Saturday, December 27, 2025

बचपन की गर्मियों की छुट्टियाँ और मामा जी का गाँव

स्कूल की गर्मियों की छुट्टियाँ हो गई थीं। आज याद करूँ तो यह भी ठीक-ठीक याद नहीं आता कि तब मैं कौन-सी कक्षा में पढ़ता था। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ है—छुट्टियों का नाम सुनते ही दिल एक ही बात कहता था, “मामा जी के घर जाना है।” 


पता नहीं मामा जी के घर में ऐसा क्या खास था, जो सबको वहीं जाना अच्छा लगता था। मासी भी थीं, बुआ भी थीं, और भी रिश्तेदार थे जो छुट्टियों में बुलाते थे, लेकिन मन तो मामा जी के गाँव जाने का ही करता था। शायद वहाँ की खुली हवा, मिट्टी की खुशबू, या फिर वो अपनापन—जो शहरों में कहीं खो गया है।

मामा जी के गाँव पहुँचते ही हमारी दुनिया बदल जाती थी। हम सब बच्चे मिलकर कच्चे आम तोड़ने निकल पड़ते थे। आमों को भूस वाले कमरे में, भूस के भीतर दबा दिया जाता था। कुछ ही दिनों में वे अपने आप पक जाते थे। पेड़ों पर आम कभी पकने तक पहुँच ही नहीं पाते थे, क्योंकि पकने से पहले ही तोड़ लिए जाते थे।

गर्मियों की रातें भी कितनी अलग होती थीं। सब लोग आँगन में खुले आसमान के नीचे सोते थे। तारों भरा आसमान, ठंडी-सी हवा और बचपन की निश्चिंत नींद। रात को हम सब मिलकर जुगनू पकड़ते थे। एक-एक करके जुगनू इकट्ठा होते जाते और फिर जब बहुत सारे जुगनू एक साथ चमकते, तो लगता जैसे अंधेरे में भी रोशनी मुस्कुरा रही हो। तब हम यह नहीं सोचते थे कि उन्हें पकड़कर रखने से उन्हें नुकसान हो सकता है। हम तो बस अपने मन की खुशी देख रहे थे।

एक बार हमने ज़िद पकड़ ली कि हमें मामा जी के घर छोड़ दिया जाए। बड़ी मुश्किल से माँ ने पिताजी को तैयार किया। पिताजी मुझे और मेरी बड़ी बहन को लेकर चल दिए। मुझे आज भी याद है—मैंने खाकी रंग की पैंट और उसी रंग की कमीज पहन रखी थी।

मामा जी का गाँव बस अड्डे से करीब तीन किलोमीटर दूर था। बस अड्डे से गाँव तक पैदल ही जाना पड़ता था। उस समय आगे जाने का कोई साधन नहीं होता था। पिताजी को आगे पाँच किलोमीटर दूर शहर से कुछ सामान लेना था। बाद में समझ आया कि “सामान” तो बस एक बहाना था।

पिताजी हमें बस अड्डे पर छोड़कर शहर चले गए। थोड़ी देर बाद मैं चुपचाप वहाँ से खिसक गया और बहन को वहीं छोड़कर पैदल ही गाँव की ओर चल पड़ा। करीब पंद्रह-बीस मिनट चलने के बाद मैं घर पहुँच गया।

नाना जी चारपाई पर बैठे थे। मैंने उन्हें नमस्ते की और पास बैठ गया। उन्होंने मुझे पहचाना नहीं—शायद उन्हें लगा कि पड़ोस का ही कोई बच्चा होगा। थोड़ी देर बाद मामी जी आईं। वे भी हैरान थीं कि मैं अकेला कैसे आ गया।

कुछ समय बाद पिताजी और मेरी बहन भी पहुँच गए। वे मुझे ढूँढते हुए आ रहे थे। बहन तो डर के मारे रोने लगी थी। जब उन्होंने मुझे सुरक्षित देखा, तो उनकी जान में जान आई। मुझे खूब डाँटा गया—“ऐसे छोड़कर नहीं आते, कोई उठा ले जाता तो?”
डर भी लगा और थोड़ी-सी शर्म भी आई।

अगले दिन पिताजी को वापस घर लौटना था। हम तो खेल में इतने मशगूल थे कि ध्यान ही नहीं रहा। लेकिन जैसे ही पिताजी जाने लगे, मैं दौड़कर उनके पास पहुँच गया। मेरा मन नहीं मान रहा था। बहुत समझाया गया, लेकिन दिल नहीं माना। आखिर मैं भी उनके साथ वापस घर आ गया।

घर पहुँचे तो माँ की डाँट अलग से मिली—“परेशान करने में लगे रहते हो, आज के बाद छुट्टियों में कहीं नहीं जाना।”

आज जब इन सब बातों को याद करता हूँ, तो लगता है जैसे वो दिन अभी भी कहीं भीतर जिंदा हैं। छोटी-छोटी खुशियाँ थीं, बड़े-बड़े सपने नहीं थे। न मोबाइल था, न चिंता। बस खेल, मस्ती और अपनापन था।

काश… वो बचपन के दिन वापस लौट सकते।
कितना मज़ा आता…
कितना सुकून था उस समय।

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