Friday, May 1, 2020

आज गर्मियों का पहला ठंडा आया घर....

गर्मियों में ठंड की बात करने पर एकदम ठंडक ही महसूस होने लगती है। दिल करता है कि गर्मी से निजात पाने के लिए जल्दी से जल्दी कुछ ठंडी चीज मिल जाए, चाहे बर्फ ही मिल जाए। आज मई का महीना शुरू हो चुका है। आज 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वैसे हमारे यहां 24 घंटे बिजली रहती थी, शायद इसलिए कि हमारे गांव के सत्संग घर में कुछ प्रवासी मजदूर जो यूपी और बिहार के थे, लॉक डाउन में फैंस गए थे। उनको सत्संग घर में ठहराया गया था, उनके लिए बिजली का कट नहीं लगता था। जैसे ही वो यहां से चले गए, तभी से पूरे दिन का बिजली कट लगाना शुरू हो गया है। सुबह 9 बजे बिजली चली जाती है और शाम को 6 बजे आती है। गर्मी ने भी लोगों के बल निकले पड़े है। कनक की कटाई हो चुकी है। भूस बनाने वाली मशीनें चल रही हैं। हमारे भी शायद आज शाम को या कल सुबह भूस की मशीन आएगी, एक किल्ले का भूस बनवाना है। 

गर्मी को देखकर घर से निकलने को दिल ही नहीं करता। आज सुबह मेरे चाचा की लड़की ने मुझे कहा कि हमारे छत वाले पंखे में रात को स्पार्किंग हो रही थी, उसे देख कर जाना, हो सके तो ठीक कर देना। 10 बजे के आसपास में उनके घर पंखा देखने गया, तब तक बिजली जा चुकी थी, गर्मी भी बहुत थी। चाचा ने कहा कि पंखे को उतार दो और अन्दर से पंखा उतार कर बाहर बरामदे में लगा दो। मैंने एक सीढ़ी के सहारे चड़कर पंखा उतार दिया। फिर अन्दर कमरे से पंखा उतरने के लिए उनकी लोहे की पेटी के ऊपर चढ़कर पंखा उतरने लगा। पंखे के पास हाथ ठीक से नहीं पहुंच रहा था। गर्मी ने भी ऐसी तैसी कर रखी थी। मैंने टीशर्ट पहन रखी थी जो पसीने से भीग चुकी थी। जैसे तैसे करके मैंने पंखा उतार दिया। फिर बरामदे में उस पंखे को लगा दिया। मैंने सोचा कि चलो काम पूरा हो गया है। परंतु अभी कहां।  

शायद अभी गर्मी को और भी परीक्षा देनी थी मुझे। चाचा ने कहा कि अब को पंखा बरामदे से उतारा था, उसे बरामदे में ही दूसरी तरफ लगा दो, वहां भी पंखे की जरूरत पड़ती है। पहले तो मैंने सोचा कि ये तो कोई बात नहीं बनी, मैंने उंगली पकड़ाई उन्होंने तो कलाई ही पकड़ ली। गर्मी ने बस करवा रखी थी। चाची मंजे पर बैठी पंखा झल रही थी। उस देख देख कर मुझे गुस्सा आ रहा था कि में यहां गर्मी में पंखे लगता फिर रहा हूं, और चाची मौज से मंजे पर बैठी पंखा झल रही है। फिर सोचा कि चलो अब काम शुरू कर है दिया है तो फिर पूरा तो करना पड़ेगा। वैसे तो काम कोई ज्यादा नहीं था, परंतु गर्मी की वजह से बहुत मुश्किल लग रहा था। फिर दूसरी तरफ सीढ़ी लगाकर पंखे को लगाने चढ़ गया। परंतु वहां भी हाथ ठीक से नहीं पहुंच रहा था। सीढ़ी दूर लग रही थी। 

फिर चाचा ने चाची को कहा कि चाय बना लो, ये भी पी लेगा। मैंने सोचा कि पहले ही बहुत गर्मी है। ऊपर से आप चाय पिला दो, में तो पहले ही गरमी से तंग हो गया। जैसे तैसे करके मैंने पंखा लगा दिया। तभी चाचा की लड़की ने कहा कि पहले ही गरमी है, चाय रहने दो, ठंडा ले आते हैं। मैंने मन ही मन सोचा कि ये मेरे लिए भगवान बन कर आई है। इसने मेरे मन की सुनी है। ठंडे का नाम सुनकर मेरी बांछे खिल गई। मैं मन ही मन खुश हो गया। फिर पता ही नहीं कब मैंने बिजली कि तारों के कुनैक्शन भी बना दिए। 

पंखा लगा कर मैं नीचेे उतर आया। चाचा की लड़की ने गिलास में ठंडा डाल दिया। मैंने पहले ना नुकर सी की, कि मैंने नहीं पीना। फिर उसने कहा कि नहीं नहीं ले लो। फिर मैंने ज्यादा मना नहीं किया, सोचा कि कहीं सच में ही ना दे। गिलास पूरा भरा हुआ था। मैंने उसमें से कुछ निकालने की कोशिश की पर उसने निकालने से मना कर दिया। फिर मैंने पूरा गिलास ठंडे का पी लिया। तब मैंने देखा कि मेरा बेटा और बेटी बाहर गेट पर खड़े मुझे बुला रहे थे। में ठंडा पी रहा था, तो मुझे ठीक नहीं लगा। फिर मैं घर आ गया। 

तभी खेत से फोन आया कि खेत में कंबाइन आ गई है, मैथा निकालना है। मैं, पिता जी और चाचा का लड़का बाइक पर खेत में चले गए। करीब एक घंटा हमने वहां मैथा कंबाइन में डाला। उसके बाद बहुत प्यास लगी। मुझे फिर वहीं ठंडा याद आ गया। फिर मैंने एक बोतल में पाइपलाइन से पानी भरके पिया। फिर डेढ़ घंटे बाद हम घर आ गए। मैंने अपनी बेटी को बोला कि जाओ दुकान से ठंडे की बोतल ले आओ। वो जाकर दुकान से ठंडे की बोतल ले आती। सबने ठंडा पिया और गर्मियों की तपिश को कम किया। मुझे भी सुकून मिला कि अब मेरे साथ साथ सबने ठंडा पिया है। शरीर के साथ साथ दिमाग में भी ठंड पड़ गई। 


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