गांवों के पुराने घर सिर्फ इंसानों से नहीं बसते थे, वहां जानवर भी परिवार का हिस्सा हुआ करते थे। आँगन में बंधी गाय-भैंसें, रसोई के आसपास घूमती बिल्लियां, और दरवाजे पर बैठे कुत्ते — ये सब घर की रौनक होते थे। वो बोल नहीं सकते थे, लेकिन उनका अपनापन हर बात में दिखाई देता था। जितना प्यार हम उन्हें देते थे, उससे कहीं ज्यादा वो हमें लौटाते थे। बचपन की यादों में अगर इंसान बसे हुए हैं, तो उन बेजुबान साथियों की यादें भी उतनी ही गहरी हैं।
हमारे घर में हमेशा कोई न कोई जानवर जरूर रहता था। कभी गाय, कभी भैंस, कभी बिल्ली के बच्चे, तो कभी कुत्ते। गांवों में जानवर पालना सिर्फ जरूरत नहीं था, वो घर के माहौल का हिस्सा होते थे। सुबह उठते ही सबसे पहले उनकी आवाजें सुनाई देती थीं। लगता था जैसे घर सचमुच जाग गया हो।
मेरी छोटी बहन सीमा को जानवरों से खास लगाव था। वो उन्हें सिर्फ जानवर नहीं समझती थी, बल्कि घर के छोटे बच्चों की तरह प्यार करती थी। घर में जब भी बिल्ली के बच्चे होते, वो चुपके से उनके लिए दूध निकाल लाती। कई बार मम्मी डांट भी देती थीं कि “सारा दूध बिल्लियों को ही पिला दोगी क्या?” लेकिन सीमा फिर भी किसी न किसी तरह उन्हें खाना खिला ही देती थी।
उसकी सबसे प्यारी आदत थी — जानवरों के नाम रखना। उस समय टीवी पर जो धारावाहिक आते थे, उन्हीं के किरदारों के नाम वो बिल्लियों और कटड़ियों को दे देती थी। कोई तनु बन जाती, कोई तैयब्बा, कोई तैयब। हमारी भैंस की छोटी कटड़ी का नाम “तैयब्बा” रखा गया था, जो उसने अलिफ लैला देखकर रखा था। धीरे-धीरे वो नाम इतना अपना लगने लगा कि हम भी उसी नाम से बुलाने लगे।
जब भी सीमा आँगन में आती, तैयब्बा उसे देखते ही आवाज करने लगती। जैसे उसे पता हो कि उसका सबसे प्यारा इंसान आ गया है। सीमा भी उसके सिर पर हाथ फेरती, उसे पुचकारती और उससे बातें करती रहती। देखने वाले को लगता था जैसे दोनों एक-दूसरे की भाषा समझते हों।
घर में बिल्लियों की शरारतें भी कम नहीं थीं। कभी रसोई में रखा दूध पी जातीं, कभी खाने में मुंह मार देतीं। तब हम गुस्से में डंडा लेकर उनके पीछे भागते। लेकिन वो भागकर सीधे सीमा के पास जाकर छिप जातीं। जैसे उन्हें पता हो कि वही उन्हें बचाएगी। सीमा तुरंत कहती — “मारो मत, बेचारे हैं।”
रात को जब हम सोते थे, तो बिल्लियां चुपके से रजाई के ऊपर आकर बैठ जाती थीं। कई बार उन्हें नीचे उतारते, डराते, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर आ जातीं। सुबह उठो तो वो आराम से रजाई पर गोल होकर सोई मिलतीं। सीमा तो उन्हें अपनी रजाई के अंदर ही सुला लेती थी। वो कहती — “इन्हें भी ठंड लगती है।”
उसकी ये बातें सुनकर कभी हंसी आती थी, तो कभी सचमुच लगता था कि जानवर भी आखिर महसूस तो करते ही हैं।
हमारे घर में दो कुत्ते भी थे। एक काले रंग का और दूसरा भूरे रंग का। उस समय हमने धर्मवीर फिल्म देखी थी, जिसमें धर्मेंद्र और जितेंद्र थे। बस उसी से प्रेरित होकर हमने उनके नाम रख दिए — धर्मेंदर और जितेंदर।
दोनों पूरे घर के सबसे चहेते साथी बन गए थे। जैसे ही हम घर पहुंचते, वो पूंछ हिलाते हुए दौड़े चले आते। अगर कभी डांट देते, तो वो समझ जाते कि गुस्सा असली है या मजाक वाला। फिर वो उल्टे लेट जाते, पंजे ऊपर कर लेते, जैसे माफी मांग रहे हों। उनकी वो हरकत देखकर कोई भी ज्यादा देर नाराज नहीं रह सकता था।
धर्मेंदर बहुत सीधा था। वो किसी पर भौंकता तक नहीं था। बस लोगों के आसपास घूमता रहता, प्यार चाहता रहता। लेकिन एक दिन वो अचानक गायब हो गया। कई दिनों तक हम उसे ढूंढते रहे। बाद में पता चला कि किसी ने उसे लाठी मार दी थी।
उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि जानवर भी दर्द देते नहीं, बल्कि दर्द सहते ज्यादा हैं। वो किसी का बुरा नहीं चाहते, फिर भी कई बार इंसानों की बेरहमी का शिकार बन जाते हैं।
धर्मेंदर के जाने के बाद जितेंदर भी उदास रहने लगा। वो पहले जैसा चंचल नहीं रहा। कुछ समय बाद वो भी कहीं चला गया। शायद कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो अकेले नहीं जी पाते।
फिर समय बीतता गया। सीमा की शादी हो गई। धीरे-धीरे बिल्लियां भी घर आना कम कर गईं। आँगन पहले जैसा भरा-भरा नहीं लगता था। कभी जो घर जानवरों की आवाजों से गूंजता था, वहां अब एक अजीब सी खामोशी रहने लगी।
तब समझ आया कि जानवर सिर्फ घर में रहने वाले जीव नहीं होते, वो हमारी यादों का हिस्सा बन जाते हैं। उनका प्यार दिखावटी नहीं होता। वो बिना किसी स्वार्थ के अपना अपनापन दे जाते हैं।
आज भी जब कहीं कोई बिल्ली अपने बच्चों को संभालती दिखती है, या कोई कुत्ता मालिक के पीछे पीछे चलता नजर आता है, तो बचपन की वो सारी यादें फिर ताजा हो जाती हैं। इंसान बोलकर अपने भाव बता देता है, लेकिन जानवर खामोशी से प्यार निभाते हैं। शायद इसलिए उनका साथ दिल में हमेशा के लिए बस जाता है।

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