बचपन में कई बार हम ऐसी हरकतें कर जाते हैं, जिन्हें उस समय खेल या मज़ाक समझते हैं, लेकिन बाद में सोचकर खुद ही डर जाते हैं। उस उम्र में ना खतरे का अंदाज़ा होता था और ना ही अंजाम का। बस मन में जो आया, वही कर दिया। गांव का बचपन तो वैसे भी शरारतों, डर, डांट और मासूमियत से भरा होता था। आज जब उन पुरानी घटनाओं को याद करता हूं, तो हंसी भी आती है और यह सोचकर डर भी लगता है कि अगर उस दिन कुछ गलत हो जाता, तो शायद कहानी कुछ और ही होती।
एक बार हमारे घर मेहमान आए हुए थे। गांव में जब भी मेहमान आते थे, घर में अचानक हलचल बढ़ जाती थी। कभी चाय बन रही है, कभी खाना तैयार हो रहा है, और बीच-बीच में बच्चों को दुकान की तरफ दौड़ाया जाता था।
उस दिन माता जी ने मुझे और मेरी बड़ी बहन ममता को दुकान से कुछ सामान लाने भेजा। जाते समय हमेशा की तरह एक खास हिदायत जरूर दी गई —
“जल्दी आना… और सामान छुपाकर लाना।”
उस समय गांवों में ऐसा ही होता था। अगर कोई देख ले कि घर में मेहमान आए हैं और क्या-क्या सामान जा रहा है, तो अगले दिन आधे गांव को खबर हो जाती थी।
हम दोनों गांव की रामदिये की दुकान की तरफ चल पड़े।
रास्ते में गांव का बड़ा जोहड़ पड़ता था। वो इतना बड़ा और गहरा था कि बच्चों को उसके पास अकेले जाने से भी रोका जाता था। बरसात के दिनों में तो उसका पानी और भी डरावना लगता था। किनारों पर घास उगी रहती थी और जगह-जगह छोटे मेंढक बैठे रहते थे।
जब हम जोहड़ के पास पहुंचे, तो पता नहीं मेरे मन में क्या शरारत सूझी। मैंने बहन ममता से कहा —
“देख, मैं तुम्हें एक जादू दिखाता हूं।”
वो उत्सुक होकर देखने लगी।
मैं जोहड़ के किनारे खड़ा हुआ और पैर हिलाने लगा। जैसे ही मैंने पैर मारा, किनारे पर बैठे ढेर सारे छोटे-छोटे मेंढक पानी में कूद गए। मुझे बहुत मजा आया।
लेकिन उसी समय मेरी एक चप्पल भी पैर से निकलकर सीधे पानी में जा गिरी।
पहले तो मैं कुछ पल उसे देखता रहा। फिर अचानक याद आया —
“अगर चप्पल खो गई, तो घर जाकर बहुत मार पड़ेगी।”
उस समय चप्पल खो जाना कोई छोटी बात नहीं होती थी। नई चप्पल आसानी से नहीं मिलती थी।
बस फिर क्या था, बिना ज्यादा सोचे मैं सीधे जोहड़ में उतर गया।
शुरू में पानी घुटनों तक था, फिर कमर तक पहुंच गया। मैं धीरे-धीरे चप्पल की तरफ बढ़ता रहा। लेकिन थोड़ी दूर जाते ही मेरे पैरों ने जमीन छोड़ दी।
अचानक मैं पानी में ऊपर-नीचे होने लगा।
मेरी ठोड़ी तक पानी आ चुका था।
बाहर खड़ी ममता जोर-जोर से रोने लगी। वो डर गई थी। शायद उसे लगा कि मैं डूब जाऊंगा।
मैं खुद भी डर गया था, लेकिन उस समय मन में बस एक ही बात थी —
“चप्पल लेकर ही बाहर जाना है।”
मैंने किसी तरह हाथ बढ़ाकर तैरती हुई चप्पल पकड़ ली और वापस किनारे की तरफ आने लगा।
लेकिन जैसे ही किनारे के पास पहुंचा, मेरे दूसरे पैर की चप्पल भी निकलकर पानी में तैरने लगी।
अब तो हालत और खराब हो गई।
मन में आया कि कम से कम एक चप्पल तो बाहर निकाल लेता, लेकिन उस समय इतनी समझ कहां थी।
अब दूसरी चप्पल के लिए फिर पानी में उतरना पड़ा।
ममता बाहर से डांट भी रही थी और रो भी रही थी —
“मत जा दोबारा… बाहर आ जा।”
लेकिन मुझे तो घर की पिटाई ज्यादा बड़ी लग रही थी।
मैं फिर पानी में उतर गया। इस बार और ज्यादा डर लग रहा था। नीचे पैर नहीं लग रहे थे। ऊपर से जोहड़ में समुंद्रशोक और घास बहुत थी। मन में बार-बार सांप का डर भी आ रहा था। गांव में लोग कहते थे कि ऐसे जोहड़ों में सांप जरूर होते हैं।
लेकिन बचपन का डर भी अजीब होता है। मौत का डर कम और मां की मार का डर ज्यादा लगता था।
आखिर काफी कोशिश के बाद दूसरी चप्पल भी मिल गई।
जब बाहर निकला तो मेरे सारे कपड़े भीग चुके थे। मैं पूरा कांप रहा था।
मैंने ममता से कहा —
“तू दुकान से सामान ले आ। तब तक मैं धूप में खड़ा होकर कपड़े सुखा लेता हूं।”
वो दुकान की तरफ चली गई और मैं वहीं धूप में खड़ा होकर अपने कपड़े सुखाने लगा।
थोड़ी देर बाद वो सामान लेकर आ गई और हम दोनों घर की तरफ चल पड़े।
लेकिन रास्ते भर मेरे मन में एक ही डर था —
“अगर मां को पता चल गया तो क्या होगा?”
और वही हुआ।
घर पहुंचते ही किसी तरह पूरी बात मां तक पहुंच गई।
उस दिन जितनी पिटाई हुई, उतनी शायद चप्पल खो जाने पर भी नहीं होती।
लेकिन आज जब उस घटना को याद करता हूं, तो समझ आता है कि मां की मार में गुस्से से ज्यादा डर और चिंता छिपी हुई थी।
आज वो पुराना जोहड़ भी नहीं रहा। उसे भरकर वहां वृद्धाश्रम और आंगनवाड़ी बना दी गई है।
समय बदल गया, जगहें बदल गईं, लेकिन बचपन की वो भीगी हुई चप्पलें और मां की डांट आज भी यादों में वैसी ही ताजा हैं।
बचपन की गलतियां उस समय भले ही छोटी शरारत लगती थीं, लेकिन आज सोचो तो एहसास होता है कि हम कितनी मासूमियत और नासमझी में जी रहे थे। शायद यही वजह है कि बचपन की हर छोटी घटना भी आज एक बड़ी कहानी बनकर दिल में बस जाती है।

No comments:
Post a Comment