Monday, May 18, 2026

वो दिन, जब आंखों में आंसू आ गए


स्कूल की जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो सालों बाद भी यादों में वैसे ही ताजा रहते हैं। ना वो किताबों में लिखे होते हैं, ना तस्वीरों में कैद होते हैं, लेकिन दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए बस जाते हैं। बचपन में हम कई बार छोटी छोटी बातों से डर जाते थे, लोगों से घुलने में समय लगता था, और कभी-कभी बिना गलती के भी सजा मिल जाती थी। लेकिन उन्हीं पलों में कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं, जिनकी एक छोटी सी सहानुभूति जिंदगी भर याद रह जाती है।


ये उन दिनों की बात है जब मैंने गांव के सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में नया नया दाखिला लिया था। हमारा स्कूल सिर्फ दसवीं तक था। आठवीं के बाद बहुत से बच्चे पढ़ाई छोड़ देते थे या दूसरे स्कूलों में चले जाते थे। मेरी पुरानी कक्षा के ज्यादातर साथी मुझसे बिछड़ चुके थे। मुश्किल से मैं और एक-दो दोस्त ही नौवीं तक पहुंच पाए थे। 


नई कक्षा में सब चेहरे अनजान थे। कोई किसी गांव से आया था, कोई किसी और स्कूल से। मैं वैसे भी बहुत कम बोलने वाला लड़का था। जल्दी किसी से घुलता-मिलता नहीं था। मन में हमेशा डर सा रहता था कि कहीं मुझसे कोई गलती न हो जाए और सबके सामने शर्मिंदा न होना पड़े।

क्लास का पहला दिन था। मास्टर जी आए और सब बच्चों से परिचय पूछने लगे। फिर उन्होंने पूछा — “तुम्हारी आठवीं की क्लास से कितने बच्चे पास हुए हैं?”

मैंने धीरे से जवाब दिया — “लगभग सब पास हो गए थे, बस एक-दो फेल हुए थे।”

उस समय तो मास्टर जी कुछ बोले नहीं, लेकिन उनके जाते ही पीछे बैठे सौंटी गांव के एक लड़के ने अचानक मेरी बाजू पकड़कर मरोड़ दी और गुस्से में बोला — “झूठ क्यों बोला कि सब पास हुए हैं?”

मैं डर गया। समझ नहीं आया कि मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया था। मैं चुपचाप खड़ा रहा। जवाब देने की हिम्मत ही नहीं हुई। तभी पास बैठी एक लड़की ने उसे डांटते हुए कहा — “तो क्या हुआ अगर बोल दिया? तू मारेगा उसे?”

उसने मेरी बाजू छोड़ दी, लेकिन उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा। ऐसा लगा जैसे मैं उस जगह का हिस्सा ही नहीं हूं। उस दिन के बाद मैं और ज्यादा चुप रहने लगा। स्कूल में सबसे अलग बैठना, कम बोलना और जल्दी छुट्टी होने का इंतजार करना — यही मेरी आदत बन गई।

एक दिन हम सब बच्चे स्कूल के आंगन में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। सब थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बैठे थे। बीच में पीटी मास्टर कुर्सी डालकर बैठा था। वो बहुत सख्त स्वभाव का था। लंबा चौड़ा शरीर, भारी आवाज और चेहरे पर हमेशा गुस्सा। उसे देखकर ही बच्चों के मन में डर बैठ जाता था।

तभी पीछे बैठे कुछ लड़के धीरे-धीरे हंसने लगे। पीटी मास्टर तुरंत गरजकर बोला — “कौन हंस रहा है?”

पूरा आंगन एकदम शांत हो गया। कोई कुछ नहीं बोला।

फिर उसकी नजर मुझ पर पड़ी। शायद उसे लगा कि मैं सच बता दूंगा। उसने मुझे खड़ा किया और कहा — “तू झूठ नहीं बोलेगा। बता कौन शोर कर रहा था?”

मुझे पता था कि कौन हंस रहा था। लेकिन मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से किसी और की पिटाई हो। मैं चुप रहा।

उसने फिर पूछा। मैं फिर भी चुप रहा।

कुछ देर बाद उसने पास से छड़ी मंगवाई और मेरे हाथों पर मारना शुरू कर दिया। दर्द हो रहा था, लेकिन मैंने किसी का नाम नहीं लिया। शायद डर था, शायद मन नहीं माना।

मारते-मारते वो गुस्से में बोला — “एक तो बता नहीं रहा, ऊपर से हंस रहा है!”

असल में मैं हंस नहीं रहा था। डर और घबराहट में मेरे चेहरे पर अजीब सा भाव आ गया था। लेकिन उसे लगा कि मैं उसकी बात को हल्के में ले रहा हूं।

फिर उसने और जोर से मारना शुरू कर दिया।

पूरा स्कूल हमारी तरफ देख रहा था। दूसरे मास्टर भी बाहर आकर देखने लगे थे। मेरे हाथ लाल हो चुके थे, लेकिन मेरी आंखों से आंसू नहीं निकले। शायद डर इतना ज्यादा था कि रोना भी भूल गया था।

कुछ देर बाद हमें वापस क्लास में भेज दिया गया।

अगली घंटी अंग्रेजी की थी। अंग्रेजी वाले मास्टर क्लास में आए। उनका स्वभाव बाकी मास्टरों से अलग था। वो बच्चों से प्यार से बात करते थे।

उन्होंने सबसे पहले मुझे अपने पास बुलाया और धीरे से पूछा — “क्या हुआ था? वो क्यों मार रहा था तुम्हें?”

मैंने पूरी बात बता दी।

उन्होंने थोड़ी देर मुझे देखा, फिर बोले — “तू बता देता कि कौन शोर कर रहा था। उनकी वजह से खुद मार खा ली।”

बस, इतना सुनते ही मेरी आंखें भर आईं।

अजीब बात थी कि इतनी मार खाने के बाद भी मैं नहीं रोया था। लेकिन उनके प्यार से पूछने पर आंसू अपने आप निकल आए। शायद इसलिए क्योंकि पहली बार किसी ने डांटने के बजाय समझने की कोशिश की थी।

आज इतने साल बाद भी वो घटना मुझे याद है। हाथों की मार का दर्द तो कब का खत्म हो गया, लेकिन वो अपनापन आज भी दिल में कहीं जिंदा है।

जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं, जिन्हें समय कभी मिटा नहीं पाता। क्योंकि वो दर्द से नहीं, एहसासों से जुड़े होते हैं।



बचपन की यादों में सिर्फ खेल और शरारतें ही नहीं होतीं, कुछ ऐसे पल भी होते हैं जो हमें इंसानियत और संवेदनशीलता का मतलब सिखा जाते हैं। कभी किसी की डांट याद रह जाती है, तो कभी किसी का प्यार से पूछा गया एक सवाल। शायद यही छोटी छोटी बातें जिंदगी भर हमारे साथ चलती रहती हैं।

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