जब हमारे घर टीवी नहीं हुआ करता था। हम टीवी देखने अपने चाचा के घर जाया करते थे। तब इतने सारे चैनल नहीं आते थे। डीडी 1 तब एक ही चैनल हुआ करता था। जब कभी बरसात का मौसम होता था तो डीडी मेट्रो भी चलने लगता था, पर वो साफ नहीं चलता था, मच्छर आते थे, पर उसमें भी ख़ुशी मिलती थी, की हमारे टीवी में दूसरा चैनल भी चल रहा है।तब शुक्रवार और शनिवार 2 दिन फिल्म आया करती थी। आज तो दिन में हर चैनल पर 5-6 फिल्में आ जाती हैं।
बंदा भी परेशान हो जाता है की कोनसी देखें, और कोनसी ना देखें। तब हफ्ते भर में सिर्फ दो फ़िल्में आती थी, जिनको देखके ही मन संतुष्ट हो जाता था। तब धारावाहिक भी बहुत अच्छे लगते थे, जैसे अलिफ़ लैला, शक्तिमान, शांति, और ऐतवार को स्पेशल बच्चों के लिए नाटक आते थे। उमंग, तराना, सुबह सुबह दिन की शुरुआत रंगोली से होती थी। पुरानी फिल्मों के पुराने गीतों से मन को शांति भी मिल जाती थी। आज के गीत इतने तड़क फड़क वाले होते हैं, सिर्फ ढमढम ही सुनाई देता है। गीत के बोल क्या है , कुछ नहीं पता चलता, और लोगों को भी आजकल ऐसे ही गीत पसंद आते हैं। हम हफ्ते में दो दिन अपने चाचा के घर टीवी देखने जाते थे, वो भी रात को 8 बजे से लेकर रात 11 बजे तक। तब ख़बरें भी आधे घंटे के लिए आती थी। वो हमारे लिए खाने पिने का समय होता था। यही कहा जाता था कि चलो जितनी देर ख़बरें चलती हैं, सभी खाना खा लो। साढ़े 8 बजे से लेकर 9 बजे तक ख़बरें चलती थी।
हम अलिफ़ लैला धारावाहिक देखने से आधा घंटा पहले चले जाते थे। कि चलो उससे पहले मशहुरियाँ (विज्ञापन) ही देख लेंगे। आजकल के धारावाहिक : जिस चैनल पर देख लो सिर्फ सास बहु के ही चल रहे हैं। जैसे उनके पास होर कोई मुद्दा ही नहीं बचा। और उन धारावाहिकों में भी सिर्फ साजिशें ही दिखाते हैं। समाज पर उनका असर उल्टा ज्यादा पड़ता है। पहले अलिफ़ लैला नाटक मुझे बहुत पसंद था। उसमें सब कुछ आध्यात्मिक, भगवान की बातें, खुदा की मिसालें होती थी। आज उस समय के कोई भी टीवी प्रोग्राम यूट्यूब पर देखते हैं तो उस ज़माने की बातें आँखों के सामने घूम जाती हैं।
दिल करता है कि काश वो ज़माना दोबारा से आ जाये और हम फिर से उस उम्र के ही हो जाएँ। आज टीवी चैनल की भरमार हो गयी है। सभी चैनल सिर्फ एक बिज़नेस बन के रह गए हैं। सभी अपने चैनल पर सिर्फ वही कुछ दिखाते हैं जो उनके चैनल के लिए फायदेमंद हो। कभी कभी दिल में भगवान से दुआ करता हु कि वो बचपन के दिन, उस ज़माने के टीवी चैनल, धारावाहिक, सब लौटा दो हमें। मुझे ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह की ये ग़ज़ल बहुत अच्छी लगती है,,, मुझे लगता है कि ये सभी को अच्छी लगती है : ''ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज़ की किश्ती, वो बारिश का पानी.......''

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