Wednesday, October 10, 2018

रामलीला का वो दिन, कुछ खट्टा कुछ मीठा....

राजा दशरथ का दरबार 

हमारे गांव रामलीला को 50 साल होने वाले हैं। पहले मैं भी रामलीला में कुछ रोल कर लेता था। पर आजकल काम काज से ज़िंदगी इतनी व्यस्त हो गयी है, कि अब समय ही नहीं मिलता। बचपन कितना भोला और शरारती होता है। न किसी का डर, ना कोई लालच। अगर बचपन में समझदार बन जाएँ तो बचपन ख़त्म हो जाता है। हमारे गांव में नवरात्रों में हर साल की तरह रामलीला शुरू हो चुकी है। आज रामलीला का दूसरा दिन है। मैं भी छुट्टी पर घर आया हुआ था तो सोचा कि रामलीला देख आता हूँ। रात को 8 बजे रामलीला ग्राउंड में पहुंच गया, पर अभी रामलीला शुरू नहीं हुई थी। मैदान में कुछ दुकानदारों ने अपनी अपनी दुकानें सजा ली थी। कुछ ने घर से ही मजे लेकर उस पर अपनी दुकान सजाई हुई थी। गोलगप्पे कि रेहड़ी,बर्गर, टिक्की, और खिलोने भी मिल जाते हैं। ग्राउंड में छोटे छोटे बच्चे खेल रहे थे। ग्राउंड में बच्चे इधर उधर भाग रहे थे। जैसे गिरने का और गिर के चोट लगने का डर भी उन्हें नहीं था। मैं जैसे ही वहां से निकल रहा था, तभी एक बच्चा भागता हुआ वहां से निकला और मुझसे टकरा गया। मैं उसकी तरफ देख कर मुस्कुराने ही लगा था कि उसने मुझसे कहा कि देखकर नहीं चल सकते, मुझे टक्कर क्यों मारी। मेरी हैरानी का ठिकाना नहीं रहा। मुझे उसपर पहले तो गुस्सा आया, फिर सारा गुस्सा भाग गया। उसने इतने आत्मविश्वास से ये बात कही थी की मुझे लगा की शायद मैंने ही टक्कर मारी हो। मैंने कहा कि अच्छा! मैंने टक्कर मारी। फिर मैं वहां से चला गया। कुछ देर बाद रामलीला शुरू हो गयी। सबसे पहले आरती की गयी। जो बच्चे स्टेज के पास बैठे थे, वे सभी अपनी अपनी शरारतों में व्यस्त थे। वो इतना शोर कर रहे थे कि मैंने उनके पास जा के उनको डांटा कि इतना शोर क्यों कर रहे हो। चुप हो के देखो। उस समय तो वो चुप हो गए, पर जैसे ही मैं वहां से पीछे मुड़ा, उनकी शरारतें पहले की तरह शुरू हो गयी। फिर मैंने भी उनको कुछ कहना ठीक नहीं समझा, कि इन्होने नहीं चुप रहना। मैं अपनी जगह पर जाकर खड़ा हो गया। आज रामलीला में ताड़का राक्षसी ने आना था। कई लोग तो रामलीला के स्पेशल दृश्य देखने आते हैं, जैसे ताड़का वध, सीता स्वयंवर, बनवास, सूर्पनखा, बाली वध, अशोक वाटिका। आज ताड़का वध होना था। हमारे गांव का ही एक लड़का संजू ताड़का का रोल करता है। उसने अपना मुँह कालिख से काला करके, काला घाघरा पहन कर, कुछ अजीब सी शक्ल बना के राक्षसी बन कर आता है। मिटटी का तेल मुँह में डाल कर आग पर फूंक मारता है तो आग बहुत जोर से भड़क जाती है, जिससे दृश्य और भयानक बन जाता है।  जैसे ही ताड़का आयी, सभी बच्चे खड़े हो गए, कुछ के लिए वो डर का माहौल था तो कुछ उसे मजे से देख रहे थे। सभी इधर उधर भागने लगे। हम लोगों ने सभी बच्चों को आराम से बैठने को कहा, कुछ को तो सख्ती से बिठाना पड़ा। सभी ताड़का के संवाद सुनने को बेताब रहते हैं। जब राम ने ताड़का को मार दीया तो ताड़का को मृत शरीर को लेने उसके कुछ रिश्तेदार आते हैं। जिसको एक कॉमिक ड्रामा बनाया गया है। सभी अजीब अजीब शक्लें बनाकर आते हैं, जिससे दर्शकों को हंसी आये और वे सभी बैठ कर उन्हें देखती रहें। वे लोग रोते हुए अपना विरलाप करते हैं। ओर कुछ संवाद बोलते हैं, जिनको सुनकर लोग हांसे बिना नहीं रह पाते। यहां पर कुछ संवाद लिख रहा हूँ।
ताड़का को लेने आये हुए कुछ रिश्तेदार 

हाय हाय चाची ताड़का,, हाय हाय चाची ताड़का। 
चाची खा के मरगी आद्दा, चाची खा के मरगी आद्दा। उसनूं रोवा मिन्दर पाधा, हाय हाय चाची ताड़का। 

चाची खा के मरगी कटोरा, चाची खा के मरगी कटोरा। उसनूं रोवा जगिंदर भोरा। हाय हाय चाची ताड़का।

चाची खा के मरगी जामण, चाची खा के मरगी जामण। उसनूं रोवा राजू बामण। हाय हाय चाची ताड़का।

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