ज़िंदगी हमेशा एक जैसी नहीं चलती। कभी सब कुछ ठीक होता है, तो कभी अचानक ऐसा मोड़ आ जाता है जहां इंसान खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करने लगता है। कई बार हमें लगता है कि हमने जो रास्ता चुना है, वही सही है, लेकिन समय धीरे-धीरे हमें सिखाता है कि हर अनुभव अपने साथ कोई सीख लेकर आता है। कुछ दिन ऐसे भी आते हैं जब मेहनत बहुत होती है, लेकिन उसके बदले कुछ हासिल नहीं होता। फिर भी इंसान उम्मीद का हाथ नहीं छोड़ता। शायद यही उम्मीद हमें टूटने नहीं देती।
ये उन दिनों की बात है जब मैंने अंबाला स्थित Embassy of Singapore से नौकरी छोड़ दी थी। उस समय मुझे लगा था कि अब घर से अपने कंप्यूटर पर काम करके बेहतर जिंदगी जी लूंगा। मैंने राजपुरा के एक बुक डिपो के साथ बुक डिजाइनिंग का काम शुरू कर दिया। शुरुआत में सब ठीक लग रहा था। मैं रोज़ मेहनत से काम करता था, घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर डिजाइन बनाता था। मुझे उम्मीद थी कि मेहनत का फल जरूर मिलेगा।
लगभग तीन महीने तक लगातार काम करने के बाद जब हाथ में एक भी रुपया नहीं आया, तब पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत करके भी पैसा ना मिलना कितना दर्द देता है। मैं बार-बार पैसे मांगता, लेकिन हर बार कोई नया बहाना सुनने को मिलता। कभी कहा जाता कि कंपनी से पैसे नहीं आए, कभी कहा जाता कि अगले हफ्ते मिल जाएंगे। बाद में पता चला कि वो किसी कंपनी के लिए नहीं, बल्कि अपने ही काम के लिए हमसे डिजाइन बनवा रहा था।
उस समय ऐसा लगने लगा था जैसे मेहनत की कोई कीमत ही नहीं रही। धीरे-धीरे उम्मीद टूटने लगी। आखिरकार मैंने भी पैसे मिलने की आस छोड़ दी।
उसी दौरान गांव के मेरे दो दोस्त लोगों के घरों में पेंट और सफेदी का काम करते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि अगर चाहो तो हमारे साथ काम कर सकते हो। उस समय मेरी आर्थिक हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि मैंने बिना कुछ सोचे तुरंत हां कर दी। मजदूरी सिर्फ 350 रुपये मिलनी थी, लेकिन उस समय वही भी बहुत लग रहे थे।
सर्दियों के दिन थे। सुबह करीब आठ बजे हम काम पर निकल जाते। पहला काम गांव के शिव मंदिर में मिला था। मैंने अपने घर के अलावा कभी कहीं मजदूरी वाला पेंट का काम नहीं किया था। शुरुआत में हाथ भी ठीक से नहीं चलते थे। धीरे-धीरे मैं उनके साथ काम सीखने लगा। मंदिर की दीवारों पर सफेदी करते हुए, रंग घोलते हुए और सीढ़ियों पर चढ़कर पेंट करते हुए मुझे जिंदगी का एक बिल्कुल अलग रूप देखने को मिला।
शिव मंदिर में करीब चार-पांच दिन काम चला। उसके बाद किसी के घर में सफेदी का काम मिला। उनके घर में दो महीने बाद शादी थी, इसलिए काम जल्दी खत्म करना था। एक साथ दो-तीन काम मिल गए थे। सुबह एक जगह काम करते, फिर दूसरी जगह चले जाते। दिन कब निकल जाता, पता ही नहीं चलता था।
गांव के कुछ लोग ताने भी मारते थे। कहते थे, “चंडीगढ़ जाकर अब फिर से यही मजदूरी करनी पड़ रही है?” उनकी बातें सुनकर कभी-कभी दिल दुखता था। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो हौसला देते थे। वो कहते थे कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत से किया गया हर काम सम्मान के लायक होता है।
धीरे-धीरे हमने गांव के सरपंच धर्मे जी का काम पकड़ लिया। उनके घर में जागरण था, इसलिए वहां भी जल्दी काम खत्म करना था। दिनभर काम करते-करते शरीर थक जाता था, लेकिन फिर भी मन में यही रहता था कि किसी तरह जिंदगी दोबारा संभल जाए।इसी बीच एक दिन हमने काम से छुट्टी ली और Geeta Jayanti देखने कुरुक्षेत्र चले गए। वहां जाकर कुछ समय के लिए ऐसा लगा जैसे जिंदगी की परेशानियां थोड़ी हल्की हो गई हों।
वापस आने के बाद हमने रविदास मंदिर में पेंट का काम शुरू कर दिया। वहां मंदिर का गुंबद काफी ऊंचा था। उस पर चढ़कर पेंट करना आसान नहीं था। मैं और मेरा दोस्त सुरेंद्र मिलकर ऊपर काम करते थे। नीचे देखने पर डर भी लगता था, लेकिन काम करना जरूरी था। हमारा तीसरा साथी सुच्चा उन दिनों छुट्टी पर चला गया था।
उस समय हमारी दिनचर्या लगभग एक जैसी हो गई थी। सुबह आठ बजे घद फिर से खुद को जोड़ना और उम्मीद का हाथ कभी ना छोड़ना।
मुश्किल समय इंसान को बहुत कुछ सिखा देता है। वो हमें यह एहसास करवार से निकलना, दोपहर को थोड़ी देर खाना खाने घर आना, फिर तीन बजे दोबारा काम पर लग जाना और शाम तक पेंट करना। करीब दो महीने तक जिंदगी इसी तरह चलती रही।
फिर गांव के डेरे में काम मिला। वहां भी हमने करीब एक हफ्ता काम किया। लेकिन धीरे-धीरे मन में सवाल उठने लगे कि आखिर ये सब कब तक चलेगा। मजदूरी से घर का खर्च तो किसी तरह चल रहा था, लेकिन जो पुराने उधार और जिम्मेदारियां थीं, वो और मुश्किल लगने लगी थीं।
कुछ समय तक छोटे-मोटे काम करता रहा। फिर एक दिन मैंने चंडीगढ़ में अपने पुराने ऑफिस में बात की। किस्मत से उन्होंने मुझे दोबारा काम पर बुला लिया।
जब मैं वापस चंडीगढ़ गया और फिर से अपने पुराने काम पर बैठा, तो ऐसा लगा जैसे जिंदगी धीरे-धीरे फिर से अपनी पटरी पर लौटने लगी है। अभी सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ है, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी है।
आज भी रोज़ काम पर जाते समय मन में यही विश्वास रहता है कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। शायद जिंदगी का असली मतलब भी यही है — गिरने के बाद फिर से उठना, टूटने के बाता है कि जिंदगी में कोई भी काम छोटा नहीं होता और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। कुछ रास्ते कठिन जरूर होते हैं, लेकिन वही रास्ते इंसान को अंदर से मजबूत भी बना देते हैं। आज पीछे मुड़कर उन दिनों को देखता हूं तो लगता है कि शायद वही संघर्ष मुझे जिंदगी को समझना सिखा गए।

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