गरबड़े! इस त्यौहार का नाम लेते ही बचपन में मनाये जाने वाले त्यौहार याद आ जाते हैं। स्कूल से छुट्टी मिलने का ख्याल भी दिल में आ जाता है। आज भी त्यौहार वही हैं पर अब शायद वो बच्चे नहीं रहे। शायद अब उनके लिए इनका महत्व उतना नहीं रहा जितना पहले हमारे लिए होता था। आज ज़िंदगी की भागदौड़ में कब त्यौहार आते हैं, कब चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। पहले हम कुम्हार के पास से गरबड़े ले के आते थे, या उनके घर वाले सबको घर घर गरबड़े दे के जाते थे। अपनी पसंद के गरबड़े ले के आते थे। गरबड़े के ऊपर रंग बिरंगी चितरकारी कि होती थी। गरबड़े के चरों तरफ डिज़ाइन में सुराख़ किये होते थे, जिनसे दिए की लो का प्रकाश बहार निकल कर अँधेरे में उजाला करता था और बहुत अच्छा लगता था। घर पर ही माथा टेक कर अपने अपने गरबड़े तैयार करते थे। गरबड़े के अंदर राख या कुछ होर चीज़ रख कर उस पर चिराग रखा जाता था। फिर गरबड़े को रस्सी से बांधकर हाथ में लटकने लायक बना दिया जाता था। फिर आसपास के घरों से सभी बच्चे इकठे हो कर एकसाथ गरबड़े को लेकर जाते थे। घरों में सभी उन गरबडों के चिरागों में तेल डालते थे। इस दिन सभी अपने अपने घरों में खुल्ले पैसे रख लेते थे गरबड़े में डालने के लिए। अगर कोई सिर्फ तेल ही डाल देता था। किसी के पास कोई 1 पैसा, 2 पैसे, 3 पैसे, 5 पैसे, 10 पैसे, 25 पैसे या 50 पैसे होते थे तो वो भी चिराग में दाल देते थे। सबके घर जा के वापस आके सभी पैसे गिनते थे। मुश्किल से 1 या 2 रूपये ही बनते थे। इस बार गरबड़े में बचा 50 से 60 रूपये इकठे कर लेता है। बच्चों को भी होता है की तेल चाहे न डालो, पैसे दाल दो बस। अब बच्चों को मोबाइल से ही फुर्सत नहीं है, गरबड़े लेकर ले जाना उनको अच्छा नहीं लगता शायद। पहले जब गरबड़े लेके जाते थे तो बोलते थे की गरबड़े को नचाना है। और गीत भी गाते थे, 'नाच मेरे गरबड़े, गरबड़ी का ब्याह।' दूसरे दिन फिर माथा टेक कर जल परवाह करना होता है। सभी शाम को अपने अपने गरबड़े को लेकर पानी के जौहड़ में किसी वस्तु के ऊपर रख कर छोड़ देते हैं। दिल करता है कि आज भी वैसा ही माहौल बन जाये और अपने इन सभी त्योहारों को वैसे ही मनाएं जैसे पहले मनाते थे।Thursday, October 17, 2019
नाच मेरे गरबड़े, गरबड़ी का ब्याह!
गरबड़े! इस त्यौहार का नाम लेते ही बचपन में मनाये जाने वाले त्यौहार याद आ जाते हैं। स्कूल से छुट्टी मिलने का ख्याल भी दिल में आ जाता है। आज भी त्यौहार वही हैं पर अब शायद वो बच्चे नहीं रहे। शायद अब उनके लिए इनका महत्व उतना नहीं रहा जितना पहले हमारे लिए होता था। आज ज़िंदगी की भागदौड़ में कब त्यौहार आते हैं, कब चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। पहले हम कुम्हार के पास से गरबड़े ले के आते थे, या उनके घर वाले सबको घर घर गरबड़े दे के जाते थे। अपनी पसंद के गरबड़े ले के आते थे। गरबड़े के ऊपर रंग बिरंगी चितरकारी कि होती थी। गरबड़े के चरों तरफ डिज़ाइन में सुराख़ किये होते थे, जिनसे दिए की लो का प्रकाश बहार निकल कर अँधेरे में उजाला करता था और बहुत अच्छा लगता था। घर पर ही माथा टेक कर अपने अपने गरबड़े तैयार करते थे। गरबड़े के अंदर राख या कुछ होर चीज़ रख कर उस पर चिराग रखा जाता था। फिर गरबड़े को रस्सी से बांधकर हाथ में लटकने लायक बना दिया जाता था। फिर आसपास के घरों से सभी बच्चे इकठे हो कर एकसाथ गरबड़े को लेकर जाते थे। घरों में सभी उन गरबडों के चिरागों में तेल डालते थे। इस दिन सभी अपने अपने घरों में खुल्ले पैसे रख लेते थे गरबड़े में डालने के लिए। अगर कोई सिर्फ तेल ही डाल देता था। किसी के पास कोई 1 पैसा, 2 पैसे, 3 पैसे, 5 पैसे, 10 पैसे, 25 पैसे या 50 पैसे होते थे तो वो भी चिराग में दाल देते थे। सबके घर जा के वापस आके सभी पैसे गिनते थे। मुश्किल से 1 या 2 रूपये ही बनते थे। इस बार गरबड़े में बचा 50 से 60 रूपये इकठे कर लेता है। बच्चों को भी होता है की तेल चाहे न डालो, पैसे दाल दो बस। अब बच्चों को मोबाइल से ही फुर्सत नहीं है, गरबड़े लेकर ले जाना उनको अच्छा नहीं लगता शायद। पहले जब गरबड़े लेके जाते थे तो बोलते थे की गरबड़े को नचाना है। और गीत भी गाते थे, 'नाच मेरे गरबड़े, गरबड़ी का ब्याह।' दूसरे दिन फिर माथा टेक कर जल परवाह करना होता है। सभी शाम को अपने अपने गरबड़े को लेकर पानी के जौहड़ में किसी वस्तु के ऊपर रख कर छोड़ देते हैं। दिल करता है कि आज भी वैसा ही माहौल बन जाये और अपने इन सभी त्योहारों को वैसे ही मनाएं जैसे पहले मनाते थे।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
उम्मीद का दीया
एक घर में पाँच दीये जल रहे थे। उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...
-
ज़िंदगी सिर्फ साँस लेने का नाम नहीं है… ज़िंदगी वो है जो साँसों के बीच में हम महसूस करते हैं। लेकिन जब मन की ख़्वाहिशें, सपने, इच्छाएँ...
-
गर्मियों की छुट्टियों का वो दिन आज भी दिल में ताज़ा है। गाँव की वो लंबी, धूल भरी कच्ची सड़क — जिसके दोनों ओर कतार में लगे जामुन के पेड़ जैसे...
-
पानी में गेंद गिरने पर डंडे से निकालते हुए खिलाड़ी आज एक बार फिर मैच खेलने निकल पड़े। अब किसी के पास समय ना होने के कारण कुल द...

No comments:
Post a Comment