Friday, September 28, 2018

100 रूपये का पेट्रोल

आज मैं बैठा लैपटॉप पर कुछ सर्च कर रहा था। तभी मेरी नज़र एक ऑनलाइन अख़बार की वेबसाइट पर लगी एक खबर पर पड़ी, जिसमें पेट्रोल के दाम के बारे में बताया गया था। मैंने उस खबर को खोल के देखा तो उसमें लिखा था कि मुंबई में पेट्रोल 90 रूपये पार कर गया है। मैंने आगे खबर ही नहीं पढ़ी, क्या  फायदा, आज मैंने भी अपनी बाइक में पेट्रोल डलवाना है। कल डलवाया था 100 रूपये का पेट्रोल, आज ख़त्म भी हो गया। आज सुबह सेक्टर 34  जाना था। 


मैं बाइक लेकर सेक्टर 41 वाले पेट्रोल पंप पर गया तो वहां लम्बी लाइन लगी हुई थी, मैंने सोचा, सेक्टर 42  वाले पेट्रोल पंप से डलवा लेता हूँ। पर वहां भी लाइन लगी हुई थी। सेक्टर 34  से वापस आते समय सोचा सेक्टर 43 से डलवा लूँ, पर वहां ध्यान ही नहीं रहा, कब पेट्रोल पंप निकल गया। असल में मेरा मन ही नहीं कर रहा था पेट्रोल डलवाने को, जबकि बाइक में पेट्रोल कम था। क्यूंकि इतना महंगा पेट्रोल कैसे डलवाये कोई, पर मज़बूरी है, 100  को पार कर जायेगा, तब भी डलवाएंगे। और बोलते भी रहेंगे कि इतना महंगा हो गया है। 
जब पेट्रोल 50 का एक लीटर था, तब भी 100 रूपये का ही डलवाना, 60 का हो गया, तब भी 100 का ही डलवाना, 70 का हो गया तब भी 100 का ही डलवाना। तब शायद इतना फर्क महसूस नहीं होता था। लेकिन अब तो हद ही हो गयी है। जब 90 रूपये के पास पहुँच गया है। अब भी 100  का डलवाएंगे तो हर रोज़ ही डलवाना पड़ेगा। और अगर किसी दिन बाइक कुछ ज्यादा चल गयी तो शायद एक दिन में दो दो बार न डलवाना पड़ जाये। इसलिए अब 100  का फंडा तो छोड़ना पड़ेगा।  
मुझे तो ऐसा लगता है कि आने वाले समय में 100 का पेट्रोल डलवाएंगे तो बाइक भी कहेगी कि मुझे घर में खड़ी कर दो। 100 का पेट्रोल डलवाके मुझे रोज़ स्टार्ट करके मेरी आवाज़ सुन कर फिर बंद कर दिया कर। इससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। 
मुझे याद है जब पहले पेट्रोल पंप से 20-25 रूपये पेट्रोल मिलता था। आज उससे चार गुना ज्यादा महंगा हो गया है। पर शायद आम लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता होगा क्यूंकि कहीं भी विरोध करने वालों में आम लोग नहीं होते, जब भी कहीं विरोध हो रहा होता है, तो किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के लोग ही होते हैं। अब तो ऐसा लगता है कि ये पेट्रोल के दाम अब कभी रुकने का नाम नहीं लेंगे। बढ़ते जायेंगे, बढ़ते जायेंगे, और वाहनों के पहिये रुकते जाएंगी। और एक दिन ऐसा आएगा कि फिर से लोग बैलगाड़ियों का इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे। 
काश वो दिन भी आये और इस टेक्नोलॉजी भरी पत्थर की दुनिया से निजात मिले और फिर से वही हरा भरा वातावरण पनपने लगे। खैर, मेरे बोलने लिखने से तो कुछ होने वाला नहीं, आप भी जाओ पेट्रोल पंप पर और पेट्रोल डलवाओ, मैं भी जा रहा हु, 100 रूपये का पेट्रोल डलवाना है, नहीं तो बाइक घर पे ही खड़ी करनी पड़ जाएगी।

Monday, September 24, 2018

बरसात है या बरसात की जिद्द... हद हो गयी...

आज सुबह सोकर उठा तो सबसे पहले बारिश ने मेरा स्वागत किया। मुझे लगा जैसे मुझे कह रही हो कि अभी तो मैं हु यहां, तू सो जा आराम से। आज कहीं भी नहीं जाना, बारिश हो रही है। और मैंने भी उसकी बात मान लो, और फिर कम्बल ओढ़ के सो गया। एक घंटे बाद फिर उठा, सोचा कि अब तो बारिश हट गयी होगी। पर नहीं, वो अभी भी वहीँ आराम से बरसे जा रही थी। मैंने सोचा शायद अभी थकी नहीं है, फिर सो जाता हु, मैंने कम्बल ओढ़ा और फिर सो गया। 

अब 10  बज चुके थे। मैंने कम्बल को धीरे से मुंह से हटाया और चुपके से देखा कि अभी भी यहीं है या चली गयी। पर बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। पर शायद आज वो अपने घर से बेफिक्र हो कर आयी थी, घर पर शायद अपनी माँ को बोल कर आयी होगी, कि आज तो मैं आने वाली नहीं। दो दिन से लगातार बरसे जा रही बारिश से मेरे कमरे की छत भी टपकने लगी थी। वैसे तो छत कच्ची नहीं है, लैंटर डाला हुआ है, पर वो भी कब तक सहन कर पाता, कब तक इस बेरहम बारिश को रोक पाता। छत वाले पंखे के बॉक्स से भी पानी आना शुरू हो गया था। मैंने अपनी चाररपायी को टपकने वाले पानी से बचा के दूसरी तरफ घुमा लिया था। 

थोड़ी देर बाद पानी वहां भी आ गया। सारी छत पर पानी की बुँदे नज़र आ रही थी। बूंदों ने एक लाइन बना ली थी, सभी उसके पीछे पीछे चलने लगी, और एक जगह पर जाकर इकठी हो गयी। जैसे उनको पता था कि इस जगह पर चारपाई है, और उस पर गद्दा है, वहीं पर आकर टपकने लगी। मैंने चारपाई को थोड़ा और पीछे को सरका लिया। और आराम से सो गया। सोचा अब इन बूंदों को नहीं पता लगेगा कि मैं कहां हु। पर मुझे लगा कि मेरे पैरों पर पानी टपक रहा था। मुझे लगा कि शायद बारिश ने अपने साथ इनको भी मिला लिया है। और मुझे परेशान करने का अब ये तरीका निकाला है। अब मेरे पास चारपाई को और ज्यादा सरकाने के लिए जगह नहीं बची थी क्यूंकि मेरा कमरा ज्यादा बड़ा नहीं है। छोटा सा कमरा है, उसमे ही कूलर भी रखा हुआ है। किराये पर मिलने वाले कमरे ज्यादातर छोटे ही होते हैं, उनमे ही पैर मोड़ कर सोना पड़ता है। 

अब दोपहर के 12  बज चुके थे। पर बारिश अभी भी टिकटिकी लगा कर मुझे देखे जा रही थी। मैंने मन ही मन कहा कि जब ज़रूरत होती है तब तो बरसती नहीं है, और अब है कि हटने का नाम नहीं ले रही। खेतों में किसानों की फसल पकने वाली है और अब ये उनको परेशान करने के लिए बरसे जा रही है। मैंने भी सोच लिया था कि अब नहीं सोऊंगा। मैं उठा, नहा कर पुराने कपडे डालकर बाहर निकलने को तैयार हो चुका था। सर पर हेलमेट रखा और मार्किट में चला गया। बारिश में ही मैं चाय की दुकान पर गया और चाय पी। रात से मैंने अपना फ़ोन चार्जिंग पर लगाया हुआ था, पर शायद usb केबल ख़राब हो गयी थी। चार्ज ही नहीं हो रहा था। अभी मैंने usb केबल भी लेनी थी। 

चाय पी कर मैं बारिश में ही मोबाइल फ़ोन की दुकान पर गया और गारंटी वाली केबल ली और फिर कमरे पर आ गया। मैंने बारिश की तरफ देखा और उसे चिढ़ाते हुए बोला कि बरसती रह अब, मैं चाय भी पी आया, केबल भी ले आया। अब तेरा जब जीअ करे तब हटना। बारिश को भी जैसे गुस्सा आ गया और वो और भी तेज हो गयी। अब 1 बज चुका था। मैंने सोचा अब बारिश में कुछ काम भी नहीं कर सकते, बाहर भी नहीं जा सकते, मैंने अपना लैपटॉप उठाया और ब्लॉग लिखने बैठ गया। पर कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं। तभी मेरा दिल बोला कि बारिश से हुई लड़ाई ही लिख दे, आज तो बारिश हो रही हो, कुछ काम नहीं है, यही लिख दे। बारिश अभी भी घूर घूर के देख रही थी। हैप्पी बरसात का दिन।

Saturday, September 22, 2018

मुझको लौटा दो बचपन का सावन.....

जब हमारे घर टीवी नहीं हुआ करता था। हम टीवी देखने अपने चाचा के घर जाया करते थे। तब इतने सारे चैनल नहीं आते थे। डीडी 1  तब एक ही चैनल हुआ करता था। जब कभी बरसात का मौसम होता था तो डीडी मेट्रो भी चलने लगता था, पर वो साफ नहीं चलता था, मच्छर आते थे, पर उसमें भी ख़ुशी मिलती थी, की हमारे टीवी में दूसरा चैनल भी चल रहा है।तब शुक्रवार और शनिवार 2  दिन फिल्म आया करती थी। आज तो दिन में हर चैनल पर 5-6  फिल्में आ जाती हैं। 

बंदा भी परेशान हो जाता है की कोनसी देखें, और कोनसी ना देखें। तब हफ्ते भर में सिर्फ दो फ़िल्में आती थी, जिनको देखके ही मन संतुष्ट हो जाता था। तब धारावाहिक भी बहुत अच्छे लगते थे, जैसे अलिफ़ लैला, शक्तिमान, शांति, और ऐतवार को स्पेशल बच्चों के लिए नाटक आते थे। उमंग, तराना, सुबह सुबह दिन की शुरुआत रंगोली से होती थी। पुरानी फिल्मों के पुराने गीतों से मन को शांति भी मिल जाती थी। आज के गीत इतने तड़क फड़क वाले होते हैं, सिर्फ ढमढम ही सुनाई देता है। गीत के बोल क्या है , कुछ नहीं पता चलता, और लोगों को भी आजकल ऐसे ही गीत पसंद आते हैं। हम हफ्ते में दो दिन अपने चाचा के घर टीवी देखने जाते थे, वो भी रात को 8  बजे से लेकर रात 11 बजे तक। तब ख़बरें भी आधे घंटे के लिए आती थी। वो हमारे लिए खाने पिने का समय होता था। यही कहा जाता था कि चलो जितनी देर ख़बरें चलती हैं, सभी खाना खा लो। साढ़े 8 बजे से लेकर 9  बजे तक ख़बरें चलती थी। 

हम अलिफ़ लैला धारावाहिक देखने से आधा घंटा पहले चले जाते थे। कि चलो उससे पहले मशहुरियाँ (विज्ञापन) ही देख लेंगे। आजकल के धारावाहिक : जिस चैनल पर देख लो सिर्फ सास बहु के ही चल रहे हैं। जैसे उनके पास होर कोई मुद्दा ही नहीं बचा। और उन धारावाहिकों में भी सिर्फ साजिशें ही दिखाते हैं। समाज पर उनका असर उल्टा ज्यादा पड़ता है। पहले अलिफ़ लैला नाटक मुझे बहुत पसंद था। उसमें सब कुछ आध्यात्मिक, भगवान की बातें, खुदा की मिसालें होती थी।  आज उस समय के कोई भी टीवी प्रोग्राम यूट्यूब पर देखते हैं तो उस ज़माने की बातें आँखों के सामने घूम जाती हैं। 

दिल करता है कि काश वो ज़माना दोबारा से आ जाये और हम फिर से उस उम्र के ही हो जाएँ। आज टीवी चैनल की भरमार हो गयी है। सभी चैनल सिर्फ  एक बिज़नेस बन के रह गए हैं। सभी अपने चैनल पर सिर्फ वही कुछ दिखाते हैं जो उनके चैनल के लिए फायदेमंद हो। कभी कभी दिल में भगवान से दुआ करता हु कि वो बचपन के दिन, उस ज़माने के टीवी चैनल, धारावाहिक, सब लौटा दो हमें। मुझे ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह की ये ग़ज़ल बहुत अच्छी लगती है,,, मुझे लगता है कि ये सभी को अच्छी लगती है : ''ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज़ की किश्ती, वो बारिश का पानी.......''

Friday, September 21, 2018

ज़िंदगी में ये राक्षस कहां से आया?

फेसबुक पर हमें कई प्रकार के लेख पढ़ने को मिल जाते हैं। जिसे जो भी अच्छा पढ़ने को मिलता है, वो उसे पढता भी है, और उसे आगे अपने दोस्त मित्रों के साथ भी शेयर करता है। ऐसी ही एक पोस्ट आज मैंने पढ़ी, हमारी ज़िंदगी में महंगाई रूपी राक्षश घर कर गया है। अगर हम उसे दूसरे नज़रिये से देखें तो उसे हमने ही राक्षस बनाया है और अपनी ज़िंदगी में हावी होने दिया। आज फेसबुक फ्रेंड करमजीत सिंह की वाल से मुझे कुछ ऐसा ही पढ़ने को मिला। जिसे आपके साथ शेयर कर रहा हूँ। अच्छा लगे तो आप भी आगे अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये।


*धीरे धीरे कितने नाजायज़ ख़र्च से जुड़ते गए है हम....*
● टॉयलेट धोने का हार्पिक अलग,
● बाथरूम धोने का अलग.
● टॉयलेट की बदबू दूर करने के लिए खुशबू छोड़ने वाली टिकिया भी जरुरी है.
● कपडे हाथ से धो रहे हो तो अलग वाॅशिंग पाउडर
और
मशीन से धो रहे हो तो खास तरह का पाउडर...
(नहीं तो तुम्हारी 20000 की मशीन बकेट से ज्यादा कुछ नहीं.)
● और हाँ, कॉलर का मैल हटाने का व्हॅनिश तो घर में होगा ही,
● हाथ धोने के लिए
नहाने वाला साबुन तो दूर की बात,
● लिक्विड ही यूज करो,
साबुन से कीटाणु 'ट्रांसफर' होते है
(ये तो वो ही बात हो गई कि कीड़े मारनेवाली दवा में कीड़े पड़ गए)
● बाल धोने के लिए शैम्पू ही पर्याप्त नहीं,
● कंडीशनर भी जरुरी है,
● फिर बॉडी लोशन,
● फेस वाॅश,
● डियोड्रेंट,
● हेयर जेल,
● सनस्क्रीन क्रीम,
● स्क्रब,
● 'गोरा' बनाने वाली क्रीम
लेना अनिवार्य है ही.
●और हाँ दूध
(जो खुद शक्तिवर्धक है)
की शक्ति बढाने के लिए हॉर्लिक्स मिलाना तो भूले नहीं न आप...
● मुन्ने का हॉर्लिक्स अलग,
● मुन्ने की मम्मी का अलग,
● और मुन्ने के पापा का डिफरेंट.
● साँस की बदबू दूर करने के लिये ब्रश करना ही पर्याप्त नहीं,
माउथ वाश से कुल्ले करना भी जरुरी है....
और फिर सामान लेने जायेंगे तो किसी बड़े शॉपिंग मॉल में, छोटी दुकान से सामान लेने में जैसे शर्म आने लगी है। छोटी दुकान में जाने से इमेज काम न हो जाये।
तो श्रीमान जी...
10-15 साल पहले जिस घर का खर्च 8 हज़ार में आसानी से चल जाता था,
आज उसी का बजट 40 हजार को पार कर गया है !
तो उसमें सारा दोष महंगाई का ही नहीं है,
कुछ हमारी बदलती सोच भी है !
*और दिनरात टीवी  पर दिखाये जानवाले विज्ञापनों का परिणाम है !*
सोचो..
सीमित साधनों के साथ स्वदेशी जीवन शैली अपनायें, देश का पैसा बचाएं ।
जितना हो सके साधारण जीवन शैली अपनाये !
केवल Govt को कोसने से कुछ नही होगा ।
*यह मैसेज बहुत हद तक सबकी आंखें खोलने वाला कड़वा सच है, बस गहराई से सोचने और समझने की जरूरत है 

Thursday, September 20, 2018

सांप और मेंढक की दोस्ती

आज फेसबुक पर मेरे एक मित्तर ने पोस्ट शेयर की। बहुत अच्छी लगी। उस पोस्ट की भाषा पंजाबी में थी, सो मैंने सोचा  कि आप लोगों के लिए उसे हिंदी में बदल के पोस्ट कर देता हु, शायद आप लोग भी उससे कुछ फायदा उठा सको। पर उसको सिर्फ पढ़ लेने से कोई फायदा नहीं होने वाला, जब तक हम उस पोस्ट का सन्देश नहीं समझेंगे।


    एक तालाब में मेंढक की सांप से दोस्ती हो गयी।
सांप कहता है, "भाई कोई काम हो तो बताना।''
मेंढक कहता है, "यार अन्य मेंढ़क मुझे परेशान करते हैं। ... अगर तुम मुझे उन मेंढकों का सरदार बना दो तो बहुत अच्छा होगा, ...
इसके अलावा, आप हर दिन एक मेंढक खा लेना
सांप ने वही किया, उस मेंढक को सभी मेंढकों का सरदार बना दिया।
कोई विद्रोह न करे, इसलिए दहशत कायम करने के लिए, सांप रोज़ एक मेंढक को खा जाता।
मित्तर मेंढक बहुत खुश था, सरदार बन कर।
सांप के रोज़ एक मेंढक खाने से धीरे धीरे सभी मेंढक ख़तम हो गए। फिर वह सांप उस मेंढक को खाने लगा।
मेंढक ने कहा, "यार हम तो दोस्त है, तुम मुझे नहीं खा सकते।"
तब सांप ने कहा, "तुमने ही मुझे सलाह दी थी, अब मैं हर दिन मेंढक खाने का आदी हो गया हूं।
इसके अलावा, आप दोस्ती के बारे में क्या बात कर रहे हैं, तुम मेरे दोस्त नहीं हो, तुमने तो मेंढक दोस्तों को धोखा दिया है। अपनी कोम के साथ धोखा किया है। "सरदार" बनने के लिए, "जथेदार" बनने के लिए।
ऐसा कहते हुए सांप ने उस मेंढक को भी खा लिया।
आज हमारे देश की स्थिति कुछ ऐसी ही है.....!

Friday, September 7, 2018

सोशल मीडिया पर आयी कहानियों से कुछ सीखना चाहिए

उम्मीद हमारे जीवन में उस दिए की तरह है, जिसे कभी बुझने नहीं देना चाहिए।

सोशल मिडिया पर ऐसी बहुत सी कहानियां  आती रहती हैं। अगर हम सोशल मिडिया का इस्तेमाल सही तरिके से करें तो और इन कहानियों को अपने जीवन में उतार तो हमें सोशल मिडिया का भरपूर फायदा मिल सकता है।

मेरे एक दोस्त ने मुझे व्हाट्सप्प पर ये कहानी भेजी, मुझे बहुत अच्छी लगी, पढ़कर आँखों में आंसू तो नहीं आये, पर सोचा आप सब के साथ भी शेयर कर लूँ. शायद किसी को इसका महत्व समझ आ जाये और इसकी शिक्षा अपने जीवन में उतार  ले. तो मेरा ये POST डालना सफल जो जायेगा।

              महत्वपूर्ण दिया !!


एक घर मे पांच दिए जल रहे थे , एक दिन पहले दिए ने कहा - 'इतना जलकर भी मेरी रोशनी की लोगो को कोई कदर नही है तो बेहतर यही होगा कि मैं बुझ जाऊं ' और वह दीया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया । जानते है वह दिया कौन था ? वह दीया था उत्साह का प्रतीक ।
यह देख दूसरा दीया जो शांति का प्रतीक था , कहने लगा , मुझे भी बुझ जाना चाहिए... निरंतर शांति की रोशनी देने के बावजूद भी लोग हिंसा कर रहे है और शांति का दीया बुझ गया ।
उत्साह और शांति के दीये बुझने के बाद , जो तीसरा दीया हिम्मत का था , वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया ।
उत्साह , शांति और अब हिम्मत के न रहने पर चौथे दीए ने बुझना ही उचित समझा । चौथा दीया समृद्धि का प्रतीक था । सभी दीए बुझने के बाद केवल पांचवां दीया अकेला ही जल रहा था । हालांकि पांचवां दीया सबसे छोटा था मगर फिर भी वह निरंतर जल रहा था ।
तब उस घर मे एक लड़के ने प्रवेश किया । उसने देखा कि उस घर मे सिर्फ एक ही दीया जल रहा है , वह खुशी से झूम उठा ... चार दीए बुझने की वजह से वह दुखी नही हुआ बल्कि खुश हुआ , यह सोचकर कि कम से कम एक दीया तो जल रहा है । उसने तुरंत पांचवां दीया उठाया और बाकी के चार दीए फिर से जला दिए ।
जानते है वह पांचवां अनोखा दीया कौन सा था ? वह था उम्मीद का दीया ..
इसलिए अपने घर मे अपने मन मे हमेशा उम्मीद का दीया जलाए रखिये । चाहे सब दीए बुझ जाए लेकिन उम्मीद का दीया नही बुझना चाहिए । ये एक ही दीया काफी है बाकी सब दीयों को जलाने के लिए ....
क्योंकि हमारे आज में जो उम्मीद जगती है वही उम्मीद हमारे भविष्य का निर्माण करती है ।

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...