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Monday, October 27, 2025

छठ पूजा – आस्था और अपनत्व का पर्व

दिवाली की जगमगाहट जैसे ही ढली, उसी के बाद से ही चंडीगढ़ में छठ पूजा की तैयारियाँ शुरू हो गईं। हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में भले ही यह पर्व स्थानीय तौर पर न मनाया जाता हो, लेकिन बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत से यहाँ आकर बसे लोग इसे अपनी पूरी श्रद्धा और भक्ति से निभाते हैं।

गाँव से चंडीगढ़ आने से पहले मैंने कभी छठ पूजा के बारे में नहीं सुना था। लेकिन यहाँ आकर जब पहली बार इस पर्व को नज़दीक से देखा, तो एहसास हुआ कि यह केवल एक त्योहार नहीं बल्कि एक गहरी आस्था का उत्सव है।

सेक्टर 42 की झील और खरड़ का अजनौली सरोवर इन दिनों पूरी तरह छठ माई के नाम हो जाते हैं। बाजारों में भी खास रौनक देखने को मिलती है। हर तरफ गन्ने की गठरियाँ, केले की गढ़, रंग-बिरंगी टोकरियाँ, छाज, मिट्टी के दीये और पूजा का सामान सजा होता है। मानो पूरा शहर इस विशेष पर्व के रंग में डूब गया हो।

जब मैं झील के किनारे पहुँचा, तो वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था। बच्चे हँसते-खेलते इधर-उधर दौड़ रहे थे, माता-पिता बार-बार उन्हें समझा रहे थे कि भीड़ में संभलकर रहना। हर कोई नए कपड़ों में सजा हुआ, चेहरे पर उत्साह और आँखों में भक्ति की चमक लिए हुए था।

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लोग अपने-अपने पूजा के सामान को बड़े स्नेह से सजो रहे थे। कहीं शामियाने लगे थे, कहीं DJ पर भक्ति गीत गूँज रहे थे। लाउडस्पीकर से बजते भोजपुरी गीत पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना रहे थे। चंडीगढ़ पुलिस भी पूरी सजगता से ड्यूटी निभा रही थी, ताकि हर कोई सुरक्षित रह सके।

भीड़ के बीच खड़ा मैं सब देख रहा था। कहीं परिवार मिलकर पूजा की तैयारी कर रहे थे, कहीं लोग झील के किनारे हाथ जोड़कर सूर्य देवता को प्रणाम कर रहे थे। कुछ लोग अपने मोबाइल से इन क्षणों को कैद कर रहे थे – शायद यादों में सँजोकर रखने के लिए। मैंने भी कुछ तस्वीरें खींचीं, लेकिन मन ही मन सोच रहा था कि तस्वीरों से ज़्यादा सुंदर तो यह माहौल दिल में बस रहा है।


उस पल मुझे लगा – त्योहार केवल रस्मों का नाम नहीं होते। ये रिश्तों को जोड़ने का, बिछड़े लोगों को करीब लाने का और अपनेपन को महसूस कराने का माध्यम होते हैं। आज की व्यस्त जिंदगी में जब लोगों को अपनों से मिलने का भी समय नहीं मिलता, तब ऐसे पर्व दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।

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मुझे भले ही छठ पूजा की सारी परंपराएँ और इतिहास विस्तार से न पता हो, लेकिन एक बात ज़रूर समझ आई – यह पर्व सिर्फ पूजा का नहीं, बल्कि आस्था, एकता और परिवार के साथ बिताए गए अनमोल पलों का पर्व है।

मैं सोचता हूँ, जल्द ही छठ पूजा के इतिहास और उसकी मान्यताओं के बारे में और गहराई से जानूँ और उसे आप सबके साथ साझा करूँ। लेकिन इस बार का अनुभव मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा – जब मैंने देखा कि कैसे आस्था और भक्ति लोगों को एक धागे में पिरो देती है।

Sunday, October 26, 2025

भीड़ भरे बाजार में छठ पूजा की रौनक — एक सजीव अनुभव

आज सुबह दफ्तर जाने के लिए जैसे ही कमरे से निकला, रोज़ की तरह बाइक स्टार्ट की और रास्ते पर चल पड़ा। ठंडी हवाओं में एक प्याली चाय का मज़ा लेने की चाहत मन में उठी, तो मैं हमेशा की तरह अपने पसंदीदा चायवाले के पास रुक गया। मैंने उसे कहा, “भाई, एक चाय बना दो।” उसने सिर हिलाया, चाय बनाई, कप में डालकर सामने रख दी और दो कप लेकर पास की दुकान पर देने चला गया। मैं इंतज़ार करता रहा कि वह लौटेगा, पर वह बिना चाय दिए प्लेट उठाकर चला गया। आख़िरकार मैंने खुद ही कप उठाया, गरमागरम चाय का मज़ा लिया, पैसे दिए और अपनी बाइक पर सवार होकर आगे बढ़ गया। 


रास्ते में जैसे ही फेज-1 की खोखा मार्केट के पास पहुँचा, मैंने बाइक को बीच की सड़क पर डाल दिया और धीरे-धीरे आगे बढ़ा। पर कुछ ही दूर चला था कि भीड़ देखकर सिर चकरा गया। चारों ओर लोगों का सैलाब था। सड़कें मानो लोगों से भर गई थीं। समझ नहीं आ रहा था कि बाइक को आगे कैसे ले जाऊं या पीछे कैसे मोड़ूं। तभी याद आया — आज छठ पूजा के दिन चल रहे हैं, और यही वजह है कि बाजार में इतनी भीड़ है।

छठ पूजा बिहार और पूर्वी भारत के लोगों के लिए सिर्फ़ एक पर्व नहीं, बल्कि एक श्रद्धा और उल्लास का उत्सव है। और आज उस उत्सव का रंग पूरे बाजार में घुला हुआ था। दुकानों पर लोगों की इतनी भीड़ थी कि दुकानवालों को अपनी सहायता के लिए एक-दो आदमी साथ रखने पड़े थे। कुछ दुकानदारों ने तो सड़कों पर ही चारपाइयां बिछाकर दुकानें सजा रखी थीं। टिन की छतों वाली छोटी दुकानों से लेकर ठेलों तक, हर जगह खरीददारों की रौनक थी।

तीन पहियों वाली रेहड़ियों पर गन्ने, फल और पूजा का सामान बिक रहा था। पर यही वजह थी कि जाम बढ़ता जा रहा था। लोग जब किसी रेहड़ी के पास आते, तो वहीं रुक जाते, जिससे वाहनों की लाइन लग जाती। गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ें चारों तरफ़ गूंज रही थीं, पर भीड़ में किसी को फर्क नहीं पड़ रहा था। सब अपने अपने उत्सव में मग्न थे।

भीड़ के बीच चलते हुए मेरी नज़र एक दुकान पर पड़ी — एक चारपाई पर रंग-बिरंगी चूड़ियों की दुकान सजी थी। उसके पास कुछ छोटी-छोटी लड़कियां खड़ी थीं, जिनकी आंखों में चमक थी। वे चूड़ियों की चमक देखकर मुस्कुरा रही थीं। वह दृश्य इतना सुंदर था कि मैं कुछ देर वहीं ठहर गया। चूड़ियों की वह चमक जैसे छठ के उत्सव की खुशियों को दर्शा रही थी।

तभी पीछे से एक कार वाले ने हॉर्न बजाया। आगे एक रेहड़ी वाला गन्ने बेचते हुए सड़क के बिल्कुल किनारे खड़ा था, जिससे रास्ता और भी तंग हो गया था। गाड़ियां निकल नहीं पा रही थीं। कई मिनटों बाद जब उसने ग्राहकों के साथ थोड़ा आगे बढ़ाया, तभी जाम खुला।

भीड़ में हर तरफ़ रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे लोग नज़र आ रहे थे — महिलाएं, बच्चे, युवक-युवतियां सब एक मेले के माहौल में डूबे थे। कई महिलाओं ने सिर पर टोकरियां उठाई हुई थीं, जिनमें पूजा का सामान और फल रखे थे। उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि श्रद्धा की चमक थी। सच कहूं तो पूरा बाजार किसी लोक मेले में तब्दील हो चुका था।

धीरे-धीरे मैं बाइक को आगे बढ़ाता रहा और आखिरकार बाजार के दूसरे छोर तक पहुंच गया। वहां से आगे एक चौक आया — और वहाँ तो जैसे जाम का ज्वालामुखी फूट पड़ा था। हर तरफ गाड़ियों का जाम, हॉर्न की आवाज़ें और लोग इधर-उधर भागते नज़र आ रहे थे। पर उस अफरातफरी में भी एक अलग ही आनंद था — यह एहसास कि हम एक जीवंत त्यौहार का हिस्सा हैं, जहां लोगों की भीड़ श्रद्धा से भरी है।

कुछ मिनटों की मशक्कत के बाद, एक खाली सा रास्ता दिखाई दिया। मैंने फुर्ती से बाइक उस गली में डाल दी। कुछ बाइकें आगे बढ़ रही थीं, मैं भी धीरे-धीरे निकल गया। करीब बीस मिनट की जद्दोजहद के बाद आखिरकार मैं उस जाम से बाहर निकला।

जैसे ही खुली सड़क पर पहुंचा, मैंने बाइक की रफ़्तार बढ़ा दी। अब सूरज ऊपर था, हवा में हल्की ठंडक थी, और मन में एक ही ख्याल — आज ऑफिस देर से पहुंचूंगा, पर यह अनुभव याद रहेगा।

दफ्तर पहुंचकर सबसे पहले पानी पिया, फिर कंप्यूटर खोला। पर दिमाग अब भी उसी भीड़, उसी गहमागहमी में था। मैंने सोचा — कल से इस रास्ते से नहीं आऊंगा, क्योंकि छठ पूजा का उत्सव अब अगले दो-तीन दिन इसी तरह जोश से मनाया जाएगा।

छठ पूजा की यही तो खूबसूरती है — यह त्योहार सूर्य भगवान और छठी मैया को समर्पित है। इसमें लोग व्रत रखते हैं, नदियों या तालाबों के किनारे जाकर अर्घ्य देते हैं, और पूरे परिवार के साथ श्रद्धा व प्रेम से पूजा करते हैं। यही कारण है कि बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और अब उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसकी धूम रहती है।

आज बाजार में जो भी भीड़ थी, वह सिर्फ़ खरीदारी के लिए नहीं थी — वह भावना और आस्था की प्रतीक थी। और उस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति की आंखों में यही चमक थी — अपने परिवार, अपनी परंपरा और अपने त्योहार के प्रति गर्व की चमक।

इस अनुभव ने सिखाया कि हर त्योहार सिर्फ़ रीति-रिवाज नहीं, बल्कि जीवन की रौनक है।
हर भीड़ एक कहानी है — प्रेम, परिश्रम और परंपरा की।

“Happy Chhath Puja” — इस आस्था के उत्सव में हर दिल में सूर्य-सा प्रकाश और माँ छठी का आशीर्वाद बना रहे।

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...