हमने गेंदबाजी के लिए अपनी फिल्डिंग सजा ली। मैदान के दोनों तरफ घर थे। इसलिए बोला गया कि को भी इन घरों में शॉट मरेगा को आउट हो जाएगा, पानी में गेंद गई तो भी आउट। कूप के पीछे कांटों में गेंद गई तो एक रन मिलेगा। पानी वाली तरफ सूखे में गेंद गई तो भी एक रन दिया जाएगा। आखिर मैच शुरू हो गया। सभी अपनी पोजिशन संभाले खड़े थे। मैच शुरू होने पर पहली गेंद ट्राई ज़रूर डालनी है। एक दो गेंद खेलने के बाद अक्सर गेंद पानी में गिर जाती थी। इसका भी इंतजाम किया हुआ था। पानी में से गेंद निकालने के लिए एक डंडा रखा हुआ था। डंडा कांटों वाला था जिसमें आगे जाली सी बनी हुई थी। गेंद निकलते हुए हाथों में कांटे चुभ जाए थे। फिर सभी ने एक दूसरा डंडा ढूंढा जो बांस का था। उससे गेंद निकालने में आसानी होने लगी।
कितनी भी आराम से खेलने की कोशिश पर गेंद पानी में चली ही जाती थी। फिर सभी वहां इकट्ठे हो जाते। कई बार गेंद नीचे गारे में ही फंस जाती थी, तब उसको ढूंढने में थोड़ा समय ज्यादा लग जाता था। शॉट मारने वाले को डांटा जाता था कि थोड़ा ध्यान नहीं रख सकता था। एक बार विजय ने शॉट मेरा तो घरों को पार करता हुआ गली में जा गिरी। सभी ढूंढने गए। अंधेरा भी बढ़ने लगा था। पहले घर के अंदर पशुओं के बाड़े में भी ढूंढा तो नहीं मिली, गली के पार खेत में, नाले में, गली के पास खड़े घास में भी ढूंढा पर गेंद नहीं मिली। फिर सोचा कि चलो छोड़ो, अब नहीं मिलेगी। फिर एक दो बार और नजर मारी तो रोहित को घास में पड़ी गेंद नज़र आ गई। सभी के चेहरे खिल गए पर अब अंधेरा हो चुका था। गेंद को उठाया और अपने अपने घरों को चल पड़े। सभी को कल गिर मैदान में आ कर खेलने का न्योता भी दिया गया।