Friday, December 19, 2025

नाम बदल देने से क्या वाकई विकास होता है? या ये सिर्फ ढकोसले हैं?


कुछ दिन पहले संसद में मनरेगा (MGNREGA) का नाम बदलने की चर्चा हुई। इससे पहले भी हमने देखा है कि कभी किसी योजना का नाम बदला जाता है, कभी किसी गाँव, शहर, सड़क या स्टेशन का। हर बार तर्क दिए जाते हैं—इतिहास सुधारा जा रहा है, पहचान लौटाई जा रही है, भावनाएँ जुड़ी हैं। 



लेकिन एक आम नागरिक के मन में एक सीधा-सा सवाल उठता है—
क्या नाम बदलने से विकास होता है? और क्या इससे देश के पैसे का नुकसान नहीं होता?

नाम बदलना सुनने में बहुत आसान लगता है। एक प्रस्ताव, एक अधिसूचना और नया नाम। लेकिन हकीकत में यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं होता। जब किसी योजना या जगह का नाम बदलता है, तो उससे जुड़ा पूरा तंत्र बदलना पड़ता है—दस्तावेज़, बोर्ड, वेबसाइट, सरकारी रिकॉर्ड, बैंक खाते, जागरूकता सामग्री, ट्रेन टिकट, नक्शे, दफ्तरों की तख्तियाँ। यह सब बदलने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
यह पैसा आखिर किसका है?
जनता का।

सवाल यह नहीं है कि नाम बदला जाए या नहीं। सवाल यह है कि प्राथमिकता क्या है।
अगर किसी गाँव में आज भी सड़क नहीं है,
अगर मज़दूर को मनरेगा का काम समय पर नहीं मिल रहा,
अगर भुगतान महीनों अटका रहता है,
तो क्या उसका दर्द नए नाम से कम हो जाएगा?

मनरेगा का नाम चाहे जो हो,
मज़दूर को रोज़गार चाहिए,
समय पर मज़दूरी चाहिए,
और सम्मान के साथ काम चाहिए।
अगर नाम बदल गया लेकिन ज़मीन पर हालात वही रहे,
तो यह बदलाव सिर्फ काग़ज़ों तक ही सीमित रह जाता है।

नाम बदलने के समर्थक कहते हैं कि इससे पहचान बदलती है, सोच बदलती है।
लेकिन सच यह है कि सोच नाम से नहीं, नीयत से बदलती है।
जापान, जर्मनी या दक्षिण कोरिया ने तरक्की इसलिए नहीं की कि उन्होंने नाम बदले,
बल्कि इसलिए कि उन्होंने शिक्षा, उद्योग, तकनीक और पारदर्शिता पर काम किया।

कई बार नाम बदलना ऐसा लगता है जैसे
घर की दीवारें रंग दी जाएँ
लेकिन नींव में दरारें जस की तस रहें।
ऊपर से सब नया,
अंदर से सब पुराना।

हाँ, कुछ मामलों में नाम बदलना ऐतिहासिक या सांस्कृतिक रूप से ज़रूरी हो सकता है।
लेकिन जब यह सिलसिला बार-बार, हर मुद्दे पर होने लगे,
तो शक पैदा होता है कि कहीं यह असल मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका तो नहीं।

एक आम आदमी पूछता है—
क्या नाम बदलने से अस्पतालों में डॉक्टर बढ़ेंगे?
क्या इससे स्कूलों में शिक्षक पूरे हो जाएंगे?
क्या इससे किसान की आमदनी बढ़ेगी?
अगर जवाब “नहीं” है,
तो फिर इतना शोर क्यों?

विकास का मतलब नाम नहीं,
काम होता है।
रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और न्याय—
यही असली पहचान बनाते हैं।
इतिहास नाम से नहीं,
काम से याद रखा जाता है।

अगर सरकारें सच में बदलाव चाहती हैं,
तो योजनाओं के नाम नहीं,
उनकी जमीन पर क्रियान्विति बदलनी होगी।
तभी जनता को लगेगा कि कुछ बदला है।

वरना इतिहास गवाह है—
नाम बदलते रहे,
बोर्ड बदलते रहे,
लेकिन ज़िंदगी
वैसी की वैसी ही रही।

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