा काम पर बुला लिया।

जब मैं वापस चंडीगढ़ गया और फिर से अपने पुराने काम पर बैठा, तो ऐसा लगा जैसे जिंदगी धीरे-धीरे फिर से अपनी पटरी पर लौटने लगी है। अभी सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ है, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी है।

आज भी रोज़ काम पर जाते समय मन में यही विश्वास रहता है कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। शायद जिंदगी का असली मतलब भी यही है — गिरने के बाद फिर से उठना, टूटने के बाता है कि जिंदगी में कोई भी काम छोटा नहीं होता और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। कुछ रास्ते कठिन जरूर होते हैं, लेकिन वही रास्ते इंसान को अंदर से मजबूत भी बना देते हैं। आज पीछे मुड़कर उन दिनों को देखता हूं तो लगता है कि शायद वही संघर्ष मुझे जिंदगी को समझना सिखा गए।

Monday, May 25, 2026

जिंदगी को समझने के लिए कभी-कभी धीरे चलना पड़ता है

आज की जिंदगी इतनी तेज हो गई है कि इंसान हर समय कहीं ना कहीं भागता हुआ नजर आता है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, कोई कामयाबी के पीछे, तो कोई दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में लगा हुआ है। लेकिन इस भागदौड़ में हम अक्सर जिंदगी को जीना ही भूल जाते हैं। कई बार जिंदगी हमें इशारे देती है कि थोड़ा रुक जाओ, थोड़ा धीरे चलो, खुद को और अपने आसपास की दुनिया को महसूस करो। क्योंकि कुछ बातें सिर्फ वही इंसान समझ पाता है, जो जिंदगी को थोड़ा ठहरकर देखता है। 



कभी-कभी लगता है कि जिंदगी किसी तेज रफ्तार ट्रेन की तरह हो गई है। सुबह आंख खुलते ही दिमाग दौड़ना शुरू कर देता है। क्या करना है, कहां जाना है, कितना कमाना है, कौन आगे निकल गया, कौन पीछे रह गया।

दिन गुजर जाते हैं, महीने निकल जाते हैं, लेकिन हम खुद से मिल ही नहीं पाते।

पहले समय ऐसा नहीं था। गांवों में लोग धीरे जीते थे। खेतों में काम जरूर कठिन होता था, लेकिन जिंदगी में एक ठहराव था। लोग शाम को घर लौटकर चैन से बैठते थे। आंगन में चारपाई डालकर बातें होती थीं। कोई जल्दी नहीं होती थी।

आज हर किसी के हाथ में मोबाइल है, लेकिन समय किसी के पास नहीं है।

हमने जिंदगी को इतना उलझा लिया है कि छोटी-छोटी खुशियां भी अब बड़ी लगने लगी हैं।

कभी गौर किया है…
बारिश की बूंदें हमेशा धीरे गिरती हैं, लेकिन सुकून बहुत देती हैं।
सूरज भी धीरे-धीरे निकलता है, लेकिन पूरी दुनिया रोशन कर देता है।
पेड़ भी धीरे-धीरे बढ़ते हैं, लेकिन सालों तक छांव देते हैं।

प्रकृति हमें हमेशा यही सिखाती है कि जो चीजें धीरे बनती हैं, वही सबसे ज्यादा टिकती हैं।

लेकिन इंसान सब कुछ जल्दी चाहता है।

जल्दी पैसा…
जल्दी सफलता…
जल्दी पहचान…

और इसी जल्दी में वो खुद को खो देता है।

कई बार जिंदगी हमें रोकती भी है। कभी किसी परेशानी के रूप में, कभी किसी हार के रूप में, तो कभी अकेलेपन के रूप में। उस समय हमें लगता है कि सब गलत हो रहा है। लेकिन सच तो यह है कि शायद जिंदगी हमें थोड़ा धीमे चलना सिखा रही होती है।

जब इंसान धीरे चलता है, तभी वो रिश्तों को महसूस करता है।
मां की आवाज में छिपी चिंता समझ आता है।
पिता की खामोशी में छिपा प्यार नजर आता है।
पुरानी यादों की कीमत समझ आती है।

तेज भागती जिंदगी में इंसान सिर्फ मंजिल देखता है।
धीरे चलने पर रास्ते भी खूबसूरत लगने लगते हैं।

कभी गांव की किसी पुरानी गली में धीरे-धीरे चलकर देखो…
किसी पेड़ की छांव में कुछ देर बैठकर देखो…
छत पर जाकर रात के आसमान को बिना मोबाइल के देखो…

दिल खुद कहेगा कि असली सुकून अभी भी छोटी-छोटी चीजों में ही छिपा हुआ है।

जिंदगी सिर्फ बड़े सपनों का नाम नहीं है।
जिंदगी वो भी है —
जब मां बिना कहे पानी का गिलास रख जाती है।
जब पुराना दोस्त अचानक याद कर लेता है।
जब बचपन की कोई खुशबू अचानक दिल को छू जाती है।

इन चीजों को महसूस करने के लिए थोड़ा धीमे चलना पड़ता है।

क्योंकि बहुत तेज भागने वाले लोग अक्सर मंजिल तो पा लेते हैं, लेकिन रास्ते में जिंदगी कहीं पीछे छूट जाती है।



जिंदगी कोई दौड़ नहीं है कि हर समय बस आगे ही भागते रहो। कभी-कभी रुकना, सांस लेना और खुद को महसूस करना भी जरूरी होता है। शायद जिंदगी का असली मतलब भी वहीं छिपा है — थोड़ी सी शांति, थोड़े अपने लोग और कुछ पल, जिन्हें दिल हमेशा याद रखना चाहता है।

Sunday, May 24, 2026

गंगा दशहरा – आस्था, पवित्रता और मोक्ष का पर्व

भारत की संस्कृति में नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं माना गया, बल्कि उन्हें माँ का दर्जा दिया गया है। इन्हीं पवित्र नदियों में सबसे श्रेष्ठ और पूजनीय है Ganga River। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है। हर वर्ष ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा का पर्व बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व माँ गंगा के धरती पर अवतरण का प्रतीक माना जाता है। 


पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा Bhagiratha ने अपने पूर्वजों की आत्मा की मुक्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनके पूर्वज राजा सगर के 60,000 पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनकी आत्माओं को मोक्ष दिलाने के लिए पृथ्वी पर गंगा का आना आवश्यक था।

राजा भगीरथ ने वर्षों तक भगवान Brahma और Shiva की कठोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। लेकिन गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया।

इसी दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान और पूजा करने से दस प्रकार के पापों का नाश होता है। “दशहरा” शब्द का अर्थ भी दस पापों का हरण करना है।

गंगा दशहरा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन लोग गंगा नदी में स्नान करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और माँ गंगा की पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।

विशेष रूप से Haridwar, Varanasi, Prayagraj और Rishikesh में लाखों श्रद्धालु इस पर्व पर गंगा स्नान करने पहुँचते हैं। घाटों पर दीपों की रोशनी, गंगा आरती और भक्तों की आस्था का दृश्य मन को भक्ति से भर देता है।

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है। यदि संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद माँ गंगा की पूजा की जाती है। लोग फूल, दीपक, दूध और प्रसाद अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन और गंगा आरती का आयोजन भी किया जाता है।

गंगा दशहरा के दिन दान का भी विशेष महत्व है। लोग गरीबों को भोजन, वस्त्र, जल और अन्य वस्तुएँ दान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

आज गंगा नदी प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है। जिस गंगा को हम माँ कहते हैं, उसी में गंदगी और कचरा डालकर हम उसकी पवित्रता को नुकसान पहुँचा रहे हैं। गंगा दशहरा केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि हमें गंगा को स्वच्छ रखने का संदेश भी देता है।

यदि हम सच में माँ गंगा का सम्मान करते हैं, तो हमें नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेना चाहिए। प्लास्टिक का उपयोग कम करना, नदी में कचरा न फेंकना और जल संरक्षण करना हमारी जिम्मेदारी है।

गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में पवित्रता, श्रद्धा और सेवा का कितना महत्व है।

माँ गंगा की धारा सदियों से लोगों के जीवन को शुद्ध और पवित्र करती आ रही है। इस पावन अवसर पर हमें केवल पूजा ही नहीं, बल्कि प्रकृति और नदियों की रक्षा का संकल्प भी लेना चाहिए।

“हर हर गंगे… जय माँ गंगे!”

मिट्टी की वो सोंधी खुशबू


बारिश की पहली बूंद जैसे ही सूखी धरती को छूती है, हवा में एक ऐसी खुशबू फैल जाती है जिसे शब्दों में पूरी तरह बयान करना मुश्किल है। वो खुशबू सिर्फ मिट्टी की नहीं होती, वो हमारे बचपन की यादों की होती है, गाँव की गलियों की होती है, कच्चे आंगन की होती है और उन दिनों की होती है जब जिंदगी इतनी भाग-दौड़ वाली नहीं थी।

आज शहरों में रहते हुए जब कभी बारिश होती है, तो सीमेंट और धुएँ की गंध ज्यादा महसूस होती है। लेकिन गाँव की मिट्टी की वो सोंधी खुशबू आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसी हुई है। जैसे ही बारिश शुरू होती थी, हम बच्चे घरों से बाहर निकल आते थे। कच्ची गलियों में पानी बहने लगता था और मिट्टी की वो महक पूरे माहौल को जादुई बना देती थी। ऐसा लगता था जैसे धरती खुद सांस ले रही हो। 


बचपन में उस खुशबू का मतलब सिर्फ बारिश नहीं होता था। उसका मतलब था – स्कूल की छुट्टी, भीगते हुए दौड़ना, पेड़ों के नीचे खड़े होकर बारिश देखना और माँ की आवाज़ सुनना कि “बीमार हो जाओगे, अंदर आ जाओ।” लेकिन उस समय बारिश और मिट्टी का रिश्ता इतना प्यारा लगता था कि डांट भी अच्छी लगती थी।

गाँव के कच्चे घरों में बारिश का अपना ही आनंद था। छत से कहीं-कहीं पानी टपकता रहता था। आंगन में छोटी-छोटी कीचड़ बन जाती थी। कई बार हम उसी कीचड़ में फिसल जाते थे और फिर हँसते-हँसते खुद ही उठ जाते थे। उस समय कपड़े गंदे होने की चिंता नहीं होती थी, मोबाइल खराब होने का डर नहीं होता था, बस बारिश का मज़ा लेना ही सबसे बड़ी खुशी होती थी।

मुझे आज भी याद है, खेतों की तरफ जाते हुए जब हल्की बारिश होती थी, तो मिट्टी की खुशबू और भी गहरी हो जाती थी। दूर-दूर तक फैली हरियाली, बैलों की आवाज़, पेड़ों से गिरती पानी की बूंदें और मिट्टी की महक… ऐसा लगता था जैसे पूरी प्रकृति कोई गीत गा रही हो। शायद इसी वजह से गाँव की यादें कभी पुरानी नहीं होतीं।

आज की पीढ़ी शायद उस एहसास को पूरी तरह समझ भी नहीं पाएगी। अब बच्चों का बचपन मोबाइल की स्क्रीन में कैद होता जा रहा है। उन्हें शायद ये नहीं पता कि बारिश में भीगते हुए मिट्टी की खुशबू महसूस करना कितना बड़ा सुख होता है। वो खुशी किसी महंगे खिलौने या बड़े मॉल में भी नहीं मिल सकती।

समय बदल गया है, लोग बदल गए हैं, लेकिन मिट्टी की वो सोंधी खुशबू आज भी वैसी ही है। जब भी बारिश होती है, वो खुशबू पुराने दिनों का दरवाजा खोल देती है। कुछ पल के लिए लगता है जैसे हम फिर से उसी बचपन में लौट गए हों, जहाँ न कोई चिंता थी और न ही किसी चीज़ की होड़।

शायद जिंदगी की असली खुशी भी यही है — छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाना। बारिश की बूंदों में, मिट्टी की खुशबू में, और उन यादों में जो कभी पुरानी नहीं होतीं।

Saturday, May 23, 2026

मामा के गांव वाली गर्मियों की छुट्टियां

 

बचपन की गर्मियों की छुट्टियां सिर्फ छुट्टियां नहीं होती थीं, वो पूरे साल का सबसे खूबसूरत इंतजार होती थीं। जैसे ही स्कूल बंद होते, मन में बस एक ही बात घूमती थी — “इस बार मामा जी के घर कब जाना है?” पता नहीं ऐसा क्या जादू होता था मामा के गांव में कि बाकी सारी रिश्तेदारियां पीछे छूट जाती थीं। वहां की मिट्टी, आम के पेड़, रात की खुली हवा, और बिना किसी रोक-टोक के खेलना — सब कुछ किसी सपने जैसा लगता था। आज जब जिंदगी भागती रहती है, तब वो धीमे और सुकून भरे दिन बहुत याद आते हैं।


स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही हमारे अंदर जैसे नई जान आ जाती थी। उस समय न मोबाइल थे, न टीवी का ज्यादा शौक। छुट्टियों का मतलब ही होता था — मामा जी के गांव जाना। 


आज सोचता हूं तो समझ नहीं आता कि आखिर मामा जी के घर में ऐसा क्या खास होता था। मासी भी थीं, बुआ भी थीं, और भी रिश्तेदार बुलाते थे। लेकिन मन सिर्फ मामा के गांव जाने के लिए ही मचलता था।

शायद इसलिए क्योंकि वहां आजादी थी…
कोई पढ़ाई की चिंता नहीं, कोई डांट नहीं, बस खेलना, घूमना और खुश रहना।

मामा जी के गांव पहुंचते ही हम सब बच्चे एक टोली बन जाते थे। सबसे मजेदार काम होता था — कच्चे आम तोड़ना।

हम पेड़ों पर चढ़ जाते, डंडों से आम गिराते और फिर उन्हें उठाकर घर ले आते। घर में एक कमरा था जिसमें भूसा भरा रहता था। हम उन कच्चे आमों को भूसे में दबा देते थे। कुछ दिनों बाद वो धीरे-धीरे पक जाते।

असल में पेड़ों पर आम पक ही कहां पाते थे। पकने से पहले ही हम उन्हें तोड़ लाते थे।

गर्मियों की रातें भी किसी जादू से कम नहीं थीं। रात को पूरा परिवार आंगन में चारपाइयां डालकर सोता था। ऊपर खुला आसमान, दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज और हल्की गर्म हवा।

हम बच्चे देर रात तक जागते रहते थे। सबसे ज्यादा मजा आता था जुगनू पकड़ने में। हम इधर-उधर भागकर जुगनू पकड़ते और उन्हें किसी डिब्बे में इकट्ठा कर लेते। जब कई सारे जुगनू एक साथ चमकते थे, तो लगता था जैसे छोटा सा आसमान हमारे हाथ में आ गया हो।

उस समय इतनी समझ कहां थी कि उन्हें पकड़कर रखने से वो मर भी सकते हैं। हम तो बस अपनी छोटी-छोटी खुशियों में खुश रहते थे।

एक बार हमने घर में जिद पकड़ ली कि हमें छुट्टियों में मामा जी के गांव छोड़कर आओ।

मां पहले तो मना करती रहीं, लेकिन आखिर बहुत कहने पर उन्होंने पिताजी को तैयार कर लिया।

उस दिन पिताजी मुझे और मेरी बड़ी बहन को लेकर चल पड़े। मुझे आज भी याद है, मैंने खाकी रंग की पैंट और उसी रंग की कमीज पहनी हुई थी। उस समय वही कपड़े मुझे सबसे अच्छे लगते थे।

मामा जी के गांव का बस अड्डा गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर पड़ता था। वहां से पैदल ही गांव जाना पड़ता था। उस समय आगे जाने के लिए कोई साधन नहीं होता था।

पिताजी ने हमें बस अड्डे पर बैठाया और कहा कि उन्हें शहर से थोड़ा सामान लेना है। तब हमें क्या पता था कि सामान तो बस बहाना था, वो शराब लेने गए थे।

वो हमें वहीं छोड़कर बस से शहर चले गए।

मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा। फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आया। मैं धीरे-धीरे वहां से खिसकने लगा और बहन को वहीं छोड़कर अकेला ही गांव की तरफ चल पड़ा।

मुझे बस इतना पता था कि रास्ता सीधा है।

करीब पंद्रह-बीस मिनट पैदल चलने के बाद मैं गांव पहुंच गया।

घर के बाहर मेरे नाना जी चारपाई पर बैठे थे। मैं उनके पास गया, नमस्ते की और चुपचाप बैठ गया।

लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। उन्हें लगा कि पड़ोस का कोई लड़का होगा।

थोड़ी देर बाद मामी जी आईं। वो मुझे देखकर हैरान हो गईं कि मैं अकेला कैसे पहुंच गया।

उधर पिताजी और बहन मुझे ढूंढते हुए परेशान हो रहे थे। बहन तो रोने लगी थी। उन्हें डर था कि कहीं मैं रास्ता भटक न गया होऊं।

कुछ देर बाद जब वो गांव पहुंचे और मुझे सही सलामत बैठे देखा, तब जाकर उनकी जान में जान आई।

फिर पिताजी ने मुझे खूब डांटा —
“ऐसे अकेले नहीं आते। कोई उठा ले जाता तो?”

उस समय मैं डर तो गया था, लेकिन मन में खुशी भी थी कि मैं खुद अकेला गांव पहुंच गया।

अगले दिन पिताजी हमें छोड़कर वापस घर जाने वाले थे। दिन भर तो हम खेलते रहे, लेकिन जैसे ही अगले दिन वो वापस जाने लगे, मेरा मन घबरा गया।

मैं भागकर उनके पास पहुंच गया और बोला —
“मैं भी आपके साथ जाऊंगा। यहां मेरा मन नहीं लगेगा।”

उन्होंने बहुत समझाया, लेकिन मैं नहीं माना। आखिर मुझे भी अपने साथ वापस ले आए।

घर पहुंचते ही मां ने फिर डांटा —
“बस परेशान करने में लगे रहते हो। आज के बाद छुट्टियों में कहीं नहीं जाना।”

लेकिन सच कहूं, आज उन्हीं डांटों में भी प्यार नजर आता है।

अब जब बचपन की वो छुट्टियां याद आती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा वही था।

ना ज्यादा खिलौने थे, ना पैसे, ना सुविधाएं…
फिर भी खुशियां इतनी थीं कि छोटी-छोटी बातों में पूरा दिन निकल जाता था।

कभी-कभी दिल सच में चाहता है कि वो बचपन फिर लौट आए…
वो आम के पेड़, वो जुगनू, वो चारपाइयां और वो मामा के गांव वाली छुट्टियां।



बचपन की गर्मियों की छुट्टियां सिर्फ बीते हुए दिन नहीं हैं, वो हमारी जिंदगी का सबसे मासूम और सुकून भरा हिस्सा हैं। समय भले आगे बढ़ गया हो, लेकिन दिल आज भी कहीं न कहीं उन्हीं गलियों, उन्हीं पेड़ों और उन्हीं रिश्तों में अटका हुआ है। शायद इसलिए बचपन हमेशा सबसे खूबसूरत लगता है।

Friday, May 22, 2026

जब मेहमान कई-कई दिन ठहरते थे

एक समय ऐसा भी था जब मेहमान सिर्फ घर आने वाले लोग नहीं होते थे, बल्कि पूरे घर की रौनक बन जाते थे। उनके आने से घर का माहौल बदल जाता था। आंगन में हंसी गूंजने लगती थी, रसोई में चहल-पहल बढ़ जाती थी और बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठते थे। उस दौर में रिश्तों में अपनापन ज्यादा था और समय की भागदौड़ कम। लोग मिलने के लिए समय निकालते थे, और मेहमान भी एक-दो घंटे नहीं, बल्कि कई-कई दिन रहकर जाते थे। आज जब जिंदगी तेज हो गई है, तब वो पुराने दिनों वाली मेहमाननवाज़ी और अपनापन बहुत याद आता है।


गांव के दिनों में मेहमानों का आना किसी छोटे त्योहार से कम नहीं होता था। उस समय न मोबाइल थे, न पहले से कोई सूचना मिलती थी। बस अचानक कोई रिश्तेदार दरवाजे पर खड़ा दिखाई देता और घर में खुशी फैल जाती।

मां तुरंत समझ जाती थीं कि अब घर में खास इंतजाम करने होंगे। वो चुपके से हमें कुछ पैसे पकड़ा देतीं और धीरे से कहतीं — 



“जल्दी से दुकान से नमकीन और बिस्कुट ले आना… और ध्यान रहे, मेहमान को पता नहीं चलना चाहिए कि अभी-अभी लाए हैं।”

बस फिर क्या था, हम भी पूरे जोश में गांव की दुकान की तरफ दौड़ पड़ते थे। रास्ते भर मन में खुशी होती थी। एक तो मेहमान आए हैं, ऊपर से नमकीन और बिस्कुट भी घर में आएंगे।

लेकिन असली मजा तब होता था जब हम सामान छुपाकर घर लाते थे। ऐसा लगता था जैसे कोई बहुत बड़ा मिशन पूरा कर रहे हों। मन में ये उम्मीद भी रहती थी कि जब मेहमान खाकर थोड़ा छोड़ देंगे, तो बाकी हमें खाने को मिलेगा।

उस समय मेहमान सिर्फ एक कमरे में बैठकर मोबाइल नहीं चलाते थे। उनके आने पर पूरा परिवार एक साथ बैठता था। रात को आंगन में चारपाइयां डाल दी जाती थीं। गर्मियों की हल्की हवा चलती रहती और देर रात तक बातें होती रहतीं।

सबसे ज्यादा इंतजार मुझे नाना जी के आने का रहता था।

जब वो आते थे, तो घर का माहौल ही बदल जाता था। हमारे ताया जी, चाचा जी और पिता जी सभी उनके पास बैठ जाते थे। फिर शुरू होती थीं पुरानी यादों की बातें।

मुझे बचपन से ही पुराने किस्से सुनना बहुत अच्छा लगता था। नाना जी बताते थे कि उनके समय में लोग बैलों से खेती करते थे। खेतों तक जाने के लिए कच्चे रास्ते होते थे। रिश्तेदारी में लोग कई-कई किलोमीटर पैदल ही चले जाते थे। उस समय सफर कठिन था, लेकिन रिश्ते मजबूत थे।

मैं उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनता रहता था। ऐसा लगता था जैसे उनकी कहानियों के साथ मैं भी उस पुराने समय में पहुंच गया हूं।

मुझे आज भी वो दिन याद है जब नाना जी हमारे घर आए हुए थे और उसी समय हमारे घर में पहली बार टेलीविजन आया था। हमारे आसपास के घरों में सबसे पहले टीवी हमारे घर में ही आया था।

वो टेक्सला का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था।

उस दिन टीवी पर “महाराणा प्रताप” का धारावाहिक आ रहा था। गांव के बच्चे और बड़े सभी हमारे घर में इकट्ठा हो गए थे। कोई जमीन पर बैठा था, कोई चारपाई पर। सबकी नजरें टीवी पर टिकी थीं।

नाना जी भी बड़े ध्यान से टीवी देख रहे थे। उस समय टीवी सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि पूरे गांव के लिए एक नया अनुभव था।

उस दौर में मेहमान कई-कई दिन रहकर जाते थे। किसी को जल्दी वापस जाने की चिंता नहीं होती थी। लोग समय लेकर आते थे और दिल भरकर मिलते थे।

कई बार तो हमें खुद इंतजार रहता था कि अब कब कोई मेहमान आएगा। क्योंकि उनके आने से घर में अलग ही रौनक हो जाती थी।

और जब हम खुद किसी रिश्तेदारी में मेहमान बनकर जाते थे, तो ऐसा महसूस होता था जैसे हम बहुत खास हैं। लोग बड़े प्यार से सेवा करते थे। खाने-पीने से लेकर सोने तक हर छोटी बात का ध्यान रखा जाता था।

आज समय बदल गया है।

अब घरों में पहले से ज्यादा सामान है, सुविधाएं हैं, लेकिन वो अपनापन कहीं कम हो गया है। लोग मिलने से पहले फोन करते हैं, आने से पहले समय देखते हैं, और आने के बाद जल्दी लौटने की चिंता भी बनी रहती है।

अब ना वो आंगन रहे, ना चारपाइयों वाली रातें, ना देर रात तक चलने वाली बातें।

कभी-कभी मन करता है कि जिंदगी फिर से थोड़ी धीमी हो जाए…
और कोई रिश्तेदार अचानक दरवाजे पर आकर कहे —
“सोचा तुम लोगों से मिलते चलें।”



पुराने समय में मेहमान सिर्फ रिश्तेदार नहीं होते थे, वो खुशियां लेकर आते थे। उनके साथ बिताया गया समय आज भी यादों में वैसे ही ताजा है। शायद जिंदगी की असली गर्माहट उन्हीं रिश्तों और उन्हीं बैठकों में छिपी थी, जो आज धीरे-धीरे कहीं खोती जा रही हैं।

Thursday, May 21, 2026

मां की मार से बड़ा कोई डर नहीं था

 बचपन में कई बार हम ऐसी हरकतें कर जाते हैं, जिन्हें उस समय खेल या मज़ाक समझते हैं, लेकिन बाद में सोचकर खुद ही डर जाते हैं। उस उम्र में ना खतरे का अंदाज़ा होता था और ना ही अंजाम का। बस मन में जो आया, वही कर दिया। गांव का बचपन तो वैसे भी शरारतों, डर, डांट और मासूमियत से भरा होता था। आज जब उन पुरानी घटनाओं को याद करता हूं, तो हंसी भी आती है और यह सोचकर डर भी लगता है कि अगर उस दिन कुछ गलत हो जाता, तो शायद कहानी कुछ और ही होती।


एक बार हमारे घर मेहमान आए हुए थे। गांव में जब भी मेहमान आते थे, घर में अचानक हलचल बढ़ जाती थी। कभी चाय बन रही है, कभी खाना तैयार हो रहा है, और बीच-बीच में बच्चों को दुकान की तरफ दौड़ाया जाता था।

उस दिन माता जी ने मुझे और मेरी बड़ी बहन ममता को दुकान से कुछ सामान लाने भेजा। जाते समय हमेशा की तरह एक खास हिदायत जरूर दी गई — 



“जल्दी आना… और सामान छुपाकर लाना।”

उस समय गांवों में ऐसा ही होता था। अगर कोई देख ले कि घर में मेहमान आए हैं और क्या-क्या सामान जा रहा है, तो अगले दिन आधे गांव को खबर हो जाती थी।

हम दोनों गांव की रामदिये की दुकान की तरफ चल पड़े।

रास्ते में गांव का बड़ा जोहड़ पड़ता था। वो इतना बड़ा और गहरा था कि बच्चों को उसके पास अकेले जाने से भी रोका जाता था। बरसात के दिनों में तो उसका पानी और भी डरावना लगता था। किनारों पर घास उगी रहती थी और जगह-जगह छोटे मेंढक बैठे रहते थे।

जब हम जोहड़ के पास पहुंचे, तो पता नहीं मेरे मन में क्या शरारत सूझी। मैंने बहन ममता से कहा —
“देख, मैं तुम्हें एक जादू दिखाता हूं।”

वो उत्सुक होकर देखने लगी।

मैं जोहड़ के किनारे खड़ा हुआ और पैर हिलाने लगा। जैसे ही मैंने पैर मारा, किनारे पर बैठे ढेर सारे छोटे-छोटे मेंढक पानी में कूद गए। मुझे बहुत मजा आया।

लेकिन उसी समय मेरी एक चप्पल भी पैर से निकलकर सीधे पानी में जा गिरी।

पहले तो मैं कुछ पल उसे देखता रहा। फिर अचानक याद आया —
“अगर चप्पल खो गई, तो घर जाकर बहुत मार पड़ेगी।”

उस समय चप्पल खो जाना कोई छोटी बात नहीं होती थी। नई चप्पल आसानी से नहीं मिलती थी।

बस फिर क्या था, बिना ज्यादा सोचे मैं सीधे जोहड़ में उतर गया।

शुरू में पानी घुटनों तक था, फिर कमर तक पहुंच गया। मैं धीरे-धीरे चप्पल की तरफ बढ़ता रहा। लेकिन थोड़ी दूर जाते ही मेरे पैरों ने जमीन छोड़ दी।

अचानक मैं पानी में ऊपर-नीचे होने लगा।

मेरी ठोड़ी तक पानी आ चुका था।

बाहर खड़ी ममता जोर-जोर से रोने लगी। वो डर गई थी। शायद उसे लगा कि मैं डूब जाऊंगा।

मैं खुद भी डर गया था, लेकिन उस समय मन में बस एक ही बात थी —
“चप्पल लेकर ही बाहर जाना है।”

मैंने किसी तरह हाथ बढ़ाकर तैरती हुई चप्पल पकड़ ली और वापस किनारे की तरफ आने लगा।

लेकिन जैसे ही किनारे के पास पहुंचा, मेरे दूसरे पैर की चप्पल भी निकलकर पानी में तैरने लगी।

अब तो हालत और खराब हो गई।

मन में आया कि कम से कम एक चप्पल तो बाहर निकाल लेता, लेकिन उस समय इतनी समझ कहां थी।

अब दूसरी चप्पल के लिए फिर पानी में उतरना पड़ा।

ममता बाहर से डांट भी रही थी और रो भी रही थी —
“मत जा दोबारा… बाहर आ जा।”

लेकिन मुझे तो घर की पिटाई ज्यादा बड़ी लग रही थी।

मैं फिर पानी में उतर गया। इस बार और ज्यादा डर लग रहा था। नीचे पैर नहीं लग रहे थे। ऊपर से जोहड़ में समुंद्रशोक और घास बहुत थी। मन में बार-बार सांप का डर भी आ रहा था। गांव में लोग कहते थे कि ऐसे जोहड़ों में सांप जरूर होते हैं।

लेकिन बचपन का डर भी अजीब होता है। मौत का डर कम और मां की मार का डर ज्यादा लगता था।

आखिर काफी कोशिश के बाद दूसरी चप्पल भी मिल गई।

जब बाहर निकला तो मेरे सारे कपड़े भीग चुके थे। मैं पूरा कांप रहा था।

मैंने ममता से कहा —
“तू दुकान से सामान ले आ। तब तक मैं धूप में खड़ा होकर कपड़े सुखा लेता हूं।”

वो दुकान की तरफ चली गई और मैं वहीं धूप में खड़ा होकर अपने कपड़े सुखाने लगा।

थोड़ी देर बाद वो सामान लेकर आ गई और हम दोनों घर की तरफ चल पड़े।

लेकिन रास्ते भर मेरे मन में एक ही डर था —
“अगर मां को पता चल गया तो क्या होगा?”

और वही हुआ।

घर पहुंचते ही किसी तरह पूरी बात मां तक पहुंच गई।

उस दिन जितनी पिटाई हुई, उतनी शायद चप्पल खो जाने पर भी नहीं होती।

लेकिन आज जब उस घटना को याद करता हूं, तो समझ आता है कि मां की मार में गुस्से से ज्यादा डर और चिंता छिपी हुई थी।

आज वो पुराना जोहड़ भी नहीं रहा। उसे भरकर वहां वृद्धाश्रम और आंगनवाड़ी बना दी गई है।

समय बदल गया, जगहें बदल गईं, लेकिन बचपन की वो भीगी हुई चप्पलें और मां की डांट आज भी यादों में वैसी ही ताजा हैं।

बचपन की गलतियां उस समय भले ही छोटी शरारत लगती थीं, लेकिन आज सोचो तो एहसास होता है कि हम कितनी मासूमियत और नासमझी में जी रहे थे। शायद यही वजह है कि बचपन की हर छोटी घटना भी आज एक बड़ी कहानी बनकर दिल में बस जाती है।

Wednesday, May 20, 2026

बचपन की वो चवन्नी और मासूम खुशियां

 बचपन की दुनिया कितनी अलग होती थी। ना भविष्य की चिंता, ना जिम्मेदारियों का बोझ। जो मन में आया, वही कर दिया। उस समय न सही-गलत का ज्यादा हिसाब होता था और न ही ये समझ कि हमारे किसी काम से किसी और को दुख भी हो सकता है। शायद इसी मासूमियत की वजह से बचपन इतना खूबसूरत लगता है। आज जब जिंदगी हर बात को सोचने और समझने में निकल जाती है, तब वो पुराने दिन और भी ज्यादा याद आते हैं।


ये उन दिनों की बात है जब गांव की गलियां ही हमारी दुनिया हुआ करती थीं। स्कूल से आते ही हम सब लड़के बाहर निकल जाते और कभी खेतों में, कभी चौपाल में, तो कभी गांव के पुराने कुएं के पास खेलते रहते। 


उस समय गांव का कुआं सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं था, बल्कि गांव की यादों और मान्यताओं का हिस्सा भी था। लोग उसे सम्मान देते थे। कई बार वहां पूजा भी होती थी। आज तो उस कुएं को लोहे के जाल से ढक दिया गया है। अब कोई वहां पानी भरने नहीं जाता। वैसे भी आजकल गांवों में पुराने कुएं लगभग खत्म ही हो चुके हैं।

उस दिन मैं, दर्शन, उसका छोटा भाई पवन, छज्जू और मोहल्ले के कुछ दूसरे लड़के कुएं के पास खेल रहे थे। खेलते-खेलते बातों का विषय अचानक पूजा और दान पर आ गया।

तभी किसी लड़के ने मजाक-मजाक में कहा —
“कुएं में दान करना चाहिए, आशीर्वाद मिलता है।”

पवन के हाथ में उस समय एक अठन्नी थी। शायद उसी को देखकर सबने कहना शुरू कर दिया —
“चल, इसमें से कुछ पैसे कुएं में डाल दे। पुण्य मिलेगा।”

पवन शायद अपने पैसे खर्च नहीं करना चाहता था। वो बस मुस्कुरा रहा था और टालने की कोशिश कर रहा था।

लेकिन उस समय मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था।

मैंने अचानक उसके हाथ से अठन्नी छीनी और सीधा गांव की रामदिये की दुकान की तरफ भाग गया। दुकान पर जाकर कहा —
“इस अठन्नी के खुले पैसे दे दो।”

रामदिये ने मुझे दो चवन्नियां दे दीं।

मैं बड़ी शान से वापस आया और पवन के हाथ में एक चवन्नी रखते हुए बोला —
“देख, मैंने पैसे खुलवा दिए। अब दान कर दे।”

लेकिन वो फिर भी दान करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

तभी मैंने दूसरी चवन्नी अपने हाथ में ली, और बिना उसे कुछ समझने का मौका दिए सीधे कुएं में फेंक दी। फिर दोनों हाथ जोड़कर माथा टेक लिया।

मुझे लगा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा पुण्य कर दिया हो।

इससे पहले कि पवन कुछ बोलता या मेरे पीछे भागता, मैं वहां से दौड़ गया।

भागते हुए भी मेरे चेहरे पर खुशी थी। मन में यही चल रहा था कि —
“दान तो हो गया। चाहे पैसे पवन के थे, लेकिन आशीर्वाद का थोड़ा हिस्सा तो मुझे भी मिलेगा।”

आज जब उस घटना को याद करता हूं, तो खुद पर हंसी भी आती है। उस समय बचपन इतना सीधा था कि हमें लगता था भगवान भी शायद इसी तरह खुश हो जाते होंगे।

न कोई चालाकी थी, न ज्यादा समझदारी। बस मन जैसा कहता था, वैसा कर देते थे। शायद इसी वजह से जिंदगी हल्की लगती थी।

आज हर काम करने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। क्या सही है, क्या गलत, कौन क्या सोचेगा, किसे बुरा लगेगा। दिमाग हर समय चलता रहता है।

लेकिन बचपन में दिमाग कम और दिल ज्यादा चलता था।

और शायद इसी कारण वो छोटी छोटी बातें भी आज इतनी बड़ी याद बन गई हैं।

कभी-कभी मन करता है कि जिंदगी फिर से वैसी ही हो जाए —
जहां एक चवन्नी दान करने भर से लगता था कि भगवान खुश हो गए होंगे, और हम पूरे दिन उसी खुशी में घूमते रहते थे।



बचपन की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि वहां खुशियां बहुत छोटी छोटी चीजों में मिल जाती थीं। ना पैसों का हिसाब, ना दुनियादारी की समझ। बस एक मासूम दिल और ढेर सारी सच्ची खुशियां। आज जिंदगी भले ही आसान दिखती हो, लेकिन बचपन जैसी सुकून भरी मुस्कान शायद कहीं पीछे छूट गई है।

Tuesday, May 19, 2026

जब मुझे लगा कि मेरे अंदर कोई आ गया है


बचपन में सुनी हुई बातें अक्सर हमारे मन में इतनी गहराई तक बैठ जाती हैं कि कभी-कभी सच और वहम के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है। गांवों में भूत-प्रेत, आत्माओं और पुरानी घटनाओं की कहानियां आम होती थीं। बड़े लोग डराने के लिए या मजाक में ऐसी बातें कह देते थे, और बच्चों का मन उन्हें सच मान बैठता था। फिर अगर कभी डर, बीमारी या बुखार साथ मिल जाए, तो कल्पनाएं और भी डरावनी लगने लगती थीं। मेरे बचपन की एक ऐसी ही घटना आज भी याद है, जिसे उस समय मैंने पूरी तरह सच मान लिया था।


ये उन दिनों की बात है जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारा स्कूल गांव नैबे में था। स्कूल के हेडमास्टर का नाम नायब सिंह था, लेकिन गांव के बच्चे उन्हें प्यार से “नैबा मास्टर” ही कहते थे। 


एक दिन अचानक हमारे स्कूल में मधुमक्खियों का बड़ा झुंड आ गया। पता नहीं कहां से उड़ता हुआ आया था। मधुमक्खियां कमरों के अंदर तक घुस गई थीं। बच्चे डरकर इधर-उधर भागने लगे। टीचरों ने उन्हें भगाने के लिए धुआं भी किया, थोड़ी आग भी जलाई, लेकिन मधुमक्खियां जाने का नाम ही नहीं ले रही थीं।

अब मास्टरों को डर लगने लगा कि कहीं किसी बच्चे को काट न लें। आखिर फैसला हुआ कि उस दिन की पढ़ाई पास वाले सरकारी स्कूल में होगी। वो स्कूल हमारे स्कूल के बिल्कुल पास ही था और उस दिन वहां छुट्टी थी।

सभी बच्चे अपना सामान उठाकर सरकारी स्कूल में पहुंच गए। हम लोगों को साइंस वाले कमरे के सामने बरामदे में बैठाया गया। उस कमरे के अंदर दीवारों के पास प्लास्टिक के कंकाल टंगे हुए थे।

लेकिन उस उम्र में हमें कहां पता था कि वो नकली होते हैं। हमें तो वो सचमुच के भूत लगते थे। हम उन्हें देखकर धीरे-धीरे बातें करते और डरते रहते थे।

उस दिन पता नहीं क्यों, मेरी तबीयत भी खराब होने लगी। क्लास खत्म होते-होते मुझे तेज बुखार चढ़ गया। जैसे-तैसे घर पहुंचा और आकर तख्त पर लेट गया।

शाम तक बुखार और बढ़ गया। शरीर टूट रहा था, आंखें भारी हो रही थीं। मैं आधी नींद और आधे बुखार की हालत में पड़ा था।

कुछ देर बाद जब मेरी आंख खुली, तो मां मुझे अजीब नजरों से देखने लगीं। उन्होंने पूछा — “तू कौन सी भाषा बोल रहा था?”

मैं हैरान रह गया। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया।

फिर मां ने बताया कि मैं बुखार में बार-बार कह रहा था —
“हम बिटवा को ले जायेगा… हम बिटवा को ले जायेगा…”

वो सुनकर मैं खुद डर गया।

तभी घर में किसी ने कहा — “उस सरकारी स्कूल में भूत रहता है। पहले वहां कोई बिहारी भईया था, जिसकी मौत हो गई थी। तब से उसकी आत्मा वहीं भटकती है।”

गांवों में ऐसी बातें बहुत जल्दी फैल जाती थीं। पहले तो हम इन्हें सिर्फ अफवाह समझते थे, लेकिन जब कई लोग एक ही बात कहने लगे, तो डर धीरे-धीरे मन में घर करने लगा।

अब मुझे भी लगने लगा कि शायद सच में वही “भईया” मेरे अंदर आ गया है।

बुखार में हालत ऐसी थी कि हर चीज डरावनी लग रही थी। कमरे में सामने एक झोला टंगा हुआ था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उसमें से कोई सांप निकल रहा हो। मैं जिस तख्त पर लेटा था, ऐसा महसूस होता था जैसे नीचे से कोई मुझे चुटकी काट रहा हो।

डर और बुखार ने मिलकर मेरे मन में एक अलग ही दुनिया बना दी थी। मुझे पूरा यकीन हो गया था कि कोई आत्मा मेरे अंदर घुस गई है और वही मुझसे अजीब बातें बुलवा रही है।

उस रात मैं बहुत डरा हुआ था। मां बार-बार मेरे सिर पर पानी की पट्टियां रखती रहीं। फिर अगले दिन दवाई दिलवाई गई। धीरे-धीरे बुखार उतर गया और मेरी हालत ठीक होने लगी।

ठीक होने के बाद मैं पूरे यकीन के साथ सबको बताता फिरता था कि —
“मेरे अंदर वो बिहारी भईया घुस गया था।”

लोग भी अपनी-अपनी बातें जोड़कर डर को और बढ़ा देते थे। कोई कहता — “हां, मैंने भी वहां अजीब आवाजें सुनी हैं।” कोई कहता — “वो जगह ठीक नहीं है।”

लेकिन आज जब उन बातों को याद करता हूं, तो हंसी भी आती है और सोचने पर मजबूर भी होना पड़ता है।

असल में वो भूत नहीं था, वो मेरा डर था। बुखार, बचपन की मासूमियत और लोगों की कही बातें मिलकर मेरे मन में ऐसा भ्रम पैदा कर रही थीं, जिसे उस समय मैं सच मान बैठा था।

बचपन का मन बहुत कोमल होता है। जो सुनता है, वही मान लेता है। और जब डर मन में बैठ जाए, तो साधारण चीजें भी डरावनी लगने लगती हैं।



आज विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है, लेकिन गांवों की पुरानी कहानियां और बचपन के डर आज भी यादों में जिंदा हैं। उस समय जो बातें हमें बिल्कुल सच लगती थीं, आज समझ आता है कि उनमें डर ज्यादा था और सच्चाई कम। फिर भी बचपन की वो मासूमियत और डर से भरी रातें जिंदगी की ऐसी यादें बन जाती हैं, जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता।

Monday, May 18, 2026

वो दिन, जब आंखों में आंसू आ गए


स्कूल की जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो सालों बाद भी यादों में वैसे ही ताजा रहते हैं। ना वो किताबों में लिखे होते हैं, ना तस्वीरों में कैद होते हैं, लेकिन दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए बस जाते हैं। बचपन में हम कई बार छोटी छोटी बातों से डर जाते थे, लोगों से घुलने में समय लगता था, और कभी-कभी बिना गलती के भी सजा मिल जाती थी। लेकिन उन्हीं पलों में कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं, जिनकी एक छोटी सी सहानुभूति जिंदगी भर याद रह जाती है।


ये उन दिनों की बात है जब मैंने गांव के सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में नया नया दाखिला लिया था। हमारा स्कूल सिर्फ दसवीं तक था। आठवीं के बाद बहुत से बच्चे पढ़ाई छोड़ देते थे या दूसरे स्कूलों में चले जाते थे। मेरी पुरानी कक्षा के ज्यादातर साथी मुझसे बिछड़ चुके थे। मुश्किल से मैं और एक-दो दोस्त ही नौवीं तक पहुंच पाए थे। 


नई कक्षा में सब चेहरे अनजान थे। कोई किसी गांव से आया था, कोई किसी और स्कूल से। मैं वैसे भी बहुत कम बोलने वाला लड़का था। जल्दी किसी से घुलता-मिलता नहीं था। मन में हमेशा डर सा रहता था कि कहीं मुझसे कोई गलती न हो जाए और सबके सामने शर्मिंदा न होना पड़े।

क्लास का पहला दिन था। मास्टर जी आए और सब बच्चों से परिचय पूछने लगे। फिर उन्होंने पूछा — “तुम्हारी आठवीं की क्लास से कितने बच्चे पास हुए हैं?”

मैंने धीरे से जवाब दिया — “लगभग सब पास हो गए थे, बस एक-दो फेल हुए थे।”

उस समय तो मास्टर जी कुछ बोले नहीं, लेकिन उनके जाते ही पीछे बैठे सौंटी गांव के एक लड़के ने अचानक मेरी बाजू पकड़कर मरोड़ दी और गुस्से में बोला — “झूठ क्यों बोला कि सब पास हुए हैं?”

मैं डर गया। समझ नहीं आया कि मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया था। मैं चुपचाप खड़ा रहा। जवाब देने की हिम्मत ही नहीं हुई। तभी पास बैठी एक लड़की ने उसे डांटते हुए कहा — “तो क्या हुआ अगर बोल दिया? तू मारेगा उसे?”

उसने मेरी बाजू छोड़ दी, लेकिन उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा। ऐसा लगा जैसे मैं उस जगह का हिस्सा ही नहीं हूं। उस दिन के बाद मैं और ज्यादा चुप रहने लगा। स्कूल में सबसे अलग बैठना, कम बोलना और जल्दी छुट्टी होने का इंतजार करना — यही मेरी आदत बन गई।

एक दिन हम सब बच्चे स्कूल के आंगन में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। सब थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बैठे थे। बीच में पीटी मास्टर कुर्सी डालकर बैठा था। वो बहुत सख्त स्वभाव का था। लंबा चौड़ा शरीर, भारी आवाज और चेहरे पर हमेशा गुस्सा। उसे देखकर ही बच्चों के मन में डर बैठ जाता था।

तभी पीछे बैठे कुछ लड़के धीरे-धीरे हंसने लगे। पीटी मास्टर तुरंत गरजकर बोला — “कौन हंस रहा है?”

पूरा आंगन एकदम शांत हो गया। कोई कुछ नहीं बोला।

फिर उसकी नजर मुझ पर पड़ी। शायद उसे लगा कि मैं सच बता दूंगा। उसने मुझे खड़ा किया और कहा — “तू झूठ नहीं बोलेगा। बता कौन शोर कर रहा था?”

मुझे पता था कि कौन हंस रहा था। लेकिन मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से किसी और की पिटाई हो। मैं चुप रहा।

उसने फिर पूछा। मैं फिर भी चुप रहा।

कुछ देर बाद उसने पास से छड़ी मंगवाई और मेरे हाथों पर मारना शुरू कर दिया। दर्द हो रहा था, लेकिन मैंने किसी का नाम नहीं लिया। शायद डर था, शायद मन नहीं माना।

मारते-मारते वो गुस्से में बोला — “एक तो बता नहीं रहा, ऊपर से हंस रहा है!”

असल में मैं हंस नहीं रहा था। डर और घबराहट में मेरे चेहरे पर अजीब सा भाव आ गया था। लेकिन उसे लगा कि मैं उसकी बात को हल्के में ले रहा हूं।

फिर उसने और जोर से मारना शुरू कर दिया।

पूरा स्कूल हमारी तरफ देख रहा था। दूसरे मास्टर भी बाहर आकर देखने लगे थे। मेरे हाथ लाल हो चुके थे, लेकिन मेरी आंखों से आंसू नहीं निकले। शायद डर इतना ज्यादा था कि रोना भी भूल गया था।

कुछ देर बाद हमें वापस क्लास में भेज दिया गया।

अगली घंटी अंग्रेजी की थी। अंग्रेजी वाले मास्टर क्लास में आए। उनका स्वभाव बाकी मास्टरों से अलग था। वो बच्चों से प्यार से बात करते थे।

उन्होंने सबसे पहले मुझे अपने पास बुलाया और धीरे से पूछा — “क्या हुआ था? वो क्यों मार रहा था तुम्हें?”

मैंने पूरी बात बता दी।

उन्होंने थोड़ी देर मुझे देखा, फिर बोले — “तू बता देता कि कौन शोर कर रहा था। उनकी वजह से खुद मार खा ली।”

बस, इतना सुनते ही मेरी आंखें भर आईं।

अजीब बात थी कि इतनी मार खाने के बाद भी मैं नहीं रोया था। लेकिन उनके प्यार से पूछने पर आंसू अपने आप निकल आए। शायद इसलिए क्योंकि पहली बार किसी ने डांटने के बजाय समझने की कोशिश की थी।

आज इतने साल बाद भी वो घटना मुझे याद है। हाथों की मार का दर्द तो कब का खत्म हो गया, लेकिन वो अपनापन आज भी दिल में कहीं जिंदा है।

जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं, जिन्हें समय कभी मिटा नहीं पाता। क्योंकि वो दर्द से नहीं, एहसासों से जुड़े होते हैं।



बचपन की यादों में सिर्फ खेल और शरारतें ही नहीं होतीं, कुछ ऐसे पल भी होते हैं जो हमें इंसानियत और संवेदनशीलता का मतलब सिखा जाते हैं। कभी किसी की डांट याद रह जाती है, तो कभी किसी का प्यार से पूछा गया एक सवाल। शायद यही छोटी छोटी बातें जिंदगी भर हमारे साथ चलती रहती हैं।

Sunday, May 17, 2026

वो बेजुबान साथी, जो परिवार बन गए


गांवों के पुराने घर सिर्फ इंसानों से नहीं बसते थे, वहां जानवर भी परिवार का हिस्सा हुआ करते थे। आँगन में बंधी गाय-भैंसें, रसोई के आसपास घूमती बिल्लियां, और दरवाजे पर बैठे कुत्ते — ये सब घर की रौनक होते थे। वो बोल नहीं सकते थे, लेकिन उनका अपनापन हर बात में दिखाई देता था। जितना प्यार हम उन्हें देते थे, उससे कहीं ज्यादा वो हमें लौटाते थे। बचपन की यादों में अगर इंसान बसे हुए हैं, तो उन बेजुबान साथियों की यादें भी उतनी ही गहरी हैं।


हमारे घर में हमेशा कोई न कोई जानवर जरूर रहता था। कभी गाय, कभी भैंस, कभी बिल्ली के बच्चे, तो कभी कुत्ते। गांवों में जानवर पालना सिर्फ जरूरत नहीं था, वो घर के माहौल का हिस्सा होते थे। सुबह उठते ही सबसे पहले उनकी आवाजें सुनाई देती थीं। लगता था जैसे घर सचमुच जाग गया हो। 


मेरी छोटी बहन सीमा को जानवरों से खास लगाव था। वो उन्हें सिर्फ जानवर नहीं समझती थी, बल्कि घर के छोटे बच्चों की तरह प्यार करती थी। घर में जब भी बिल्ली के बच्चे होते, वो चुपके से उनके लिए दूध निकाल लाती। कई बार मम्मी डांट भी देती थीं कि “सारा दूध बिल्लियों को ही पिला दोगी क्या?” लेकिन सीमा फिर भी किसी न किसी तरह उन्हें खाना खिला ही देती थी।

उसकी सबसे प्यारी आदत थी — जानवरों के नाम रखना। उस समय टीवी पर जो धारावाहिक आते थे, उन्हीं के किरदारों के नाम वो बिल्लियों और कटड़ियों को दे देती थी। कोई तनु बन जाती, कोई तैयब्बा, कोई तैयब। हमारी भैंस की छोटी कटड़ी का नाम “तैयब्बा” रखा गया था, जो उसने अलिफ लैला देखकर रखा था। धीरे-धीरे वो नाम इतना अपना लगने लगा कि हम भी उसी नाम से बुलाने लगे।

जब भी सीमा आँगन में आती, तैयब्बा उसे देखते ही आवाज करने लगती। जैसे उसे पता हो कि उसका सबसे प्यारा इंसान आ गया है। सीमा भी उसके सिर पर हाथ फेरती, उसे पुचकारती और उससे बातें करती रहती। देखने वाले को लगता था जैसे दोनों एक-दूसरे की भाषा समझते हों।

घर में बिल्लियों की शरारतें भी कम नहीं थीं। कभी रसोई में रखा दूध पी जातीं, कभी खाने में मुंह मार देतीं। तब हम गुस्से में डंडा लेकर उनके पीछे भागते। लेकिन वो भागकर सीधे सीमा के पास जाकर छिप जातीं। जैसे उन्हें पता हो कि वही उन्हें बचाएगी। सीमा तुरंत कहती — “मारो मत, बेचारे हैं।”

रात को जब हम सोते थे, तो बिल्लियां चुपके से रजाई के ऊपर आकर बैठ जाती थीं। कई बार उन्हें नीचे उतारते, डराते, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर आ जातीं। सुबह उठो तो वो आराम से रजाई पर गोल होकर सोई मिलतीं। सीमा तो उन्हें अपनी रजाई के अंदर ही सुला लेती थी। वो कहती — “इन्हें भी ठंड लगती है।”

उसकी ये बातें सुनकर कभी हंसी आती थी, तो कभी सचमुच लगता था कि जानवर भी आखिर महसूस तो करते ही हैं।

हमारे घर में दो कुत्ते भी थे। एक काले रंग का और दूसरा भूरे रंग का। उस समय हमने धर्मवीर फिल्म देखी थी, जिसमें धर्मेंद्र और जितेंद्र थे। बस उसी से प्रेरित होकर हमने उनके नाम रख दिए — धर्मेंदर और जितेंदर।

दोनों पूरे घर के सबसे चहेते साथी बन गए थे। जैसे ही हम घर पहुंचते, वो पूंछ हिलाते हुए दौड़े चले आते। अगर कभी डांट देते, तो वो समझ जाते कि गुस्सा असली है या मजाक वाला। फिर वो उल्टे लेट जाते, पंजे ऊपर कर लेते, जैसे माफी मांग रहे हों। उनकी वो हरकत देखकर कोई भी ज्यादा देर नाराज नहीं रह सकता था।

धर्मेंदर बहुत सीधा था। वो किसी पर भौंकता तक नहीं था। बस लोगों के आसपास घूमता रहता, प्यार चाहता रहता। लेकिन एक दिन वो अचानक गायब हो गया। कई दिनों तक हम उसे ढूंढते रहे। बाद में पता चला कि किसी ने उसे लाठी मार दी थी।

उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि जानवर भी दर्द देते नहीं, बल्कि दर्द सहते ज्यादा हैं। वो किसी का बुरा नहीं चाहते, फिर भी कई बार इंसानों की बेरहमी का शिकार बन जाते हैं।

धर्मेंदर के जाने के बाद जितेंदर भी उदास रहने लगा। वो पहले जैसा चंचल नहीं रहा। कुछ समय बाद वो भी कहीं चला गया। शायद कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो अकेले नहीं जी पाते।

फिर समय बीतता गया। सीमा की शादी हो गई। धीरे-धीरे बिल्लियां भी घर आना कम कर गईं। आँगन पहले जैसा भरा-भरा नहीं लगता था। कभी जो घर जानवरों की आवाजों से गूंजता था, वहां अब एक अजीब सी खामोशी रहने लगी।

तब समझ आया कि जानवर सिर्फ घर में रहने वाले जीव नहीं होते, वो हमारी यादों का हिस्सा बन जाते हैं। उनका प्यार दिखावटी नहीं होता। वो बिना किसी स्वार्थ के अपना अपनापन दे जाते हैं।



आज भी जब कहीं कोई बिल्ली अपने बच्चों को संभालती दिखती है, या कोई कुत्ता मालिक के पीछे पीछे चलता नजर आता है, तो बचपन की वो सारी यादें फिर ताजा हो जाती हैं। इंसान बोलकर अपने भाव बता देता है, लेकिन जानवर खामोशी से प्यार निभाते हैं। शायद इसलिए उनका साथ दिल में हमेशा के लिए बस जाता है।

Saturday, May 16, 2026

छत पर बिछे मंजे और मच्छरों वाली रातें

 

गांव की गर्मियां सिर्फ गर्मी का नाम नहीं थीं, वो एक पूरा एहसास हुआ करती थीं। दिन भर की तपती धूप के बाद जब रात होती, तो लोग अपने मंजे, चादर और तकिए लेकर घरों की छतों या आँगन में पहुँच जाते। बिजली का कोई भरोसा नहीं होता था, पंखे अक्सर बंद पड़े रहते थे, और ऊपर से मच्छरों की फौज रात भर हमला करने को तैयार रहती थी। फिर भी उन दिनों में एक अपनापन था, एक सुकून था, जो आज की एसी वाली रातों में भी नहीं मिलता। 



गांवों में गर्मियों के दिनों में घर के अंदर सोना किसी सजा से कम नहीं होता था। मिट्टी के घर दिन भर की गर्मी सोख लेते और रात को वही गर्मी वापस छोड़ते रहते। ऊपर से बिजली कट जाए, तो पसीने से हालत खराब हो जाती थी। इसलिए जैसे ही शाम ढलती, लोग छतों पर या आँगन में मंजे बिछाने लगते थे।

लेकिन असली मुसीबत तो मच्छर हुआ करते थे। गांव के मच्छर भी किसी पहलवान से कम नहीं लगते थे। लोग मजाक में कहते थे कि ये मच्छर नहीं, छोटी मोटी भैंसें हैं। पूरी रात कानों के पास “भूं भूं” करते रहते। अगर गलती से कोई एक मच्छर भी मच्छरदानी के अंदर घुस जाए, तो समझो पूरी रात खराब। आदमी आधी रात को अपने ही गालों पर थप्पड़ मारता रहता था, और मच्छर आराम से बच निकलता था।

धीरे-धीरे गांवों में मच्छरदानियों का चलन शुरू हुआ। रात को बड़ी सावधानी से मच्छरदानी लगाई जाती, उसके कोनों को नीचे दबाया जाता, ताकि कोई मच्छर अंदर न घुस पाए। लेकिन पता नहीं कैसे, एक आध मच्छर फिर भी रास्ता ढूंढ ही लेता था। और फिर पूरी रात कानों में गाना गाता फिरता था। कई बार तो ऐसा लगता था जैसे वो जानबूझकर कान के पास आकर कह रहा हो — “सोने नहीं दूंगा।”

गर्मियों की रातों में छत पर सोने का अपना अलग ही मजा था। ऊपर खुला आसमान, दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज, और हल्की हल्की चलती हवा। लोग देर रात तक बातें करते रहते थे। कोई खेतों की चर्चा करता, कोई पुराने किस्से सुनाता। बच्चे तारों को देखते हुए ही सो जाया करते थे।

लेकिन बरसात के मौसम में यही छत सबसे बड़ी परेशानी बन जाती थी। कई बार रात को मंजा छत पर लगाया, और थोड़ी देर बाद बूंदाबांदी शुरू। फिर सब लोग जल्दी जल्दी बिस्तर समेटकर नीचे भागते। नीचे पहुंचो तो बारिश बंद। फिर मंजे उठाकर ऊपर ले जाओ। और जैसे ही फिर से लेटो, बारिश वापस। कई बार पूरी रात यही ऊपर नीचे करने में निकल जाती थी।

एक बार मेरे नाना जी हमारे घर आए हुए थे। गर्मी बहुत थी और बिजली भी नहीं थी, इसलिए सब लोग छत पर सो रहे थे। नाना जी अपने मंजे पर आराम से लेटे ही थे कि मेरे ताया जी ने मजाक करने की सोची। उन्होंने गिलास में थोड़ा पानी लिया और चुपके से नाना जी पर छींटे मार दिए। फिर खुद अंधेरे में छिप गए।

नाना जी एकदम घबराकर उठ बैठे। उन्हें लगा कि बारिश शुरू हो गई है। उन्होंने तुरंत अपना बिस्तर समेटना शुरू कर दिया और बोले — “जल्दी नीचे चलो, बारिश आ गई है।”

हम सब उनकी बात सुनकर हंसी रोक रहे थे। तभी ताया जी सामने आ गए और हंसते हुए बोले — “क्यों मौसा जी, बरसात आ गई क्या?”

तब नाना जी भी मुस्कुरा पड़े और बोले — “मुझे तो सच में लगा था कि बारिश शुरू हो गई।”

ऐसे छोटे छोटे मजाक ही उन दिनों की असली खुशी थे।

मुझे खुद बार-बार मंजा ऊपर नीचे ले जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। इसलिए एक बार मैंने पहले से ही इंतजाम कर लिया। आँगन में मंजा लगाया और उसके ऊपर डंडे खड़े करके पल्ली बांध दी, ताकि अगर रात को बारिश आए तो मुझे उठना न पड़े।

रात को सचमुच बारिश आ गई। सब लोग अपने बिस्तर बचाने में लगे थे, लेकिन मैं आराम से सोता रहा। सुबह उठा तो देखा कि पल्ली तो लगी थी, लेकिन एक तरफ से पानी अंदर आता रहा और मेरा पूरा बिस्तर भीग चुका था। उस दिन घर वालों ने मेरी खूब हंसी उड़ाई।

आज समय बदल चुका है। लगभग हर घर में इन्वर्टर है, कई जगह एसी भी लग गए हैं। बिजली की परेशानी पहले जैसी नहीं रही। लेकिन सच कहूं, वो पुराने दिनों वाली छत पर सोने की बात आज भी दिल को याद आती है। अब न वैसे खुले आँगन बचे हैं, न वो लंबी गर्मियों वाली बातें। शहरों की ऊंची दीवारों और बंद कमरों में कहीं वो खुला आसमान खो गया है।

आज भी जब गर्मियों की रात में हल्की हवा चलती है, तो मन करता है कि फिर से वही पुराना मंजा छत पर डाल दूं, आसमान के तारों को देखते हुए सो जाऊं, और कानों में मच्छरों की वही पुरानी “भूं भूं” सुनाई दे।



पुराने दिनों में सुविधाएं कम थीं, लेकिन सुकून बहुत था। आज हर चीज आसान हो गई है, पर वो छत पर बिताई गई रातें, मच्छरों से लड़ाई, बारिश में मंजे उठाना और परिवार के साथ हंसना — ये सब यादें आज भी दिल को ठंडक दे जाती हैं। शायद इसी का नाम असली बचपन और असली गांव की जिंदगी था।

Friday, May 15, 2026

सिर पर पल्ली और साइकिल का वो सफर

 

गर्मी के वो दिन आज भी याद आते हैं, जब जिंदगी में आराम बहुत कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हुआ करती थीं। उस समय मैं 11वीं कक्षा में पढ़ता था। सुबह स्कूल जाना, दोपहर की तपती गर्मी में साइकिल चलाकर वापस लौटना और फिर घर-खेत के कामों में लग जाना—यही रोज़ की जिंदगी थी। 

गर्मियों में स्कूल से लौटते समय हालत खराब हो जाती थी। तेज धूप, गर्म हवाएँ और लंबा रास्ता शरीर की सारी ताकत निकाल देते थे। घर पहुँचकर कुछ देर आराम करते, लेकिन उस समय बिजली भी कहाँ रहती थी। दोपहर होते-होते लाइट चली जाती और घर के अंदर बैठना मुश्किल हो जाता। फिर हम बाहर पेड़ के नीचे चारपाई डालकर बैठ जाते। वहीं हवा के सहारे थोड़ी राहत मिलती।

मुझे आज ठीक से याद भी नहीं कि स्कूल का काम किस समय करता था, क्योंकि दिन का ज़्यादातर हिस्सा घर और खेत के कामों में निकल जाता था। दोपहर ढलने लगती, चाय पीते और फिर साइकिल उठाकर खेत की ओर निकल पड़ते—भैंसों के लिए चारा लेने।

खेत पहुँचकर बापू के साथ काम करवाते। कभी जल्दी चारा लेकर लौट आते, तो कभी रात तक खेत में ही काम चलता रहता। बरसीम काटना, उसे रेहड़ी पर लादकर मोटर तक लाना और फिर मशीन से काटना—ये सब काम रोजमर्रा का हिस्सा थे। कई बार शाम को झोटा-बुग्गी लेकर भी घर आना पड़ता था। लेकिन झोटे के साथ गाँव में आना थोड़ा जोखिम भरा होता था। हमारे गाँव में झोटा चलाना मना था, और अगर रास्ते में किसी दूसरे झोटे से भिड़ंत हो जाए, तो फिर उन्हें अलग करना किसी के बस की बात नहीं रहती थी। इसलिए हमेशा सावधानी रखनी पड़ती थी।

एक दिन की बात मुझे आज भी बहुत अच्छी तरह याद है। उस दिन खेत में हरा चारा खत्म हो चुका था और बरसीम अभी छोटी थी, इसलिए उसे काट नहीं सकते थे। तब बापू ने कहा, “आज तूड़ी की पल्ली बाँधकर ले जाओ।”

मैंने भूसे की बड़ी सी पल्ली तो बाँध ली, लेकिन अब समस्या थी उसे घर कैसे पहुँचाया जाए। पल्ली इतनी बड़ी थी कि उसे साइकिल पर बाँधना संभव ही नहीं था। कुछ देर सोचने के बाद मेरे दिमाग में एक अजीब सा विचार आया—क्यों न पल्ली को सिर पर रखकर साइकिल चलाई जाए।

मैंने पल्ली सिर पर उठाई और धीरे-धीरे साइकिल सड़क पर चढ़ा दी। शुरुआत में संतुलन बनाना बहुत मुश्किल लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि कभी भी गिर जाऊँगा। लेकिन थोड़ी देर बाद जैसे-जैसे साइकिल की रफ्तार बढ़ी, संतुलन बनता गया और सफर थोड़ा आसान लगने लगा।

वो मेरी जिंदगी का पहला मौका था जब मैं इतनी बड़ी पल्ली सिर पर रखकर साइकिल चला रहा था। यह काम खतरे से खाली नहीं था। जरा सा झटका गर्दन को नुकसान पहुँचा सकता था, लेकिन उस समय दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी—किसी तरह पल्ली घर पहुँचानी है।

जब मैं गाँव में पहुँचा, तो रास्ते में खड़े लोग मुझे हैरानी से देख रहे थे। शायद उन्होंने पहली बार किसी को इतनी बड़ी पल्ली सिर पर रखकर साइकिल चलाते देखा था। गाँव में आते ही मैंने साइकिल की रफ्तार धीमी कर दी। घर तक पहुँचते-पहुँचते साइकिल लगभग रुक ही गई। मैंने धीरे से पैर नीचे टिकाए और साइकिल रोक दी।

अब तक गर्दन पूरी तरह दर्द करने लगी थी। मैंने धीरे-धीरे पल्ली सिर से उतारी और एक तरफ रख दी। कुछ देर तक हाथों से गर्दन सहलाता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे गर्दन पत्थर की हो गई हो।

मम्मी ने जैसे ही देखा, तुरंत डाँटना शुरू कर दिया—“इतना खतरा क्यों उठाता है? अगर गर्दन में झटका लग जाता तो?”

मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। लेकिन अंदर ही अंदर एक अलग सी खुशी भी थी। उस दिन मैंने अपने तरीके से एक बड़ी चुनौती पूरी की थी।

थोड़ी देर बाद बापू भी घर पहुँचे। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, “पल्ली को साइकिल पर कैसे लाए?”

मैंने भी हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया—“बस... ले आया।”

और फिर वहीं बात खत्म हो गई। लेकिन आज इतने सालों बाद भी वो दिन, वो गर्मी, वो साइकिल और सिर पर रखी वो पल्ली—सब कुछ आज भी यादों में वैसे ही जिंदा है।

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...