Wednesday, June 27, 2018

क्या आज के सूरज को ज्यादा गुस्सा आता है?

गांव में धुप में खेलते बच्चे

गर्मी! ये नाम सुनते ही सूरज की लाल आँखें हमारी आँखों के सामने आ जाती हैं। जैसे आज कल इमोजी बने होते हैं, सूरज बड़े गुस्से से देखता हुआ, सूरज का वैसा ही चेहरा हमारे सामने आ जाता है। क्या सूरज को अब गुस्सा पहले से ज्यादा आने लगा है, जो आजकल इतनी गर्मी बरसाता है। पहले जैसे नरम दिल था, जो आज सख्त स्वभाव का हो गया है। शायद उसकी भी सहनशक्ति इंसान की तरह कम हो गयी है। पता नहीं किस का गुस्सा पृथ्वी पर निकालता है।  जब हम छोटे थे, आपस में खेलते रहते थे, पर कभी कभी किसी बात से नाराज़ हो कर हम एक दूसरे से लड़ पड़ते थे। तो उसका गुस्सा हम घर पर आ कर निकालते थे, वैसे ही सूरज को भी उसके दोस्तों ने अपने साथ खिलाने से मना कर दिया होगा, जो अपना गुस्सा पृथ्वी पर निकाल रहा है। क्या कभी आपने सोचा है कि उसका ये गुस्सा अब ज्यादा बढ़ गया है या शुरू से ऐसे ही गुस्सैल स्वभाव का था। मुझे लगता है कि वो तो शुरू से ही ऐसा है, पर अब हमें गर्मी ज्यादा लगने लगी है। गांवों में तो लोग आज भी इतना महसूस नहीं करते । ये सिर्फ शहर में रहने वालों को ही इतनी महसूस होती है। पहले लोग खेतों में, या कहीं और धुप में काम करते थे। आजकल शहर में AC वाले कमरों में काम करते हैं। उनको तब तक गर्मी महसूस नहीं होती जब तक वो उस AC  वाले कमरे में हैं। जैसे ही काम ख़तम करके बाहर धुप में निकलेंगे तो उनको लगेगा कि आज तो धुप कहर ढा रही है। दरअसल धुप तो हर रोज़ की तरह ही है। गॉव में धुप में जो लोग काम करते हैं उन्हें गर्मी महसूस ही नहीं होती। मैं जब गांव जाता हूँ, कई बार ताया जी के पास बैठ जाता हूँ, उनको बोलता हूँ कि आज तो गर्मी बहुत ज्यादा है। पर वो बोलते हैं कि हर रोज़ इतनी ही होती है। जैसे ही आसमान में बदल उमड़ पड़ते हैं, दिल बाग़ में मोर की तरह नाचने लगता है। दिल कहता है कि ज़ोरों से बरस जा, और गर्मी को कम कर दे। पर आजकल तो गांव में भी इन्वर्टर आ गए हैं, दोपहर में बच्चे घर में ही खेलते रहते हैं, टीवी देखते रहते हैं। जैसे ही बच्चे धुप में निकलेंगे, उनकी माता जी उनको झट से डांट डपट कर अंदर बुला लेती है और बोलती है कि बाहर धूप है, गर्मी लग जाएगी। बच्चों के मन में भी बैठ गया है कि धुप में जाने से गर्मी लग जाएगी। पहले हम स्कूल से छुट्टी होते ही, घर पर बैग फेंककर बाहर खेलने चले जाते थे। ये भी नहीं देखते थे कि बाहर धुप है, गर्मी लग जाएगी। और सच पूछो तो कभी लगी भी नहीं। और आज जरा सा धुप में जाओ, बस गर्मी लग जाएगी। पहले नींबू पानी हम सिर्फ स्वाद के लिए पीते थे, पर आजकल गर्मी के कारन पीना पड़ता है। पहले भरी दोपहरी में गरम सड़क पर, खेत में, गरम रेत पर खेलते रहते थे। और पांव में चप्पल तक नहीं होती थी। सड़क पर तेज धुप के कारन लुक पिघल जाया करती थी, फिर हम डंडे से उसे खरोच कर इकठी कर लेते थे। उसका गोला बना कर खेलते थे। कभी कभी तो कपड़ों पर भी चिपक जाती थी। जब मम्मी को कपडे धोने होते थे, जब पता चलता कि लुक लगी हुई है, तो उनका पारा भी सूरज के पारे के समान हो जाता था। अपने लिए और मुश्किल तब और बढ़ जाती थी, जब वही लुक बालों में चिपक जाती थी।  या तो कैंची से बाल काटने पड़ते थे, या डीज़ल लगा कर धोने पड़ते थे। हमे डराया भी जाता था कि दोपहर में पेड़ों पर भूत होते हैं, पर हम कहां मानने वाले थे। दोपहर में पेड़ों पर झूले डाल कर खेलना, पील पलंगड़ा, खेलना, जूत पलो, ये सब खेल दोपहर में स्कूल की छुट्टी होने पर ही खेले जाते थे। भूत भी शायद उस समय के बच्चों का इतना उत्पात देखकर भाग जाये। पूरी दोपहर भैंसों को लेकर चराने निकल जाना। गांव में आज भी बच्चों को इस तरह के काम करते देखता हूँ तो अपना बचपन याद आ जाता है। और सुकून सा मिलता है कि चलो हमारे ज़माने के कुछ अंश तो अभी भी बच्चे हुए हैं। आजकल किसी को धुप में कहीं जाना पड़ जाये, पहले तो वो जाने को टाल देगा,  फिर भी अगर जाना ही पड़ गया तो छतरी लेकर जायेगा। जैसे धुप उसका खून ना चूस ले। धुप में सारा मुंह सर कपडे से बांध कर निकलना, जैसे कोई डाकू हो। ये परम्परा लड़किओं में ज्यादा देखने को मिलती है। पता नहीं ये धुप से बचने के लिए करती हैं या आजकल का फैशन है। भगवान् ही जाने।

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