सुबह का समय — जब शहर अभी नींद में डूबा होता है, तब गाँव में ज़िंदगी धीरे-धीरे करवट लेने लगती है। आसमान से उतरती सफ़ेद धुंध खेतों को ऐसे ढक लेती है मानो प्रकृति ने अपना गर्म कम्बल ओढ़ा हो। दूर कहीं किसी घर के आँगन में हल्की-सी खाँसते हुए लैंप की लौ टिमटिमाती है, और उसी रोशनी के साथ एक किसान अपने दिन की शुरुआत करता है। उसके लिए यह सिर्फ़ सुबह नहीं — बल्कि मेहनत, उम्मीद और जिम्मेदारी का हर रोज़ दोहराया जाने वाला व्रत है।
धीरे-धीरे वह खेत की ओर बढ़ता है। रास्ता धुंध से ढका है, पर कदमों का भरोसा मजबूत। खेतों में पहुँचते ही ठंडी मिट्टी की खुशबू, ओस की नमी और दूर-दूर तक फैली खामोशी उसे एक अनकही ताक़त देती है। आज का दिन फिर उसी तरह शुरू होना है — कंधे पर दरांती, आंखों में सपने और दिल में परिवार के लिए अनगिनत फ़िक्र।
किसान सबसे पहले भैंसों के लिए चारा देखने निकलता है। धुंध के बीच हरी-हरी घास चमकती सी लगती है। झुककर, काटकर, बाँधकर — वह बिना शिकायत काम करता जाता है। ठंडी हवा उँगलियों को सुन्न कर देती है, मगर उसे पता है कि यह मेहनत ही कल की रोटी बनेगी।
घर लौटकर वह चारा मशीन में डालता है। मशीन घूमती है, घर में मोटर की आवाज़ भर जाती है, और इसी आवाज़ में परिवार का भविष्य घूमता दिखाई देता है। कटा हुआ चारा गाय-भैंस के आगे रखा जाता है। जानवर चुपचाप खाते हैं — जैसे उन्हें भी पता हो कि यह श्रम प्रेम से पैदा हुआ है।
इसके बाद आता है दूध निकालने का काम। सर्द सुबह में गर्म दूध का कटोरा हथेलियों पर रखा हो तो एक अनो सा सुकून महसूस होता है। फिर वही दूध, साफ बर्तनों में भरकर, साइकिल या मोटरसाइकिल पर रखकर डेयरी तक पहुंचाया जाता है। रास्ता लंबा है, धुंध घनी — लेकिन किसान के लिए यह रोज़ का सफ़र है। डेयरी में दूध तौला जाता है, पर्ची मिलती है, और वापस लौटते समय उम्मीद साथ चलती है कि महीने के अंत में यह सब किसी काम आएगा।
दिन भर का काम खत्म नहीं होता। दोपहर खेतों में गुज़रती है — कभी पानी देना, कभी नालियाँ ठीक करना, कभी टूटे हुए हिस्से संभालना। शाम होते-होते थकान शरीर में उतर आती है, मगर मन में संतोष रहता है कि आज का दिन बेकार नहीं गया।
और जब रात करीब आती है, खेत के किनारे सूखी पराली जलाई जाती है। धुएँ के साथ ठंड दूर भागती है, आग की लपटें हाथ-पैरों में गर्मी भर देती हैं। इस आग के पास बैठकर किसान अपने दिन को याद करता है — सुबह की धुंध, मेहनत, चारा, दूध, डेयरी, खेत — और फिर चुपचाप आसमान की ओर देखकर सोचता है: “कल फिर यही सफ़र शुरू होगा।”
यह कहानी सिर्फ़ खेत और जानवरों की नहीं, बल्कि उस मेहनत की है जो बिना शोर किए हर दिन की जाती है। गाँव की यह धुंध-भरी सुबह हमें सिखाती है कि ज़िंदगी के बड़े सपने, छोटे-छोटे कामों से मिलकर बनते हैं। किसान के हाथ भले खुरदरे हों, मगर उन्हीं हाथों में दुनिया को खिलाने की ताक़त रहती है। मेहनत का यह सिलसिला रुकता नहीं — क्योंकि उसके पीछे किसी परिवार की रोटी, बच्चों की पढ़ाई और बुज़ुर्गों की दवा छुपी होती है।
अगर आप कभी धुंध में खेतों से गुज़रें, तो एक पल रुककर इस मेहनत को महसूस कीजिए। अपने बच्चों को बताइए — रोटी सिर्फ़ बाज़ार से नहीं आती, वह पसीने से उगती है। और अगर आपके आस-पास कोई किसान परिवार हो — तो उनका सम्मान कीजिए, क्योंकि उनकी मेहनत से ही हमारी सुबहें सच-मुच सुबह बनती हैं।

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