ज़िंदगी में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। हम उस समय तो उन्हें एक सामान्य घटना की तरह जी रहे होते हैं, लेकिन बाद में वही दिन यादों का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन जाते हैं। वर्ष 2020 का मार्च महीना भी कुछ ऐसा ही था। पूरी दुनिया एक अनजाने डर के साये में जी रही थी। एक ऐसा वायरस, जिसके बारे में किसी ने पहले कभी नहीं सुना था, धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका था। हर दिन टीवी पर नई खबरें आ रही थीं। कहीं लॉकडाउन की चर्चा थी, कहीं अस्पतालों की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। लोगों के मन में डर था और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी।
उसी समय भारत में भी कोरोना वायरस के मामले बढ़ने लगे थे। देश के प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 22 मार्च 2020 को "जनता कर्फ्यू" का पालन करने की अपील की। लोगों से कहा गया कि वे अपने घरों में रहें और अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। यह एक ऐसा दिन होने वाला था, जब पूरा देश स्वेच्छा से अपने घरों में रहने वाला था।
उस समय मैं चंडीगढ़ में काम करता था। चारों तरफ कोरोना वायरस की खबरें सुनकर मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। ऐसा लग रहा था कि आने वाले दिनों में हालात और भी बदल सकते हैं। इसलिए मैंने तय किया कि जनता कर्फ्यू से पहले अपने गांव चला जाऊं।
शुक्रवार की रात को ही मैंने अपना बैग तैयार करके रख दिया था। शनिवार को सुबह अपने जरूरी काम निपटाए और करीब दोपहर बारह बजे बाइक लेकर चंडीगढ़ से गांव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में सड़कों पर सामान्य दिनों की तुलना में कम भीड़ दिखाई दे रही थी। लोगों के चेहरों पर भी चिंता साफ नजर आ रही थी।
चंडीगढ़ से डेराबस्सी, बरवाला, शहजादपुर होते हुए मैं साहा पहुंच गया। वहां मेरी मौसी का घर था। मेरी पत्नी और भांजी जस्सू भी वहीं आई हुई थीं, जिन्हें साथ लेकर गांव जाना था। मौसी के घर पहुंचकर चाय पी, खाना खाया और कुछ देर आराम किया।
शाम करीब चार बजे हम साहा से गांव के लिए निकल पड़े। आसमान में काले बादल घिरने लगे थे। मौसी ने हमें रोकने की कोशिश भी की। उन्होंने कहा कि मौसम ठीक नहीं लग रहा, थोड़ी देर रुक जाओ। लेकिन घर पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए हमने सफर जारी रखा।
अभी हम शाहबाद के आसपास ही पहुंचे थे कि बारिश शुरू हो गई। मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगीं। सड़क किनारे एक पेट्रोल पंप देखकर हम वहां रुक गए। लगभग आधे घंटे तक बारिश रुकने का इंतजार करते रहे।
बारिश कुछ कम हुई तो हमने फिर से यात्रा शुरू कर दी। लेकिन प्रकृति जैसे उस दिन बार-बार हमारी परीक्षा ले रही थी। कुछ दूरी तय करने के बाद फिर तेज बारिश शुरू हो गई। इस बार हम दिल्ली-अमृतसर हाईवे पर एक पुल के नीचे जाकर खड़े हो गए।
करीब दस मिनट बाद बारिश हल्की हुई और हम फिर आगे बढ़ गए। जैसे-जैसे गांव करीब आ रहा था, वैसे-वैसे मौसम का मिजाज भी बदल रहा था। लेकिन आगे जाकर देखा कि कई जगह बारिश बिल्कुल नहीं हुई थी। कुछ ही समय बाद हम सुरक्षित अपने गांव पहुंच गए।
घर पहुंचकर चाय पी और थोड़ा आराम किया। लेकिन गांव में आराम ज्यादा देर कहां टिकता है। शाम करीब छह बजे पिताजी का फोन आया। उन्होंने खेत में बुला लिया। पशुओं के लिए दो दिन का चारा लाना था।
मैं खेत पहुंचा। वहां पराली का काम करवाया और फिर पास के गन्ने के खेत की तरफ चला गया। खेत में प्रवासी मजदूर ट्रैक्टर-ट्रॉली में गन्ना भर रहे थे। मैंने वहीं से दो गन्ने तोड़ लिए। ताजा और मीठे गन्ने का स्वाद आज भी याद है।
कुछ देर बाद पशुओं के लिए हरे चारे की गठरी बाइक पर रखवाई और घर की ओर चल पड़ा। पिताजी वहीं खेत में रुक गए। उन्होंने कहा कि वे बाद में आ जाएंगे।
रात करीब नौ बजे तक भी वे घर नहीं पहुंचे तो मेरे भाई ने उन्हें फोन किया। उन्होंने बताया कि अभी रास्ते में हैं। हम दोनों भाई उन्हें लेने खेत की ओर निकल पड़े।
जब हम वहां पहुंचे तो पता चला कि वे अभी चले ही नहीं थे। फिर हमने उन्हें बाइक पर बैठाया और चारे से भरी रेहड़ी को साथ लेकर चल पड़े। कुछ रास्ता कच्चा था, इसलिए रेहड़ी को पैदल ही निकालना पड़ा। सड़क पर आने के बाद मेरे भाई ने पीछे से पैर लगाकर रेहड़ी को गति दी और मैं उसकी सीट पर बैठकर उसे संभालने लगा।
गांव की शांत रात, हल्की ठंडी हवा और खेतों की खुशबू के बीच हम धीरे-धीरे घर की तरफ बढ़ते रहे। कुछ ही देर में घर पहुंच गए। चारा उतारा, हाथ-मुंह धोया और खाना खाकर सो गए।
उस रात सोते समय मन में एक अलग ही भावना थी। अगले दिन पूरा देश अपने घरों में रहने वाला था। शायद पहली बार ऐसा होने जा रहा था कि करोड़ों लोग एक साथ अपनी दिनचर्या रोक देंगे।
तब किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले दिन और भी कठिन होने वाले हैं। लॉकडाउन, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और अनगिनत नई बातें हमारी जिंदगी का हिस्सा बनने वाली थीं। लेकिन उस रात हम सिर्फ इतना जानते थे कि कल जनता कर्फ्यू है और देश एक नई चुनौती का सामना करने जा रहा है।
आज जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि वह सिर्फ एक सफर नहीं था, बल्कि इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ का हिस्सा था। बारिश से भरा वह रास्ता, खेतों में बिताई गई शाम, गन्ने की मिठास और अगले दिन के अज्ञात भविष्य की चिंता—सब कुछ आज भी यादों में ताजा है।
कोरोना ने दुनिया को बहुत कुछ सिखाया। उसने हमें परिवार की अहमियत समझाई, गांव की शांति का महत्व बताया और यह एहसास भी कराया कि जिंदगी कितनी अनिश्चित हो सकती है। शायद इसी कारण मार्च 2020 की वह यात्रा मेरी यादों का हमेशा के लिए हिस्सा बन गई।



















