घर गए हुए पूरे पंद्रह दिन हो चुके थे। इस बार मंगलवार को ऑफिस का काम थोड़ा जल्दी खत्म होने वाला था, इसलिए मन पहले से ही घर पहुंचने की खुशी से भरा हुआ था। लेकिन पिछले एक-दो दिनों से सोशल मीडिया पर मौसम को लेकर लगातार डराने वाली खबरें दिखाई दे रही थीं। कहीं भारी बारिश की चेतावनी, तो कहीं दो-तीन दिन लगातार तेज़ बारिश होने की संभावना जताई जा रही थी।
रात के लगभग दस बजे ऑफिस का काम खत्म हुआ और मैं अपनी बाइक लेकर घर की ओर निकल पड़ा। बाहर अंधेरा था, इसलिए मौसम का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। आसमान में बादल ज़रूर थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। मन ही मन यही उम्मीद थी कि बस किसी तरह घर तक पहुंच जाऊँ, उसके बाद चाहे जितनी बारिश हो जाए।
सफर के दौरान कई बार नज़र आसमान की तरफ चली जाती। बादलों को देखकर खुद को तसल्ली देता कि अभी मौसम संभला हुआ है। लगभग रात के बारह बजे मैं घर पहुंच गया। हल्की ठंडक महसूस होने लगी थी और सफर की थकान भी थी, इसलिए खाना खाकर जल्दी ही सो गया।
अगली सुबह बाइक की सर्विस करवाने इस्माइलाबाद जाना था। वैसे तो पिछले महीने ही सर्विस करवाई थी, लेकिन कहते हैं न कि हर मैकेनिक का हाथ अलग होता है। पिछली सर्विस से मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं था और बाइक में कुछ छोटी-छोटी दिक्कतें अभी भी बनी हुई थीं।
सुबह कुछ ज़रूरी काम निपटाकर मैं इस्माइलाबाद की ओर निकल पड़ा। रास्ते में मेरा दोस्त सुरेंद्र खेत में काम कर रहा था। कई दिनों से उससे मुलाकात भी नहीं हुई थी। मैंने बाइक रोकी तो वह खेत से बाहर सड़क तक आ गया। कुछ देर हाल-चाल पूछे, दो-चार बातें हुईं और फिर मैं आगे बढ़ गया।
मैकेनिक की दुकान पर पहुंचकर मैंने बाइक की सारी समस्याएँ बताईं। वह अपने काम में लग गया और मैं इंतज़ार करता रहा। करीब दो घंटे बाद बाइक तैयार हो गई। अब वह पहले से काफी बेहतर चल रही थी। मैं वापस घर लौट आया और देखते ही देखते पूरा दिन निकल गया।
घर पर नूर का अपना ही उत्साह था। उसे बाइक पर घूमना इतना पसंद है कि बस चाबी दिखनी चाहिए। दिन में मैंने उसे दो-तीन बार बाइक पर घुमाया, लेकिन उसका मन कहाँ भरने वाला था। थोड़ी देर बाद फिर वही आवाज़...
"चाबी उठाओ... बाइक चलाओ..."
शाम को जब मैं स्कूटी से थोल गया, तब भी वह मेरे साथ ही था। लौटते-लौटते अंधेरा हो चुका था। बादल फिर से घिर आए थे। ऐसा लग रहा था कि कभी भी बारिश शुरू हो सकती है, लेकिन उस दिन किस्मत अच्छी रही और बारिश नहीं हुई।
अगले दिन मुझे वापस ऑफिस जाना था।
सुबह आंख खुली तो देखा कि रात में अच्छी बारिश हो चुकी थी। बाहर अब भी हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी। ऐसी बूंदाबांदी जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
नूर भी खेलने के लिए बाहर आ चुका था। मैंने बैग कंधे पर डाला और जैसे ही बाइक की चाबी उठाई, उसके चेहरे का रंग बदल गया।
वह रो तो नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें सब कुछ कह रही थीं।
मैंने मुस्कुराकर उसे "बाय" कहा, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसका उदास चेहरा देखकर मेरा भी मन भारी हो गया।
मैंने उसे बाइक पर बैठाया और सड़क तक लेकर आया। अंजली उसे उतारने लगी, लेकिन वह उतरने को तैयार ही नहीं था। आखिरकार अंजली उसे दुकान से कुछ दिलाने का बहाना बनाकर अपने साथ ले गई। मैं बाइक मोड़कर चल पड़ा। पीछे मुड़कर देखा तो वह बस मुझे जाता हुआ देख रहा था।
शायद मेरे निकलने के बाद वह थोड़ा रोया भी होगा...
बाहर अभी भी हल्की फुहार पड़ रही थी। शुरुआत में तो लगा कि आराम से सफर निकल जाएगा, लेकिन अंबाला पार करके बनूर पहुंचने से पहले वही हल्की-हल्की बूंदें धीरे-धीरे मुझे पूरी तरह भिगोने लगीं। मैंने अपना बैग बाइक के आगे रख लिया ताकि कम से कम उसमें रखा सामान बच जाए।
करीब दो घंटे बाद मैं अपने कमरे पर पहुंच गया। भीगे हुए कपड़े बदले और थोड़ा आराम करने के लिए बिस्तर पर लेट गया।
पता ही नहीं चला कि कब नींद आ गई।
जब आंख खुली तो ऑफिस जाने का समय हो चुका था। जल्दी-जल्दी तैयार होकर फिर ऑफिस के लिए निकल पड़ा। इस बार बारिश पहले से तेज़ थी। ऑफिस पहुंचते-पहुंचते मैं पूरी तरह भीग चुका था।
भीगे कपड़ों की वजह से ठंड भी लगने लगी थी, लेकिन काम तो करना ही था। देखते ही देखते पूरी रात ऑफिस में निकल गई।
रात को जब वापस कमरे की ओर लौटा, तब भी हल्की बारिश जारी थी। कमरे पर पहुंचकर भीगे कपड़े बदले और बिस्तर पर लेट गया।
उस दिन ऐसी गहरी नींद आई कि कब रात बीत गई, पता ही नहीं चला।
सुबह लगभग सात बजे आंख खुली।
खिड़की के बाहर अब भी बारिश की नमी हवा में घुली हुई थी। मन में घर की यादें, नूर का मासूम चेहरा और बारिश में भीगा पूरा सफर एक-एक करके फिर से ताज़ा हो गया।
ज़िंदगी शायद ऐसे ही छोटे-छोटे पलों से खूबसूरत बनती है। कभी घर लौटने की खुशी, कभी अपनों से बिछड़ने का दर्द, कभी बारिश का सफर और कभी किसी मासूम बच्चे का चुपचाप दरवाज़े पर खड़े होकर आपको जाते हुए देखना...

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