Thursday, June 7, 2018
गुमसुम सी हो गयी रेडियो की वो धुनें....
आज कहीं से अचानक मेरे कानों में पुराने गाने के बोल सुनाई पड़े। बोल थे : नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राजदुलारा, सुनके पहले तो मैंने इधर उधर देखा कि ये आवाज़ आ कहां से रही है। क्यूंकि आजकल की नौजवान पीढ़ी तो बस आजकल के मोड्रन गाने ही सुनती है। तड़क भड़क वाले गीत, जिनमें से कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता। गाने के बोल क्या हैं, कुछ नहीं पता चलता। बस ढिंका चिंका चिंका चिका होती रहती है। मैंने देखा सड़क किनारे एक ढाबे वाले ने रेडिओ चलाया हुआ था। शायद वो रेडिओ नहीं था, है तो मोबाइल ही था, पर मोबाइल में FM चलाया हुआ था। जिसमें ज्यादातर पुराने गीत ही आते हैं, जो कानों में रस घोल जाते हैं। पुराने गीत सुन कर मुझे भी पुरानी यादों ने घेर लिया। पहले ज़माने में शादी में रेडिओ दिया करते थे। मुझे याद है मेरे ताया जी को शादी में रेडिओ मिला था जो शायद आज भी पड़ा होगा। पहले TV जितने बड़े बड़े रेडियो भी होते थे। धीरे धीरे रेडियो का साइज घटने लगा। थोड़े छोटे कर दिए गए। आजकल तो मोबाइल के अंदर ही रेडियो आ गया है। पर शायद कोई कोई होगा जो उसमे रेडियो को ओन करता हो। क्यूंकि पुराने गाने कोई सुनना ही नहीं चाहता। आज किसी के घर में पुराने रेडियो पड़े होंगे तो शायद किसी कोने में धूल खा रहे होंगे। क्यूंकि अब वो बेकार हो चुके हैं। उनका काम अब मोबाइल से होने लगा है। जिसने जो भी गाना सुनना हो MP3 player में से वही सुन लेता है। जब मोबाइल फ़ोन शुरू हुए थे तो रेडियो के साइज भी मोबाइल जैसे ही बना दिए थे। हम रेडियो खरीद कर मोबाइल की फीलिंग ले लेते थे। ऐसा लगता था जैसे हाथ में मोबाइल फ़ोन पकड़ा हुआ हो। मेरे पिता जी के पास जो फ़ोन है, उसमे FM चलता है। उनको एक बार सीखा दिया कि FM कैसे चलता है। तो बस अब हर समय उनके फ़ोन में FM चलता रहता है। रात तक पुराने गाने चलते रहते हैं। कई बार मेरा भी दिल पुराने गाने सुनने को करता है। इसलिए मैंने अपने फ़ोन में पुराने गाने डाले हुए हैं। जब दिल करता हैं, उनको सुन लेता हूँ। पहले रेडियो में बड़ी बड़ी बैटरियां डाली होती थी। आज कल छोटी बैटरियां ही काम चला देती हैं। और तो और अब तो चार्जिंग की सुविधा मिल गयी है। एक बार चार्ज किया, पूरा दिन चलता रहता है। पहले का ज़माना भी क्या ज़माना था, हर तरफ रेडियो की धुनें गूंजती थी। आज कल तो कहीं देखने को भी नहीं मिलते । नाई के खोखे में, चाय की दुकान में, डॉक्टर की दुकान में। हर कोई अपनी दुकान में, घर में रेडियो चला के रखता था। रेडियो का रिवाज़ धीरे धीरे TV के आने से कुछ काम हो गया। मोबाइल ने तो बिलकुल ही ख़तम कर दिया है। आज जहां कहीं भी रेडियो के गाने सुनता हूँ, उनको सलाम करने को दिल करता है, जिसने रेडियो चलाया हुआ है। रेडिओ पर जो पैमाना लगा होता था, उसका तो हमे पता ही नहीं होता था, कि इसका काम काम क्या है इस रेडिओ के अंदर। हम बस घूमते रहते थे, सुई जहां मर्जी जाये, बस जब आवाज़ सही आये, वहां रोक देते थे। कई बार तो सुई घूमते घूमते पैमाने के ऊपर चढ़ जाती थी। और हम बटन घूमते रहते थे। हमें सुई का और पैमाने का काम ही अब मालूम हुआ है। जब रेडिओ शायद कहीं खो से गए हैं।
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