यह कहना कोई तुलना करना नहीं है, बल्कि एक सत्य को पहचानना है।
जैसे अंधेरा प्रकाश के बिना अर्थहीन है, वैसे ही संसार स्त्री के बिना अधूरा है।
स्त्री सिर्फ किसी की परछाईं नहीं, वह स्वयं एक पूर्ण अस्तित्व है—जो जीवन को दिशा, संवेदना और उजाला देता है।
स्त्री ने हर युग में सृजन किया है। उसने जन्म दिया, पोषण किया, सहा और फिर भी मुस्कुराई। वह घर की चौखट के भीतर भी समाज की रीढ़ बनी और बाहर निकली तो इतिहास रच दिया। पुरुष की शक्ति यदि बाहुबल है, तो स्त्री की शक्ति धैर्य, करुणा और चेतना है—और यही शक्ति सबसे गहरी होती है।
प्रकाश कभी शोर नहीं करता, वह बस अंधेरे को हटाता है।
ठीक उसी तरह स्त्री भी बिना शोर किए बहुत कुछ बदल देती है। वह रिश्तों को जोड़ती है, टूटे मन को सहारा देती है और गिरते आत्मविश्वास को थाम लेती है। वह माँ बनकर ममता देती है, बेटी बनकर उम्मीद जगाती है, पत्नी बनकर साथ निभाती है और जब ज़रूरत पड़े तो योद्धा भी बन जाती है।
समस्या यह नहीं कि स्त्री कमज़ोर है, समस्या यह है कि समाज ने उसकी ताकत को समझने में देर की। जिस दिन हमने यह मान लिया कि स्त्री किसी से कम नहीं बल्कि अपने आप में पूर्ण है, उसी दिन असली प्रगति शुरू होगी।
यह बात पुरुष के विरोध में नहीं है, बल्कि मानवता के पक्ष में है।
जहाँ स्त्री को सम्मान मिलता है, वहाँ समाज स्वतः उज्ज्वल हो जाता है।
क्योंकि जब प्रकाश बढ़ता है, तो अंधेरा अपने आप मिट जाता है।
अंत में बस इतना ही—
स्त्री को साबित करने की ज़रूरत नहीं,
ज़रूरत है तो सिर्फ उसे समझने और स्वीकार करने की।

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