Friday, April 20, 2018

शहर की शादी में भीड़, भीड़ में भी मैं अकेला....


मैंने कई ऐसी शादियां अटैंड की जिनको देख के लगता भी नहीं था कि ये कोई शादी का माहौल होगा। गांव की शादी में तो आज भी शादी में तो कई दिन पहले से रौनक लगनी शुरू हो जाती है और शादी के कई दिन बाद भी बनी रहती है। पर शहर में तो शादी के 1  घंटे बाद लगता ही नहीं कि शादी हुई है। मुझे शहर की एक शादी में जाने का मौका मिला। मेरा दोस्त रंजीत जो अपने दोस्तों के साथ उस शादी में जा रहा था। वो मुझे कहने लगा कि तुम भी आ जाओ। मुझे कोई काम नहीं था, सो मैं भी चला गया। 

हम वहां शाम को 7 बजे पहुंचे। शादी एक पैलेस में थी। जब हम पैलेस की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने गए तो देखा कि लगभग 500 गाड़ियाँ होंगी। जिनमे मेहमान आये हुए थे। हम भी अपनी गाडी खड़ी करके पैलेस में चले गए। जब हम गेट पर पहुंचे तो स्वागत करने के लिए घरवाले और रिश्तेदार दरवाज़े पर खड़े थे। तरह तरह के फूलों से पुरे पैलेस को सजाया हुआ था। कई तरह की बिजली की झालरें लगाई हुई थी। एक दो दरवाजे पार करके हम पैलेस के अंदर दाखिल हो गए। 

अंदर जा के देखा तो लोग इधर उधर ऐसे टहल रहे थे, मानो दिवाली वाले दिन बाजार में खरीददारी करने आये हुए हों। इतने लोग देखकर मैं हैरान रह गया। सभी अपने अपने मोबाइल फ़ोन में सेल्फियां लेने में मशगूल थे। शादी में बड़े बड़े मंत्री, अफसर आये हुए थे। जितने भी परिवार आये हुए थे सभी अलग अलग मेज़ों पर बैठे हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे सभी होटल में आये हुए हों, और एक दूसरे को जानते ही ना हों।  हम 5-6 थे, जो एक दो गाड़यों में गए थे। 

पहले घरवालों के साथ फोटो खिचवाई, फिर सभी अपने अपने रस्ते हो लिए। पैलेस के एक कोने में शराब की स्टाल लगी हुई थी। वो आगे जा रहे थे, हम उनके पीछे। जब हम स्टाल पर पहुंचे तो सभी के हाथ में शराब के गिलास थे। मैं तो उनको देख कर वापस मुड़ गया। और दूसरी स्टालों की तरफ चला गया। वहां रबड़ी, फ्रूट चाट, टिक्की, कोल्ड ड्रिंक, और और शाकाहारी स्टाल लगी हुई थी। मैंने सभी स्टालों से कुछ न कुछ खा पी के देखा। कुछ वेटर मेज़ों पर बैठे परिवारों को खाने के चीजें परोस रहे थे। वहीं पर ड्रोन कैमरे भी उड़ रहे थे। बच्चे तो ड्रोन कैमरे को देख ही खुश हो रहे थे। ड्रोन कैमरा सभी के लिए खींच का केंदर बना हुआ था। रात के 10  बज गए थे।  

फिर हम सब खाना खाने हाल में चले गए। वहां भी हर तरह का खाना लगा हुआ था। नॉन-वेज, और वेज दोनों तरह का खाना मेज पे सजाया हुआ था। मैंने प्लेट में पुलाव डाल लिए और दाल डाल कर खाने लगा। तभी मुझे लगा कि कहीं मैंने नॉन-वेज तो नहीं डाल लिए। क्यंकि अगर उन पर टैग न लगा हो तो पता ही नहीं चलता कि कौन सा वेज है और कौन सा नॉन-वेज। मैंने मेज पर खाने के सामने लगे टैग देखे। मैंने वेज ही डाला था। खाना खा कर, फिर कुछ मीठा खाने के लिए स्टाल की तरफ गया। मिठाई में भी कई स्टालें लगी हुई थी। गरम गुलाबजामुन, गुड़ की डिश, खीर, आइस-क्रीम, कई के तो मुझे नाम भी नहीं पता। 

मैंने तो सिर्फ आइस-क्रीम ही खाई, क्यूंकि अब पेट में जगह भी नहीं बची थी। दिल कर रहा था कि यहीं किसी सोफे पर लेट जाऊं। सब ने अपनी अपनी पेट पूजा की और चलने की तैयारी की। हम सभी गाडी में बैठे और मोहाली आ गए। उस शादी में इतनी भीड़ थी, पर मुझे इतनी भीड़ में भी अकेलापन ही महसूस हो रहा था। क्यूंकि अपनापन भीड़ में नहीं अपनों के बीच होता है। जितने भी लोग उस शादी में आये हुए थे, मुझे नहीं लगता कि वो  किसी को जानते भी होंगे।


No comments:

Post a Comment

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...