बचपन और मेले का रिश्ता शायद उतना ही पुराना है जितना गांवों की परंपराएं। मेले का नाम सुनते ही बच्चों की आंखों में चमक आ जाती है। उन्हें ना भीड़ की परवाह होती है, ना धूप की और ना थकान की। उनके लिए मेला मतलब खिलौने, झूले, मिठाइयां और ढेर सारी खुशियां। जब हम छोटे थे, तब मेले में जाने के लिए जिद किया करते थे। आज अपने बच्चों को देखकर लगता है कि समय बदल गया है, लेकिन बच्चों की मासूमियत बिल्कुल नहीं बदली।
19 अक्टूबर 2018 को दशहरे का दिन था। गांव में मेले की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो चुकी थीं। सुबह मैं अभी सो ही रहा था कि मेरा बेटा अक्षित उठकर बैठ गया। उसे पता था कि आज स्कूल की छुट्टी है और मेले का दिन भी।
उठते ही उसने अपनी पहली फरमाइश रख दी—"पापा, मुझे मेले में जाना है और खिलौना लेना है।"
मैंने उसे समझाया कि अभी सुबह है, दुकानें भी नहीं लगी होंगी। लेकिन बच्चों को तर्क कहां समझ आते हैं। थोड़ी देर चुप रहता, फिर आकर वही बात दोहरा देता।
"पापा, चलो ना... खिलौना लेकर आते हैं।"
समय बीतता गया। सुबह से दोपहर होने लगी, लेकिन उसकी जिद कम होने का नाम नहीं ले रही थी। आखिरकार जब वह बार-बार वही बात दोहराने लगा तो मुझे थोड़ा सख्त होना पड़ा। वह कुछ देर के लिए चुप तो हो गया, लेकिन उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था कि उसने अपनी मांग छोड़ी नहीं है
मैं कमरे में जाकर लेट गया। थोड़ी देर बाद अक्षित भी वहीं आकर बैठ गया। वह कुछ बोल नहीं रहा था, लेकिन उसकी हर हरकत बता रही थी कि वह अभी भी मुझसे नाराज़ है।
पास में मेरा बैग रखा हुआ था। उसने धीरे-धीरे बैग खोलना शुरू कर दिया। फिर उसमें रखे कपड़े और सामान एक-एक करके बाहर निकालने लगा। कुछ देर में पूरा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था।
जब मैं उसकी तरफ देखता तो वह अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लेता। कभी बैग के पीछे छिप जाता, कभी चुपचाप बैठ जाता। यह उसका विरोध जताने का तरीका था।
मुझे उस पर गुस्सा भी आ रहा था और हंसी भी। मन ही मन सोच रहा था कि बच्चे भी अपनी बात मनवाने के कितने अनोखे तरीके ढूंढ़ लेते हैं।
दोपहर बाद मेरे ताऊ जी ने कहा कि पास के गांव जनसुई में कुश्तियों का आयोजन है, वहां चलना चाहिए। उन्हें कुश्तियां देखने का बहुत शौक था।
हम बाइक निकालकर चलने लगे तो सबसे पहले अक्षित दौड़कर आया और बाइक पर सबसे आगे बैठ गया। जैसे उसे डर हो कि कहीं उसे पीछे ना छोड़ दिया जाए।
करीब दस मिनट बाद हम मेले में पहुंच गए। वहां लोगों की भारी भीड़ थी। अखाड़े में कुश्तियां चल रही थीं और चारों तरफ मेले की रौनक फैली हुई थी।
लेकिन अक्षित का ध्यान कुश्तियों में कहां था।
कुछ ही देर बाद उसने कहा, "पापा, भूख लगी है।"
मैं समझ गया कि उसे भूख खाने की नहीं, खिलौनों की लगी हुई है।
मैं उसे लेकर खिलौनों की दुकानों की तरफ निकल गया। दुकानें रंग-बिरंगे खिलौनों से भरी हुई थीं।
पहले उसने एक हेलीकॉप्टर देखा। उसे बहुत पसंद आया। लेकिन वह धागे से चलने वाला था और कीमत भी ज्यादा थी। मैंने उसे समझाया कि यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा।
फिर उसकी नजर एक रिमोट वाली कार पर पड़ी। उसने कहा कि यही चाहिए।
मैंने उसे याद दिलाया कि घर पर ऐसी कार पहले से है। दुकानदार ने भी बताया कि बस डिजाइन अलग है, काम वही है। काफी समझाने के बाद वह मान गया।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
वह मुझे एक दुकान से दूसरी दुकान और दूसरी से तीसरी दुकान तक घुमाता रहा। उसे याद था कि किस दुकान पर कौन-सा खिलौना रखा था। मैं थक गया था, लेकिन उसके उत्साह में कोई कमी नहीं आई थी।
आखिरकार उसे "मोटू-पतलू" वाला एक खिलौना पसंद आ गया। कीमत भी ठीक थी और वह उसे देखकर बहुत खुश था।
खिलौना खरीदने के बाद मैंने उससे पूछा, "अंजलि के लिए भी कुछ ले लें?"
उसने तुरंत कहा, "उसके लिए गुड़िया ले लो। उसने मुझसे कहा था कि मेरे लिए भी लेकर आना।"
हमने एक छोटी सी गुड़िया भी खरीद ली।
बाद में घर पहुंचकर उसने हंसते हुए बताया कि अंजलि ने तो उससे कुछ कहा ही नहीं था। उसने खुद ही सोचा कि बहन के लिए भी कुछ ले जाना चाहिए।
उसकी यह बात सुनकर मुझे उसकी समझदारी पर प्यार आ गया।
इसके बाद हमने आइसक्रीम खाई और मेले में घूमते रहे। रास्ते में भांजा विजय और दूसरे रिश्तेदार भी मिल गए। वे गोलगप्पे खा रहे थे।
मैंने भी एक गोलगप्पा खाया, लेकिन उसका पानी बिल्कुल फीका लगा। गांव के मेलों का मजा वैसे भी खाने से ज्यादा माहौल में होता है।
शाम ढलने लगी थी। कुश्तियां समाप्त हो चुकी थीं और लोग रावण दहन वाली जगह की तरफ बढ़ने लगे थे।
हमने काफी देर तक अपने ताऊ जी को ढूंढ़ा। जब वे नहीं मिले तो हमें लगा कि शायद वे पैदल ही गांव की तरफ निकल गए होंगे।
घर लौटते समय मैंने पकौड़े खरीदे। जब मैं उन्हें पैक करवा रहा था तो अक्षित ने कहा,
"पापा, मुझे नहीं खाने, मुझे भूख नहीं है।"
मैंने हंसते हुए कहा, "ये तेरे लिए नहीं, घर वालों के लिए हैं।"
इतना सुनते ही उसने कहा, "फिर एक मुझे भी दे दो।"
मैंने एक गरम पकौड़ा उसके हाथ में रख दिया। उसने जल्दी-जल्दी खाने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ से छूटकर नीचे गिर गया।
उसका चेहरा देखने लायक था।
कुछ देर बाद रास्ते में ताऊ जी मिल गए और हम उन्हें साथ लेकर घर पहुंच गए।
रात को गांव में रावण दहन हुआ। आतिशबाजी हुई, भीड़ जमा हुई और दशहरे का दिन खत्म हो गया।
आज जब उस दिन को याद करता हूं तो मेले की भीड़, कुश्तियां, खिलौनों की दुकानें या रावण दहन से ज्यादा एक चीज याद आती है—अक्षित का वह मासूम चेहरा।
सुबह से शाम तक उसकी वही एक जिद, "पापा, मेले में चलो।"
उसकी मिन्नतें, उसकी नाराज़गी, बैग का सामान बिखेरना और फिर खिलौना मिलने के बाद चेहरे पर लौट आई मुस्कान—ये सब याद करके आज भी हंसी आ जाती है।
शायद यही बचपन की सबसे बड़ी खूबसूरती है। छोटी-छोटी चीजों में इतनी बड़ी खुशियां ढूंढ़ लेना, जो बड़े होने पर कहीं खो जाती हैं।

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