Wednesday, May 20, 2026

बचपन की वो चवन्नी और मासूम खुशियां

 बचपन की दुनिया कितनी अलग होती थी। ना भविष्य की चिंता, ना जिम्मेदारियों का बोझ। जो मन में आया, वही कर दिया। उस समय न सही-गलत का ज्यादा हिसाब होता था और न ही ये समझ कि हमारे किसी काम से किसी और को दुख भी हो सकता है। शायद इसी मासूमियत की वजह से बचपन इतना खूबसूरत लगता है। आज जब जिंदगी हर बात को सोचने और समझने में निकल जाती है, तब वो पुराने दिन और भी ज्यादा याद आते हैं।


ये उन दिनों की बात है जब गांव की गलियां ही हमारी दुनिया हुआ करती थीं। स्कूल से आते ही हम सब लड़के बाहर निकल जाते और कभी खेतों में, कभी चौपाल में, तो कभी गांव के पुराने कुएं के पास खेलते रहते। 


उस समय गांव का कुआं सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं था, बल्कि गांव की यादों और मान्यताओं का हिस्सा भी था। लोग उसे सम्मान देते थे। कई बार वहां पूजा भी होती थी। आज तो उस कुएं को लोहे के जाल से ढक दिया गया है। अब कोई वहां पानी भरने नहीं जाता। वैसे भी आजकल गांवों में पुराने कुएं लगभग खत्म ही हो चुके हैं।

उस दिन मैं, दर्शन, उसका छोटा भाई पवन, छज्जू और मोहल्ले के कुछ दूसरे लड़के कुएं के पास खेल रहे थे। खेलते-खेलते बातों का विषय अचानक पूजा और दान पर आ गया।

तभी किसी लड़के ने मजाक-मजाक में कहा —
“कुएं में दान करना चाहिए, आशीर्वाद मिलता है।”

पवन के हाथ में उस समय एक अठन्नी थी। शायद उसी को देखकर सबने कहना शुरू कर दिया —
“चल, इसमें से कुछ पैसे कुएं में डाल दे। पुण्य मिलेगा।”

पवन शायद अपने पैसे खर्च नहीं करना चाहता था। वो बस मुस्कुरा रहा था और टालने की कोशिश कर रहा था।

लेकिन उस समय मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था।

मैंने अचानक उसके हाथ से अठन्नी छीनी और सीधा गांव की रामदिये की दुकान की तरफ भाग गया। दुकान पर जाकर कहा —
“इस अठन्नी के खुले पैसे दे दो।”

रामदिये ने मुझे दो चवन्नियां दे दीं।

मैं बड़ी शान से वापस आया और पवन के हाथ में एक चवन्नी रखते हुए बोला —
“देख, मैंने पैसे खुलवा दिए। अब दान कर दे।”

लेकिन वो फिर भी दान करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

तभी मैंने दूसरी चवन्नी अपने हाथ में ली, और बिना उसे कुछ समझने का मौका दिए सीधे कुएं में फेंक दी। फिर दोनों हाथ जोड़कर माथा टेक लिया।

मुझे लगा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा पुण्य कर दिया हो।

इससे पहले कि पवन कुछ बोलता या मेरे पीछे भागता, मैं वहां से दौड़ गया।

भागते हुए भी मेरे चेहरे पर खुशी थी। मन में यही चल रहा था कि —
“दान तो हो गया। चाहे पैसे पवन के थे, लेकिन आशीर्वाद का थोड़ा हिस्सा तो मुझे भी मिलेगा।”

आज जब उस घटना को याद करता हूं, तो खुद पर हंसी भी आती है। उस समय बचपन इतना सीधा था कि हमें लगता था भगवान भी शायद इसी तरह खुश हो जाते होंगे।

न कोई चालाकी थी, न ज्यादा समझदारी। बस मन जैसा कहता था, वैसा कर देते थे। शायद इसी वजह से जिंदगी हल्की लगती थी।

आज हर काम करने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। क्या सही है, क्या गलत, कौन क्या सोचेगा, किसे बुरा लगेगा। दिमाग हर समय चलता रहता है।

लेकिन बचपन में दिमाग कम और दिल ज्यादा चलता था।

और शायद इसी कारण वो छोटी छोटी बातें भी आज इतनी बड़ी याद बन गई हैं।

कभी-कभी मन करता है कि जिंदगी फिर से वैसी ही हो जाए —
जहां एक चवन्नी दान करने भर से लगता था कि भगवान खुश हो गए होंगे, और हम पूरे दिन उसी खुशी में घूमते रहते थे।



बचपन की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि वहां खुशियां बहुत छोटी छोटी चीजों में मिल जाती थीं। ना पैसों का हिसाब, ना दुनियादारी की समझ। बस एक मासूम दिल और ढेर सारी सच्ची खुशियां। आज जिंदगी भले ही आसान दिखती हो, लेकिन बचपन जैसी सुकून भरी मुस्कान शायद कहीं पीछे छूट गई है।

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