Tuesday, May 5, 2020

बादलों की गड़गड़ाहट ने किसी को खुश किया, किसी को निराश

दोपहर का खाना खा कर हम सभी तैयार हो गए लेकिन विक्की अभी भी सो रहा था। उससे पहले तो संजय ने जगाया लेकिन वो मना करता रहा। कहने लगा कि मेरी तो कमर में दर्द हो रहा है। मैं नहीं जाऊंगा। फिर मैंने उसे कई बार जगाया लेकिन को उठने को तैयार ही नहीं हुआ। आखिर हम तीनों ही विक्की हो छोड़कर खेत में चले गए। पहले ही दिन दो बंदे कहते से वापस चले गए। दिल तो हमारा भी नहीं कर रहा था। परंतु जाना तो पड़ेगा ही। फिर खेत का मालिक वहां गेड़ा मारने आया तो उसने कहा कि तुम तीनों काट दोगे इसे। कुछ औरतों को पूछ के शामिल कर को। 

शाम को घर जाकर संजय कुछ औरतों से जाने के लिए पूछने लगाम आखिर तीन औरतें तैयार हो गई। परंतु उन्होंने एक शर्त रखी कि हम दिहाड़ी के बदले में गेहूं का अनाज लेंगे। अगले दिन सुबह हम छे बंदे हो गए मेथी काटने के लिए।  बीच में एक दिन बरसात ने भी हमें आराम करने पर मजबूर कर दिया। हम सभी बैठे मेथी काट रहे थे तभी बादलों के आने का संदेश मिला। बादल ब्दी जोर जोर से गरजने लगे

 एक तरफ तो दिल खुश हो गया कि चलो अब ठंड हो जाएगी। बूंदाबांदी सी होनी शुरू हो गई। लेकिन हम सभी अपने काम में लगे रहे। चाय का समय भी हो चला था। चाय और पानी पिलाने का काम मेरे ही जिम्मे था। सुबह के साढ़े दस बज रहे थे। मैं चाय बनाकर ले आया। 

हमने चाय पी। फिर काम पर लग गए। बूंदाबांदी काम हो गई थी। एक औरत ने तो घास की पल्ली को अपनी पीठ पर बांध लिया बरसात से बचने के लिए। एक दिन का काम बाकी रह गया था। सभी अरदास करने लगे कि आज बारिश ना पड़े तो आज शाम तक काम निपट जाएगा। लेकिन बादलों कि गड़गड़ाहट का शोर बढ़ता ही जा रहा था। सभी अपनी अपनी तरफ से कुछ ना कुछ बोले ही जा रहे थे। एक औरत कहती की है परमात्मा क्यों घड़े से फोड़ रहे हो, कर लेने दो हमें काम। संजय ने कहा कि बादल जल्दी से आजा, हम सभी घर चले जाएंगे। मैंने भी बीच में अपना स्टल्ला छोड़ दिया। मैंने कहा कि बादल तुम्हारी ये बैंड बाजे बजाने की आवाज ही अच्छी लग रही है। ऐसे ही बजते रहो, पर बरसो मत। 

मुझे डर था कि अगर आज काम रह गया तो कल फिर आना पड़ेगा। इसलिए आज ही काम खत्म करके जाएंगे। पर शायद बदल ज्यादा घने होने कि वजह से हमारी आवाज़ वरुण देवता तक नहीं पहुंच सकी। बरसात तेज हो चुकी थी। हमने अपनी अपनी दरांती वहीं रखी और बाइक पर घर आ गए। घर आने  के बाद थोड़ी देर में धूप भी निकल आई। तब तक दोपहर हो चुकी थी। हमने खाना खाया और आराम किया। शाम के चार बजे हम फिर खेत के लिए निकल पड़े। खैर वो दिन भी आ गया जब हम मेथी काट कर फ्री हो गए। मेथी काटे हुए तीन चार दिन हो चुके थे। अब उसको कंबाइन से निकालना था। हम खेत में ही थे जब शाम को कंबाइन खेत में पहुंच गई। उन्होंने कहा कि कल सुबह 8 बजे आ कर कंबाइन में डलवा देना। 

अगले दिन सुबह हम तीनों खेत में पहुंच गए। लेकिन वहां कोई भी नहीं था। तभी संजय ने जाकर पूछा कि कब चलेगी मशीन। उसने कहा कि दोपहर 12 बजे चलेगी। फिर हम 12 बजे खेत में पहुंचे। तीन हम थे और 6-7 बिहारी मजदूर भी वहां पहुंच गए, वो भी पास में ही गन्ना छील रहे थे। हमने एक घंटे में पूरी मेथी निकलवा दी। एक घंटे में ही हमारी शक्ल बिल्कुल खराब हो चुकी था। मशीन से धूल ही धूल निकल रही थी। वहां से फ़्री होकर हम घर आ गए। नहा धोकर खाना खाया और सो गए। शाम को खेत में जाकर भूस का कूप बांधने की तैयारी भी करनी थी। 

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