Tuesday, March 24, 2020

कोरोनावायरस का खतरा, बचने के अलग अलग तरीके

कल सुबह मस्जिद की लाउड स्पीकर में अनाउंसमेंट की गई थी कि अंबाला को लॉक डाउन कर दिया है है। सभी अपने अपने घरों में रहें। पर आज सुबह से पूरे हरियाणा को ही लॉक डाउन कर दिया गया। सभी अपने अपने घरों पर बन्द रहने को मजबूर हो रहे हैं। कल एक यह अनाउंसमेंट भी गई थी कि राशन डिपो में राशन दिया जाएगा, सुबह सभी गांव वासी राशन ले आएं। आज सुबह नहा धोकर तैयार हुआ चंडीगढ़ जाने के लिए, पहले तो घर वाले ही मना कर रहे थे कि अभी नहीं जाना, सख्ताई बहुत है। 

भाई तो सुबह तैयार होकर अंबाला अपने काम पर चला गया। आज राशन डिपो से राशन लेने भी जाना था। पिता राशन कार्ड ले कर डिपो में चले गए, मुझे बोला कि मैं फोन कर दूंगा की भीड़ कम है तो आ जाना। क्यूंकि राशन लेने के लिए फिंगरप्रिंट लगाना पड़ता है। आधे घंटे बाद हम भी चले गए। डिपो में बहुत भीड़ लगी हुई थी। वैसे भी 5 लोगों से अधिक के इकठ्ठा होने पर पाबंदी लगाई हुई है। तो खतरा महसूस होता है कि अगर भीड़ में गए तो कहीं कोई इंफेक्शन ना हो जाए। हम काफी देर बाहर सड़क पर ही खड़े रहे। आखिर एक घंटे बाद हमारी बारी आ गई। सभी ने अपने अपने तरीके से मुंह को ढका हुआ था। किसी ने मास्क पहने हुए थे तो किसी ने अपने तौलिए से मुंह को ढक रखा था। फिर भी सभी एहतियात बरत रहे थे। 

राशन ले के हम घर आ गए। लगा जैसे कि किसी खतरे से बाहर आ गए हैं। घर आ कर हमने हाथ धोए फिर चाय पी। घरवाली ने कहा कि हमें गोरखा स्कूल में जाना पड़ेगा, कुछ सामान लेकर आना है। स्कूल की छुट्टियां होने के कारण अध्यापकों को होमवर्क घर से ही करने को कहा गया है। 10 बजे हम स्कूल के लिए निकल पड़े। घरवाली को स्कूटी सीखनी है। इसलिए पहले तो स्कूटी घरवाली ने है चलाई। उस मोड़ पर डर लगता है। ठोल में हाईवे पर जाकर उसने स्कूटी मुझे दे दी। जाते हुए हम डर भी लग रहा था कि कहीं पुलिस वाले हमें जाने से ना रोक दें। खैर हमें पुलिस वाले नहीं मिले। अजरवर जाकर हमने एक दूसरी मैडम को साथ लिया और हम तीनों स्कूल चले गए। करीब आधा घंटा वहां लगा होगा। फिर हम डॉक्युमेंट्स लेकर वापस आ गए। फिर में बाइक पर अड्डे की तरफ चला गया। वहां सभी दुकानें बन्द थी। एक मेडिकल स्टोर खुला हुआ था। मेरी माता जी ने कहा कि अड्डे पर फक्कर (हम उस शुरू से ही फ़क्कर ही कहकर बुलाते हैं। असली नाम मुझे पता नहीं है) की दुकान से चावल  ले के आने हैं। में दुकान पर गया तो देखा रास्ते में डिपो में अभी भी बहुत भीड़ लगी हुई थी। आगे गया तो स्कूल के प्लेग्राउंड में लड़के वालीबॉल खेल रहे थे। सोचा कि इनके लिए कोरोनावायरस का डर ही नहीं है। फिर मैं दुकान पर पहुंचा तो वहां एक दुकान और भी खुली हुई थी। दुकान वाले से चावलों के बारे में पूछा तो उसने कहा कि चावल खत्म हो गए हैं। फिर मैं वापस आ गया।

 गांव में दूध की डायरी हमारी दूध वाली कैन पड़ी थी। उस लेने दुकान पर गया तो देखा कि पास में चाचा की दुकान किरयाने की दुकान है। उन्होंने अपनी दुकान के आगे सावधानी बरतते हुए एक डंडा इस तरीके से लगाया हुए था कि कोई उस डंडे से आगे ना जा सके। मुझे उस देख कर लगा कि इसकी तो फोटो खींचने चाहिए। तभी फोटो खींच ली।  चाचा के लडके सोनू ने कहा कि कहानियां अच्छी लिखी थी। मैंने कहा कि दो तीन दिन से घर में फ्री बैठे हैं । कुछ करने के लिए काम नहीं है तो सोचा यही लिख लें। फिर हमने डेयरी से कैन ली और घर वापस आ गए। कोरोनावायरस  खतरा हर तरफ नजर आ रहा है। 

सभी संभल कर रहे।

Sunday, March 22, 2020

ऐसी थी "जनता कर्फ्यू" के दिन हमारी दिनचर्या

आज सुबह जैसे ही सो के उठे तो मां आवाज़ें देने लगी की जल्दी से घर काम, पशुओं को चारा डालना, दूध निकालने जैसे काम निपटा लो। गांव में सभी को ऐसेलग रहा था जैसे सूरज ग्रहण या कांड ग्रहण के दें होता है कि घर से बाहर नहीं निकलना, नहीं तो कुछ गलत हो जाएगा। उनको लग रहा था कि दरवाज़ा भी नहीं खोलना। घर के बाहर कदम ही नहीं रखना है। सुबह हमने पशुओं को चारा डाल कर, गोबर वगैरा का का निपटा लिया। 

आज पूरा दिन घर पर रहना था। इसलिए नहाने को भी में नहीं कर रहा था। 9 बजे के आसपास में नहा के तैयार हो गया और बाहर गली में जा कर बैठ गया। फिर दूसरे घर से आवाज़ आईं कि बाहर मत बैठो, अन्दर जाओ, आज कर्फ्यू है। फिर धीरे धीरे सभी ने अपने काम निपटा लिए। बापू जी खेत में चले जाते थे घास लेने, पर आज तो उठे ही नहीं। माता जी भी लेटे रहे। फिर मैंने सोचा कि आज फ्री तो हैं ही, चलो कुछ तूफानी करते हैं। पहले तो मैंने सोचा कि बाथरूम का दरवाजा टूटा हुआ है, उसे ठीक करता हूं। मैं उसके लिए कुछ सामान लेने दुकान पर गया। पर आज सारी मार्केट ही बन्द थी। सिर्फ एक केमिस्ट की दुकान खुली हुई थी। मैंने बाइक वापस मोदी और घर आ गया। 

फिर मैंने सोचा गांव म कोई दुकान खुली होगी। मैं बाइक पर ही बेटे को बिठाकर चल पड़ा। गांव में एक दो दुकान बंद मिली, फिर एक दुकान खुली हुई थी। बेटे को पैसे देकर भेजा की एक ब्रेड का पैकेट ओर बेसन ले आए। वो दुकान से के आया, रास्ते में एक सब्जी वाले पाला सुनार के घर चले गए। उनके घर बेचने के लिए सब्जी रखी होती है। मैंने उनको मटर लेने के बारे में पूछा तो उसकी घरवाली ने कहा कि मटर तो हैं बहुत ही खराब हालत में हैं। मैंने बाहर देखा तो एक कपड़े पर मटर को धूप में सूखने के लिए डाले हुए थे। उनको देखने को भी मन नहीं कर रहा था। फिर भी मैंने उसमे कुछ अच्छे अच्छे दे मटर ढूंढ कर 200 ग्राम मटर ले लिए। उनको पांच रुपए दिए और घर आ गया। घर आ कर मैंने ब्रेड पकौड़े बनाने का सामान तैयार किया। फिर देखा तो आलू भी खत्म थे। सिर्फ दो आलू पड़े थे। 

तभी मैंने बेटे अक्षित को पैसे देकर भेजा की पाला सुनार के घर से आलू ले आए। उसका घर थोड़ी ही दूर था। वो दौड़ा दौड़ा आलू ले आया। उस पता चल चुका था कि ब्रेड पकौड़े बनेंगे तो जल्दी ले आटा हूं। नहीं तो कई बार मना भी कर देता है। हमने सामान तैयार किया। तभी घरवाली भी रसोई में आ गई। वैसे उसकी भी तबियत ठीक नहीं थी। फिर उसने साथ मिलकर पकौड़े बनवाए। दोपहर को चाय के साथ पकौड़े खाए। सभी आराम करने लगे। पात में जब भी घर पर आता हूं तो बहुत ही कम घर में टिकता हूं। गली में इधर उधर घूम कर दिन निकल जाता है। चार बजे मैंने पशुओं को चारा डाला। आज मैंने चाय बनाने को भी किसी को नहीं बोला। घरवाली तबियत खराब की वजह से से रही थी। उसको चाचा के बेटे डॉक्टर सुशील से दवाई भी लेकर दी।

 

लगभग पांच बजे मैंने चाय बनाई और सबको दी। फिर गली में बैठ गए। अभी पांच बजने में 2 मिनट थे। मैंने सभी को बोला कि पांच बजे सभी ने थालियां, तालियां, शंख बजाना है। क्यूंकि प्रधान मंत्री ने ऐसा करने की अपील की थी। उन सभी का आभार व्यक्त करने का एक जरिया बनाया था जो कोरोनावायरस से लडने में दिन रात काम कर रहे हैं। डॉक्टर, पुलिस मुलाजिम, सफाई सेवक और बहुत से साथी। पहले तो सभी थालियां बजाने को लेकर शर्म महसूस कर रहे थे। फिर मैंने उनको दिखाया कि फेसबुक पर पूरे भारत में लोग ऐसा कर रहे हैं। 

फिर धीरे धीरे सभी अपने घर थालियां लेकर आने लगे और गली में या अपने घर में थालियां बजाने लगे। बच्चों के लिए तो ये एक उत्सव सा लग रहा था। पांच मिनट बाद सबको चुप कराया तो बच्चे तो बन्द करने का नाम ही नहीं ले रहे थे। फिर सभी को ऐसा करने के पीछे के वैज्ञानिक कारण के बारे में भी बताया। धीरे धीरे अंधेरा बढ़ने लगा। फिर सभी अपने अपने घर के कामों में मशरूफ हो गए। आज रात को टाइम निकाल कर में इस बारे में लिखने बैठा था। अब 10 बज चुके हैं। अब आंखों में भी नींद आने लगी है। कल सुबह उठ कर फिर अपनी दिनचर्या में जुट जाना है। शुभ रात्रि। 

रास्ते में घनघोर घटा छाई......

आज बहुत दिनों बाद अपने ब्लॉग में कुछ लिखने का मौका मिला है। कुछ दिनों से पूरी दुनिया में हाहाकार मची हुई है। कोरोनावायरस नाम के राक्षस ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। चीन से शुरू हुए इस वायरस ने हजारों जानें ले ली और कई लाख जानें इसकी गिरफ्त में आई हुई हैं। भारत के प्रधान मंत्री ने 20 मार्च को टीवी पर लाइव को कर देश को संबोधित किया बताया की 22 मार्च को रविवार के दिन पूरा देश जनता कर्फ्यू का पालन करेगा। जनता कर्फ्यू में लोगों अपने घर से बाहर ना निकलने की हिदायत की हुई है। जिससे वायरस को कंट्रोल किया का सके।

 मैं चंडीगढ़ में था, शनिवार को शाम को मैंने अपने गांव जाना था। क्यूंकि सभी तरफ घर वायरस से घबराहट फैली हुई थी। मैंने शुक्रवार को रात को ही अपना बैग तैयार कर के रख लिया था। शनिवार को में 12 बजे तक अपने दिनचर्या के काम निपटा कर मैं बाइक पर चंडीगढ़ से निकल पड़ा। चंडीगढ़ से डेराबसी, बरवाला, शहजादपुर होते हुए साहा पहुंच गया था। उस समय तक 2 बज चुके थे। साहा में मेरी मौसी रहती हैं। उनके घर पहुंच कर मैंने चाय पी, फिर खाना खाया। वहां पर मेरी घरवाली और मेरी भानजी जस्सू आई हुई थी। उनको साथ लेकर जाना था। इसलिए मुझे साहा से होकर जाना पड़ा। 

साहा से हम 4 बजे निकल चुके थे। बादल भी सिर पर आ चुके थे। मौसी ने हमें रोकने की कोशिश की कि रास्ते में बारिश आ सकती है। पर हम नहीं रुके। हम अभी शाहबाद पहुंचे भी नहीं थे कि बादल घिर आए। मोटी मोटी बूंदें पड़ने लगी। एक पेट्रोल पंप देख कर हम उसके पास रुक गए। आधा घंटा रुकने के बाद हम फिर से चल पड़े। कुछ दूर चले तो फिर से बरसात आ गई। दिल्ली अमृतसर हाईवे पर हम पुल के नीचे रुक गए। 10 मिनट रुकने के बाद बरसात कम होने पर हम फिर से चल दिए। जैसे जैसे हम घर की तरफ बढ़ रहे थे, मौसम भी बिगड़ता जा रहा था। पर आगे चल कर देखा बरसात कम ही पड़ी थी। रास्ते में नलवि कस्बे से आगे बिल्कुल सूखा पड़ा था। 

आधे घंटे बाद हम घर पहुंच गए। घर पर आकर चाय पी। आराम किया, और अगले दिन के लिए तैयारी भी करनी थी। श्याम को 6 बजे मेरे पिताजी ने फोन करके मुझे खेत में बुला लिया। दो दिन के लिए पशुओं के लिए चारा ले के आना था। मैंने खेत में जाकर पराली का रोका करवाया। फिर मैं गन्ने के खेत चल गया, जो पास ही था। खेत में प्रवासी मजदूर ट्राली में गन्ना लाद रहे थे। मैंने खेत में से दो गन्ने तोड़े, जो बहुत मीठे थे। फिर मैंने बाइक पर टोके की गठरी रखवाई और घर के निकाल पड़ा। मेरे पिता वहीं पर रुक गए। वो बाद में आए। रात को 9 बजे के आसपास मेरे भाई ने बापू जी को फोन करके पूछा कि वो खेत से चले या नहीं। उन्होंने कहा कि वो रास्ते में ही हैं। हम बाइक पर खेत की तरफ चल दिए, ताकि उनकी रेहड़ी के पीछे पैर से धक्का लगा कर उनको साथ ही ले आएं। हम खेत में पहुंच चुके थे, तब तक वो चले भी नहीं थे। 

फिर मैंने उनको बाइक पर बिठाया और रेहड़ी ले के आने लगा। कुछ दूर का रास्ता कच्चा होने की वजह से पैदल ही लानी पड़ती है। जब मैं रेहड़ी को सड़क पर लाया तो भाई ने रेहड़ी के पीछे पैर से धक्का लगाना शुरू किया। में रेहड़ी की सीट पर बैठ गया। कुछ ही देर में हम घर पहुंच गए। फिर हमने चारा उतार कर रखा और हाथ पैर धोकर खाना खा के सोने चले गए। अगले दिन सुबह सात बजे से रात को 9 बजे तक जनता कर्फ्यू लागू किया जाना था। 

बाकी कल.....

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...