Sunday, March 22, 2020

ऐसी थी "जनता कर्फ्यू" के दिन हमारी दिनचर्या

आज सुबह जैसे ही सो के उठे तो मां आवाज़ें देने लगी की जल्दी से घर काम, पशुओं को चारा डालना, दूध निकालने जैसे काम निपटा लो। गांव में सभी को ऐसेलग रहा था जैसे सूरज ग्रहण या कांड ग्रहण के दें होता है कि घर से बाहर नहीं निकलना, नहीं तो कुछ गलत हो जाएगा। उनको लग रहा था कि दरवाज़ा भी नहीं खोलना। घर के बाहर कदम ही नहीं रखना है। सुबह हमने पशुओं को चारा डाल कर, गोबर वगैरा का का निपटा लिया। 

आज पूरा दिन घर पर रहना था। इसलिए नहाने को भी में नहीं कर रहा था। 9 बजे के आसपास में नहा के तैयार हो गया और बाहर गली में जा कर बैठ गया। फिर दूसरे घर से आवाज़ आईं कि बाहर मत बैठो, अन्दर जाओ, आज कर्फ्यू है। फिर धीरे धीरे सभी ने अपने काम निपटा लिए। बापू जी खेत में चले जाते थे घास लेने, पर आज तो उठे ही नहीं। माता जी भी लेटे रहे। फिर मैंने सोचा कि आज फ्री तो हैं ही, चलो कुछ तूफानी करते हैं। पहले तो मैंने सोचा कि बाथरूम का दरवाजा टूटा हुआ है, उसे ठीक करता हूं। मैं उसके लिए कुछ सामान लेने दुकान पर गया। पर आज सारी मार्केट ही बन्द थी। सिर्फ एक केमिस्ट की दुकान खुली हुई थी। मैंने बाइक वापस मोदी और घर आ गया। 

फिर मैंने सोचा गांव म कोई दुकान खुली होगी। मैं बाइक पर ही बेटे को बिठाकर चल पड़ा। गांव में एक दो दुकान बंद मिली, फिर एक दुकान खुली हुई थी। बेटे को पैसे देकर भेजा की एक ब्रेड का पैकेट ओर बेसन ले आए। वो दुकान से के आया, रास्ते में एक सब्जी वाले पाला सुनार के घर चले गए। उनके घर बेचने के लिए सब्जी रखी होती है। मैंने उनको मटर लेने के बारे में पूछा तो उसकी घरवाली ने कहा कि मटर तो हैं बहुत ही खराब हालत में हैं। मैंने बाहर देखा तो एक कपड़े पर मटर को धूप में सूखने के लिए डाले हुए थे। उनको देखने को भी मन नहीं कर रहा था। फिर भी मैंने उसमे कुछ अच्छे अच्छे दे मटर ढूंढ कर 200 ग्राम मटर ले लिए। उनको पांच रुपए दिए और घर आ गया। घर आ कर मैंने ब्रेड पकौड़े बनाने का सामान तैयार किया। फिर देखा तो आलू भी खत्म थे। सिर्फ दो आलू पड़े थे। 

तभी मैंने बेटे अक्षित को पैसे देकर भेजा की पाला सुनार के घर से आलू ले आए। उसका घर थोड़ी ही दूर था। वो दौड़ा दौड़ा आलू ले आया। उस पता चल चुका था कि ब्रेड पकौड़े बनेंगे तो जल्दी ले आटा हूं। नहीं तो कई बार मना भी कर देता है। हमने सामान तैयार किया। तभी घरवाली भी रसोई में आ गई। वैसे उसकी भी तबियत ठीक नहीं थी। फिर उसने साथ मिलकर पकौड़े बनवाए। दोपहर को चाय के साथ पकौड़े खाए। सभी आराम करने लगे। पात में जब भी घर पर आता हूं तो बहुत ही कम घर में टिकता हूं। गली में इधर उधर घूम कर दिन निकल जाता है। चार बजे मैंने पशुओं को चारा डाला। आज मैंने चाय बनाने को भी किसी को नहीं बोला। घरवाली तबियत खराब की वजह से से रही थी। उसको चाचा के बेटे डॉक्टर सुशील से दवाई भी लेकर दी।

 

लगभग पांच बजे मैंने चाय बनाई और सबको दी। फिर गली में बैठ गए। अभी पांच बजने में 2 मिनट थे। मैंने सभी को बोला कि पांच बजे सभी ने थालियां, तालियां, शंख बजाना है। क्यूंकि प्रधान मंत्री ने ऐसा करने की अपील की थी। उन सभी का आभार व्यक्त करने का एक जरिया बनाया था जो कोरोनावायरस से लडने में दिन रात काम कर रहे हैं। डॉक्टर, पुलिस मुलाजिम, सफाई सेवक और बहुत से साथी। पहले तो सभी थालियां बजाने को लेकर शर्म महसूस कर रहे थे। फिर मैंने उनको दिखाया कि फेसबुक पर पूरे भारत में लोग ऐसा कर रहे हैं। 

फिर धीरे धीरे सभी अपने घर थालियां लेकर आने लगे और गली में या अपने घर में थालियां बजाने लगे। बच्चों के लिए तो ये एक उत्सव सा लग रहा था। पांच मिनट बाद सबको चुप कराया तो बच्चे तो बन्द करने का नाम ही नहीं ले रहे थे। फिर सभी को ऐसा करने के पीछे के वैज्ञानिक कारण के बारे में भी बताया। धीरे धीरे अंधेरा बढ़ने लगा। फिर सभी अपने अपने घर के कामों में मशरूफ हो गए। आज रात को टाइम निकाल कर में इस बारे में लिखने बैठा था। अब 10 बज चुके हैं। अब आंखों में भी नींद आने लगी है। कल सुबह उठ कर फिर अपनी दिनचर्या में जुट जाना है। शुभ रात्रि। 

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