Sunday, May 31, 2020

जहां जिसका जितना दाना पानी होता है, उसी को मिलता ज़रूर है।

मैं कुराली जाने का मन बना चुका था। मैंने रंजीत काका को फोन किया। रंजीत ने कहा कि तुम मोरिंडा आ जाओ, वहीं पर मिलते हैं। उनके किसी दोस्त का जन्मदिन था जिसके लिए होटल में पार्टी रखी थी। मैं दोपहर को 2 बजे मोरिंडा होटल में पहुंच गया। आधे घंटे बाद वो भी वहीं आ गए। शाम को पार्टी का इंतजाम किया हुआ था। शाम तक हम वहीं होटल में ही रहे। शाम को 6 बजे उनके बाकी दोस्त भी आने शुरू हो गए। 8 बजे सभी पहुंच चुके थे। केक काटने के बाद सभी के लिए मेज और कुर्सियों का प्रबंध किया गया। सभी कुर्सियों पर सज गए। सामने मेज पर सबके खाने के लिए समान आने लगा। शराब की बोतलें, कोलड्रिंक, चिकन, वेग रोल, पनीर टिक्का। कुल 35-40 मेहमानों में से मेरे साथ एक दो ऐसे थे जो शराब, चिकन वगैरा नहीं खाते थे। सभी अपनी अपनी मौज मस्ती कर रहे थे। 

मेरा एक जानकार तो सिर्फ रंजीत ही था, वो भी अपने उन्हीं दोस्तों में मशगूल था। कभी कभी मुझे आवाज़ देकर मुझे अपने साथ होने का अहसास करवा देता था। में सोच था था कि अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने में।मज़ा आता है, परंतु जब पार्टी दोस्त के दोस्त की हो तो सोच समझ कर हो जाना चाहिए। परंतु में बिन बुलाया मेहमान भी नहीं था और बुलाया हुआ भी नहीं था। मैं तो वैसे ही अनजाने में पहुंचा हुआ था। कहते हैं कि जिसका झन दाना पानी होता है, वहीं उसको मिलता है। ये सोच कर मैं अपने आप को इस पार्टी का हिस्सा समझ रहा था।


हमने कोलड्रिंक लिया और बाकी सभी ने शराब, बीयर ली। मेरे पास बैठे सभी चिकन डाल डाल कर खाने लगे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इनके बीच मैं कैसे बैठूं। चिकन की गंध भी आ रही थी। पर में बैठा रहा। फिर कुछ वैष्णो सामान आया खाने के लिए, जैसे पनीर टिक्का, वैग रोल। पर मुझे पनीर टिक्का ही मिला। मैंने टिक्का खाने के बाद केक खाया। थोड़ी थोड़ी देर में कुछ कुछ मेहमान जाने लगे थे। साढ़े 9 बजे 12-13 लोग ही रह गए थे। फिर वेटर खाना ले कर आ गया। सभी खाना खाया। 10 बज चुके थे। फिर सभी जाने के लिए होटल के बाहर आ गए। शाम को थोड़ी बारिश हुई थी जिससे मौसम ठंडा हो गया था। 

मैं  बाइक पर बैठ कर कुराली के लिए निकल पड़ा। 15 मिनट के बाद बाद में कुराली पहुंच गया। रंजीत के घर के बाहर रुका तो तीन चार कुत्तों ने मुझे घेर लिया और भौंकने की बरसात कर दी। एक चुप होता तो दूसरा भौंकने लगता। मैंने सोचा कि रात के समय लोग सोचेंगे कि कुत्ते भोंक रहे हैं, कहीं कोई चोर ना आ गया हो। इसलिए मैं बाइक स्टार्ट करके बाहर सड़क पर आ गया और रणजी का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद रंजीत भी कार में कुराली आ गया। हम उसके घर चले गए। घरवाले सभी सो चुके थे। 

हम भी सोने की तैयारी करने लगे। लेकिन अभी नींद नहीं आ रही थी। बातें करते हुए हमें ढाई बज गए थे। फिर हमने अपनी बातों को विराम दिया और नींद की आगोश में चले गए। सुबह उठकर नहा कर तैयार हो गए। तभी रंजीत का भांजा शिवी आलू के परांठे ले आया। दहिं, मखन और अचार के साथ परांठे खाए। पेट भर चुका था, फिर चाय पी और रंजीत को अलविदा कहा।

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