आज बहुत दिनों बाद अपने ब्लॉग में कुछ लिखने का मौका मिला है। कुछ दिनों से पूरी दुनिया में हाहाकार मची हुई है। कोरोनावायरस नाम के राक्षस ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। चीन से शुरू हुए इस वायरस ने हजारों जानें ले ली और कई लाख जानें इसकी गिरफ्त में आई हुई हैं। भारत के प्रधान मंत्री ने 20 मार्च को टीवी पर लाइव को कर देश को संबोधित किया बताया की 22 मार्च को रविवार के दिन पूरा देश जनता कर्फ्यू का पालन करेगा। जनता कर्फ्यू में लोगों अपने घर से बाहर ना निकलने की हिदायत की हुई है। जिससे वायरस को कंट्रोल किया का सके।
मैं चंडीगढ़ में था, शनिवार को शाम को मैंने अपने गांव जाना था। क्यूंकि सभी तरफ घर वायरस से घबराहट फैली हुई थी। मैंने शुक्रवार को रात को ही अपना बैग तैयार कर के रख लिया था। शनिवार को में 12 बजे तक अपने दिनचर्या के काम निपटा कर मैं बाइक पर चंडीगढ़ से निकल पड़ा। चंडीगढ़ से डेराबसी, बरवाला, शहजादपुर होते हुए साहा पहुंच गया था। उस समय तक 2 बज चुके थे। साहा में मेरी मौसी रहती हैं। उनके घर पहुंच कर मैंने चाय पी, फिर खाना खाया। वहां पर मेरी घरवाली और मेरी भानजी जस्सू आई हुई थी। उनको साथ लेकर जाना था। इसलिए मुझे साहा से होकर जाना पड़ा।
साहा से हम 4 बजे निकल चुके थे। बादल भी सिर पर आ चुके थे। मौसी ने हमें रोकने की कोशिश की कि रास्ते में बारिश आ सकती है। पर हम नहीं रुके। हम अभी शाहबाद पहुंचे भी नहीं थे कि बादल घिर आए। मोटी मोटी बूंदें पड़ने लगी। एक पेट्रोल पंप देख कर हम उसके पास रुक गए। आधा घंटा रुकने के बाद हम फिर से चल पड़े। कुछ दूर चले तो फिर से बरसात आ गई। दिल्ली अमृतसर हाईवे पर हम पुल के नीचे रुक गए। 10 मिनट रुकने के बाद बरसात कम होने पर हम फिर से चल दिए। जैसे जैसे हम घर की तरफ बढ़ रहे थे, मौसम भी बिगड़ता जा रहा था। पर आगे चल कर देखा बरसात कम ही पड़ी थी। रास्ते में नलवि कस्बे से आगे बिल्कुल सूखा पड़ा था।
आधे घंटे बाद हम घर पहुंच गए। घर पर आकर चाय पी। आराम किया, और अगले दिन के लिए तैयारी भी करनी थी। श्याम को 6 बजे मेरे पिताजी ने फोन करके मुझे खेत में बुला लिया। दो दिन के लिए पशुओं के लिए चारा ले के आना था। मैंने खेत में जाकर पराली का रोका करवाया। फिर मैं गन्ने के खेत चल गया, जो पास ही था। खेत में प्रवासी मजदूर ट्राली में गन्ना लाद रहे थे। मैंने खेत में से दो गन्ने तोड़े, जो बहुत मीठे थे। फिर मैंने बाइक पर टोके की गठरी रखवाई और घर के निकाल पड़ा। मेरे पिता वहीं पर रुक गए। वो बाद में आए। रात को 9 बजे के आसपास मेरे भाई ने बापू जी को फोन करके पूछा कि वो खेत से चले या नहीं। उन्होंने कहा कि वो रास्ते में ही हैं। हम बाइक पर खेत की तरफ चल दिए, ताकि उनकी रेहड़ी के पीछे पैर से धक्का लगा कर उनको साथ ही ले आएं। हम खेत में पहुंच चुके थे, तब तक वो चले भी नहीं थे।
फिर मैंने उनको बाइक पर बिठाया और रेहड़ी ले के आने लगा। कुछ दूर का रास्ता कच्चा होने की वजह से पैदल ही लानी पड़ती है। जब मैं रेहड़ी को सड़क पर लाया तो भाई ने रेहड़ी के पीछे पैर से धक्का लगाना शुरू किया। में रेहड़ी की सीट पर बैठ गया। कुछ ही देर में हम घर पहुंच गए। फिर हमने चारा उतार कर रखा और हाथ पैर धोकर खाना खा के सोने चले गए। अगले दिन सुबह सात बजे से रात को 9 बजे तक जनता कर्फ्यू लागू किया जाना था।
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