चार साल का मासूम निरवैर अपने पिता के साथ खेत में अपने दादा जी को खाना देने गया था। उसे क्या पता था कि यह दिन उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन बन जाएगा।
वह न किसी से वैर रखता था, न किसी से कोई शिकायत। उसका नाम भी निरवैर था और उसका मासूम स्वभाव भी। फिर आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ?
जब यह खबर सामने आई कि हरियाणा के अंबाला जिले के गांव धनौरा में एक चार वर्षीय बच्चा खुले बोरवेल में गिर गया है, तो पूरे इलाके के साथ-साथ देशभर के लोगों की निगाहें उसी ओर टिक गईं। हर कोई भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि किसी तरह यह मासूम सुरक्षित बाहर आ जाए।
बोरवेल के आसपास हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। NDRF, SDRF और प्रशासन की टीमें लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी थीं। मशीनें चल रही थीं, सुरंग खोदी जा रही थी, अधिकारी पूरी कोशिश कर रहे थे। लेकिन दूसरी ओर ज़मीन पर बैठे उसके पिता, माँ और दादा की आँखों में सिर्फ एक उम्मीद थी—कोई आकर बस इतना कह दे, "चिंता मत करो... निरवैर सुरक्षित बाहर आ गया है।"
उनके कान केवल यही एक वाक्य सुनने के लिए तरस रहे थे।
सच कहूँ, मैं भी उन लाखों लोगों में शामिल था जो लगातार सोशल मीडिया पर हर छोटी-बड़ी अपडेट देख रहे थे। रात को कार्यालय से लौटने के बाद देर रात तक नींद नहीं आई। बार-बार मोबाइल उठाकर यही देखता रहा कि शायद कोई अच्छी खबर मिल जाए।
रात के दो-तीन बजे भी जब नींद खुली, तो सबसे पहले हाथ मोबाइल की ओर गया। मन में यही उम्मीद थी कि शायद अब तक निरवैर बाहर आ चुका होगा। लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी।
सुबह जब आँख खुली तो मोबाइल उठाने से पहले ही दिल घबराने लगा। डर था कि कहीं कोई बुरी खबर न पढ़नी पड़ जाए। रात में ही रेस्क्यू टीमों ने संकेत देना शुरू कर दिया था कि बोरवेल में पानी भरने के कारण बच्चे के बचने की संभावना बहुत कम होती जा रही है।
और वही हुआ, जिसका डर था।
करीब 21 घंटे की कठिन मशक्कत के बाद निरवैर को बोरवेल से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसका शरीर तो बाहर आ गया, पर उसकी मासूम साँसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं।
यह समाचार पढ़कर आँखें नम हो गईं। बार-बार यही सोचता रहा कि उस मासूम ने उन 21 घंटों में क्या-क्या सहा होगा। तंग पाइप में फँसा हुआ, ऊपर से गिरता पानी, अंधेरा, घुटन... यह कल्पना मात्र ही मन को विचलित कर देती है।
सोशल मीडिया पर जब उसकी बोरवेल के अंदर की तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे थे, तो उन्हें देखकर मन रो पड़ता था। फिर भी उम्मीद नहीं टूट रही थी कि शायद कोई चमत्कार हो जाए।
खेत में हजारों लोग मौजूद थे, लेकिन उस एक मासूम की जान बचाने के सामने सब खुद को असहाय महसूस कर रहे थे।
आज सवाल केवल एक परिवार का नहीं है।
सवाल यह है कि आखिर खुले बोरवेल अब भी क्यों छोड़ दिए जाते हैं?
देश अंतरिक्ष में नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। हम चाँद और मंगल तक पहुँचने की बातें करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और आधुनिक तकनीकों पर गर्व करते हैं। लेकिन क्या हम आज भी एक मासूम बच्चे को ओपन बोरवेल से नहीं निकाला जा सकता?
तकनीक पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ा काम है ऐसी दुर्घटनाओं को होने से रोकना।
हर साल न जाने कितने बच्चे खुले बोरवेल में गिरकर अपनी जान गंवा देते हैं। हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, फिर सब भूल जाते हैं। लेकिन जिन परिवारों के घरों के चिराग बुझ जाते हैं, उनके लिए यह दर्द कभी खत्म नहीं होता।
यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है।
जिस खेत में बोरवेल हो, उसे सुरक्षित ढकना मालिक का कर्तव्य है। प्रशासन को भी ऐसे खुले बोरवेलों की पहचान कर उन्हें तुरंत बंद करवाना चाहिए। यदि कोई लापरवाही करता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और निरवैर इस तरह अपनी जान न गंवाए।
निरवैर अब वापस नहीं आएगा।
उसकी मासूम मुस्कान, उसकी बातें, उसके सपने सब अधूरे रह गए।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह मासूम निरवैर सिंह की आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और उसके माता-पिता तथा पूरे परिवार को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें।
एक मासूम चला गया, लेकिन उम्मीद है कि उसकी यह दर्दनाक कहानी समाज को जगाएगी।
क्योंकि एक खुला बोरवेल केवल एक गड्ढा नहीं होता, वह किसी परिवार की पूरी दुनिया निगल सकता है।

No comments:
Post a Comment