आज सुबह सोकर उठा तो सबसे पहले बारिश ने मेरा स्वागत किया। मुझे लगा जैसे मुझे कह रही हो कि अभी तो मैं हु यहां, तू सो जा आराम से। आज कहीं भी नहीं जाना, बारिश हो रही है। और मैंने भी उसकी बात मान लो, और फिर कम्बल ओढ़ के सो गया। एक घंटे बाद फिर उठा, सोचा कि अब तो बारिश हट गयी होगी। पर नहीं, वो अभी भी वहीँ आराम से बरसे जा रही थी। मैंने सोचा शायद अभी थकी नहीं है, फिर सो जाता हु, मैंने कम्बल ओढ़ा और फिर सो गया।
अब 10 बज चुके थे। मैंने कम्बल को धीरे से मुंह से हटाया और चुपके से देखा कि अभी भी यहीं है या चली गयी। पर बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। पर शायद आज वो अपने घर से बेफिक्र हो कर आयी थी, घर पर शायद अपनी माँ को बोल कर आयी होगी, कि आज तो मैं आने वाली नहीं। दो दिन से लगातार बरसे जा रही बारिश से मेरे कमरे की छत भी टपकने लगी थी। वैसे तो छत कच्ची नहीं है, लैंटर डाला हुआ है, पर वो भी कब तक सहन कर पाता, कब तक इस बेरहम बारिश को रोक पाता। छत वाले पंखे के बॉक्स से भी पानी आना शुरू हो गया था। मैंने अपनी चाररपायी को टपकने वाले पानी से बचा के दूसरी तरफ घुमा लिया था।थोड़ी देर बाद पानी वहां भी आ गया। सारी छत पर पानी की बुँदे नज़र आ रही थी। बूंदों ने एक लाइन बना ली थी, सभी उसके पीछे पीछे चलने लगी, और एक जगह पर जाकर इकठी हो गयी। जैसे उनको पता था कि इस जगह पर चारपाई है, और उस पर गद्दा है, वहीं पर आकर टपकने लगी। मैंने चारपाई को थोड़ा और पीछे को सरका लिया। और आराम से सो गया। सोचा अब इन बूंदों को नहीं पता लगेगा कि मैं कहां हु। पर मुझे लगा कि मेरे पैरों पर पानी टपक रहा था। मुझे लगा कि शायद बारिश ने अपने साथ इनको भी मिला लिया है। और मुझे परेशान करने का अब ये तरीका निकाला है। अब मेरे पास चारपाई को और ज्यादा सरकाने के लिए जगह नहीं बची थी क्यूंकि मेरा कमरा ज्यादा बड़ा नहीं है। छोटा सा कमरा है, उसमे ही कूलर भी रखा हुआ है। किराये पर मिलने वाले कमरे ज्यादातर छोटे ही होते हैं, उनमे ही पैर मोड़ कर सोना पड़ता है।
अब दोपहर के 12 बज चुके थे। पर बारिश अभी भी टिकटिकी लगा कर मुझे देखे जा रही थी। मैंने मन ही मन कहा कि जब ज़रूरत होती है तब तो बरसती नहीं है, और अब है कि हटने का नाम नहीं ले रही। खेतों में किसानों की फसल पकने वाली है और अब ये उनको परेशान करने के लिए बरसे जा रही है। मैंने भी सोच लिया था कि अब नहीं सोऊंगा। मैं उठा, नहा कर पुराने कपडे डालकर बाहर निकलने को तैयार हो चुका था। सर पर हेलमेट रखा और मार्किट में चला गया। बारिश में ही मैं चाय की दुकान पर गया और चाय पी। रात से मैंने अपना फ़ोन चार्जिंग पर लगाया हुआ था, पर शायद usb केबल ख़राब हो गयी थी। चार्ज ही नहीं हो रहा था। अभी मैंने usb केबल भी लेनी थी।
चाय पी कर मैं बारिश में ही मोबाइल फ़ोन की दुकान पर गया और गारंटी वाली केबल ली और फिर कमरे पर आ गया। मैंने बारिश की तरफ देखा और उसे चिढ़ाते हुए बोला कि बरसती रह अब, मैं चाय भी पी आया, केबल भी ले आया। अब तेरा जब जीअ करे तब हटना। बारिश को भी जैसे गुस्सा आ गया और वो और भी तेज हो गयी। अब 1 बज चुका था। मैंने सोचा अब बारिश में कुछ काम भी नहीं कर सकते, बाहर भी नहीं जा सकते, मैंने अपना लैपटॉप उठाया और ब्लॉग लिखने बैठ गया। पर कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं। तभी मेरा दिल बोला कि बारिश से हुई लड़ाई ही लिख दे, आज तो बारिश हो रही हो, कुछ काम नहीं है, यही लिख दे। बारिश अभी भी घूर घूर के देख रही थी। हैप्पी बरसात का दिन।


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