Sunday, October 21, 2018

मेले में जाने के लिए उसका वो भोला चेहरा अब भी याद आ रहा है .....

19  अक्टूबर 2018  को दशहरे का मेला आ गया। बच्चों के लिए मेले का नाम खुशियां लेकर आता है। बच्चों को जिस दिन स्कूल जाना होता है, तो उनको बड़ी मुश्किल से जगाना पड़ता है, पर जिस दिन छुट्टी हो उस दिन सुबह वो ही उठकर हमको जगाते हैं। ऐसा ही हुआ दशहरे वाले दिन भी। मैं अभी सो रहा था, पर मेरा बेटा अक्षित उठकर बैठ गया। उसे पता था कि आज दशहरे की छुट्टी है, स्कूल नहीं जाना, मेले में जाना है। खिलौने खरीद कर लाने हैं। 

हमारे गांव में भी दशहरे का छोटा सा मेला भरता है। वो सुबह ही जिद करने लगा कि मुझे खिलौने दिलवा के लाओ। मैंने उसे कहा कि अभी तो मेले में दुकानें भी नहीं सजी होंगी। पर वो थोड़ी देर चुप रहता फिर वही रट लगता कि चलो मेले में। अब 11 बज चुके थे पर उसकी वही रट अभी भी चल रही थी कि चलो खिलौने दिलवा के लाओ। काफी देर जब वो नहीं माना तो मुझे ना चाहते हुए भी उसे एक चांटा लगाना पड़ा। जिससे वो चुप हो गया। पर मुझे पता था कि वो इससे भी मानने वाला नहीं था। पर चलो कुछ देर ही सही, शांति तो मिलेगी। मैं कुछ काम निपटा के घर में जा के लेट गया। वो भी मेरे पीछे पीछे आ गया। पर वो कुछ ना बोलते हुए भी मुझसे अभी भी वही जिद कर रहा था कि चलो खिलौने दिलवा के लाओ। वो पास में कुर्सी पर बैठ गया। वहीं पास में ही मेरा बैग पड़ा था। वो थोड़ा छिप छिप कर मुझे देख रहा था। फिर बोलने लगा कि चलो, मैं उसे घूरता तो वो चुप हो जाता और अपना मुंह छुपा लेता। मुझे हंसी भी आ रही थी और उस पर तरस भी आ रहा था कि कैसे मिन्नतें करनी पड़ रही हैं। 

उसने धीरे धीरे मेरे बैग से सारे कपड़े निकल दिए। बैग में जो कुछ भी सामान पड़ा था उसे निकाल कर कुर्सी पर बिखेर दिया। ये उसका गुस्सा प्रकट करने का तरीका था। जब मैं उसे देखता तो फिर अपना मुंह बैग के पीछे छुपा लेता। मैं भी मन ही मन हंस रहा था कि देखो क्या ड्रामे कर रहा है। उसने बैग की ज़िप खोल खोल कर खराब कर दी। मुझे गुस्सा भी आया, और उस पर तरस भी आ रहा था। कैसे वो अपना भोला सा चेहरा बना कर मेरी मिन्नतें कर रहा था। खैर दोपहर हो चुकी थी, खाना खा कर  हम आराम कर रहे थे। हमारे पास के गांव जनसुई में मेले वाले दिन कुश्तियों का आयोजन किया जाता है। मेरे ताया जी को कुश्तियों देखने का बहुत शौक है।

ताया जी ने मुझे कहा कि उनको बाइक पर ले कर चले। हम ढाई बजे बाइक पर निकलने लगे थे कि तभी अक्षित बाइक पर सबसे आगे आकर बैठ गया। मैं और ताया जी, ताया जी का कुडम (समधी) भी साथ में थे। भांजा विजय भी आया हुआ था। वो अलग बाइक लेकर हमारे पीछे बाद में ताया जी के लड़के के साथ मेले में पहुंचा। हम 10 मिनट बाद  मेले में पहुंच गए। कुश्तियां शुरू हो चुकी थी। बहुत भीड़ थी। हमने एक जगह पर बाइक खड़ी की और कुश्तियां देखने लगे। अभी हमें 10 मिनट ही हुए थे कि अक्षित कहने लगा कि भूख लगी हुई है, कुछ खिलाओ। पर मैं जानता था कि उसे भूख खिलौनों की लगी हुई है। खैर मैं उसे लेकर दुकानों की तरफ चला गया। उसे लेकर दुकानों पर घुमा कि जो लेना हो ले लो। पहले तो उसे कुछ पसंद नहीं आया। फिर उसे एक हेलीकाप्टर पसंद आया, पर वो महंगा था, और धागे से चलने वाला था, जिससे वो जल्दी ही खराब हो जाता। उसे कुछ और लेने को बोला। फिर उसे एक रिमोट वाली कार दिखाई दी। वो कुछ अलग डिज़ाइन की थी। 

मैंने उसे समझाया कि ये तो तेरे पास है, पर वो नहीं माना, बोलने लगा कि नहीं ये तो अलग है। फिर दुकानदार ने बताया कि ये भी वैसी है , पर डिज़ाइन अलग बनाया है। फिर वो मान गया उसे ना लेने के लिए। उसने पूरी दुकानों पर घुमा दिया, मैं थक चूका था, पर वो नहीं थका। फिर कहता कि पीछे दुकान पर मैंने एक खिलौना देखा था, उसे सब याद था कि उसे कहां देखा था। काफी घूमने के बाद उसे मोटू पतलू वाला खिलौना पसंद आया, सस्ता भी था। मैंने पूछा कि अब अंजलि के लिए कुछ ले लेते हैं। पर पता नहीं उसे क्या पसंद आएगा। 

उसने कहा कि अंजलि के लिए भी गुड़िया ले लो, उसने मुझसे बोला था कि गुड़िया लेकर आना। घर जाने के बाद उसने बताया कि मैंने तो ऐसे ही कह दिया कि अंजलि ने मुझसे गुड़िया लाने को कहा था। फिर मुझे उसकी होशियारी अच्छी लगी। फिर उसे आइसक्रीम खिलाई। घूमते घूमते हमें विजय और ताया जी का लड़का भी मिल गया, वो गोलगप्प्पे कहा रहे थे। उनमें से एक गोलगप्पा मैंने लिया, पर पानी बिलकुल भी स्वाद नहीं था। घूमते घूमते काफी देर हो चुकी थी।

कुश्तीयां खत्म हो चुकी थी। सभी वहां से निकल कर रावण के पुतले की तरफ बढ़ रहे थे। हमने ताया जी और उनके समधी को भी ढूंढ़ना था। काफी देर उनको ढूंढा पर वो नही मिले। मुझे लगा कि शायद वो मेले से निकल चुके हैं और पैदल चले गए होंगे। हमने दुबारा फिर उनको मेले में ढूंढा, पर जब नहीं मिले तो हमने भी घर के लिए पकौड़े खरीदे। जब मैं पकोड़े ले रहा था तो अक्षित ने मुझसे कहा कि पापा मैं नहीं खाऊंगा, मुझे भूख नहीं है । मैंने कहा कि ये तेरे लिए नहीं है, घर में और भी हैं खाने वाले। 

फिर जब पकौड़े लिए तो कहता मैंने भी खाने हैं, एक निकल के दो, उसे एक पकौड़ा दिया, वो गरम था, कुछ खाया बाकि हाथ से छूटकर निचे गिर गया। फिर हम बाइक पर चल पड़े। काफी दूर जाने पर हमें ताया जी पैदल जाते हुए मिल गए। हमने उन्हें बिठाया और घर पहुंच गया। गांव में भी रावण दहन की तैयारियां हो चुकी थी, फिर हम गांव वाले मेले में गए। तब तक अँधेरा हो चुका था। पर मुझे अक्षित का वो भोला सा चेहरा अभी भी याद आ जाता है कि मुझे मेले में चलने के लिए कैसे मिन्नतें कर रहा था। हा हा हा हा, कभी हम भी ऐसे ही ड्रामे करते थे, मेले में जाने के लिए।

Friday, October 19, 2018

किस मेले में सबसे बड़ा रावण बनाया?




दोस्तों आप सब को दशहरे की लाख लाख बधाई। हर तरफ दशहरे की धूम मची हुई है। आज शहर में जिस तरफ भी जाओ, ऊँचे ऊँचे रावण, कुम्भकरण, मेघनाद के पुतले खड़े दिखाई देते हैं। पर ये सिर्फ आज के लिए ही हैं। आज शाम तक सभी पुतले आग की भेंट चढ़ जायेंगे। गांवों में मेले भरे जा रहे हैं।  कुश्तियों का आयोजन किया जा रहा है। गांवों में वैसे तो अब कुश्तियों का इतना शौक नहीं रहा, जो पहले पुराने लोग हैं, बज़ुर्ग हैं, उनको ज्यादा शौंक है।  बच्चों को तो टेलीविज़न से ही फुर्सत ही नहीं है। दशहरे वाले दिन मेले में ज्यादा आकर्षण का केंद्र होता है रावण। सब यही देखते हैं की रावण कैसा बना है? कितना बड़ा बनाया है? कितना खर्चा किया है? 
कई मेलों में रावण के साथ कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले भी बनाये जाते हैं। पर कई जगह बजट कम होने की वजह से सिर्फ रावण का ही पुतला बनाया जाता है। चंडीगढ़ के हर सेक्टर में रावण के पुतले बनाए जा रहे थे, सिर्फ आज एक दिन के लिए। हरियाणा के शाहबाद मरजंदा शहर के पास बराड़ा में सबसे बड़ा रावण का पुतला बनाने का रिकार्ड है। लगभग 200 फुट। लेकिन अब हर कोई चाहता है कि हम क्यों पीछे रहें। हमारा रावण बड़ा होना चाहिए। चाहे कितना भी खर्चा क्यों का करना पड़े। आजकल पंचकूला के रावण की चर्चा हर तरफ है। सभी अपनी अपनी फेसबुक पर पोस्ट कर रहे हैं। रावण के पुतले के साथ फोटो खींचते हैं। 

कई जगह मजाकिया टाइप के रावण बनाये गए। जिन्हें देखकर कोई कार्टून ही नज़र आता है। सुना है कि पंचकूला में 30 लाख खरच करके रावण का सबसे बड़ा पुतला बनाया गया है। लगभग 3 महीने में इसे तैयार किया गया है। इस रावण की ऊंचाई 210 फुट बताई जा रही है। शाम को 5 बजे के आसपास इस रावण को आग के सपुर्द कर दिया जायेगा। मतलब 30 लाख रूपये मिनटों में खाक हो जायेंगे। लोग भी उस मेले में जा कर अपने आप को धन्य मेहसूस करते हैं जिस मेले में बड़ा रावण लगाया गया हो। रावण का पुतला बनाना ज़रूरी है तो बड़ा बनाने की होड़ क्यों? क्या छोटा रावण जल्दी जल जाता है। लोग वैसे भी रावण को आग लगते ही अपने अपने घरों को निकल पड़ते हैं। तो इतना खर्चा, क्यों? समझ में नहीं आता।

Thursday, October 11, 2018

सांझी माता: श्रद्धा जो आज नज़र ही नहीं आती...


सांझी उत्तर भारत का मशहूर त्यौहार है, जिसे सभी बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। सांझी माता के नाम से ये त्यौहार प्रसिद्ध है। पर आज शायद ये धूमधाम सिर्फ दिखावा ही रह गया है। जिस दिन नवरात्रे शुरू होते हैं, पहले नवरात्रे के दिन सांझी माता की मूर्ति बनाकर दीवार पर लगाई जाती है।  9 दिन तक उसकी पूजा की जाती है, फिर नौवें दिन उसे उतार कर पानी में विसर्जित किया जाता है। हमारे बचपन की सांझी और आज की सांझी में बहुत अंतर आ चुका है। आज तो बाजार से मोल की बनी बनाई मूर्तियां मिल जाती हैं। आज किसी भी घर में लड़कियों के पास समय ही नहीं है कि वो अपने हाथों से सांझी बनाकर लगाएं। पहले हम भी अपनी बहनों के साथ मिलकर गारे से सांझी बनाते थी। खेतों में काने पे पौधे मिल जाते थी, जिनकी पतली पतली टहनियों कि सहायता से गारे के घुंघरू बनाये जाते थे। जो बहुत ही प्यारे लगते थे। गारे से सांझी माता का मुंह, हाथ, पैर, कुर्ती सलवार, चूड़ियां, टिक्कियां, चिड़िया, पेटू, पेटू का हुक्का, कंघा बनाते थे। सांझी लगाने के दिन से 10 दिन पहले बनाना शुरू कर देते थे। फिर दुकान से कई तरह के रंग लेकर उनको रंगबिरंगी बनाया जाता था। मुझे गारे से कई तरह कि चीज़ें बनाना बहुत अच्छा लगता था। स्कूल से घर आ कर सांझी बनाना शुरू कर देते थे।सूरज, चाँद, चिड़ियाँ, टिक्कियाँ और भी कई तरह की चीज़ें बनाते थे। सांझी माता का मुंह बनाना सबसे मुश्किल होता था। कई बार गारे से उसका नाक बड़ा बन जाता था, कई बार कान छोटे रह जाते थी। अभी कुछ दिन पहले मेरे भाई की पत्नी ने अपने मोबाइल पर व्हाट्सप्प पर स्टेटस लगाया था, जिसमें सांझी माता का मुंह बनाया हुआ था, देखकर पहले तो समझ ही नहीं आया की ये क्या है। बड़े गौर से देखने पर पता चला की ये तो सांझी बनाई हुई है। आज किसी को शौक ही नहीं है इन सब का। वे सब इसे बेकार की बातें मानते हैं। क्यूंकि आजकल सभी पढ़े लिखे हो गए हैं, और मन से श्रद्धा ख़तम हो चुकी है, सभी विज्ञान की तरह सोचने लगे हैं। पहले लोगों के मन में श्रद्धा होती थी। हम गारे की चीज़ें बनाते हुए भी ये सोचते थे कि हाथ धो के बनाना है, नहीं तो पाप लगेगा। सभी पैसे देकर सांझी माता की मूर्तियां खरीद लेते हैं जैसे कि बस ले के दिवार पर ही लगानी है, तो लगा देंगे। पर ये सब बातें श्रद्धा की होती हैं, मन में किसी के प्रति सच्ची श्रद्धा उसे सबके साथ जोड़ कर रखती है। पहले लोग अनपढ़ होते थे, पर मन में श्रद्धा होती थी, सचाई होती थी, आज लोग पढ़े लिखे हैं पर सिर्फ किताबी कीड़ा ही बन कर रह गए हैं। जो किताबों में पढ़ाया जाता है, व्ही सच है, बाकि कुछ भी नहीं। मुझे लगता है कि शायद आनी वाली पीढ़ियां तो इन सबके बारे में भूल ही जाएँगी, और नई पीढ़ी के बच्चों को इन सब बातों के बारे में बताएंगे तो उससे अचंभा ही लगेगा

Wednesday, October 10, 2018

रामलीला का वो दिन, कुछ खट्टा कुछ मीठा....

राजा दशरथ का दरबार 

हमारे गांव रामलीला को 50 साल होने वाले हैं। पहले मैं भी रामलीला में कुछ रोल कर लेता था। पर आजकल काम काज से ज़िंदगी इतनी व्यस्त हो गयी है, कि अब समय ही नहीं मिलता। बचपन कितना भोला और शरारती होता है। न किसी का डर, ना कोई लालच। अगर बचपन में समझदार बन जाएँ तो बचपन ख़त्म हो जाता है। हमारे गांव में नवरात्रों में हर साल की तरह रामलीला शुरू हो चुकी है। आज रामलीला का दूसरा दिन है। मैं भी छुट्टी पर घर आया हुआ था तो सोचा कि रामलीला देख आता हूँ। रात को 8 बजे रामलीला ग्राउंड में पहुंच गया, पर अभी रामलीला शुरू नहीं हुई थी। मैदान में कुछ दुकानदारों ने अपनी अपनी दुकानें सजा ली थी। कुछ ने घर से ही मजे लेकर उस पर अपनी दुकान सजाई हुई थी। गोलगप्पे कि रेहड़ी,बर्गर, टिक्की, और खिलोने भी मिल जाते हैं। ग्राउंड में छोटे छोटे बच्चे खेल रहे थे। ग्राउंड में बच्चे इधर उधर भाग रहे थे। जैसे गिरने का और गिर के चोट लगने का डर भी उन्हें नहीं था। मैं जैसे ही वहां से निकल रहा था, तभी एक बच्चा भागता हुआ वहां से निकला और मुझसे टकरा गया। मैं उसकी तरफ देख कर मुस्कुराने ही लगा था कि उसने मुझसे कहा कि देखकर नहीं चल सकते, मुझे टक्कर क्यों मारी। मेरी हैरानी का ठिकाना नहीं रहा। मुझे उसपर पहले तो गुस्सा आया, फिर सारा गुस्सा भाग गया। उसने इतने आत्मविश्वास से ये बात कही थी की मुझे लगा की शायद मैंने ही टक्कर मारी हो। मैंने कहा कि अच्छा! मैंने टक्कर मारी। फिर मैं वहां से चला गया। कुछ देर बाद रामलीला शुरू हो गयी। सबसे पहले आरती की गयी। जो बच्चे स्टेज के पास बैठे थे, वे सभी अपनी अपनी शरारतों में व्यस्त थे। वो इतना शोर कर रहे थे कि मैंने उनके पास जा के उनको डांटा कि इतना शोर क्यों कर रहे हो। चुप हो के देखो। उस समय तो वो चुप हो गए, पर जैसे ही मैं वहां से पीछे मुड़ा, उनकी शरारतें पहले की तरह शुरू हो गयी। फिर मैंने भी उनको कुछ कहना ठीक नहीं समझा, कि इन्होने नहीं चुप रहना। मैं अपनी जगह पर जाकर खड़ा हो गया। आज रामलीला में ताड़का राक्षसी ने आना था। कई लोग तो रामलीला के स्पेशल दृश्य देखने आते हैं, जैसे ताड़का वध, सीता स्वयंवर, बनवास, सूर्पनखा, बाली वध, अशोक वाटिका। आज ताड़का वध होना था। हमारे गांव का ही एक लड़का संजू ताड़का का रोल करता है। उसने अपना मुँह कालिख से काला करके, काला घाघरा पहन कर, कुछ अजीब सी शक्ल बना के राक्षसी बन कर आता है। मिटटी का तेल मुँह में डाल कर आग पर फूंक मारता है तो आग बहुत जोर से भड़क जाती है, जिससे दृश्य और भयानक बन जाता है।  जैसे ही ताड़का आयी, सभी बच्चे खड़े हो गए, कुछ के लिए वो डर का माहौल था तो कुछ उसे मजे से देख रहे थे। सभी इधर उधर भागने लगे। हम लोगों ने सभी बच्चों को आराम से बैठने को कहा, कुछ को तो सख्ती से बिठाना पड़ा। सभी ताड़का के संवाद सुनने को बेताब रहते हैं। जब राम ने ताड़का को मार दीया तो ताड़का को मृत शरीर को लेने उसके कुछ रिश्तेदार आते हैं। जिसको एक कॉमिक ड्रामा बनाया गया है। सभी अजीब अजीब शक्लें बनाकर आते हैं, जिससे दर्शकों को हंसी आये और वे सभी बैठ कर उन्हें देखती रहें। वे लोग रोते हुए अपना विरलाप करते हैं। ओर कुछ संवाद बोलते हैं, जिनको सुनकर लोग हांसे बिना नहीं रह पाते। यहां पर कुछ संवाद लिख रहा हूँ।
ताड़का को लेने आये हुए कुछ रिश्तेदार 

हाय हाय चाची ताड़का,, हाय हाय चाची ताड़का। 
चाची खा के मरगी आद्दा, चाची खा के मरगी आद्दा। उसनूं रोवा मिन्दर पाधा, हाय हाय चाची ताड़का। 

चाची खा के मरगी कटोरा, चाची खा के मरगी कटोरा। उसनूं रोवा जगिंदर भोरा। हाय हाय चाची ताड़का।

चाची खा के मरगी जामण, चाची खा के मरगी जामण। उसनूं रोवा राजू बामण। हाय हाय चाची ताड़का।

Sunday, October 7, 2018

त्यौहार आ रहें हैं, थोड़ा सोच समझ कर......

त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है और मौसम भी बहुत अच्छा बनने लगा है।  मुझे तो ये मौसम बहुत अच्छा लगता है पर इसमें शरीर को थोड़ी परेशानी ज़रूर होती है, जैसे जुकाम हो गया, कभी छींकें लग कर नाक का बुरा हाल हो जाना, सर में दर्द होने लग जाता है। पर इस तरह के मौसम में जो मद्धम मद्धम धुप निकली होती है, उसके तो क्या कहने। मेरा फेवरेट मौसम है। थोड़े दिनों बाद जब चावल की फसल की कटाई हो जाएगी, तो गेहूं की फसल बीजी जाएगी। त्योहारों के इस मौसम में अब बाज़ारों में हर तरफ चहल पहल शुरू होने लगी है, सभी अपनी अपनी दुकानों की सजावट करने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार दिवाली माना जाता है। जगह जगह पर मिटटी के दिए बेचने वाले दिखाई देते हैं। अब फेसबुक और व्हाट्सप्प वाले अपनी तरफ से सक्रिय हो चुके हैं। अब दिवाली की पोस्ट डालते हैं, सड़क के किनारे बैठी छोटी बच्ची मिटटी के दिए बेच रही होगी, उसकी फोटो फेसबुक पर, व्हाट्सप्प पर डाल रहे हैं। और निचे लिखा जाता है कि इन गरीबों से खरीददारी करो, ताकि ये भी अपना त्यौहार मना सकें। पर कहते हैं कि दिए तले अँधेरा तो होता ही है, जो ये पोस्ट डाल रहे हैं, वो खुद भी नहीं ख़रीददते उनसे। कहते हैं कि सभी भगत सिंह जैसे होने चाहिए, पर पड़ोसी के घर में। क्यूंकि कोई खुद को उन जैसा नहीं बनाना चाहता। क्यूंकि क़ुरबानी देनी आसान नहीं होती। जब हम बाजार में खरीददारी करने जाते हैं तो इन छोटी दुकानों से खरीदना ठीक नहीं समझते, क्यूंकि अपने स्टैट्स का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं कोई ये न कह दे, कि इसके पास पैसे काम होंगे। इसलिए अपना स्टैट्स बचने के लिए बड़े बड़े शोरूम में जाते हैं, और 10 रूपये की चीज़ 50 रूपये में खरीद के लाते हैं। हम दूसरों को तभी कोई नसीहत कर सकते हैं, जब हम खुद उस नसीहत पर चलें। पर बहुत कम लोग हैं जो ऐसा करते हैं। और किसी को स्पेशल कह भी नहीं सकते की भाई उस गरीब दुकानदार से सामान खरीदना, क्यों खरीदे वो हमारे कहने से, क्यूंकि हमने अपने आप को इस लायक बनाया नहीं है, कि कोई हमारी बात माने। तो सबसे पहले हमें खुद को बदलना होगा। कोई बदले न बदले। और ये आस भी नहीं रखनी चाहिए की कोई बदलेगा।

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...