Friday, May 15, 2026

सिर पर पल्ली और साइकिल का वो सफर

 

गर्मी के वो दिन आज भी याद आते हैं, जब जिंदगी में आराम बहुत कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हुआ करती थीं। उस समय मैं 11वीं कक्षा में पढ़ता था। सुबह स्कूल जाना, दोपहर की तपती गर्मी में साइकिल चलाकर वापस लौटना और फिर घर-खेत के कामों में लग जाना—यही रोज़ की जिंदगी थी। 

गर्मियों में स्कूल से लौटते समय हालत खराब हो जाती थी। तेज धूप, गर्म हवाएँ और लंबा रास्ता शरीर की सारी ताकत निकाल देते थे। घर पहुँचकर कुछ देर आराम करते, लेकिन उस समय बिजली भी कहाँ रहती थी। दोपहर होते-होते लाइट चली जाती और घर के अंदर बैठना मुश्किल हो जाता। फिर हम बाहर पेड़ के नीचे चारपाई डालकर बैठ जाते। वहीं हवा के सहारे थोड़ी राहत मिलती।

मुझे आज ठीक से याद भी नहीं कि स्कूल का काम किस समय करता था, क्योंकि दिन का ज़्यादातर हिस्सा घर और खेत के कामों में निकल जाता था। दोपहर ढलने लगती, चाय पीते और फिर साइकिल उठाकर खेत की ओर निकल पड़ते—भैंसों के लिए चारा लेने।

खेत पहुँचकर बापू के साथ काम करवाते। कभी जल्दी चारा लेकर लौट आते, तो कभी रात तक खेत में ही काम चलता रहता। बरसीम काटना, उसे रेहड़ी पर लादकर मोटर तक लाना और फिर मशीन से काटना—ये सब काम रोजमर्रा का हिस्सा थे। कई बार शाम को झोटा-बुग्गी लेकर भी घर आना पड़ता था। लेकिन झोटे के साथ गाँव में आना थोड़ा जोखिम भरा होता था। हमारे गाँव में झोटा चलाना मना था, और अगर रास्ते में किसी दूसरे झोटे से भिड़ंत हो जाए, तो फिर उन्हें अलग करना किसी के बस की बात नहीं रहती थी। इसलिए हमेशा सावधानी रखनी पड़ती थी।

एक दिन की बात मुझे आज भी बहुत अच्छी तरह याद है। उस दिन खेत में हरा चारा खत्म हो चुका था और बरसीम अभी छोटी थी, इसलिए उसे काट नहीं सकते थे। तब बापू ने कहा, “आज तूड़ी की पल्ली बाँधकर ले जाओ।”

मैंने भूसे की बड़ी सी पल्ली तो बाँध ली, लेकिन अब समस्या थी उसे घर कैसे पहुँचाया जाए। पल्ली इतनी बड़ी थी कि उसे साइकिल पर बाँधना संभव ही नहीं था। कुछ देर सोचने के बाद मेरे दिमाग में एक अजीब सा विचार आया—क्यों न पल्ली को सिर पर रखकर साइकिल चलाई जाए।

मैंने पल्ली सिर पर उठाई और धीरे-धीरे साइकिल सड़क पर चढ़ा दी। शुरुआत में संतुलन बनाना बहुत मुश्किल लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि कभी भी गिर जाऊँगा। लेकिन थोड़ी देर बाद जैसे-जैसे साइकिल की रफ्तार बढ़ी, संतुलन बनता गया और सफर थोड़ा आसान लगने लगा।

वो मेरी जिंदगी का पहला मौका था जब मैं इतनी बड़ी पल्ली सिर पर रखकर साइकिल चला रहा था। यह काम खतरे से खाली नहीं था। जरा सा झटका गर्दन को नुकसान पहुँचा सकता था, लेकिन उस समय दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी—किसी तरह पल्ली घर पहुँचानी है।

जब मैं गाँव में पहुँचा, तो रास्ते में खड़े लोग मुझे हैरानी से देख रहे थे। शायद उन्होंने पहली बार किसी को इतनी बड़ी पल्ली सिर पर रखकर साइकिल चलाते देखा था। गाँव में आते ही मैंने साइकिल की रफ्तार धीमी कर दी। घर तक पहुँचते-पहुँचते साइकिल लगभग रुक ही गई। मैंने धीरे से पैर नीचे टिकाए और साइकिल रोक दी।

अब तक गर्दन पूरी तरह दर्द करने लगी थी। मैंने धीरे-धीरे पल्ली सिर से उतारी और एक तरफ रख दी। कुछ देर तक हाथों से गर्दन सहलाता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे गर्दन पत्थर की हो गई हो।

मम्मी ने जैसे ही देखा, तुरंत डाँटना शुरू कर दिया—“इतना खतरा क्यों उठाता है? अगर गर्दन में झटका लग जाता तो?”

मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। लेकिन अंदर ही अंदर एक अलग सी खुशी भी थी। उस दिन मैंने अपने तरीके से एक बड़ी चुनौती पूरी की थी।

थोड़ी देर बाद बापू भी घर पहुँचे। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, “पल्ली को साइकिल पर कैसे लाए?”

मैंने भी हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया—“बस... ले आया।”

और फिर वहीं बात खत्म हो गई। लेकिन आज इतने सालों बाद भी वो दिन, वो गर्मी, वो साइकिल और सिर पर रखी वो पल्ली—सब कुछ आज भी यादों में वैसे ही जिंदा है।

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