Saturday, April 14, 2018
एक था मोची.....
हमे जिस चीज का शौक होता है, हम उसे किसी न किसी बहाने से पाना चाहते हैं। अगर हमें वो कहीं से मिल जाये, तो क्या कहना। जब मैं साइकिल चलाना सीख रहा था, तो किसी ना किसी बहाने से साइकिल चलाने का मौका ढूंढ़ते थे। हमारे गांव के पास वाले गांव सौन्टी से एक मोची आता था। वो अपने साइकिल पर सामान रखकर गाँव गाँव में घूमता रहता था। वो बेचारा सीधा सादा सा था। हम उससे जूते ठीक करवा लेते थे। एक दिन वो हमारी गली में बैठा था। उसने मुझसे कहा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है, तुम जा के डॉक्टर से दवाई ले आओ मेरे लिए। मैंने पहले तो मना करना चाहा, पर जब उसने कहा कि मेरी साइकिल ले जाओ। मेरी तो जैसे बांछें खिल गयी, मुझे और क्या चाहिए था। मैंने झट से हां कर दी। मैंने साइकिल उठाया। साइकिल का अगला मगराड नहीं था। पीछे देखा तो पिछला मगराड भी नहीं था। चेन कवर भी नहीं था। बिलकुल छकड़ा ही कह सकते हैं उसे। एक बार तो दिल किया कि रहने ही दूँ, इस साइकिल से अच्छा पैदल ही जा के ले आउ। फिर सोचा जैसा भी है, चलाने को तो मिलेगा। मैं उसका साइकिल ले गया। मैं उसके गांव सौन्टी में जा पहुंचा, जो वहां से कोई डेढ़ या दो किलोमीटर होगा। सौन्टी जा के पशुओं के हस्पताल में चला गया। और पशुओं के डॉक्टर को जा के बोलै की मोची की दवाई दे दो। डॉक्टर ने सोचा कि मोची की दवाई वो भी पशुओं के हस्पताल में। उसने कहा कि मोची कौन। मैंने कहा कि आपके गांव सौन्टी का ही है। पर वो डॉक्टर गांव ठोल से आता था। उसने कहा कि मुझे नहीं पता, उसे कहना आ के खुद ले जाये। मैं वापस मुड़ गया। वापस आ के मोची को बोला कि डॉक्टर ने मना कर दिया, और बोला कि वो खुद आ के ले जाये। मोची ने कहा कि इतनी देर कैसे लग गयी। डॉक्टर तो आपके गांव सोँटा में ही था। मुझे लगा कि शायद गलत डॉक्टर के पास चला गया। उसने बताया कि गुरमेल डॉक्टर के पास जाना था। जो हमारे ही गांव में था। पर मुझे लगा कि वो सौन्टी का है, तो सौन्टी में जाना होगा। वो बेचारा अपना सामान साइकिल पर रखकर चला गया। चलो मुझे तो साइकिल चलाने को मिल गया था बेशक उसकी दवाई ना मिली तो ना सही। ये बात आज भी छिड़ जाती है तो वो मोची याद आ जाता है। कुछ दिनों बाद पता चला कि वो मोची अब इस दुनिया में नहीं रहा। बेचारा मोची, जब भी आ जाता था, हम उसके साथ मज़ाक करते रहते थे।
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