बचपन में सुनी हुई बातें अक्सर हमारे मन में इतनी गहराई तक बैठ जाती हैं कि कभी-कभी सच और वहम के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है। गांवों में भूत-प्रेत, आत्माओं और पुरानी घटनाओं की कहानियां आम होती थीं। बड़े लोग डराने के लिए या मजाक में ऐसी बातें कह देते थे, और बच्चों का मन उन्हें सच मान बैठता था। फिर अगर कभी डर, बीमारी या बुखार साथ मिल जाए, तो कल्पनाएं और भी डरावनी लगने लगती थीं। मेरे बचपन की एक ऐसी ही घटना आज भी याद है, जिसे उस समय मैंने पूरी तरह सच मान लिया था।
ये उन दिनों की बात है जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारा स्कूल गांव नैबे में था। स्कूल के हेडमास्टर का नाम नायब सिंह था, लेकिन गांव के बच्चे उन्हें प्यार से “नैबा मास्टर” ही कहते थे।
एक दिन अचानक हमारे स्कूल में मधुमक्खियों का बड़ा झुंड आ गया। पता नहीं कहां से उड़ता हुआ आया था। मधुमक्खियां कमरों के अंदर तक घुस गई थीं। बच्चे डरकर इधर-उधर भागने लगे। टीचरों ने उन्हें भगाने के लिए धुआं भी किया, थोड़ी आग भी जलाई, लेकिन मधुमक्खियां जाने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
अब मास्टरों को डर लगने लगा कि कहीं किसी बच्चे को काट न लें। आखिर फैसला हुआ कि उस दिन की पढ़ाई पास वाले सरकारी स्कूल में होगी। वो स्कूल हमारे स्कूल के बिल्कुल पास ही था और उस दिन वहां छुट्टी थी।
सभी बच्चे अपना सामान उठाकर सरकारी स्कूल में पहुंच गए। हम लोगों को साइंस वाले कमरे के सामने बरामदे में बैठाया गया। उस कमरे के अंदर दीवारों के पास प्लास्टिक के कंकाल टंगे हुए थे।
लेकिन उस उम्र में हमें कहां पता था कि वो नकली होते हैं। हमें तो वो सचमुच के भूत लगते थे। हम उन्हें देखकर धीरे-धीरे बातें करते और डरते रहते थे।
उस दिन पता नहीं क्यों, मेरी तबीयत भी खराब होने लगी। क्लास खत्म होते-होते मुझे तेज बुखार चढ़ गया। जैसे-तैसे घर पहुंचा और आकर तख्त पर लेट गया।
शाम तक बुखार और बढ़ गया। शरीर टूट रहा था, आंखें भारी हो रही थीं। मैं आधी नींद और आधे बुखार की हालत में पड़ा था।
कुछ देर बाद जब मेरी आंख खुली, तो मां मुझे अजीब नजरों से देखने लगीं। उन्होंने पूछा — “तू कौन सी भाषा बोल रहा था?”
मैं हैरान रह गया। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया।
फिर मां ने बताया कि मैं बुखार में बार-बार कह रहा था —
“हम बिटवा को ले जायेगा… हम बिटवा को ले जायेगा…”
वो सुनकर मैं खुद डर गया।
तभी घर में किसी ने कहा — “उस सरकारी स्कूल में भूत रहता है। पहले वहां कोई बिहारी भईया था, जिसकी मौत हो गई थी। तब से उसकी आत्मा वहीं भटकती है।”
गांवों में ऐसी बातें बहुत जल्दी फैल जाती थीं। पहले तो हम इन्हें सिर्फ अफवाह समझते थे, लेकिन जब कई लोग एक ही बात कहने लगे, तो डर धीरे-धीरे मन में घर करने लगा।
अब मुझे भी लगने लगा कि शायद सच में वही “भईया” मेरे अंदर आ गया है।
बुखार में हालत ऐसी थी कि हर चीज डरावनी लग रही थी। कमरे में सामने एक झोला टंगा हुआ था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उसमें से कोई सांप निकल रहा हो। मैं जिस तख्त पर लेटा था, ऐसा महसूस होता था जैसे नीचे से कोई मुझे चुटकी काट रहा हो।
डर और बुखार ने मिलकर मेरे मन में एक अलग ही दुनिया बना दी थी। मुझे पूरा यकीन हो गया था कि कोई आत्मा मेरे अंदर घुस गई है और वही मुझसे अजीब बातें बुलवा रही है।
उस रात मैं बहुत डरा हुआ था। मां बार-बार मेरे सिर पर पानी की पट्टियां रखती रहीं। फिर अगले दिन दवाई दिलवाई गई। धीरे-धीरे बुखार उतर गया और मेरी हालत ठीक होने लगी।
ठीक होने के बाद मैं पूरे यकीन के साथ सबको बताता फिरता था कि —
“मेरे अंदर वो बिहारी भईया घुस गया था।”
लोग भी अपनी-अपनी बातें जोड़कर डर को और बढ़ा देते थे। कोई कहता — “हां, मैंने भी वहां अजीब आवाजें सुनी हैं।” कोई कहता — “वो जगह ठीक नहीं है।”
लेकिन आज जब उन बातों को याद करता हूं, तो हंसी भी आती है और सोचने पर मजबूर भी होना पड़ता है।
असल में वो भूत नहीं था, वो मेरा डर था। बुखार, बचपन की मासूमियत और लोगों की कही बातें मिलकर मेरे मन में ऐसा भ्रम पैदा कर रही थीं, जिसे उस समय मैं सच मान बैठा था।
बचपन का मन बहुत कोमल होता है। जो सुनता है, वही मान लेता है। और जब डर मन में बैठ जाए, तो साधारण चीजें भी डरावनी लगने लगती हैं।
आज विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है, लेकिन गांवों की पुरानी कहानियां और बचपन के डर आज भी यादों में जिंदा हैं। उस समय जो बातें हमें बिल्कुल सच लगती थीं, आज समझ आता है कि उनमें डर ज्यादा था और सच्चाई कम। फिर भी बचपन की वो मासूमियत और डर से भरी रातें जिंदगी की ऐसी यादें बन जाती हैं, जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता।

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