त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है और मौसम भी बहुत अच्छा बनने लगा है। मुझे तो ये मौसम बहुत अच्छा लगता है पर इसमें शरीर को थोड़ी परेशानी ज़रूर होती है, जैसे जुकाम हो गया, कभी छींकें लग कर नाक का बुरा हाल हो जाना, सर में दर्द होने लग जाता है। पर इस तरह के मौसम में जो मद्धम मद्धम धुप निकली होती है, उसके तो क्या कहने। मेरा फेवरेट मौसम है। थोड़े दिनों बाद जब चावल की फसल की कटाई हो जाएगी, तो गेहूं की फसल बीजी जाएगी। त्योहारों के इस मौसम में अब बाज़ारों में हर तरफ चहल पहल शुरू होने लगी है, सभी अपनी अपनी दुकानों की सजावट करने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार दिवाली माना जाता है।
जगह जगह पर मिटटी के दिए बेचने वाले दिखाई देते हैं। अब फेसबुक और व्हाट्सप्प वाले अपनी तरफ से सक्रिय हो चुके हैं। अब दिवाली की पोस्ट डालते हैं, सड़क के किनारे बैठी छोटी बच्ची मिटटी के दिए बेच रही होगी, उसकी फोटो फेसबुक पर, व्हाट्सप्प पर डाल रहे हैं। और निचे लिखा जाता है कि इन गरीबों से खरीददारी करो, ताकि ये भी अपना त्यौहार मना सकें। पर कहते हैं कि दिए तले अँधेरा तो होता ही है, जो ये पोस्ट डाल रहे हैं, वो खुद भी नहीं ख़रीददते उनसे। कहते हैं कि सभी भगत सिंह जैसे होने चाहिए, पर पड़ोसी के घर में। क्यूंकि कोई खुद को उन जैसा नहीं बनाना चाहता। क्यूंकि क़ुरबानी देनी आसान नहीं होती। जब हम बाजार में खरीददारी करने जाते हैं तो इन छोटी दुकानों से खरीदना ठीक नहीं समझते, क्यूंकि अपने स्टैट्स का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं कोई ये न कह दे, कि इसके पास पैसे काम होंगे। इसलिए अपना स्टैट्स बचने के लिए बड़े बड़े शोरूम में जाते हैं, और 10 रूपये की चीज़ 50 रूपये में खरीद के लाते हैं। हम दूसरों को तभी कोई नसीहत कर सकते हैं, जब हम खुद उस नसीहत पर चलें। पर बहुत कम लोग हैं जो ऐसा करते हैं। और किसी को स्पेशल कह भी नहीं सकते की भाई उस गरीब दुकानदार से सामान खरीदना, क्यों खरीदे वो हमारे कहने से, क्यूंकि हमने अपने आप को इस लायक बनाया नहीं है, कि कोई हमारी बात माने। तो सबसे पहले हमें खुद को बदलना होगा। कोई बदले न बदले। और ये आस भी नहीं रखनी चाहिए की कोई बदलेगा।
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