खामोशियाँ कभी बेवजह नहीं होतीं
क्योंकि कुछ दर्द आवाज़ छीन लिया करते हैं…
ज़िंदगी में हर इंसान कभी न कभी ऐसे मोड़ से गुजरता है जहाँ बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन शब्द साथ नहीं देते। दिल भरा होता है, आँखें भीगी होती हैं, लेकिन जुबान ठहर जाती है। ऐसे ही पलों को हम खामोशी कहते हैं। और ये खामोशियाँ कभी भी बेवजह नहीं होतीं। इनके पीछे छिपा होता है एक गहरा दर्द, एक अधूरी कहानी, या फिर कोई टूटता हुआ रिश्ता।
हम अक्सर सोचते हैं—
"ये क्यों चुप है?"
"क्या बात है?"
पर सच तो यह है कि कुछ दर्द इतने भारी होते हैं कि वह इंसान की आवाज़ ही छीन लेते हैं।
वह बोलना चाहता है, पर बोल नहीं पाता।
वह समझाया जाना चाहता है, पर खुद को समझा भी नहीं पाता।
कई बार खामोशी इंसान के अंदर चल रही लड़ाई की गवाही होती है।
वह जो बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता है, अंदर से शायद बिखर रहा होता है।
जो मुस्कुरा रहा है, शायद छुपा रहा है कि रातों को नींद नहीं आती।
जो दोस्तों के बीच हँस रहा है, शायद उस हँसी के पीछे ढेर सारे टूटे पल छिपे हैं।
कहते हैं—
“सब ठीक है”
दुनिया कहती है “चलो अच्छा है”
लेकिन दिल जानता है कि कहीं न कहीं कुछ खो गया है।
कई बार इंसान इसलिए खामोश होता है क्योंकि उसे डर होता है कि बोल देने से सब कुछ टूट जाएगा।
कभी इसलिए चुप होता है कि कहीं किसी का दिल न टूट जाए।
कभी इसलिए कि जो कुछ उसके भीतर है—
उसका कोई सुनने वाला ही नहीं है।
खामोशी कोई कमजोरी नहीं होती,
ये एक ढाल होती है—
दर्द को दुनिया से छुपाने की,
अपने आप को संभालने की।
इंसान तब चुप नहीं होता जब उसके पास शब्द नहीं होते…
वह तब चुप होता है जब उसके पास बहुत कुछ होता है—
पर वह किससे कहे, कैसे कहे, और क्यूँ कहे…
यह समझ नहीं पाता।
अगर कभी भी आपको कोई खामोश मिले—
तो उसे झकझोरिए मत,
बस उसका साथ दीजिए।
कई बार खामोशी को सुन लेने से भी इंसान ठीक हो जाता है।
क्योंकि…
खामोशियाँ कभी बेवजह नहीं होतीं,
कुछ दर्द आवाज़ छीन लिया करते हैं।a

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